मैं घर छोड़ना नहीं चाहता था - नीलाभ अश्क | Who is right Bhumika Dwivedi orNeelabh Ashk


भूमिका द्विवेदी नीलाभ अश्क neelabh ashq Bhumika Dwivedi

मैं घर छोड़ना नहीं चाहता था  

- नीलाभ अश्क

नीलाभ अश्क और भूमिका द्विवेदी की 'भड़ास4मीडिया' और उनकी अपनी-अपनी फेसबुक वाल पर कही गई बातों को पढ़ कर, जिस तरह की असमंजस की स्थित बनी, उससे निकलने के लिए मैने नीलाभ जी से कुछ सवाल पूछे, उन्होंने जो जनाब दिए वो और 'भड़ास4मीडिया' से हुई बातचीत दोनों यहाँ लगा रहा हूँ, असमंजस दूर हो और उन दोनों की समस्या हल हो, यही कामना है। 

भरत तिवारी


#नीलाभ जी भूमिका ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा है कि आपने उसे अमानवीय तरीके से पीटा, क्या यह सही बात है?

नीलाभ:  नहीं, वह झूठ बोल रही है, मैंने उसको छुआ भी नहीं. बल्कि उसने ही मेरा चश्मा छीन कर तोड़ डाला। एक बार मैंने भूमिका से कहा था -- "हमारे घर में औरतों पर हाथ उठाने की परम्परा नहीं है"। इस पर भूमिका ने जवाब दिया था ,"हमारे घर में हर औरत पिटी है, मेरी माँ समेत"। तब मैंने कहा था, "यह तुम्हारे घर की परंपरा होगी लेकिन तुम मेरे घर में रह रही हो और हमारे यहाँ पति पत्नियों पर हाथ नहीं उठाते". इसके अलावा, जिस दिन का वह मुझ पर कथित मारपीट का आरोप लगा रही है, उस रोज़ दिन के एक बजे से रात के बारह बजे तक मैं पुलिस की मौजूदगी में था और पुलिस की मदद से ही अपनी कार वापस ला पाया।
# कार की ऐसी क्या ज़रूरत पड़ गयी आपको?
नीलाभ:  कार की ज़रूरत ! इसलिए कि मैं पेशे से एक लेखक हूँ मुझे भिन्न-भिन्न प्रकाशकों के पास जाना होता है, कार की ज़रूरत मुझे नहीं होगी तो क्या घर में बैठी भूमिका को होगी, जो आराम से घर बैठ कर ज़िन्दगी गुज़ारना चाहती है.
#लेकिन पुलिस को साथ ले जाने की क्या आवश्यकता थी?
नीलाभ:  भई, उसने चाभियाँ देने से इनकार कर दिया था। पुलिस को भी आसानी से नहीं दीं. कल को यदि गाड़ी के साथ कोई दुर्घटना घट जाती तो आखिर कौन जिम्मेवार होता ? मैं ही होता ना, जब गाड़ी मेरे नाम है। 


नीलाभ अश्क की भड़ास4मीडिया से बातचीत

प्रसिद्ध साहित्यकार उपेंद्रनाथ अश्क के पुत्र एवं जाने माने लेखक-रंगकर्मी नीलाभ अश्क ने कई दिन बाद आज अपने घरेलू घटनाक्रम में चुप्पी तोड़ी। भड़ास4मीडिया से अपना दुख-दर्द साझा करते हुए उन्होंने कहा कि जो कुछ हो रहा है, ठीक नहीं है। मेरे लिए असहनीय है। मैं मर्यादाओं की सीमा तोड़कर ऐसी नीजी बातें सार्वजनिक रूप से साझा नहीं करना चाहता था लेकिन मुझे विवश किया गया है। बाकी जिन्हें करीब से सारी सच्चाई मालूम है, वे भी मेरी अप्रसन्नता के साथ भूमिका द्विवेदी उनकी मां की ताजा घिनौनी हरकतों पर क्षुब्ध और अचंभित हैं। मेरा पूरा अतीत देश के ज्यादातर हिंदी साहित्यकारों, पत्रकारों, रंगकर्मियों, सामाजिक सरोकार रखने वाले लोगों के बीच सुपरिचित है। मुझे अपने रचनाकर्म, अपनी आदमियत और अपने शानदार पारिवारिक अतीत के बारे में कुछ नहीं बताना है। मुझ पर थोपे जा रहे घटिया लांछन विचलित करते हैं, इसलिए अब कुछ कहना आवश्यक हो गया है। 

