बाक़र गंज के सैयद - २ : असग़र वजाहत | Baqar ganj ke Syed - 2 : Asghar Wajahat


असग़र वजाहत साहब आपको जन्मदिन (5 जुलाई) की हज़ार मुबारकबाद  

बाक़र गंज के सैयद - १ : असग़र वजाहत | Baqar ganj ke Syed - 1 : Asghar Wajahat

बाक़र गंज के सैयद  २

~ असग़र वजाहत



अबुल मुज़फ्फ़र मोहीउद्दीन मुहम्मद औरंगजेब आलमगीर जवानी के दिनों में दक्षिण का सूबेदार बनकर जा रहा था। रास्ते में वह किसी रिश्तेदार के यहां ठहरा। क़िले के महल के पीछे आम का बाग़ था। सुबह पौ फटने से पहले शहज़ादे की आँख खुल गयी। सुहानी सुबह थी, उसकी जि़न्दगी का पहला प्रेम उसे बाहर आने के संकेत दे रहा था। वह अकेला ही आम के बाग़ में आ गया। आत्मा को विभोर कर देने वाली हवा थी। आकाश में बादल छाये थे। वह धीरे-धीरे संगेमरमर की सीढिय़ाँ उतर कर बाग़ में पहुँचा। यहां उसने एक अद्भुत नज़्ज़ारा देखा। एक लड़की आम तोडऩे की कोशिश कर रही थी। आम तक लड़की का हाथ नहीं पहुँच रहा था। लेकिन वह आम तोडऩे की हर मुमकिन कोशिश कर रही थी। जिस तरह शहज़ादा सलीम अनारकली के कबूतर उड़ा देने की अदा पर मर मिटा था उसी तरह शहज़ादा औरंगजेब इस लड़की के आम तोडऩे की अदा पर दीवाना हो गया। लड़की ने शहज़ादे को देखा और डर कर आम के पेड़ के पीछे छिप गयी, फिर वह किसी परी की तरह गायब हो गयी। शहज़ादा उसे आम के बाग में तलाश करता रहा। बाद में पता चला कि वह ज़ैनाबांदी है। शहज़ादा उसके प्यार में दीवाना हो गया था। ज़ैनाबांदी को जब यह पता चला कि शहज़ादा उससे प्रेम करने लगा है तो उसे विश्वास नहीं हुआ और उसने कहा कि इसका क्या सुबूत है कि शहज़ादा मुझसे प्रेम करने लगा है? क्या शहज़ादा अपने प्रेम की परीक्षा देने पर तैयार है? शहज़ादे के दिल में तो आग भड़क रही थी। उसने कहा कि हाँ, किसी भी तरह की परीक्षा देने पर मैं तैयार हूँ। ज़ैनाबांदी ने बड़ी कठिन परीक्षा लेने की ठानी। उसे मालूम था कि शहज़ादा पक्का मुसलमान है और शराब नहीं पीता। ज़ैनाबांदी ने कहा कि अगर शहज़ादा मेरे हाथ से शराब पी लेगा तो मैं मानूँगी कि मुझसे प्रेम करता है। हैरत की बात यह है कि शहज़ादा तैयार हो गया। ज़ैनाबांदी ने जाम तैयार करके शहज़ादे को दिया। शहज़ादे ने जाम हाथ में लिया। वह जाम को अपने होंठो से लगाने ही वाला था कि ज़ैनाबांदी ने हाथ मार कर जाम गिरा दिया और शहज़ादे की आग़ोश में चली गयी। ज़ैनाबांदी ने शहज़ादे से कहा—'मेरा मक़सद तुम्हारा इम्तिहान लेना था। तुम्हारे विश्वास को तोडऩा नहीं था।' 


Aurangzeb in old age
औरंगजेब 

उम्र की आखरी मंजि़ल में औरंगजेब ने, जब वह नब्बे साल का हो रहा था, अपने बेटे आज़म से कहा था—''मैं अकेला आया था और अजनबी की तरह जा रहा हूँ। मैं नहीं जानता मैं कौन हूँ या मैं क्या कर रहा था।'' मरने से पहले फरवरी, 1707 में औरंगजेब के ये शब्द बहुत कुछ कहते हैं। 

एक बहुत अजीब समानता औरंगजेब के इन शब्दों और मुहम्मद अली जिन्ना (1876- 1948) के अंतिम समय में कहे गये शब्दों में देखी जा सकती है। जिन्ना ने अपने डाक्टर इलाहीबख़्श से कहा था—''डाक्टर, पाकिस्तान मेरी जि़न्दगी की सबसे बड़ी भूल है।'' दोनों में यही साम्य था कि वे अपनी सबसे बड़ी 'उपलब्धियों' से संतुष्ट नहीं थे। 

'मुग़ल नोबेलिटी अण्डर औरंगजेब' में बाक़रगंज के सैयदों के एक पुरखे मुहम्मद तक़ी का नाम मनसबदारों की सूची में है। उनके नाम के साथ दर्ज है कि वे दो हजार ज़ात (आदमी) और डेढ़ हजार सवार (घोड़े) के मनसबदार थे। उनका जन्म हिन्दुस्तान में ही हुआ था और उनका ताल्लुक दरबार के ईरानी समूह से था। उनके पिता भी शाही नौकरी में थे। स्टोरिया डो मोगोर (STORIO DO MOGOR) के लेखक निकोला मानुसी (NICCOLAO MANUCCI १६५२-१६८०) ने मुहम्मद तक़ी की उपस्थिति को औरंगजेब की कश्मीर यात्रा के दौरान दर्ज किया है। 

''राज ज्योतिषी ने औरंगजेब की कश्मीर यात्रा के शुरू करने के लिए 6 दिसम्बर, 1660 ई. तीन बजे दिन का शुभ समय निश्चित किया। यात्रा पर जाने से पहले सम्राट ने आगरा का सूबेदार होशयार ख़ाँ को नियुक्त किया क्योंकि आगरे के क़िले में सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण क़ैदी मतलब औरंगजेब का पिता शाहजहाँ क़ैद था। सम्राट ने ख़्वाजासरा ऐतबार ख़ाँ को शाहजहाँ के संबंध में निर्देश दिए। आगरे की छावनी का मुखिया मुर्तुज़ा ख़ाँ को बनाया गया। दिल्ली से कश्मीर के सफर में कम से कम एक साल या कुछ ज़्यादा वक्त लगता था। इसलिए पूरी तैयारी के साथ शाही सवारी आगे बढ़ी। अफवाह ये गर्म थी कि औरंगजेब कश्मीर के सफर पर नहीं बल्कि कंधार पर चढ़ाई करने जा रहा है जो ईरानियों के कब्ज़े में आ गया था। 

बादशाह और दूसरे बड़े दरबारियों के ख़ेमों और शामियानों के दो सेट होते हैं। एक में वे ठहरते हैं और दूसरा आगे बढ़ जाता है ताकि जब शाही सवारी वहाँ पहुँचे तो रहने-सहने के लिए ख़ेमे और शामियाने तैयार मिलें। शाही ख़ेमे उठाने और लगाने के लिए दो सौ ऊँटों और पचास हाथियों के अलावा दो सौ लोग तैनात रहते हैं। नियम के अनुसार तोपख़ाना पहले और सबसे आगे चलता है। तोपख़ाने के लिए रास्ता बनाने वाले जो रास्ता बनाते हैं उस पर ही शाही सवारी आगे बढ़ती है। तोपख़ाने के पीछे बड़ी-सी गाड़ी पर एक शाही बजरा चलता है ताकि अगर कहीं नदी पार करना पड़े तो बादशाह के लिए बजरा हाजि़र हो। इसके पीछे सामान चलता है। ये सब रात में ही आगे निकल जाते हैं। सुबह होते-होते घुड़सवार और पैदल फौज आगे बढ़ती है। 

सफर ख़र्च के लिए फौज के पीछे, दो सौ ऊँटों पर चांदी के सिक्के, एक सौ ऊँटों पर सोने के सिक्के लदे हैं। बड़े-बड़े कटहरों में शिकारी चीते हैं जो शाही शिकार के वक्त इस्तेमाल किए जाते हैं। इसके पीछे पूरा शाही दफ्तर है। शहंशाह को पता नहीं किस वक्त कौन-सा फरमाया या दरबार में की गयी कौन-सी कार्यवाही देखने की ज़रूरत पड़ जाये इसलिए मुंशियों की एक छोटी-सी फौज दस्तावेजों के साथ हमेशा मौजूद रहती है। मीर मुंशी अपने अमले के साथ उस वक्त दरबार में मौजूद रहता है जब सम्राट दरबार करता है, दूर-दराज़ से आई डाक देखता है और अहकामात देता है जिन्हें फौरन दर्ज किया जाता है ताकि उन पर अमल किया जा सके। अस्सी ऊँटों पर लदा शाही दफ्तर हर वक़्त मुस्तैदा रहता है। इसके पीछे पचास ऊँटों पर आबदारख़ाना चलता है। पीतल के बड़े-बड़े मटकों में शाही परिवार के लिए पानी मौजूद रहता है। इसके पीछे शाही परिवार के लोग हस्बे हैसियत आगे-पीछे चलते हैं। हर शहज़ादे और शाही ख़ानदान के दूसरे लोगों के चलने की जगहें तय हैं और कोई उसकी खिलाफ़वजऱ्ी नहीं कर सकता। बादशाह के साथ आठ खच्चरों पर शाही ख़ेमे चलते हैं ताकि अगर कहीं भी बादशाह आराम करना चाहे तो ख़ेमे लगा दिए जायें। इसके बाद शाही तोशाख़ाना चलता है जिसमें ज़रूरत की तमाम चीज़ों के साथ तरह-तरह के इत्र और तेल भी होते हैं। 

नियम यह है कि जब बादशाह को अगले दिन सफर करना होता है तो शाही बावरचिख़ाना के साथ-साथ दूध देने वाली पचास गायें और बावरचिओं की फौज और दीगर सामान पहले ही खाना कर दिया जाता है ताकि अगले पड़ाव पर सम्राट को सही वक़्त पर नाश्ता-खाना दिया जा सके। दो सौ कुली बर्तन उठाने पर तैनात रहते हैं। 

शाही ख़ज़ाने का क़ीमती सामान जैसे हीरे जवाहरात तीस हाथियों पर लदा होता है जो बहुत विशेष और विश्वसनीय गारद के साथ चलते हैं। शाही सिंहासन बारह लोग उठाते हैं। पाँच विशेष प्रकार के हाथियों के साथ तरह-तरह की पालकियाँ भी चलती हैं ताकि बादशाह जब चाहे पालकी में बैठ जाये। 

