कहानी: दरवाज़ा खोलो ! - उपासना सियाग | HIndiKahani 'Darvaza Kholo' - Upasna Siyag


दरवाज़ा खोलो .....!

उपासना सियाग

" दरवाज़ा खोलो !!"

     " ठक ! ठक !! दरवाज़ा खोलो !!!

    रात के तीन बजे थे। सुजाता ठक -ठक की आवाज़ की और बढ़ी चली जा रही थी। बहुत बड़ी लेकिन सुनसान हवेली थी। चलते -चलते तहखाने के पास जा कर सुजाता के कदम रुक गए। कमरे का दरवाज़ा हल्का सा खुला था। नीम रोशनी में देखा दुल्हन का सा लिबास पहने  फूल कँवर खड़ी थी।

कहानी: दरवाज़ा खोलो ! -  उपासना सियाग | HIndiKahani 'Darvaza Kholo' - Upasanaya Siyag

      " यह यहाँ कैसे ! यह तो मर गई थी ! फिर क्या करने आयी है ? "सुजाता का कलेजा जैसे मुहँ की ओर आ गया हो।फूल कंवर  उसकी और देखती हुई मुस्कुराये जा रही थी।

           बहुत बरस हुए फूल कंवर को अपने देवर की दुल्हन बना कर लाई थी। तब भी  मुख पर ऐसी ही प्यारी सी मुस्कान थी। देवर वीरेश को पुत्र की तरह पाला था। वीरेश की माँ ,सुजाता के पति राज सिंह की सौतेली माँ थी। वीरेश छोटा ही था तब उसकी माँ भी चल बसी। ठाकुर साहब ने बड़े बेटे राज सिहं की शादी कर दी। सुजाता ने वीरेश को मातृवत्त स्नेह दिया। यह स्नेह और भी गहरा हो गया , जब उसका पति और ससुर दोनों पारिवारिक रंजिश में मार दिए गए।

      अब दोनों देवर भाभी रह गए  इतनी बड़ी हवेली और जायदाद के साथ। बहुत मुश्किल से वीरेश की परवरिश की। युवा  होने पर सुजाता को राय दी गई की अब उसे वीरेश का ब्याह कर लेना चाहिए। परिवार बढ़ेगा। रौनक लगेगी। वंश भी तो आगे बढ़ेगा ! वह चाहती तो नहीं थी कि वीरेश का विवाह हो , लेकिन चाहने से क्या होता है।

      सुकुमार सा वीरेश और फूलों सी फूल कंवर। बरसों बाद हवेली में रौनक लगी थी। सब खुश  थे कि अब हवेली में छाई उदासी हट जाएगी और खुशियां ही खुशियां होगी। आज दुल्हन के शुभ कदम पड़े हैं। कल को खानदान  के वारिस की किलकारियां भी गूंजेगी।

        लेकिन  सुजाता खुश क्यों नहीं थी ! उसे वीरेश छिनता हुआ क्यों नज़र आ रहा था। उसने ,उसे पाल  पोस कर बड़ा किया था। बैरियों से बचा कर रखा। क्या हुआ जो वीरेश को जन्म नहीं दिया। पाला  तो एक माँ ही की तरह था। तो फिर उलझन क्या थी ?  क्यों सुजाता वीरेश को फूल कंवर के वजूद को सहन नहीं कर पा रही थी ? माँ थी तो माँ की तरह ही व्यवहार करती ना ! यह सौतिया डाह उसे क्यों डस रहा था ? सीने पर सांप लौट रहे थे। वह चहलकदमी कर रही थी तेज़ी से। सांस तेज़ चल रहा था जैसे कि रुक ना जाये कहीं।