उन्होंने कहा कि भूमिका द्विवेदी लगातार झूठा प्रचार कर रही हैं। उसके पीछे और कोई बात नहीं, सिर्फ इतनी भर मंशा है कि मैं उस घर में दोबारा न लौटूं और उसमें वह अपनी मां के साथ आजीवन रह सकें, साथ उनके निजी दोस्तों के साझा होने में मैं आड़े न आऊं। मेरे अलावा भी बहुत संख्या में ऐसे लोग हैं, जिन्हें भूमिका के तौर तरीकों के बारे में कुछ कम मालूम नहीं, अच्छी तरह से उन्हें जानते हैं। मैंने तो आखिरी तक निभाने का प्रयास किया है। पानी नाक से ऊपर हो गया और भूमिका की मां ने जब घर न छोड़ने पर तरह तरह की धमकियों, गाली-गलौज का सहारा लेना शुरू किया, तब उन्हें वहां से हट जाना ही उपयुक्त लगा।    

उन्होंने कहा कि भूमिका सारी बातें झूठी और मनगढ़ंत तरीके से दुष्प्रचारित कर रही हैं। उनकी रोज रोज की घटिया हरकतों से लोनी पुलिस चौकी का स्टॉफ भी क्षुब्ध है। एक पुलिस वाले ने परसों यहां तक कहा कि अगर ये मां बेटी कहीं देहाती क्षेत्र में होतीं, तो गांव वाले ही इन्हें इनकी इस तरह की हरकतों का मजा चखा देते। अब तो उसका नाम लेते भी शर्म आ रही है। मैंने उससे रिश्ते में भी साफगोई रखी थी। 

उन्होंने कहा कि शादी से पहले मैंने तो अपने मित्र उमेश सिंह के कहने पर उसे अपने यहां एक रंगकर्मी के रूप उसकी मदद एवं काम करने के लिए बुलाया था। तब मैं उसे जानता भी नहीं था। उन दिनों वह मुझे मीठे-मीठे ई-मेल करती रहती थी। परिचय के बाद जब मैंने उमेश सिंह के कहे अनुसार उसे पहली बार अपने यहां बुलाया तो उसने कहा, अकेले नहीं आती, आओ मुझे ले जाओ। मैंने उसे तब साफ मना कर दिया था। फिर बोली थी कि गाड़ी भेजो, तब आऊंगी। फिर मैंने अपने भतीजे को फोन किया। भतीजे की मौसेरी बहनें मेरे यहां आ रही थीं। मैंने कहा, उनके साथ गाड़ी में आ जाओ। तब भी नहीं आई। बाद में खुद आ गई। 

भारी मन से दुखद अतीत के पन्ने पलटते हुए नीलाभ अश्क ने कहा कि जिस समय वह मेरे यहां आई, मेरी पहली पत्नी मर चुकी थी। घर पर बेटी थी। रात में वह मुझे अपनी पलंग पर बुलाने लगी। तब मैंने अगले दिन उससे पूछा कि क्या तुम मुझसे शादी करना चाहती हो। वह पहले से इसके लिए मन बनाकर आई हुई थी। दरअसल, उसके पीछे जो उसकी दूरगामी मंशा थी, उसी का अब विस्फोट हुआ है। खैर, शादी हो गई। यद्यपि उस समय मेरे कुछ साथियों ने ऐसा करने से मना किया था और उसके बारे में पूरी जानकारी भी दी थी, लेकिन निर्णय गलत रहा। मैंने उससे शादी की बात पूछ कर ही अपने पांव में कुल्हाड़ी मार ली थी। उम्रदराज हूं लेकिन आर्यसमाज के सर्टिफ़िकेट हैं। आंख में धूल झोंककर मैंने शादी नहीं की है।  