शाही सवारी रवाँ है। शहंशाह की सवारी के सामने हिरावल दस्ता शेख मीर के नेतृत्व में आगे बढ़ रहा है जिसमें आठ हज़ार घुड़सवार है। दाहिने बाज़ू की फौज हसन अली ख़ाँ के अधीन है। ये हसन अली ख़ाँ अलीवर्दी ख़ाँ के बेटे हैं जिन्होंने खजुआ (फतेहपुर) की लड़ाई में शाह शुजा से ये कहा था कि 'बंदापरवर आप लड़ाई जीत चुके हैं और अब आपका हाथी पर बैठना खतरनाक है। पता नहीं कहाँ से कोई तीर आ जाये और हुज़ूर को कोई नुक़सान पहुँच जाये। इसलिए सरकार आप हाथी से उतर कर घोड़े पर बैठ जायें' शाह शुजा अलीवर्दी ख़ाँ के इस षड्यंत्र को समझ नहीं पाया था। वह हाथी से उतर गया था। उसकी ऊौज ने अपने सालार के हाथी का हौदा खाली देखा था तो यह अनुमान लगाते देर नहीं लगी थी कि शाह शुजा मारा गया। और शाह शुजा की फौज भाग खड़ी हुई थी। औरंगजेब जीत गया था। हसन अली ख़ाँ आठ हज़ार घुड़सवारों की फौज का सिपहसालार है। बायीं तरफ मुहम्मद अमीन ख़ाँ के आठ हज़ार घुड़सवार हैं। इन फौजों के पीछे शिकारी चल रहे हैं। 

शहंशाह के बिल्कुल सामने नौ हाथियों पर मुग़ल झण्डे लहरा रहे हैं। इनके पीछे घोड़े पर एक नक़्क़ारख़ाना है जो एलान कर रहा है कि शहंशाह की सवारी आ रही है। फौज के पीछे अनगिनत लोग चल रहे हैं। ये सब छोटे-मोटे काम करने वाले हैं। कोई नाई है, कोई साइस, कोई धोबी है तो कोई कहार, कोई मज़दूर है तो कोई कारीगर। भिश्ती लगातार रास्ते में पानी का छिड़काव कर रहे हैं ताकि धूल न उड़े। 

शहंशाह के तख़्त के साथ वे अहलकार चल रहे हैं जिनके पास उस जगह से मुत्तालिक पूरी मालूमात हैं जहाँ से शहंशाह की सवारी गुज़र रही है। अगर शहंशाह पूछे कि इस इलाके से कितनी आमदनी होती है? यहां कौन-कौन सी फसलें होती हैं? यहां कौन लोग बसते हैं? यहां का मौसम कैसा रहता है? यहां की ज़मीन कैसी है? तो इन सवालों के जवाब दिए जा सकें। इनके साथ ही कुछ लोग एक रस्सी लिए यह नाप कर रहे हैं कि शहंशाह ने कितने कोस का सफर तय कर लिया है और कितना सफर बाक़ी है। इन्हीं के साथ एक और गिरोह है जो वक़्त की नाप करता है और हर घड़ी और हर पहर के बदलने पर उसकी घोषणा करता है। 

सबसे पीछे हिफ़ाज़त के लिए राजा जयसिंह दस हज़ार घुड़सवारों के साथ चला आ रहा है। उसके पास छ: सौ हाथी और अनगिनत पैदल सिपाही हैं। जयसिंह के झण्डे भी हवा में लहरा रहे हैं और ऊँचे हरे पेड़ों से दो-दो बातें कर रहे हैं। 

तख़्ते ताऊस रौशनी में दमक रहा है। सामने दाहिनी तरफ शहज़ादे और वज़ीर हाथ बाँधें खड़े हैं। बायीं तरफ मनसबदार अपनी-अपनी हैसियत के मुताबिक सिर झुकाए हाजि़र हैं। एक भारी आवाज़ गूँजी—'बाअदब, बामुलाहिज़ा होशियार आली जनाब अबुल मुज़फ्फ़र मोहीउद्दहीन मुहम्मद औरंगजेब आलमगीर शहंशाहे हिन्दुस्तान आली मुक़ाम, जि़ल्ले सुब्हानी सिकन्दरे सानी तशरीफ़ लाते हैं।' तख़्ते ताऊस हीरों और जवाहरात से और रौशन हो गया। दरबारी कमर तक झुक गये। शहंशाह के बैठ जाने के बाद नक़्क़ारे पर चोट पड़ी। एलान हो गया कि दरबार शुरू हो चुका है। कार्यवाही शुरू हो गयी। सल्तनत के अतराफ़ से आई डाक सुनाई जाने लगी। उसके बाद आदेश जारी होने लगे। मुग़मल ख़ाँ को मालवा का सूबेदार बनाया गया। उसे ख़िलअत और ज़ुल्फ़िक़ार नाम का एक हाथी इनायत हुआ। सआदत ख़ाँ को मोअज़्ज़म ख़ाँ का ख़िताब दिया गया। दाराब ख़ाँ के बेटे मुहम्मद तक़ी को ख़िलअत दी गयी। 

''दाराब ख़ाँ का ताल्लुक़ बनी मुख़्तार ख़ानदान से है जो बहुत मशहूर और पवित्र परिवार माना जाता है।'' 

 इतिहास के इन पृष्ठों में मुहम्मद तक़ी दिखाई पड़ते हैं। उनके पिता का नाम दाराब ख़ाँ पता चलता है। दाराब ख़ाँ के पिता का नाम शाहनवाज़ ख़ाँ है। शाहनवाज़ ख़ाँ के वालिद अब्दुल रहीम ख़ाने-ख़ाना थे जो आज अकबर के नवरत्न होने के कारण नहीं बल्कि दोहों की वजह से लोगों की ज़ुबान पर हैं। 

इन तरह मुहम्मद तक़ी के परदादा अब्दुल रहीम ख़ाने-ख़ाना थे जिससे यह बात साफ हो जाती है कि इन मुहम्मद तक़ी का संबंध भी बाक़र गंज के सैयदों से नहीं है। लेकिन खोज में मज़ा आ रहा है। देखिए कहाँ-कहाँ भटकते हैं और कहाँ पहुँचते हैं। कहीं पहुँचते भी हैं या नहीं। बाक़र गंज के सैयदों की वंशावली में मुहम्मद तक़ी के बाद उनके बेटे शाह क़ुली ख़ाँ के नाम का उल्लेख है। 'आइन-ए-अकबरी' के अलावा अकबरकालीन इतिहास के दूसरे ग्रंथों में भी शाह क़ुली ख़ाँ के बारे में विस्तार से जानकारी मिलती है। शाह क़ुली ख़ाँ भी ईरानी ग्रुप से संबंध रखते थे और बैरम ख़ाँ के निकट के लोगों में माने जाते थे। सम्राट अकबर ने उन्हें नारनौल, हरियाणा का सूबेदार नियुक्त किया था। शाह क़ुली ख़ाँ का बनवाया मक़बरा (1574-75) आज भी नारनौल में देखा जा सकता है। यह मक़बरा उन्होंने अपने पिता के लिए बनवाया था, लेकिन इसमें शाह क़ुली ख़ाँ भी दफ़न हैं। मक़बरे के अलावा उनका बनवाया 'जल महल' जिस विशाल तालाब पर बनवाया गया था, वह सूख चुका है, लेकिन महल खड़ा है। शाह क़ुली ख़ाँ की देख- रेख में नारनौल की टकसाल में सिक्के ढालने का काम भी होता था। सम्राट अकबर अपने नवरत्न राजा टोडरमल के साथ यहां आया था। नारनौल में अकबर के दूसरे नवरत्न बीरबल की छतरी भी इस बात का सबूत है कि बीरबल भी यहां आये थे। 

शाह क़ुली ख़ाँ को नारनौल जैसे सूबे का सूबेदार बनाने की एक बड़ी वजह थी। बल्कि यह उनका इनाम था जो सम्राट अकबर ने उनकी एक विशेष सेवा से खुश होकर दिया था। सम्राट हुमायूँ की बेवक़्त मौत के बाद मुग़लिया सल्तनत डावाँडोल हो रही थी। तेरह साल का सम्राट काबुल में बैठा था और उसकी सेनाएँ दिल्ली और आगरा में धूल चाट रही थीं। बड़ेबड़े योद्घा जैसे तिरदी बेग वग़ैरह हेमचन्द्र उर्फ हेमू के, जो बाद में हेमचन्द्र विक्रमादित्य बना, ख़ौफ़ से बिना लड़े भाग रहे थे। हेमू ने अफ़गान पठानों के साथ मिल कर मुग़लों के ख़िलाफ़ एक बड़ा मोर्चा खोल दिया था। उस समय तक हिन्दुस्तान में पठानों को देशी और मुग़लों को विदेशी माना जाता था। 

 हेमू का ख़ौफ़ मुग़लों के दिलों में बैठा हुआ था। इसकी वजह भी थी। हेमू कभी किसी लड़ाई में न हारा था। उसने अपने जीवन में बाइस युद्घ लड़े थे और सभी में वह विजयी हुआ था। मुग़लों को उसने दिल्ली और आगरा के युद्घों में करारी शिकस्त दी थी। एक साधारण पुरोहित परिवार में जन्मा और रिवाड़ी (हरियाणा) में पला-बढ़ा हेमू अनोखी प्रतिभा और अद्वितीय क्षमता से सम्पन्न था। व्यापारी के रूप में अपना काम शुरू करने वाला हेमू शेरशाह सूरी की सेना को राशन और बारूद सप्लाई किया करता था। व्यापारी होने की वजह से उसकी जानकारियाँ व्यापक थीं। वह राजनीतिक उतार-चढ़ाव और सामरिक ताक़तों पर गहरी नज़र रखता था। उसके संबंध उस युग के पुर्तगाली व्यापारियों से भी थे जिन्होंने गोवा में तोप ढालने के बड़े कारखाने लगाये थे और वे दक्षिण भारत की सल्तनतों के बीच चलने वाले युद्घों में विजय नगर साम्राज्य को तोपें बेचा करते थे। सेनाओं के लिए तोपों की बढ़ती हुई माँग के मद्देनज़र हेमू ने पुर्तगालियों की मदद से रिवाड़ी में भी तोपें ढालने का एक कारखाना लगाया था। वह केवल तोपें ढालने ही नहीं बल्कि उनको चलाने और बारूद विज्ञान में भी दक्ष हो गया था। शेरशाह सूरी के बेटे इस्लाम शाह ने हेमू की प्रतिभा और योग्यता को पहचान कर उसे ''शहंगे-बाज़ार'' अर्थात ''बाजार का शहंशाह'' की उपाधि दी थी। कुछ साल बाद हेमू को अपने दरबारियों में शामिल कर लिया था। इसके बाद हेमू के सितारे नित नयी ऊँचाइयाँ छूते रहे। उसे अच्छे और ऊँचे पद मिलने लगे। इस्लाम शाह ने उसे पंजाब का सूबेदार बनाया ताकि काबुल में बैठे मुग़लों से साम्राज्य की रक्षा की जा सके। इस्लाम शाह के मरने के बाद उसका बारह साल का लड़का फीरोज़ ख़ाँ (1553) गद्दी पर बैठा। यह भी रोचक तथ्य है, उधर मुग़ल साम्राज्य के सिंहासन पर तेरह वर्षीय अकबर (1556) बैठा था। अकबर के संरक्षक बैरम ख़ाँ थे तो फीरोज़ ख़ाँ के संरक्षक हेमू थे। दोनों ही अनुभवरी, चतुर, सैन्य कला और कूटनीति में दक्ष थे। दोनों बालक सम्राटों के सामने दरबारी दाँव-पेंच, झूठ-फरेब, मक्कारी, चालाकी, गिरोहबंदी और षड्यंत्रों के जाल बिछे थे। फीरोज़ ख़ाँ के सितारे अकबर की तरह बुलंद नहीं थे। गद्दी पर बैठने के तीसरे ही दिन उसकी हत्या आदिल शाह सूरी ने कर दी और ख़ुद गद्दी पर बैठ गया। लेकिन चार साल बाद एक युद्घ में पराजित होने के कारण उसकी हत्या बंगाल के सुल्तान ग़यासुद्दीन बहादुर शाह ने कर दी थी जो अपने एक चाचा की हत्या करने के बाद बंगाल का सुल्तान बना था। 