        सहनशक्ति जब असहनीय हो गई तो वह दौड़ पड़ी वीरेश के कमरे की तरफ। दरवाज़े पर आ कर रुकी। ह्रदय से एक पुकार भी उठी कि वह यह क्या करने जा रही है। लेकिन स्त्री के एकाधिकार की प्रवृत्ति कई बार सोचने समझने की शक्ति खत्म भी कर देती है। वह बुदबुदा उठी ," नहीं , वीरेश मेरा है ! मेरा बच्चा है ! इसे कोई दूर नहीं कर सकता मुझसे ! " दरवाज़ा पीटने लगी।

     " दरवाज़ा खोलो !! दरवाज़ा खोलो !! "

        वीरेश ने घबरा कर दरवाज़ा खोला। सुजाता उसे धकेल कर अंदर चली गई। कमरे में इधर -उधर नज़र दौड़ाई और आश्वस्त सी हो गई। कहीं कोई हलचल नहीं दिखी। कमरे में सजाये फूल अभी अनछुए से ही थे। गहरी साँस भर कर वीरेश के पास जा कर अपने आँचल से उसका माथा पोंछने का उपक्रम करने लगी।

   " अरे मेरे बच्चे !! कितनी गर्मी है यहाँ ! चल मेरे साथ ! मैं हवा में सुलाती हूँ !! " नव वधु को आग्नेय दृष्टि से देखती वीरेश को खींचती ले गई।

    और फूल कंवर ! वह एक दम से घटित हुई घटना से सकते में आ गई थी, उन दोनों के पीछे बढ़ी तो थी। लेकिन लाज ने कदम रोक दिए। जिन आँखों में नव जीवन के सपने भरे थे , उनमें आंसू भर गए। वहीँ जमीन पर बैठ गई। रोती  रही ...., फिर ना जाने कब आँख लग गई।

        उधर वीरेश ने कमज़ोर आवाज़ में प्रतिरोध भी किया कि गर्मी नहीं है  और होगी तो पंखा चलाया जा सकता है। वह सुजाता का अधिक विरोध नहीं कर पाया। मन की भावनाओं पर संकोच हावी हो गया। वह भी वहीँ सो गया।

          तीन महीने बीत गए।  सुजाता ने कोई न कोई बहाना बना कर वीरेश और फूल कंवर को एक छत के नीचे एक होने ही नहीं दिया। फूल कंवर सहमी सी रहती और वीरेश संकोच में रहता।  अपने मन की बात कभी कह ही नहीं पाया। फूल कंवर मायके भी जाती तो वीरेश को बहाने से घर पर ही रोक लिया जाता। सुजाता ने जैसे प्रण ही कर लिया था कि अगर उसे सुख नहीं मिला तो वह दुनिया की किसी भी औरत को सुखी नहीं रहने देगी।

        दिन -रात  समान हुए हैं कभी ! मौसम भी भी तो बदलते हैं। फिर फूल कंवर के जीवन में ईश्वर ने पतझड़ और गर्म लू तो नहीं लिखी थी ! संयोग से सुजाता को मायके से बुलावा आ गया और उसे जाना पड़ा। आशंकित तो थी वह लेकिन कोई बस नहीं था हालात पर।

        अब वीरेश और फूल कंवर अकेले ही थे। उस रात बहुत बारिश हुई। छाई उमस खत्म हो गई।  हवा का ठंडा झोंका दोनों के हृदय को सुकून दे रहा था। ह्रदय का सुकून चेहरे पर गुलाब खिला रहे थे। तीन -चार दिन बाद सुजाता लौट आई। दोनों के चेहरों पर खिले गुलाब उसके हृदय में काँटों की तरह चुभ रहे थे।

          सुजाता ने अब भी अपना नाटक जारी रखा। रात होते ही पीड़ा का नाटक शुरू होता जो भोर होने तक थमता। फूल कंवर के जीवन में क्या चार दिन की चांदनी ही थी ?