उन्होंने बताया कि उसके कुछ समय बाद मेरे उम्र की दुहाई देते हुए भूमिका ने मुझसे अपने भविष्य की सुरक्षा के नाम पर चाहा कि पहली पत्नी के नाम का मकान मैं उसके नाम कर दूं। मकान अपने नाम करा लेने के बाद शुरू हुआ उसकी मां का असली खेल, जो पर्दे के पीछे से रणनीति बना रही थी, क्योंकि वह मेरे घर में ही अपनी बेटी भूमिका के साथ परित्यक्ता की तरह रहने लगी थी। उसका अपने घर में गुजर बसर नहीं था क्योंकि उसकी भी हरकतों को बताना ठीक नहीं होगा। यद्यपि मकान बेटी के नाम हो जाने के बाद उसने मेरे साथ बड़ी ज्यादतियां करना शुरू कर दिया था। 

कभी मिले तो यशवंत सिंह जरूर पूछूंगा कि मेरे बारे में इतना गलत क्यों छापा ! 

वार्ता के दौरान नीलाभ अश्क ने अपने घरेलू मसले पर एकतरफा भूमिका द्विवेदी के अनुसार खबर देने का भड़ास4मीडिया पर आरोप लगाते हुए कहा कि संपादक यशवंत सिंह को मैं अच्छी तरह से जानता हूं। वह भी मुझे जानते हैं। मैं उनकी पुस्तक के विमोचन समारोह में गया था। उन्हें खबर देने से पहले मुझसे या मेरे लोगों से, जो हकीकत जानते हैं, मेरे घर के पड़ोसियों से मौके पर सही बातों की जानकारी तो कर लेनी चाहिए थी। भूमिका जैसी झूठी को वे इतना महत्व क्यों दे रहे हैं, समझ से परे है। ये कैसी पत्रकारिता है भाई, कभी मिले तो यशवंत सिंह जरूर पूछूंगा। अब तो मुझे शर्म आ रही है कि इतने दिनों तक हिंदी की सेवा क्यों करता रहा? 
उन्होंने बताया कि पहले शादी, उसके बाद मकान अपने नाम करा लेने के बाद भूमिका अब मुखर होने लगी थी। तरह तरह से उसने खुली उड़ानें भरना शुरू किया। नित-रोज उसकी नई नई हरकतें सामने आने लगीं। किसी तरह एडजस्ट करते रहने के लिए मैं एक साल तक जिंदा मक्खी निगलता रहा। मां-बेटी को अब मेरे हर काम में हजार खामियां नजर आने लगीं, क्योंकि घर-संपत्ति पर कब्जा कर अब वे दोनों मुझे पैदल कर चुकी थीं। अब उनका इरादा सिर्फ एक था, किसी भी तरह से वे मुझे वहां से निकाल बाहर करें। जिस दिन मैंने घर छोड़ा है, मां-बेटी ने मेरे साथ मारपीट की। जबकि उलटे मुझपर इल्जाम लगाया जा रहा है। मैं घर छोड़ना नहीं चाहता था लेकिन चीख चीख कर कई दिनो तक गंदी गंदी गालियां सुनना, मारपीट झेलना मेरे लिए असहनीय हो गया। उसी दिन उसकी मां ने मुझपर डंडे से प्रहार और बेशर्म हरकतें कीं। तब चुपचाप मेरे पास ठिकाना छोड़ देने के अलावा और कोई चारा नहीं रहा।  

भूमिका की हरकतों से पर्दा उठाते हुए नीलाभ अश्क ने कई चौंकाने वाली बातें भी भड़ास4मीडिया से साझा कीं। उन्होंने बताया कि वह तो अपनी उम्र के बारे में भी गलतबयानी करती है। इस समय वह तीस वर्ष की है। वह मनीषा पांडेय आदि के साथ सीमा आजाद डीपी गर्ल कालेज में पढ़ी है। मनीषा से वह उम्र में तीन साल बड़ी है। उन्होंने बताया कि मुझसे शादी रचाने के बाद वह कई एक लोगों के निजी संपर्क में खुलकर रहने लगी। ऐसे ही एक आईएएस अधिकारी से भी उसके अभिन्न संबंध हो गए। उसकी अब तक पांच सगाइयां हो चुकी हैं, जिनमें एक सगाई इलाहाबाद दूरदर्शन के निदेशक श्याम विद्यार्थी के बेटे के साथ मुझसे शादी से पहले हो चुकी थी। पढ़ाई के दिनों में वह जिस सरोजनी नगर गर्ल्स हास्टल में रहती थी, वहां से भी उसका इतिहास मुझे बहुत बाद में पता चला। 