आदिल शाह सूरी की हत्या हो जाने के बाद सूरी साम्राज्य पर हेमू का एकछत्र अधिकार हो गया था। हुमायूँ की मौत की ख़बर सुनने के बाद वह सीधा आगरा आया और यहाँ उसने मुग़लों को हरा दिया। इसके बाद दिल्ली आया था। यहाँ उसने फिर मुग़लों को पीट दिया था। यह उसकी लगातार जीते जाने वाली बाइसवीं लड़ाई थी। दिल्ली विजय के बाद पुराने क़िले में हेमू का पारम्परिक ढंग से राज्याभिषेक हुआ था। 7 अक्तूबर, 1556 को उसने विक्रमादित्य की उपधि धारण की थी और हिन्दुस्तान का सम्राट बन गया था। कुछ पठान सरदार किसी हिन्दू के सम्राट बन जाने से ख़ुश नहीं थे। हेमू जानता था कि उनके मुँह कैसे बन्द हो सकते हैं। हेमू ने उन्हें बड़े बड़े पद सम्मान और हीरे जवाहरात से उनके मुँह बन्द कर दिए थे। सामंती समाज में स्वार्थ किसी भी मूल्य पर भारी पड़ता है। 

हेमू से भयभीत मुग़ल अमीर ये चाहते थे कि हेमू को न छेड़ा जाये और मुग़ल साम्राज्य काबुल और पंजाब के क्षेत्रों तक सीमित रहे। लेकिन मुग़ल बहुमत से अलग सम्राट के संरक्षक और कार्यकारी सम्राट बैरम ख़ाँ की राय यह थी कि हेमू से निपटने का यही वक़्त है। समय बीतने के साथ-साथ उसकी ताक़त बढ़ती जायेगी और फिर मुग़लों के लिए हिन्दुस्तान सपना बन कर रह जायेगा। बाबर और हुमायूँ की कुर्बानियाँ बेकार चली जायेंगी। बहरहाल बड़े विचार मंथन के बाद मुग़ल इस नतीजे पर पहुँचे कि हेमू से दो-दो हाथ करने ही पड़ेंगे। 



हेमू और उसकी सेना में अपार आत्मविश्वास था। लेकिन जिन्दगी में कोई लड़ाई न हारने वाला और मुग़लों को कई बार मैदाने जंग में हरा देने वाला हेमू सिर्फ आत्मविश्वास के सहारे ही युद्घ करने नहीं निकला था। उसके पास मुग़लों से दुगनी सेना थी। भारी तोपख़ाने के अलावा हेमू के पास डेढ़ हज़ार जंगी हाथियों का जत्था था जिसकी ताकत हेमू जानता था और उस पर गर्व करता था। हिरावल दस्ते के अलावा तीस हज़ार अनुभवी और दक्ष घुड़सवारों की सेना थी। पैदल सैनिकों की भारी संख्या थी जो घुड़सवारों के पीछे टिड्डी दल की तरह छायी हुई थी। हेमू के साथ पठानों और राजपूतों की अपार ताक़त थी। युद्घ से पहले भी हेमू ने सभी सरदारों को अच्छी तरह नवाज़ा था। उन्हें विश्वास था कि मुग़लों से यह लड़ाई जीत जाने के बाद उन्हें और मिलेगा। हेमू लड़ाई के मैदान के बीच अपने हीरे जवाहरात और सोने-चाँदी से सज्जित हाथी पर बैठा था। पाँच नवम्बर, 1556 की एक सुबह पानीपत का मैदान दूसरी बार हिन्दुस्तान की क़िस्मत का फैसला करने के लिए चुना गया था। हेमू ने फ़ौज़ का मरक़ज़ और सिपाहसालार की जि़म्मेदारी संभाली थी। दाहिना बाजू हेमू की बहन के बेटे और अनुभवी सेनापति रमइया के पास था। बायें बाजू की सेना का संचालन विख्यात पठान सेनापति और हेमू के विश्वसनीय शादी ख़ाँ खक्कर कर रहा था। मुग़लों को यह डर था कि वे हेमू से हार भी सकते हैं। बैरम ख़ाँ ने तेरह साल के सम्राट को युद्घ में भाग लेने से रोक दिया था। अकबर युद्घ क्षेत्र से आठ मील पीछे एक छावनी में था जिसकी पाँच हज़ार अति-विश्वसनीय घुड़सवार सुरक्षा कर रहे थे। बैरम ख़ाँ ने अकबर से यह तक कह दिया था कि अगर मुग़ल सेना हार जाये तो वह वापस काबुल चला जाये। कुछ इतिहासकार कहते हैं बैरम ख़ाँ ने भी इस लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया था। कुछ का मानना है हिस्सा लिया था। बैरम ख़ाँ ने मुग़ल सेना को परम्परागत तरीके से सजाया था। सामने सबसे आगे क़रावल दस्ता था जिसका काम दुश्मन के सही ठिकाने बताना, रास्ता दिखाना और फिर वापस हिरावल दस्ते में मिल जाना था। हिरावल दस्ते के बायें बाजू घुड़सवारों के दस्ते थे। दाहिनी तरफ फौज में अन्य घुड़सवार दस्ते तैनात थे। हिरावल दस्ते के पीछे फौज का मरकज़ था जहां दस हज़ार घुड़सवारों के बीच एक विशाल हाथी पर बैरम ख़ाँ विराजमान था। मरकज़ के दाहिने और बायें फौज के दो दूसरे दस्ते थे। मरकज़ के पीछे घुड़सवारों की वह सेना थी जो पीछे से किए जाने वाले हमलों को रोकने का काम करती है। तोपख़ाना हिरावल दस्ते के पीछे था। तोपों के सामने मिट्टी की एक मोटी दीवार बनाई गयी थी और तोपों को लाहे की मोटी जंज़ीरों से बाँध दिया गया था। तोपों के पीछे पानी के बड़े-बड़े हौज़ थे जिनमें भिश्तियों ने पानी भर दिया था। तोपख़ाने की हिफाज़त के लिए दो सौ घुड़सवार तैनान थे। 

पानीपत के मैदान में हम शाह क़ुली ख़ाँ को भी देखते हैं जो पूरा जि़रह बख़्तर पहने अरबी घोड़े पर सवार बायें बाजू के हिरावल दस्ते में सबसे आगे खड़ा है। शाह क़ुली का साफ़ रंग धूप में चमक रहा है। उसके खोद पर 'अल फतेह' खुदा है। मुग़ल सेना में मरकज़ को संभाले हुए हैं अबदतला ख़ाँ उज़्बेक। दाहिनी तरफ की फौज सिकन्दर ख़ाँ के कमान में है और बायां बाज़ू लतीफ ख़ाँ सरहदी के पास है। 

दूर-दूर तक दोनों फौजें सजी खड़ी थीं इधर और उधर झण्डे लहरा रहे थे। हथियार धूप में चमक रहे थे। हाथियों के चिंघाडऩे और घोड़ों के हिनहिनाने की आवाज़ें युद्घ संगीत में दब गयी थीं जो धीरे-धीरे अपने उफान पर आ रहा था। पता नहीं वह कौन-सी घड़ी थी जब हेमू की सेना का तोपख़ाना दहाडऩे लगा। पुर्तगालियों की मदद से बनी तोपें मुग़ल सेना पर आग बरसाने लगीं। मीर आतिश के आदेश पर मुग़ल तोपची भी हाथ में लम्बी-लम्बी जलती छड़ें लिए तोपों के फलीतों में आग लगाने लगे। आग लगाने के बाद तोपची तेज़ी से कानों पर हाथ रखकर पीछे भागते थे और भयानक आवाज़ के साथ गोले दुश्मन की फौज पर गिरते थे। मीर आतिश चीखता था, 'तोप को ठण्डा करो'। पानी में भीगे हुए रूई के मोटे-मोटे गद्दे तोप पर रख दिए जाते थे और भाप के बादल-से उठते थे। भिश्ती उनके ऊपर मश्क से पानी डालते थे। इस दौरान दूसरी तोप दाग़ी जाती थी। मीर आतिश गोला दग़ने पर इनाम का एलान करता था : 'दस अशर्फियाँ... गोला सही जगह गिरा है।' वह बारूद भरने वालों को भी हिदायतें देता था। मीर आतिश चाहता था एक पहर में कम से कम चालीस गोले दाग़े जायें। वह चीख-चीख कर कह रहा था कि ऐसा करके दिखाओ तो तुम सबको सौ-सौ सोने के सिक्के मिलेंगे। देखो, बारूद ये देख कर भरो कि गोले ठीक जगह नहीं गिर रहे हैं और दुश्मन के मरकज़ के ऊपर से गुज़र रहे हैं। मुग़ल अपनी नयी तोपें ला रहे थे। एक तोप को पचास बैल और पाँच हाथी घसीट रहे थे। तोपचियों के कपड़े धुएँ और धूल से काले पड़ गये थे। उनके चेहरों पर भी कालिख ऐसी लगी थी। काले चेहरे पर सफेद आँखें बड़ी अजीब लग रही थीं। मीर आतिश पागलों की तरह हिदायतें देता दौड़ रहा था। उसे मालूम था कि वक़्त कम है और इस दौरान लगातार तोपें न दाग़ी गयीं तो हेमू की विशाल फौज को तितर-बितर करना मुश्किल हो जायेगा। हाथी पर विराजमान बैरम ख़ाँ दूरबीन से अपनी तोपों का असर देखने की कोशिश कर रहा था। लेकिन धुआँ इतना था कि कुछ साफ़ नज़र न आता था। तोपख़ानों के ख़ामोश होने के बाद हिरावल दस्ते आपस में भिड़ गये। अल्ला हो अकबर, बेज़न, हर हर महादेव, हुज़्ज़ा नारों के साथ गालियाँ भी सुनाई देने लगीं। कुछ हिरावल दस्ते के जवान घोड़ों से उतर गये और अपनी शहज़ोरी दिखाने लगे। लोहे से लोहा टकराने की आवाज़ों के साथ चीख़-पुकार, कराहें और चीख़ें सुनाई देने लगीं। हर सामने वाले के खून की प्यास हर सामने वाले को थी। 

अचानक एक लय में नगाड़े बजने लगे। यह संकेत था। एक के पीछे चार कतारों में खड़े हाथी चिंघाड़ते हुए काफी रफ्तार से आगे बढ़े। हेमू की फौज़ के जो पैदल नगाड़ों की आवाज़ सुन कर हट नहीं पाये थे वे अपने ही हाथियों के पैरों के नीचे आ गये, लेकिन हाथी रुके नहीं। मुग़लों की तरफ से तीरों की बौछार भी हाथियों को रोक नहीं सकी क्योंकि वे ऊपर से नीचे तक लोहे के झोल में सुरक्षित थे। 