      " नहीं शायद ! "

      उसे कुछ दिनों से कुछ अजीब सा महसूस हो रहा था। तबियत भी गिरी-गिरी  सी थी शायद ये किसी नन्ही जान के आने की आहट थी और उसे ही पता नहीं था।  लेकिन सुजाता को भान हो गया था। वह तड़प उठी। सर को , हाथों को दीवार पर मारा। खुद को लहूलुहान कर लेना चाहती थी। लेकिन तभी कुछ सोच कर फूल कंवर के कक्ष की तरफ भागी। उसे बालों से पकड़ कर बाहर ले आयी।

         मासूम फूल कंवर घबरा गई। रोते हुए कारण पूछने लगी कि उसका क्या कसूर है ?

" कसूर पूछ रही हो ? बताओ कहाँ जाती हो  ? किस से मिलती हो ? किसका पाप है ?  "

" मैंने कोई गलत काम नहीं किया ! यह तो आपके देवर का ही जिज्जी .....! "

 " झूठ मत बोलो ! अभी वीरेश को बुलाती हूँ ! "

वीरेश खुद ही वहां पहुँच गया था शोर की आवाज़ सुन कर।

 " बोलो वीरेश ! ये क्या कह रही है ? पाप किसी और का लिए घूम रही है और नाम तुम्हारा ले रही है !! "

" हाँ बोलो , तुम बोलते क्यों नहीं कि यह बच्चा तुम्हारा ही है !! " फूल कंवर हाथ जोड़े गिड़ गिड़ा  रही थी।

        कायर निकला वीरेश। गर्दन झुका दी। ख़ामोशी दो तरफा होती है। हां भी और ना भी। सुजाता ने इसे ना समझा। जबकि वह यह जानती थी कि फूल कंवर सच बोल रही थी।

        कैसी विडंबना थी ! वीरेश को मालूम था कि फूल कंवर सच बोल रही थी फिर भी चुप रहा।  ऐसा भी क्या भय था उसे जो सच का साथ ना दे सका। सुजाता को वीरेश की ख़ामोशी का बल मिला। वह  फूल कंवर को घसीटती हुई तहखाने में ले गई और बंद कर दिया। फूल कंवर की आर्त पुकार कोई नहीं सुन रहा था। नौकर भी थे लेकिन वे सब हुकुम के गुलाम और बेजुबान थे। किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि  मालकिन का विरोध कर सकें।

       सुजाता ने वीरेश को मज़बूर कर दिया कि वह उसकी बात माने और रात को तहखाने में ले कर गई। सुजाता में बेसुध फूल कंवर के प्रति नफरत ना केवल शब्दों और आँखों से बल्कि रोम -रोम से फूट रही थी।

   " वीरेश , मार डाल इस कुलक्षिणी को ! यह जीने के लायक नहीं है !! "

फूल कंवर  तीन दिन से भूखी थी। बोलने की भी क्षमता नहीं थी उठती  तो क्या ! पड़ी रही। मौत की बात सुन कर कांप उठी। जमीन पर घिसट कर दीवार की तरफ सरकने की कोशिश की। लेकिन जो सात जन्म का वादा कर के हाथ पकड़ कर लाया था वही साथ नहीं निभा पाया तो शिकायत किस से !

       सुजाता ने फूल कंवर को घसीट कर चारपाई के पास पटक दिया। चार पाई का पाया उसके कलेजे पर रख दिया। वीरेश को कहा कि वह पाये पर जोर दे कर फूल कंवर को मार डाले। वीरेश के एक बार तो हाथ कांपे लेकिन ना जाने क्या डर था उसे भाभी का।  आदेश का पालन हुआ। मर गई फूल कंवर ! मर गई या जी गई यह तो कौन बताता। परन्तु ईश्वर जो दुनिया बनाता है , सबका रक्षक होता है। वह क्यों नहीं आया।

        जब कोई पुरुष स्त्री पर अत्याचार करता है तो इंसानो की ना सही लेकिन ईश्वर की अदालत में इंसाफ की उम्मीद जरूर की जाती है। यहाँ एक स्त्री थी दूसरी स्त्री पर अत्याचार करने वाली। ईश्वर स्तब्ध हो जाता है ऐसे दृश्य देख कर। वह हैरान हो जाता है कि स्त्री को बनाते हुए वह पांच तत्वों को गूंधते हुए कुछ ईश्वरीय अर्क भी समाहित करता है। यही ईश्वरीय अर्क स्त्री के दया और ममता भर देता है। फिर कोई स्त्री इतनी क्रूर कैसे हो सकती है ?

