सोमवार, जून 01, 2015

मेरी कविताएँ - अंजु अनु चौधरी | Meri Kavitayen - Anju Anu Choudhary (hindi kavita sangrah)



मेरी कविताएँ

- अंजु अनु चौधरी


गांधारी तुम आज भी जीवित हो

जब भी आज किसी बेटे से कोई
अपराध हो जाता है
हर किसी की सोच में
गांधारी...
तुम आज भी जीवित हो जाती हो
घटना दुखद तो
उस के प्रतिफल मे
तुम आज भी
खून के आँसू बहाती हो ।

आलोचना,प्रतिवाद
रिश्तों के नागफणी के जंगल में
रिश्तों का तार-तार होना
उसके दर्द में,
गांधारी
तुम आज भी दर्द से तड़पती हो।

एक पात्र जो रच दिया
इतिहास ने
वो अपने आप में
बार बार दोहराया जाता है

कपटी-कुटिल समाज में
इतनी कठिन परीक्षाओं के
बाद भी
ज़रा सी गलती के उपरांत
बेटे को दुर्योधन
और माँ को गांधारी बना दिया जाता है

हाँ... सच है... मैं डरती हूँ
गांधारी बनने से
क्यों कि
आज के वक्त में
मैं भी बेटों की माँ हूँ
इस लिए किसी भी हाल में
समाज के चलन और बुराइयों को
नज़र-अंदाज़ नहीं कर सकती
तभी तो मुझे भी
किसी के बेटे की गलती पर
गांधारी सा देखा जाता है।





उसके लिए

उसके लिए
आधी से ज्यादा जिंदगी
एक दुस्वप्न सी बीती


उसने
ना जाने कितना ही समय
एक ही साड़ी में
निपटा दिया
मांगे हुए या दिये गए
कपड़ों में
ताउम्र गुज़ार दी

घर की बड़ी बहू होते हुए भी
वो कभी ना सजी,
ना संवरी
हाथ में चार पीतल की चूड़ियाँ डाले
हमेशा करछी हिलाते हुए ही मिली

ना जाने कितने ही सपने
उसके भीतर
अपनी मौत मर गए
पलंग का एक कोना पकड़े हुए
कभी खुद पर हँसती
कभी खुद पर रोती
बहुत बार खुद पर नाराज़ होती
नज़र आ जाती थी

अच्छे दिनों की आस में
उसका
पल पल बीत गया
दहेज का भी समान
धीरे धीरे हाथ से
फिसल गया
ना कोई अच्छा दिन आया
ना इज्ज़त ना सम्मान मिला
पर उम्मीद और इंतज़ार का
एक बड़ा सा पहाड़
काटने को मिल गया

कुछ खास सी
'दिव्य' थी वो मेरे लिए
उसके टूटे-फूटे ब्यान
आज भी दर्ज है
मेरी यादों में
उसका चलना, बैठना,उठना
बात बात पर बिदकना
और फिर मान जाना
ऐसी ही बहुत सी संभव बाते
जो वो किया करती थी
आज भी अंकित है
स्मृतियों में मेरी
मेरे रीति -रिवाजों की तरह।।




अंजू (अनु) चौधरी
जन्म: 23 अगस्त 1967
शिक्षा: बी.ए. (मिरांडा हॉउस, दिल्ली विश्वविद्यालय)
ब्लॉग: http://apnokasath.blogspot.in/ (अपनों का साथ)
इ-मेल: anuradhagugni@gmail.com
मोबाइल: +91-9996031345

जिंदगी की किताब के पन्ने

मेरी जिंदगी की किताब का
पहला पन्ना अब भी
खाली है
जिस पर मुझे अब भी लिखना
बाकी है
वो अनुक्रम ..... जो मुझे जिंदगी से बाँधे रखे

ऐसे पल जो मुझे दे
जन्म-बचपन
प्यार-खामोशी
इश्क और जुदाई भी ।

जिंदगी का हसीन वो
सोलहवाँ साल भी
जिस में प्रेम अपने
अनोखे रूप में
हर किसी पर  हावी रहता है

खुद का प्यार
अपने ही अरमान लिए
एक नयी कथा लिखूँ
और प्रेम की बंसी की धुन सी
चहुं ओर बजाती  फिरूँ

अपनी कहानी के
वो सब किरदार लिखूँ....
स्कूल से कॉलेज
कॉलेज से कॉफी हाउस
उस बेनाम से रिश्ते का
क्या  नाम लिखूँ ?

वक़्त की रफ्तार
जिंदगी की दौड़
एक जलन एक तड़पन
उस अधूरे से रिश्ते का
क्या नाम रखूँ ?

मेरी जिंदगी की किताब का
पहला पन्ना अब भी
खाली है

जहाँ जागते नयनों में
तुम्हारा ही सपना हो
हो अधरों पे तुम्हारे लिए
प्यार की गजल और
दर्द की यादें भी गुनगुनाती हो।

हाथों से बारिश की बूंदों को
महसूस करना है
उम्मीद की  तितलिओं को पकड़ना है
अपने मन की चहकती चिड़िया को
देनी है एक उन्मुक्त उड़ान


मेरी जिंदगी की किताब का
पहला पन्ना अब भी
खाली है
मुझे अभी भी सोचना है कि
एक ऐसी बालकनी
जहाँ....
जिंदगी खुशियों का एक झूला हो
जिस पर बैठ कर
मैं सोच सकूँ और
अपने अंक में भर सकूँ
हम दोनों की बहुत सी हसीन यादें
जहाँ मेरे सपनों को अभी
ओर इंतज़ार में बूढ़ा होना है,
अपनी बूढी होती यादों का
अंत लिखना है कि
तुम संग प्रणय में
मैं बूढ़ी होना चाहती हूँ।।


००००००००००००००००

गूगलानुसार शब्दांकन