हेमू को इसी वक़्त का इंतिज़ार था। वह जानता था कि मुग़लों के पास विशालकाय हाथियों का कोई तोड़ नहीं है। हर हाथी की सूंड में लोहे की मोटी-मोटी ज़ंजीरें थीं जिनमें तेज़ छुरियां लगी थीं। हाथी जिधर भी सूंड उठा कर वार करते थे उधर घोड़ों की पंक्ति टूट जाती थी और दसियों सवार घोड़ों पर से नीचे आ जाते थे। महावत अपनी आवाज़ों में इन हाथियों को और आक्रामक बना रहे थे जो वैसे ही नशावर चीज़ें खिला-खिला कर पागल जैसे बना दिए गये थे। हेमू ने यह दृश्य देखा तो उसने अपने हिरावल दस्ते को दबने का संकेत दिया और हाथियों का एक और झुण्ड मुग़ल सेना पर छोड़ दिया। अगर युद्घ का यही अंदाज़ रहा तो उसकी जीत निश्चित है। हेमू के पास अभी हाथियों की कमी न थी। अभी तो आधे हाथी भी दुश्मन की सेना पर न टूटे थे। 

पठान और राजपूत घुड़सवार इधर-उधर छितरे मुग़ल घुड़सवार फौजियों का काम तमाम कर रहे थे। इस उत्साह में पाठानों ने तो विजय के नारे लगाने शुरू कर दिए थे। यह मुग़लों को डराने के लिए किया जा रहा था। पठान यह भी चाहते थे कि अब विजय के नगाड़े बजा दिए जायें क्योंकि मुग़ल सेना की पंक्तियाँ छिन्न-भिन्न हो चुकी हैं। इतिहासकार हेमू के खाते में तेइसवीं विजय भी दर्ज करने जा रहे थे जब ही एक तीर पता नहीं कहाँ से आया और हेमू के आँख में घुसता हुआ सिर के पीछे निकल गया। जब तक महावत सम्राट को संभालने के लिए पीछे मुड़ता तब तक सम्राट हाथी के हौदे से नीचे गिर पड़ा। पठान और राजपूत सैनिकों ने हेमू के हाथी की तरफ देखा तो हौदा खाली था। मतलब सम्राट खेत रहे। अब सेना को रोकना किसी के वश में न था। पहले तो मुग़ल ख़ुद ही हैरान हो गये कि हेमू की फौज क्यों भाग रही है, लेकिन जब हेमू के हाथी का खाली हौदा देखा तो चौगने उत्साह से आगे बढ़े। हेमू की फौज तितर-बितर हो गयी। जिसके जिधर सींग समाए भाग निकला। महावत हाथियों को छोड़ कर भागे। तोपची तोपें छोड़ कर रफूचक्कर हुए। घुड़सवार सेना अपनी जान बचाने के लिए छोटे-छोटे समूहों में अपने देश की दिशा में भागी। कुछ ही देर में भागते हुए सिपाहियों का पीछा छोड़ मुग़ल फौज लूट-मार में लग गयी। माले-ग़नीमत पर हाथ साफ करने का इससे अच्छा मौक़ा क्या मिलता। जिसने जो पाया वह दबा लिया। लेकिन लूट में भी पद और पदवी का ध्यान था। किसी पैदल सिपाही की हिम्मत न थी कि वह किसी हाथी या घोड़े पर कब्ज़ा कर लेता। वे तो मुर्दों की जेबें टटोल कर जो मिलता था उसे रख लेते थे। हद यह है कि घायलों की जेबों में हाथ डाल कर जो पाते निकाल लेते। असलहे बिखरे पड़े थे। हाँ, तोपख़ाने की तोपें लूटने का अधिकार किसी को न था। यह सम्राट की सम्पत्ति थी। तीर-कमान, तलवारें, बंदूकें जो पाता ले जाता। अरबी घोड़ों पर अधिकार जमाने का हक़ केवल सालारों को था। फौजियों के कपड़े-लत्ते लूटने का काम खादिम पेशा कर रहे थे। मतलब सब अपनी-अपनी हैसियत के मुताबिक लूट में लगे थे। 

पानीपत के मैदान में एक तीसरी फौज भी मौजूद थी। इस फौज में वे सिपाही थे जो हारे हुए और भागते हुए सिपाहियों को घेर कर लूट लेते थे। इस तीसरी फौज को किसी से कोई हमदर्दी न थी। वह तो किसी भी हारने वाले को लूटने वालों की फौज थी। हेमू हार गया तो उसकी फौज को लूटने लगे। मुग़ल हार जाते तो उनकी फौज को लूट लेते। उन्हें तो बस लूटने से मतलब था। इनकी चपेट में वे सिपाही आते थे जो जल्दी ही मैदान छोड़ कर अकेले या छोटे-छोटे समूहों में भागते थे। अच्छी तरह सोच-समझ कर मैदान छोडऩे वाले बड़े समूहों को ये न लूट पाते थे। 

लूट-मार करने में शाह क़ुली ख़ाँ किसी से पीछे न थे। इस्लाम में तो माले-ग़नीमत यानी जंग के बाद लूटा गया सामान हलाल है। वे इधर-उधर लूट-मार कर ही रहे थे कि उन्हें एक हाथी दिखाई पड़ा जिसका हौदा सोने का था और उसमें हीरे जवाहरात जड़े थे। हाथी की झूल सोने-चाँदी के तारों से सजी थी और उसके मस्तक पर हीरे जगमगा रहे थे। हाथी देख कर ही शाह क़ुली ख़ाँ के अन्दर माले-ग़नीमत के हलाल होने की भावना और ज्य़ादा प्रबल हो कर सामने आ गयी। वे हाथी के पास आये और वहाँ खड़े महावत पर तलवार का वार करने ही वाले थे कि महावत ने हाथ जोड़ कर कहा, 'महाराज, मुझे मार कर क्या मिलेगा। ये जो नीचे पड़े हुए हैं इन्हें जानते हैं कौन हैं? ये सम्राट हेमू हैं।' यह सुनना था कि शाह क़ुली ख़ाँ को लगा ख़ज़ाने का दरवाज़ा खुल गया है। शाह क़ुली ख़ाँ ने लाखों रुपये की सम्पत्ति यानी हाथी अपने साथियों के हवाले किया और जख़्मी हेमू को एक घोड़े पर डाल कर महावत के साथ सम्राट के शिविर पहुँचे। बैरम ख़ाँ अभी यहाँ नहीं थे। शाह क़ुली ख़ाँ ने अकबर के सामने हेमू और उसके हाथी के महावत को पेश किया। तीर लगने की वजह से हेमू अधमरा और बेहोश हो गया था। उसके महावत ने तस्दीक़ की कि वह सम्राट हेमू है। दूसरे जानकार लोगों ने भी हेमू को पहचाना। शाह क़ुली ख़ाँ ने सम्राट से कहा कि वे मुग़ल साम्राज्य के सबसे बड़े दुश्मन को गिरफ्तार करके लाये हैं और उन्हें इसका इनाम मिलना चाहिए। उसी वक़्त बैरम ख़ाँ आ गये। उन्होंने तेरह वर्षीय सम्राट से कहा कि वे तुरंत हेमू की हत्या कर दें। अकबर ने कहा कि 'ये वैसे ही अधमरा है। मैं इसे नहीं मारूँगा।' इस पर बैरम ख़ाँ को गुस्सा आ गया। उन्होंने कहा कि 'तुम इस पर दया कर रहे हो, इसके लिए तुम्हारे मन में इंसानियत और रहम की भावना है, लेकिन अगर तुम इस हालत में होते जिसमें ये है तो इसने कोई दया न दिखाई होती।' बैरम ख़ाँ ने तलवार निकाली और अधमरे जख़्मी हेमू का सिर उड़ा दिया। हेमू का सिर काबुल भेज दिया गया ताकि वहां मुग़ल शाही परिवार को पता चल सके कि मुग़लिया सल्तनत का सबसे बड़ा दुश्मन ख़त्म हो चुका है। उसके जिस्म को दिल्ली के पुराने क़िले के फाटक पर लटका दिया गया। राजपूतों और पठानों का संयुक्त मोर्चा ख़त्म हो गया, लेकिन मुग़लों को लम्बे समय तक इन दोनों ताक़तों का सामना करते रहना पड़ा। 

शाह क़ुली ख़ाँ को सम्राट अकबर ने हरियाणा प्रांत का सूबेदार बना कर विशेष सेवा के लिए विशेष उपहार दिया था। सोलहवीं शताब्दी में नारनौल एक बड़ा केन्द्र था। मध्य एशिया से दिल्ली आने वालों का एक पड़ाव नारनौल भी हुआ करता था। शाह क़ुली ख़ाँ दूसरे सूबेदारों की तरह राजधानी में भी रहते थे। उन्होंने आगरा में महलसरा बनवाई थी। उस समय के बड़े सामंतों जैसा जीवन जीने वाले शाह क़ुली ख़ाँ कविता और संगीत के आशिक़ थे। उनकी महफिलों में गायन और संगीत का विशेष महत्व था। उनके पास क़ाबुल ख़ाँ नाम का एक बहुत सुन्दर लड़का था जो बहुत अच्छा गाता और नाचता था। शाह क़ुली ख़ाँ इस लड़के पर फ़िदा थे। वह उनकी महफिलों की ही नहीं बल्कि उनकी भी जान था। क़ाबुल ख़ाँ की दिल फरेब अदाओं पर उनकी जान जाती थी। क़ाबुल ख़ाँ भी अपनी हैसियत समझता था और शाह क़ुली ख़ाँ के यार-दोस्त भी जानते थे कि शाह क़ुली ख़ाँ को पूरी दुनिया में इस लड़के से ज्य़ादा और कुछ प्यारा नहीं है। शराब, संगीत और रक़्स की महफिलों में यह लड़का कमाल करता था। उसकी नज़ाक़त, उसकी नफ़ासत, उसकी तहज़ीब, उसका रंग-रूप, उसकी शक्ल-सूरत, उसकी दिल-फरेबी, उसकी दिल्लगी, उसकी क़ातिलाना अदाएँ शाह क़ुली ख़ाँ के सीने में तीर की तरह उतर जाती थीं। महफिलों के बाद रात की तन्हाई में क़ाबुल ख़ाँ अपने मालिक शाह क़ुली ख़ाँ को जिस लज़्ज़त से आश्ना कराता था उसकी तो बात ही कुछ और थी। शाह क़ुली ख़ाँ इस लड़के के ऊपर जन्नत की ख़ूबसूरत से ख़ूबसूरत हूर को कुर्बान कर सकते थे। राजधानी और नारनौल में शाह क़ुली ख़ाँ क़ाबुल ख़ाँ के चर्चे आम थे। ये चर्चे सल्तनत के मीर बख़्शी की ज़ुबानी नौजवान सम्राट तक पहुँचे। युवा सम्राट इस तरह के संबंधों को बहुत आपत्तिजनक ही नहीं, आपराधिक मानता था। उसका मानना था कि ऐसे संबंध किसी भी दृष्टि से स्वीकार करने योग्य नहीं हैं। उसे यह तो बिल्कुल बर्दाश्त न था कि उसका कोई बड़ा मनसबदार और सूबेदार वह कर रहा है जो उसकी नज़र में घृणित अपराध है। सम्राट की राय शाह क़ुली ख़ाँ के कानों तक भी पहुँची थी, लेकिन वह तो क़ाबुल ख़ाँ के प्रेम में अंधा हो चुका था। उसने सम्राट की राय की परवाह नहीं की और क़ाबुल ख़ाँ से अपने रिश्ते को जारी रखा। मीर बख़्शी से सम्राट को लगातार ख़बरें मिलती थीं कि शाह क़ुली ख़ाँ अपनी रविश पर क़ायम हैं। एक दिन तंग आकर सम्राट ने आदेश दिया कि क़ाबुल ख़ाँ को शाह क़ुली ख़ाँ की हवेली से निकाल कर शाही कारख़ाने पहुँचा दिया जाये जहाँ वह कोई काम सीखे और करे। आगरा शहर का दरोग़ा शाही हुक्मनामा लेकर शाह क़ुली ख़ाँ के पास गया और आदेश दिखाया। पहले तो शाह क़ुली ख़ाँ को अपनी ऑखों पर विश्वास नहीं हुआ, लेकिन फिर धीरे-धीरे उनकी समझ में सब आने लगा। 