           भोर होने पर खबर फैला दी गई कि फूल कंवर  करंट लगने से मर गई। उसके शव के पास सुजाता का विलाप दिलों को जैसे चीर रहा था। माहौल बेहद ग़मगीन था। परन्तु यह विलाप कैसा था ? इसमें तो जैसे आल्हाद छुपा था। वीरेश खामोश था। मन में कुछ नहीं था। ख़ुशी नहीं थी तो गम भी नहीं था।

            फूल कंवर चली गई तो क्या हुआ। रागिनी आ गई। उसे तो आना ही था। घर सूना कैसे रहता। वंश भी तो बढ़ाना था।

         सुजाता ने रागिनी के साथ भी वही खेल शुरू कर दिया जो फूल कंवर के साथ करती थी। नव -वधु ने कुछ दिन तो देखा। फिर सोच -विचार कर कुछ निर्णय किया। वह सुजाता के कक्ष में गई।  लाज संकोच छोड़ कर वीरेश से बोली , " आप हमारे कक्ष में चलें। जिज्जी की सेवा करने को मैं हूँ। वह जब तक नहीं सो जाती मैं उनके पैर दबाती रहूंगी। "

         वीरेश भी शायद यही चाहता था। बस हिम्मत ही नहीं कर पा रहा था। पिंजरे से आज़ाद हुए पंछी की तरह जल्दी से बाहर निकल गया। रागिनी धीरे से सुजाता के पैरों की तरफ झुकी। सुजाता ने झट से पैर खींच लिए। खड़ी हो कर रागिनी पर तमाचा मारने को हाथ उठाया। रागिनी ने हाथ पकड़ लिया ! हर स्त्री तो फूल कंवर नहीं होती न !

      " देखो जिज्जी ! माँ हो तो माँ ही बनी रहो ! सौतन बनने की कोशिश ना करो !! " हाथ झटक कर कक्ष से बाहर आ गई।

           यह तो होना ही था एक दिन ! हर स्त्री तो फूल कंवर नहीं होती न ! सुजाता की बारी थी अब सकते में आने की !

             जीवन की गाड़ी चल पड़ी वीरेश की। वह खुद को अपराधी तो मानता था फूल कंवर का लेकिन कर भी क्या सकता था। हालाँकि रात के सूनेपन में एक चीख उसे जगा जाती थी। उसके बाद वह सो नहीं पाता था। अपने गुनाह के बारे में रागिनी को भी क्या बताता ।

          रागिनी ! उसे जीवन के सभी रागों को सुर में ढाल कर गाना आता था। अब उसे मातृत्व का सुर ढाल कर ममता का गीत गाना  था। वीरेश बहुत प्रसन्न था लेकिन सुजाता ! वह तो खुश होने का दिखावा भी नहीं कर पा रही थी। अलबत्ता कोई न कोई कोशिश होती कि रागिनी का गर्भ समाप्त हो जाये। यह राज़ एक दिन वीरेश पर भी खुल गया। वह रागिनी को लेकर अलग घर में चला गया।