उन्होंने बताया कि वह संतानोत्पत्ति के संबंध में अपने घिनौने झूठ सार्वजनिक कर रही है कि मैं शादी के समय सेक्स के लायक नहीं था। शादी के बाद उसे बच्चा होने वाला था। सच्चाई ये है कि मेरी संपत्ति पर निगाह गड़ाते हुए उसने जानबूझकर स्वयं गर्भपात कर दिया। बच्चा हो जाता तो संपत्ति कब्जियाने की मां-बेटी की सारी रणनीति फेल हो जाती। मैं उनकी उस चाल को तब तक नहीं भांप सका था। गर्भपात कर देने पर उसे तीस हजारी क्षेत्र स्थित तीरथराम चैरिटेबल अस्पताल के सामने की डॉ. सुषम धवन ने भी उसकी जानीबूझी असावधानी पर झिड़का और इलाज किया था। उसे बताना चाहिए कि वह गर्भ किसका था? 

उसने तो अपने फेसबुक वॉल पर भी फ्राड कर रखा है। एक बार फ्रांसीसियों के साथ अपने किसी ब्वॉय फ्रेंड को लेकर पचमढ़ी गई थी। वह कभी फ्रांस नहीं गई है लेकिन फेसबुक पर उसी तरह से खुद को शो करती है। वह कभी आज तक विदेश नहीं गई। उसकी ये हकीकत भी उसके पासपोर्ट से जानी जा सकती है। गाजियाबाद से गली-मोहल्ले का कोई 'जागरूरता मेल' का पत्रकार भूमेश शर्मा, जो लंबे समय से इसके साथ मेरे घर आता रहा है, उसने कभी मुझे उससे मिलने नहीं दिया क्योंकि दाल में कुछ काला था। 

उन्होंने भूमिका को लक्ष्य कर कहा कि वह बार बार शशि थरूर से क्यों मिलती रही है। वह पीएम नरेंद्र मोदी से आज तक कभी नहीं मिली लेकिन अपना भौकाल बनाने के लिए फेसबुक पर इस तरह लिखती है, जैसे सचमुच मुलाकात हुई हो। हर तरह के झूठ बोल लेती है। मां-बेटी ने मुझे पीटा और उलटे भड़ास को बता दिया कि मैंने उसे मारा है। ये हकीकत लोनी पुलिस से पता चल जाएगी। भड़ास ने खबर दी कि मैंने नशे में परसो उसको मारापीटा, जबकि मैं सारा दिन थाने में रहा।  वह मुझे अपनी कार नहीं ले आने दे रही थी। पुलिस की मदद लेनी पड़ी। वह कहती है कि मैं कार मेकैनिक के यहां से ले आया, जबकि कार पुलिस चौकी से मैं ले आया था।   

उन्होंने बताया कि वह अफवाह फैला रही है कि मैं सारा सामान उठा ले आया हूं। हकीकत कुछ और है। वह ऐसा इसलिए कर रही है कि उस घर में जो कुछ भी मेरा है, सब वह लोगों की सहानुभूति जुटाकर हथिया ले। मेरा अभी सारा सामान वही है। पड़ोसियों को भी ये सारी सच्चाई मालूम है। उस घर में मेरे पिता उपेंद्रनाथ अश्क की राइटिंग टेबल, धरोहर जैसी दुर्लभ साहित्यिक सामग्रियों से भरी दस लाख की लाइब्रेरी पड़ी है। वहां मेरा पांच लाख का खानदानी फर्नीचर है। मैंने उसे चार लाख का चेक से पेमेंट किया है। उस मां-बेटी ने जो गहने समेट रखे हैं, उनकी कीमत सुनार जानता है, जो लगभग बीस लाख के हैं। मैंने उसे नौ रत्न तक बनवा के दिया है। साठ लाख से अधिक तो मेरे उस मकान की कीमत हो चुकी है। 

साभार : भड़ास4मीडिया

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