—''हुज़ूर क़ाबुल ख़ाँ को हमारे हवाले कर दीजिए।'' दरोग़ा ने नीचे देखते हुए कहा। वह जानता था कि नारनौल के सूबेदार की क्या हैसियत है। 

कुछ लम्हे शाह क़ुली ख़ाँ ने सोचा। शाही हुक्म को न मानने का कोई सवाल ही नहीं था। दूसरी तरफ क़ाबुल ख़ाँ की जुदाई के बारे में वो सोच भी नहीं सकते थे। उनकी आँखों के सामने एक मलगिजा-सा अंधेरा छा गया। 

—''हम मजबूर हैं हुज़ुर।'' दरोग़ा ने कहा। 

क़ाबुल ख़ाँ को बुलाया गया। वह डर के मारे काँप रहा था। शाह क़ुली ख़ाँ ने उसकी तरफ नज़र भर कर देखा। उस एक नज़र में सब कुछ था। पूरी दुनिया उजड़ जाने का दु:ख और सब कुछ खत्म हो जाने की अपार पीड़ा। बहरहाल क़ाबुल को शाही सिपाही ले गये। पानीपत की दूसरी लड़ाई का एक वीर दहाड़ें मार-मार कर रोने लगा। फिर उसने एलान किया कि वह सन्यास ले रहा है। जोगी बन रहा है। उसने जोगियों के कपड़े लाने का आदेश दिया। हैरत से सब देख रहे थे। किसी में हिम्मत न थी कि शाह क़ुली ख़ाँ के दु:ख का सामना कर सकता। 

शाह क़ुली ख़ाँ के सन्यास लेने और योगी बन जाने की ख़बर बैरम ख़ाँ तक पहुँची जो मुग़ल दरबार में ईरानी गुट के प्रमुख और सम्राट के सरपरस्त थे। बैरम ख़ाँ नहीं चाहते थे कि शाह क़ुली ख़ाँ जैसा सक्षम आदमी दरबार से बाहर हो जाये। बैरम आने वाले वक़्त की नज़ाक़त को पहचान रहे थे। उन्हें मालूम था कि दरबार और हरमसरा की सियासत में उन्हें कहाँ-कहाँ अपने मोहरे चाहिए होंगे। पानीपत की लड़ाई के बाद शाही हरम काबुल से दिल्ली आ गया था। मुग़ल दरबार में बैरम ख़ाँ जैसे आदमी का बढ़ता प्रभाव तूरानियों को खटक रहा था। एक तो बैरम ख़ाँ ईरानी थे और दूसरे उन पर शिया होने का शक भी था। ऐसे आदमी को मुग़ल, उज़्बेक, ताजिक सरदार कैसे पसंद कर सकते थे! बैरम ख़ाँ को दरबार में अपने विश्वसनीय लोगों की संख्या बढ़ाना थी और यहाँ हालत ये थी कि शाह क़ुली ख़ाँ जोगी बन कर सन्यास ले रहे थे। बैरम ख़ाँ ने शाह क़ुली ख़ाँ को समझाया कि एक लड़के के लिए तुम अपनी कई पुश्तों की कमाई और इज़्ज़त को लात मार रहे हो। ज़रा सोचो तुम्हारे जोगी बन जाने से क्या होगा? कहीं ये न हो कि शाही इताब नाजि़ल हो जाये। तुम जाओगे कहां? जोगी बन जाना क्या आसान है? लोग क्या कहेंगे? तुम्हाने ख़ानदान का क्या होगा? तुम बाप-दादा का नाम डुबोओगे? तुम मेरे साथ जहाँपनाह के पास चलो। उनसे माफी माँगो। वो तुम्हारा मनसब बढ़ायेंगे और मैं तुम्हें दो जागीरें देने की सिफारिश करूँगा। बहरहाल बैरम ख़ाँ के समझाने से शाह क़ुली ख़ाँ मान गये थे । 

फतेहपुर डिस्ट्रिक्ट गज़ेटियर यह बताता है कि शाह क़ुली ख़ाँ मुहम्मद तक़ी के बेटे थे। लेकिन यहां कुछ उल्टा नज़र आ रहा है। मुहम्मद तक़ी तो औरंगजेब के समकालीन हैं और शाह क़ुली ख़ाँ अकबर के समय में थे। ऐसा कैसे हो सकता है? इसलिए ये वे शाह क़ुली ख़ाँ नहीं हैं जिनकी मुझे तलाश है। 

इतिहास के फटे-पुराने पन्नों पर एक और शाह क़ुली ख़ाँ के दर्शन होते हैं। इनका संबंध अफशार या अफशारीद वंश से था जिसकी स्थापना ईरान के एक 'बादशाह' नादिरशाह ने की थी। नादिरशाह का संबंध ईरान के उस क़बीले से था जिसमें तुर्क जाति का मिश्रण था। 

नादिरशाह अपने प्रारंभिक दिनों में ख़ुरासान के क्षेत्र में मुसाफ़िरों और कारवानों को लूट लिया करता था। एक डाकू और अपराधी के तौर पर उसने इतनी तरक्की (अगर उसे तरक्की कहा जाये तो) कर ली थी कि एक छोटी-मोटी सेना खड़ी कर ली थी और इसके चलते और परिस्थितियों का फायदा उठा कर वह ईरान का सम्राट बन गया था। उसने दिल्ली पर चढ़ाई की थी। एक दिन में तीस हज़ार निर्दोष लोगों की हत्या कराई थी। यहां से तख्त-ए-ताऊस और कोहेनूर हीरा लूट कर ले गया था। 

शाह क़ुली ख़ाँ के सूत्र को फिर पकड़ते हैं। नादिरशाह के वंश से ताल्लुक रखने वाले शाह क़ुली ख़ाँ सम्राट औरंगजेब के बेटे मुहम्मद आज़म शाह (1653-1707) के जामबरदार थे। मुहम्मद आज़म शाह ने उनके बड़े बेटे मिर्ज़ा अहमद को आबदारख़ाने का काम सौंपा था और आज़म शाह और कामबख़्श को मालवा और बीजापुर का सूबेदार बना दिया था ताकि वे एक- दूसरे से दूर रहें। लेकिन लडऩे वालों के लिए दूरियों का कोई मतलब नहीं है। आखिरकार दोनों आगरा के पास जाजों में लड़े। इस जंग में शाह क़ुली ख़ाँ के बेटे भी शामिल थे। छोटे बेटे मिर्ज़ा मुहम्मद अली को कुछ जख़्म भी लगे थे। लड़ाई में शाह क़ुली ख़ाँ के संरक्षक मुहम्मद आज़म शाह हार गये थे और मार दिए गये थे। 

अब शाह क़ुली ख़ाँ और उनके बेटों के लिए दिल्ली के दरवाज़े बंद हो चुके थे। उम्मीद की एक किरन यह थी कि कटक का नाजि़म शुजाउद्दीन उनका रिश्तेदार था। लेकिन आगरा से कटक जाना हँसी-खेल न था। मिर्ज़ा मुहम्मद अली के जख़्म हरे थे और सफर लम्बा था। बरसात का मौसम भी शुरू हो गया था। कहीं आने-जाने का सवाल ही न पैदा होता था। नदियों में तुग़यानी थी और रास्ते कीचड़ की वजह से दलदली हो गये थे। बरसात में कहारों और मालबरदार गाडिय़ों का मिलना भी दुश्वार था। इसलिए शाह क़ुली ख़ाँ ने अपने मीर मुंशी को आगरा भेज दिया ताकि सफर का इंतिज़ाम करता रहे और ख़ुद अपने जख़्मी बेटे मिर्ज़ा मुहम्मद अली और मिर्ज़ा अहमद के साथ बागपत आ गये जहाँ उनके दोस्त मीर इलाही बख़्श की जागीर थी। 

बरसात खत्म होने के बाद शाह क़ुली ख़ाँ का खानदान बज़रिय-ए-जमना बनारस की तरफ रवाना हुआ। चार बजरों का उनका कारवाँ बख़ैरियत बनारस पहुँच गया। अब वहाँ से कटक के लिए सफर दुश्वार था। बनारस में पालकियों, घोड़ों, मालबरदार गाडिय़ों और सिपाहियों का इंतिज़ाम करने में महीना लग गया। 

शाह क़ुली ख़ाँ Shah Quli Khan
शाह क़ुली ख़ाँ 
बेसरो-सामानी की हालत में शाह क़ुली ख़ाँ कटक पहुँचे तो कटक के नायब शुजाउद्दीन ने उनकी बड़ी आवभगत की और शाह क़ुली ख़ाँ को नौकरी दे दी। लेकिन लम्बा सफर और नयी आबो-हवा शाह क़ुली ख़ाँ को रास न आयी और सन 1732 में उनका वहीं इंतिक़ाल हो गया। उनके बड़े बेटे मिर्ज़ा अहमद हज करने चले गये और छोटे बेटे मिर्ज़ा मुहम्मद अली कटक में नौकरी करते रहे। मिर्ज़ा मुहम्मद अली बहुत गंभीर, ईमानदार, समझदार और इंतिज़ामी मामलात में होशियार थे। उन्होंने कटक के शासक शुजाउद्दीन के इलाक़े के कुछ बाग़ी सिरफिरे जमींदारों को क़ाबू में कर लिया था जिससे मालगुजारी में इज़ाफ़ा हो गया था। इसके अलावा उन्होंने कटक के इंतिजामी मामलात बेहतर बनाने के लिए कुछ कारामद मश्विरे दिए थे। चंद ही सालों में शुजाउद्दीन उन पर भरोसा करने लगा और वो तरक्की की मंजि़लें तय करते हुए शुजाउद्दीन के चिलमबरदार के ओहदे पर पहुंच गये। 1728 में शुजाउद्दीन ने मिर्ज़ा मुहम्मद अली को अलीवर्दी ख़ाँ का ख़िताब देकर राजमहल का फौजदार बनाया। इस दौरान मिर्ज़ा मुहम्मद अली यानी अलीवर्दी ख़ाँ ने अपने बड़े भाई को, जो हज करने के बाद हाजी अहमद कहलाने लगे थे और दिल्ली में रहने लगे थे, कटक बुला लिया। कटक आते ही उसकी नियुक्ति मोहतमम मलबूसात मतलब वस्त्रागार के सर्वोच्च अधिकारी के रूप में हो गयी। दोनों भाई कटक के शासक शुजाउद्दीन के बहुत करीब आ गये। कुछ इतिहासकार जैसे जे.ज़ेड. होलवेल ने अपनी किताब 'इंटेरिस्टिंग हिस्टॉरिकल इवेन्ट्स रिलेटिंग टु द प्राविन्स ऑफ बेंगाल एण्ड द इम्पायर ऑफ हिन्दोस्तान,' लंदन, 1775-76 और ल्यूक स्क्रैफ्टन ने 'रिफ्लेशन्स ऑन द गवर्नमेन्ट ऑफ हिन्दोस्तान' (1763) में लिखा है कि इन दोनों भाइयों मतलब मिर्ज़ा अहमद और अलीवर्दी ख़ाँ ने शुजाउद्दीन को खुश करने और कटक सरकार में ऊँचे ओहदों तक पहुँचने के लिए अपने घर की औरतों की, सेवाएं ली थीं। होलवेल ने लिखा है कि हाजी अहमद ने ''बहुत जल्दी अपने मालिक (शुजाउद्दीन) की इस बड़ी कमज़ोरी को भाँप लिया था कि उसे तरह-तरह की औरतों से बहुत दिलचस्पी है। वह (हाजी अहमद) खुद भी संभोग के शौक में उसका सहयोगी बन कर उसके लिए इस शौक का 'सामान' मुहैया करा कर जल्दी ही अपने मालिक पर छा गया था।'' स्क्रैफ्टन ने एक क़दम आगे बढ़ कर लिखा है कि हाजी अहमद ने खुद अपनी बेटी को ही शुजाउद्दीन की कामुकता की भेंट चढ़ा दिया था। लेकिन दूसरे इतिहासकारों का कहना है कि होलवेल और स्क्रैफ्टन के बयान साक्ष्यों की कमज़ोरी तथा दूसरे इतिहासकारों द्वारा बताई गयी बातों के आधार पर बहुत प्रामाणिक नहीं रह जाते। 