उपासना सियाग
बी एस सी , जयपुर, ज्योतिष रत्न ( आई ऍफ़ ए एस ,दिल्ली )
प्रकाशित रचनाएं: 6 साँझा काव्य संग्रह, ज्योतिष पर लेख ,कहानी और कवितायेँ  विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं में छपती  रहती है।
संपर्क: नई सूरज नगरी
गली नंबर -7, 9वां चौक
अबोहर ( पंजाब ) - 152116
ईमेल:upasnasiag@gmail.com
मोबाईल:08054238498
         सुजाता  क्या करती ? उसने तो वीरेश को माँ बन कर पाला था।  निःस्वार्थ ! बेशक निःस्वार्थ ! उसके अवचेतन मन में यही था कि जो भी उसे मिलता है छिन जाता है। इसलिए वह वीरेश के प्रति असुरक्षित थी। पारिवारिक रंजिश की वजह से और परदे की वजह से भी वह बाहर की दुनिया से अधिक सम्पर्क नहीं बना पाई। अपने ही खोल में सिमटी रही। काश कि कोई सुजाता को समझने वाला होता तो वह ऐसी नहीं होती। खुले दिल से वीरेश की दुनिया बसते देखती।

            उसका अकेलापन और बढ़ गया। सूनी हवेली में वह अकेली थी। पागलों की तरह यहाँ वहां हर कमरे में भागती। उसकी चीखों से सारी  हवेली तड़प उठती। रागिनी एक समझदार औरत थी उसने वीरेश को सुजाता के ईलाज करवाने को कहा। कहा कि वह सुजाता के प्रति जिम्मेदारी से मुहं नहीं मोड़ सकता। आखिर उसी ने तो उसकी परवरिश की थी।  ईलाज से तन ठीक होते हैं मन नहीं। हालात से समझोता करने के अलावा सुजाता के पास कोई चारा भी नहीं था।

              कलेजे में हूक सी उठती थी सुजाता के और वीरेश के भी। दोनों को ही उनका पाप जीने नहीं दे रहा था। वीरेश के घर में खुशियां तो आई थी लेकिन कभी हृदय से महसूस नहीं कर पाया। कभी हँसता भी तो फूल कंवर का मरता , दर्द भरा चेहरा सामने खड़ा हो जाता। उसे याद था कि कैसे फूल कंवर के चेहरे पर दर्द था। वह चली गई चिता की अग्नि में भस्म हो गई। दर्द यही छोड़ गई , सुजाता और वीरेश के हिस्से में।

                सुजाता को लगता कि फूल कंवर उसके आस -पास ही मंडराती है। वह भयभीत रहती थी। किसी नौकर या नौकरानी को हवेली में रहने ही नहीं देती थी। रात को बार -बार दरवाज़े पर अंदर लगी कुण्डियां जांचती। चलती तो ऐसे लगता कि कोई साया उसके साथ -साथ चल रहा है।

        " आओ जिज्जी ! मेरे साथ चलो !" फूल कंवर बोली तो सुजाता बुरी तरह से चौंक उठी। अतीत की तन्द्रा से जाग गई हो जैसे।

       " नहीं !! मैं तुम्हारे साथ क्यों जाऊँ ? तुम हट जाओ मेरे सामने से ! चली जाओ !! "

पता नहीं यह फूल कंवर का भूत था या मन का वहम। भूत या वहम नहीं था तो यह सुजाता का पाप तो जरूर था जो आज उसके सामने खड़ा था। वह दौड़ पड़ी मुख्य दरवाज़े के पास।

     चीख रही थी ,   " दरवाज़ा खोलो !!" दरवाज़ा पीट रही थी !   " दरवाज़ा खोलो !!" अंदर से बंद दरवाज़े खुलें है भला कभी !!

  दरवाज़ा खोलने के लिए कुण्डी उसके सामने थी लेकिन वह बाहर से दरवाज़ा खुलने का इंतज़ार करती रही। काश कि वह अपने मन का दरवाज़ा बंद ना करती।
     
सुबह दरवाज़ा तोडा गया तो सामने सुजाता मरी पड़ी थी। लहू लुहान , रक्त रंजित कलेजा फटा पड़ा था। सुना था की उसे पेट में कैंसर हो गया था , शायद वही फूट गया हो। या क्या मालूम फूल कंवर ने ही ?




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