उड़ीसा का नायब नाजि़म शुजाउद्दीन बंगाल के नाजि़म सूबेदार मुर्शिद क़ुली ख़ाँ का दामाद था, लेकिन दोनों एक-दूसरे को फूटी आँखों न भाते थे। मुर्शिद क़ुली ख़ाँ की लड़की बेगम ज़ेबुन्निसां भी अपने पति शुजाउद्दीन की आवारगी से तंग आकर बेटे सरफ़राज़ के साथ अपने वालिद मुर्शिद क़ुली ख़ाँ के साथ रहने लगी थी। मुर्शिद क़ुली ख़ाँ किसी भी सूरत बंगाल की सूबेदारी अपने औबाश दामाद शुजाउद्दीन को नहीं देना चाहते थे। जब उन्हें अपने बचने की उम्मीद न रही तो उन्होंने दिल्ली दरबार से अपने नवासे सरफ़राज़ ख़ाँ के लिए बंगाल की सूबेदारी की सनद हासिल करने की कोशिश शुरू कर दी। जैसे ही इस बात का पता शुजाउद्दीन को लगा उसने हाजी अहमद और अलीवर्दी ख़ाँ से मश्विरा किया। तीनों की राय यह बनी कि हिन्दोस्तान के शहंशाह बहादुरशाह अव्वल, उनके वज़ीरे-आज़म क़मरुद्दीन और ख़ाने-दौरां ससामुद्दौला को क़ीमती से क़ीमती तोहफे भेज कर यह दरख़ास्त की जाये कि बंगाल की सूबेदारी की सनद शुजाउद्दीन को दे दी जाये। अलीवर्दी ख़ाँ ने यह पक्का इंतिज़ाम किया कि मुर्शिदाबाद और दिल्ली के दरमियान जो डाक आ-जा रही है उसका पता उन्हें चलता रहे। उन्होंने उड़ीसा की फौज के कुछ सौ सिपाहियों को बज़ाहिर नौकरी से निकाल दिया, लेकिन बहुत खुफ़िया तरीके से उनके जिम्मे यह काम सौंपा गया कि वे मुर्शिदाबाद जाकर महल और फौजी छावनी के आसपास इस तरह रहें कि जरूरत पडऩे पर कोई भी कार्यवाही कर सकें। यह तय किया गया कि बारिश हो जाने की वजह से रास्ते बंद हो जायें तो नदियों के रास्ते मुर्शिदाबाद जाने के लिए बड़ी-बड़ी फौजी नावें तैयार रहें। बहरहाल जब यह ख़बर आई कि मुर्शिद क़ुली ख़ाँ पाँच-छ: दिन से ज्य़ादा जिन्दा न बचेंगे तो एक बड़ी फौज लेकर शुजाउद्दीन मुर्शिदाबाद की तरफ बढ़ा। इसी दौरान दिल्ली से सनद भी आ गयी और बंगाल की सूेदारी पर उसका हक़ और पक्का हो गया। 

अब बाप और बेटा आमने-सामने थे। शुजाउद्दीन एक बड़ी सेना लेकर मुर्शिदाबाद की तरफ बढ़ा आ रहा था। ऐसे नाज़ुक मौके पर स्वर्गीय मुर्शिद क़ुली ख़ाँ की बेगम यानी शुजाउद्दीन की सास, सरफ़राज़ की नानी ने समझदारी से काम लिया। बंगाल की सूबेदारी शुजाउद्दीन को मिल गयी। मतलब बाप के हक़ में बेटे ने, अपने को पीछे कर लिया। 

खूब जश्न मनाये गये। इनामात बाँटे गये। मिर्ज़ा मुहम्मद अली को उनकी सेवाओं का फल मिला। अलीवर्दी ख़ाँ के हिस्से में बिहार की नायब सूबेदारी आयी। यह बहुत बड़ा पद था। अलीवर्दी ख़ाँ ने समझदारी, साहस और कूटनीति से बिहार के बाग़ी बनजारों की ताक़त को तोड़ा और उन्हें अपने आधीन किया। बनजारे लम्बे समय से सूबेदार के लिए मुसीबत बने हुए थे। दूसरे विद्रोही चकलेदारों और सामंतों को भी लड़ाइयों में हराया। अलीवर्दी ख़ाँ को अब्दुल करीम ख़ाँ के रूप में एक बहुत साहसी व योग्य अफ़गान मिल गया था जो उसके शासन की रीढ़ की हड्डी बन गया था। लेकिन धीरे-धीरे जब अलीवर्दी ख़ाँ ने अब्दुल करीम ख़ाँ की बढ़ती महत्वाकांक्षा को देखा तो धोखा देकर उसकी हत्या करा दी थी। 


जगत सेठ का महल (मुर्शिदाबाद)
दौलत, ताकत और बंगाल के प्रभावशाली लोगों जैसे जगत सेठ आदि से संबंध बनाने के बाद अलीवर्दी ख़ाँ की नज़र बंगाल की गद्दी पर थी। इसके लिए उसे ज्यादा इंतिज़ार नहीं करना पड़ा। शुजाउद्दीन की मौत (1740) के बाद रास्ता खाली था। शुजाउद्दीन के पुत्र सरफ़राज़ ख़ाँ का उससे कोई मुकाबला न था। वह बहुत आसानी से, बड़ी चतुराई के साथ बंगाल का सूबेदार बन गया। 

अलीवर्दी ख़ाँ के वालिद शाह क़ुली ख़ाँ वो शाह क़ुली ख़ाँ नहीं हैं जिनकी मुझे तलाश है। 

फतेहपुर डिस्ट्रिक्ट गज़ेटियर में उल्लेखित शाह क़ुली ख़ाँ अलीवर्दी ख़ाँ के पिता होते तो बाक़र गंज के सैयदों के इतिहास में अलीवर्दी ख़ाँ जैसे विख्यात और शक्तिशाली बंगाल, बिहार और उड़ीसा के सूबेदार का नाम जरूर होता। इसलिए अलीवर्दी के वालिद शाह क़ुली ख़ाँ का कोई रिश्ता बाक़र गंज के सैयदों से नहीं जुड़ता। तलााश को और आगे बढ़ाना चाहिए। लेकिन मुश्किल ये है कि अलीवर्दी के बड़े भाई हाजी अहमद मुझे रोक रहे हैं। चलिए ये माना कि वे बाक़र गंज के सैयदों के पूर्वजों में नहीं हैं, लेकिन हैं मज़ेदार आदमी और उनके बारे में कुछ न बताना बहुत ग़लत होगा। इसलिए सुनिए। हाजी अहमद के बारे में सभी इतिहासकार कहते हैं वे बड़े कामुक, व्यभिचारी, दुराचारी, कपटी, चालाक, धोखेबाज़, बेशरम, बेहूदा, चाटुकार, लम्पट, झूठे, मक्कार, दग़ाबाज़, जालसाज़, सत्ता-लोलुप, अधिकारों का दुरुपयोग करने वाले बूढ़े व्यक्ति थे। अपने छोटे भाई अलीवर्दी ख़ाँ के सूबेदार हो जाने के बाद हाजी अहमद ने अपने अत्यंत महत्वाकांक्षी बेटे ज़ैनुद्दीन को बिहार का नायब सूबेदार बनवा दिया था। हाजी अहमद ने ऐशो-इशरत के सभी सामान जमा कर रखे थे। उसके पास एक बड़ा हरम था जहां खूबसूरत औरतों की कमी न थी। हीरे जवाहरात और सोना-चाँदी भी बड़ी मिक़दार में जमा कर रखा था। वह अजीमाबाद के शाही महल में बड़ी शानो-शौकत के साथ रहता था। सैकड़ों नौकर-चाकर, ख़िदमतगार, प्यादे, सिपाही, दरोग़ा, फौजी उसकी ख़िदमत में हाजि़र रहा करते थे। उसका बेटा ज़ैनुद्दीन अपने बाप की इन सब हरकतों को जानते हुए भी अनजान बना रहता था। 

गोकि मुग़लों ने पठानों को राजसत्ता से उखाड़ फेंका था, लेकिन सैकड़ों सौ साल से हिन्दुस्तान में रहने वाले पठान वापस कहाँ जाते? वे हिन्दुस्तान में ही अपनी सीमित भूमिकाएँ निभाते रहते थे। जहाँ मौका मिलता था वहाँ सत्ता में शामिल होकर या सत्ता हथिया कर या विरोधी बन कर अपना काम चलाते थे। सैन्य कलाओं में दक्ष होने के कारण उनकी माँग सेना में रहती ही थी। वे बगाल और बिहार में कभी शासकों, कभी विद्रोहियों के पक्ष में लड़ा करते थे। 

सत्ताधारी की महत्वाकांक्षाएँ तो आँधी-तूफान की तरह बढ़ती हैं। हाजी अहमद के लड़के बिहार के नायब सूबेदार अलीर्वी ख़ाँ के भतीजे ज़ैनुद्दीन के दिमाग़ में यह ख़याल आया कि वह अपने चचा को सत्ता से हटा कर खुद बंगाल का सूबेदार बन सकता है। उसके इस ख़याल को हाजी अहमद ने और हवा दी। उस ज़माने में बंगाल का मतलब था पूरा पूर्वी और पश्चिमी बंगाल, उड़ीसा और बिहार जिसकी सालाना मालगुज़ारी सोलह करोड़ रुपया सालाना थी। इसका क्षेत्रफल योरोप के कई देशों से अधिक था और बंगाल का सूबेदार हिन्दुस्तान के धनवान सूबेदारों में गिना जाता था। 

अपार सम्पत्ति का लालच जैऩुद्दीन और उसके वालिद हाजी अहमद को पागल बना देने के लिए काफी था। बंगाल की गद्दी पर कब्ज़ा जमाने के लिए फौजी ताक़त और ऐसी फौजी ताक़त दरकार थी जो अलीवर्दी ख़ाँ जैसे शासक और सेना नायक से टक्कर ले सके। ज़ैनुद्दीन ने इधर- उधर नज़रें दौड़ाईं और उसे सिर्फ पठान दिखाई दिए जो अगर उसके साथ आ जाते तो वह बंगाल की सूबेदारी तक पहुँच सकता था। 

दरभंगा जिले में ऐसे पठानों के कई समूह थे जो पहले अलीवर्दी ख़ाँ की फौज में थे, लेकिन अब अलग कर दिए गये थे। ज़ैनुद्दीन उन्हें अपनी फौज में रखना चाहता था। लेकिन जाहिर है ऐसा करने से वह अलीवर्दी ख़ाँ को नाराज़ कर देता या अलीवर्दी ख़ाँ चौंक जाता कि उसका भतीजा पठानों को अपनी फौज में क्यों शामिल कर रहा है। हाजी अहमद ने अपने बेटे ज़ैनुद्दीन को सलाह दी कि वह अलीवर्दी ख़ाँ को ख़त लिखे कि दरभंगा में हज़ारों पठानों की मौजूदगी खतरनाक साबित हो सकती है। इन पठानों को काबू में करने के लिए उन्हें सरकारी फौज में नौकरी दे दी जाये तो बहुत अच्छा हो। लेकिन बिहार में इतना राजस्व नहीं है कि इन्हें तंख्वाहें दी जा सकें। इसलिए बंगाल की सरकार यह खर्च उठाये। अलीवर्दी के पास जब यह ख़त पहुँचा तो उसे अच्छा नहीं लगा। लेकिन अपने भतीजे और भाई की सुरक्षा और इच्छा का सम्मान करते हुए उसने यह आदेश दे दिया कि पाठानों को फौज में भरती कर लिया जाये। 

अलीवर्दी ख़ाँ की स्वीकृति पाते ही ज़ैनुद्दीन दीवाना हो गया। अब तो उसे बंगाल की सूबेदारी अपने कदमों में लोटती दिखाई पडऩे लगी। उसने फौरन दरभंगा के पठानों से सम्पर्क साधा। दिसम्बर, 1747 तक पठान बड़ी संख्या में अपने नेताओं शमशीर ख़ाँ , मुराद शेर ख़ाँ , सरदार ख़ाँ के नेतृत्व में गंगा के उस पार हाजीपुर पहुँच गये। उन्होंने फौरन गंगा पार करके पटना आने की कोशिश नहीं की क्योंकि उन्हें ज़ैनुद्दीन पर ये भी शक था कि वह उन्हें जाल में फंसा कर बर्बाद कर देना चाहता है। बहरहाल बातचीत चलती रही। पटना के चेहेल सुतून मतलब दरबारे-आम में मुलाकात रखी गयी। पठानों को विश्वास में लेने के लिए ज़ैनुद्दीन ने यह आदेश दिया कि इस मुलाकात में उसके फौजी या सिपाही न रहेंगे। मुलाकात में कुछ दरबारी और मुंशी ज़ैनुद्दीन के साथ थे। 

तयशुदा जगह और वक़्त पर मुराद शेख़ और ठाकुर बहेलिया के साथ पाँच सौ पठान फौजी पहुँच गये। इसके साथ शमशीर ख़ाँ तीन हज़ार पठान सिपाहियों को लेकर शहर की कोतवाली पहुँच गया और उसने शाही महल की ओर जाने वाला रास्ता और पश्चिमी दरवाज़ा बंद कर दिया। दरबार हॉल में पठान सरदारों को जब यह सूचना मिली कि शहर पर शमशीर ख़ाँ का कब्ज़ा हो गया है तो दरबार हॉल का रंग बदल गया। सबसे पहले एक अफ़गान अब्दुल रशीद ने ज़ैनुद्दीन के पेट में खंज़र भोंक दिया। यह जख़्म ज्य़ादा गहरा न था इसलिए मुराद शेर आगे बढ़ा और तलवार के भरपूर वार से ज़ैनुद्दीन के दो टुकड़े कर दिये। फिर उसकी लाश को टुकड़-टुकड़े करके दफ़न कर दिया गया। ज़ैनुद्दीन का मक़बरा आजकल मक़बरा हैबत जंग के नाम से मशहूर है। दरअसल पठानों ने ज़ैनुद्दीन से रौशन ख़ाँ तराही के ख़ून का बदला लिया था जिसे धोखा देकर ज़ैनुद्दीन ने क़त्ल करा दिया था। 

ज़ैनुद्दीन की हत्या के बाद पटना शहर में ग़दर मच गया। हाजी अहमद को जब इसकी ख़बर मिली तो उसके पास इतना वक़्त था कि वह भाग कर अपने भाई अलीवर्दी ख़ाँ के पास मुर्शिदाबाद जा सकता था, लेकिन नब्बे साल का हाजी अहमद अपने साथ हरम की औरतें और अपना ख़ज़ाना ले जाना चाहता था। यह सब करने में इतनी देर लग गयी कि उसे पठानों ने पकड़ लिया। हाजी अहमद के रूप में पठानों को ख़ज़ाने की चाबी मिल गयी। लेकिन हाजी अहमद यह बताने के लिए तैयार नहीं था कि ख़ज़ाना कहाँ छिपाया है। पठान उसे सत्रह दिन तक भयानक शारीरिक कष्ट पहुंचाते रहे। उसके नाख़ून उखाड़ लिए। जलाया गया। उल्टा लटकाया गया। गरम तेल छिड़का गया। चरखी पर चढ़ाया गया। उसके जिस्म पर बिच्छू छोड़े गये। आँखें फोड़ दी गयीं। नाक और कान काट लिए गये। भयानक कष्टों के बाद कहीं जाकर हाजी अहमद ने बताया कि महल में क़दम रसूल के पत्थर के नीचे ख़ज़ाना गड़ा है। अफ़ग़ानों ने क़दम रसूल उखाड़ फेंका। उसके नीचे से उन्हें बड़ी मात्रा में हीरे जवाहरात, सोने और चाँदी की छड़ें और सत्तर लाख रुपये मिले। ज़ैनुद्दीन के महल से भी उन्हें बहुत धन-दौलत हासिल हुई। हाजी अहमद भयानक शारीरिक कष्टों के कारण तीस जनवरी, 1748 ई. को मर गया। वह एक पाठ पढ़ा गया जिसे पढ़ते तो सब हैं पर उससे सीखते कम हैं। 

पटना शहर अफगान पठानों के कब्ज़े में तीन महीने रहा और इस दौरान पटना के शहरियों की लूटमार जारी रही। वहाँ रहने वालों ने बड़े दु:ख उठाये और अपमान झेले। हर आदमी ने डर और ख़ौफ़ में दिन-रात गुजारे। उन हालात के चश्मेदीद गवाह पटना के एक शहरी ग़ुलाम हुसैन ने लिखा है कि शमशेर ख़ाँ और बख़्शी बहेलिया के सिपाही किसी उसूल क़ायदे के पाबंद न थे और न उन्हें किसी तरह के दबाव का डर था। उनके सिपाही बदनसीब शहर के कोने-कोने में फैल गये थे और कोई दिन ऐसा नहीं गुजरता था जब कुछ मकान इनकी ज़ोर ज़बरदस्ती और हर तरह की नापाक हरकतों का निशाना न बनते हों। बहुत-से घरों की इनके हाथों बेइज़्ज़ती हुई और शायद ही कोई ऐसा खुशक़िस्मत होगा जो इन बदमाशों की क़ाबिले नफ़रत हरकतों से बच सका हो। 

बाक़र गंज के सैयदों के तीन पुरखों को खोजने और उनके बीच एक क्रम स्थापित करने की मेरी कोशिश नाकाम हो गयी है। क्योंकि अब तक न तो मुझे सैयद इकरामुद्दीन का पता चल सका है और न वे शाह क़ुली ख़ाँ और मुहम्मद तक़ी मिल सके हैं जिनका ताल्लुक बाक़र गंज के सैयदों से था। 

अब बाक़र गंज के सैयदों के चौथे पुरखे सैयद (मीर) ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ की तलाश का काम शुरू करता हूँ। श्रुतियों के अनुसार सैयद ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ अवध के नवाब आसिफुद्दौला के दरबारी थे। एक दिन नवाब ने दरबार में कहा कि वे दुनिया का सबसे बड़ा इमामबाड़ा लखनऊ में बनवाने जा रहे हैं। उनकी मर्जी है कि इस इमामबाड़े की संगे-बुनियाद वह आदमी रखे जिसने एक वक़्त की नमाज़ न क़ज़ा (छोड़ी) की हो और जिसने अपनी बीवी के अलावा किसी दूसरी औरत के साथ कभी जिस्मानी रिश्ता न क़ायम किया हो। नवाब ने सभी दरबारियों से कहा कि तुममें कौन ऐसा है जो क़ुरान पर हाथ रख कर यह कह सके। दरबारियों को साँप सूँघ गया। इतने में मीर ज़ैनुलआब्दीन खड़े हुए और उन्होंने क़ुरान पर हाथ रख कर क़सम खाई। बड़े इमामबाड़े का संगे-बुनियाद उन्होंने ही रखा था। 

यह भी प्रचलित है कि मीर ज़ैनुलआब्दीन साल में सिर्फ एक बार अपनी निकाही बेगम के पास जाते थे और हमल ठहर जाता था। उनके नौ लड़के थे। 

दोआब के इलाके में एक चकलेदार बड़ा ताक़तवर हो गया था। अवध के नवाब को ख़िराज न देता था। नवाब ने उसकी सरकूबी के लिए कई बार फौजें भेजी थीं, लेकिन कोई उसे ज़ेर न कर पाया था। आख़िरकार नवाब ने यह काम मीर ज़ैनुलआब्दीन को सौंपा। वे अपनी फौज लेकर आये, लेकिन काली नदी के उस पार फौज को रोक दिया और ख़ुद अकेले चकलेदार के क़िले में पहुंचे। अपना परिचय कराया और कहा कि मैं तुमसे नब्बे लाख रुपया वसूल करने आया हूँ जो तुम्हारी तरफ से शाही खज़ाने की लेनदारी बनती है। चकलेदार ने कहा, तुमसे पहले भी कई लोग आये और वापस लौट गये। तुम भी अपनी फौज को ले आओ और लड़ो। अगर जीत जाओगे तो पैसा दे दूँगा, नहीं तो लौट जाना। ज़ैनुलआब्दीन ने कहा—देखो मसला मेरे और तुम्हारे दरम्यान है। हमारी फौजें लड़ेंगी तो नाहक़ सिपाही मारे जायेंगे। क्यों न हम तुम लड़ कर मसले को तय कर लें। तुम जीत जाओगे तो मैं बग़ैर पैसा लिए चला जाऊँगा। हार जाना तो पैसा दे देना। चकलेदार तैयार हो गया। उस ज़माने में किसी की जिस्मानी ताक़त को चुनोती देना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। चकलेदार ने पूछा—''हमारे तुम्हारे दरम्यान लड़ाई कैसे होगी? तलवारबाज़ी होगी या ख़ंजर से लड़ेंगे या भाले-बल्लम से लडऩा चाहते हो?'' 

ज़ैनुलआब्दीन ने कहा—''लड़ाई का तरीका ये होगा कि मैं अपने बायें हाथ से तुम्हारा दाहिना हाथ पकड़ लूँगा। तुम अगर अपना हाथ छुड़ा लोगे तो मैं हार जाऊँगा। वापस चला जाऊँगा और अगर तुम हाथ न छुड़ा पाये तो रक़म अदा कर देना।'' 

लड़ाई का ये तरीक़ा चकलेदार को बड़ा अपमानजनक लगा। उसने कहा—''तुमने क्या समझ रखा है? क्या मैं तुम्हारे बायें हाथ की गिरफ्त से अपना दाहिना हाथ न छुड़ा सकूँगा?'' बहरहाल चकलेदार ने अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ाया। ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ ने 'या अली मदद' कह कर अपने उल्टे हाथ से उसका सीधा हाथ पकड़ लिया। ज़ोर आज़माई शुरू हो गयी, चकलेदार ने बड़ी ताक़त लगाई। वह हट्टा-कट्टा और ताक़तवर आदमी था। लेकिन हाथ न छुड़ा सका। उसका चेहरा सुर्ख हो गया। जब उसके आदमियों ने देखा कि हमारा सरदार कमज़ोर पड़ रहा है, तलवारें सूत कर आगे बढ़े। 

मीर ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ का दाहिना हाथ खाली था। उन्होंने चकलेदार के आदमियों को बढ़ता देख कर अपना ख़ंजर निकाला और चकलेदार की गर्दन पर रख कर कहा कि अगर कोई मेरे पास आया तो फिर इसकी ख़ैर नहीं है। 

चकलेदार ने अपने आदमियों को रोक दिया। उसने ज़ैनुलआब्दीन से कहा—''आप जीते मैं हारा। अब मेरा हाथ छोडि़ए।'' 

सुनी सुनाई बातों और किस्से कहानियों जैसे प्रसंगों से अलग इतिहास की प्रामाणिक किताबों आदि में मीर ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ के बारे में जो जानकारियां मिलती हैं उनके आधार पर खोज को आगे बढ़ाया जा सकता है। पहली और सबसे बड़ी जानकारी यह मिलती है कि अवध के नवाब आसिफ़द्दौला (1775-1797) के प्रधानमंत्री सरफराज़ुद्दौला (कार्यकाल 28 जनवरी मार्च 1776) के बुलाने पर ज़ैनुलआब्दीन मुर्शिदाबाद से लखनऊ आये थे। 

मुर्शिदाबाद में ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ की तलाश दिलचस्प काम था। खुदा भला करे क्रिस्टोफर बायर का जिसने मुर्शिदाबाद के इतिहास पर एक बहुत अच्छी वेबसाइट बनाई है जिसमें मुर्शिदाबाद के नवाबों के तीनों वंशों की वंशावलियां बहुत विस्तार से दी गयी हैं। मुर्शिदाबाद के नवाबों का पहला वंश नसीरी है जिसके पहले नवाब मुर्शिद क़ुली ख़ाँ थे। दूसरा वंश अफशर कहा जाता है जिसके अलीवर्दी ख़ाँ थे। तीसरा वंश नजफ़ी है जिसके बहुत प्रमुख सदस्य विश्वासघाती के रूप में विख्यात नवाब मीर जाफ़र थे। 

मुझे नहीं मालूम कि क्रिस्टोफर बायर कौन हैं? उन्होंने मुर्शिदाबाद की इतनी अच्छी वेबसाइट क्यों बनाई है? उनका मुर्शिदाबाद के नवाबों से कोई संबंध है या नहीं? बहरहाल उनकी साइट को देखने के बाद मैंने उन्हें एक ई-मेल भी भेजा था जिसका उन्होंने जवाब भी दिया था। पर फिर बात आगे नहीं बढ़ी। लेकिन उनकी वेबसाइट ने कमाल का काम कर दिया। मेरी कई सालों की खोज का उत्तर इस साइट पर मिला। शुरू-शुरू में कुछ गुत्थियाँ भी उलझ गयी थीं, लेकिन वे समय के साथ-साथ साफ होती चली गयीं और हैरतअंगेज़ तथ्य सामने आने लगे। जैसे-जैसे जानकारी मिलती गयी मैं हैरान होता रहा। सोचता और दु:ख करता रहा कि बाक़र गंज के सैयदों में अब ऐसा कोई नहीं बचा है जो इन तथ्यों पर रौशनी डाल सकता। फिर सोचा यह एक-दो पीढिय़ों पीछे की बात नहीं है। अगर मीर ज़ैनुलआब्दीन जीवित होते तो शायद इस बारे में कुछ बताते। पर अफसोस कि ऐसा असंभव है। यह गुत्थी भी इतिहास की अन्य अनसुलझी गुत्थियों की तरह शायद हमेशा या लम्बे समय तक अनसुलझी रहेगी। अब सिर्फ अंदाज़े लगा कर काम चलाया जा सकता है। अंदाज़े सही या ग़लत, दोनों हो सकते हैं। 

मीर जाफ़र और उसका बेटा मीरन
मीर ज़ैनुलआब्दीन का मृत्यु वर्ष 1792 बताया जाता है। जन्म वर्ष के बारे में कोई जानकारी नहीं मिलती। यदि उस समय की औसत आयु पैंसठ वर्ष के आधार पर अनुमान लगाया जाये तो उनका जन्म वर्ष 1728 माना जा सकता है। उन्होंने लगभग पूरी 18वीं शताब्दी देखी जो भारतीय इतिहास और समाज को एक नया मोड़ देने वाली शताब्दी थी। उन्होंने सिराजुद्दौला के खिलाफ रचा जाने वाला षड्यंत्र देखा होगा। प्लासी की लड़ाई देखी होगी। मराठों की आक्रामकता देखी होगी। टीपू सुल्तान की काबिले-मिसाल मौत देखी होगी। वे महाराजा रणजीत सिंह के दबदबे के साक्षी रहे होंगे। उन्होंने 1765 वाला बंगाल का भयानक अकाल देखा होगा जिसमें जवाहरलाल नेहरू के अनुसार बंगाल के मैदान जुलाहों की हड्डियों से सफेद हो गये थे। उन्होंने ईस्ट इण्डिया कम्पनी की साजि़शें देखी होंगी। लॉर्ड क्लाइव की लालच और मीर जाफर की सत्ता लोलुपता और फिर बेपनाह हताशा और निराशा देखी होगी। वे मीर क़ासिम के सत्ता में आने आने और फिर डूब जाने के गवाह रहे होंगे। उन्हें 1764 में बक्सर की लड़ाई की पूरी जानकारी रही होगी। उन्होंने बंगाल के किसानों पर लगातार बढ़ता लगान वसूल किया होगा। अवध की कठपुतली सरकारें और सामंती षड़यंत्रों और ऐशो-इशरत में डूबे समाज के आडम्बर को देखा होगा। लखनऊ के बड़े इमामबाड़े को बनते और वैभव को आकार लेते देखा होगा। राजा नंदकुमार को फाँसी के तख्ते पर झूलते पाया होगा। मीर तक़ी मीर की, जो उनके हमउम्र थे, ग़ज़लें सुनी होंगी। मुर्शिदाबाद में यह ख़बर सुनी होगी कि नादिरशाह ने तख़्ते-ताऊस और कोहेनूर हीरा लूट लिया है। दिल्ली में क़त्ले-आम कराया है और बड़े सम्मानित लोगों के काम कटवा लिए हैं क्योंकि वे उतनी रक़म नहीं दे पाये थे जितनी नादिरशाह उनसे माँग रहा था। पानीपत की तीसरी लड़ाई में मराठा शक्ति के टूटने और बिखरने की ख़बरें उन तक ज़रूर पहुँची होंगी। क्रिस्टोफर बायर द्वारा दी गयी मुर्शिदाबाद की नसीरी वंशावली में मीर ज़ैनुलआब्दीन का नाम नहीं है। दूसरे वंश अफशार में भी उनका नाम दिखाई नहीं पड़ता। क्रिस्टोफर बायर ने इन वंशावलियों पर बहुत विस्तार से काम किया है और प्राय: छ:-सात पीढिय़ों तक के नाम दिए हैं। तीसरी वंशावली नजफ़ी वंशावली है। हिन्दुस्तान में इस वंश के संस्थापक सैयद हुसैन नजफ़ी तबातबाई, जो सैयद अली रजा के बेटे थे, सम्राट औरंगजेब के बुलाने पर 24 अप्रैल, 1676 ई. को दिल्ली पहुँचे थे। उन्हें औरंगजेब ने काज़ी-उल-साजुद नियुक्त किया था। इसके बाद दरोग़ा बयुतात का पद दिया गया था। उनकी शादी दारा शिकोह की किसी बेटी से हुई थी। सैयद हुसैन नजफ़ी के पाँच बेटे और एक बेटी थी। इन पाँचों बेटों में दो इराक और ईरान में बस गये थे। तीसरे सैयद मोहसिन नजफ़ी को 'नजफ़ ख़ाँ ' की उपाधि और अन्य पदों के अलावा ग्वालियर की क़िलेदारी मिली थी। चौथे बेटे सैयद अहमद नजफ़ी (मिर्ज़ा मीरक) के सात बेटे और एक बेटी थी। उनके एक बेटे—मीर मुहम्मद जाफ़र ख़ाँ थे जो बाद में शुजाउल मुल्क, हाशिमुद्दौला नवाब जाफर अली ख़ाँ बहादुर, महाबत जंग नवाब नाजि़म बंगाल, बिहार और उड़ीसा हुए। इन्हें उर्फे आम में मीर जाफर भी कहा जाता है। वही मीर जाफर हैं जिन्होंने प्लासी की लड़ाई में नवाब सिराजुद्दौला को धोखा दिया था। वही मीर जाफर जिन्होंने लॉर्ड क्लाइव, सेठ अमीचंद और जगतसेठ के साथ मिल कर सिराजुद्दौला का तख्ता पलट दिया था। वही मीर जाफ़र जिनके लड़के मीरन ने सिराजुद्दौला की हत्या करायी थी। वही मीर जाफ़र जिनका नाम इतिहास में जयचंद के साथ लिया जाता है। वही मीर जाफ़र जो विश्वासघात का प्रतीक बन चुके हैं। जिनकी हवेली को आज भी नमक हराम की डियोढ़ी कहा जाता है। जिन्हें लोगों ने ग़द्दार-ए-अबरार यानी भले आदमी से विश्वासघात करने वाले की उपाधि दी थी। 

सैयद हुसैन नजफ़ी के सबसे छोटे पांचवें बेटे का नाम सैयद ज़ैनुद्दीन नजफ़ी था। इन्हें नजफ़ ख़ाँ दोयम भी कहा जाता था। ये उड़ीसा के नायब सूबेदार थे। उनके एक बेटा था जिसका नाम नवाब सैयद इस्माइल अली ख़ान बहादुर (मीर इस्माइल) था। सैयद इस्माइल के आठ बेटे और एक बेटी थी। आठों बेटों के नाम वेबसाइट नहीं बताती। चार बेटों और दो बेटियों के नामों में एक नाम सैयद ज़ैनुलआब्दीन अली ख़ाँ का भी है। संभवत: यही वे ज़ैनुलआब्दीन हैं जिनकी मुझे तलाश है। यहीं यह भी पता चलता है कि बदनामे-जमाना मीर जाफर सैयद ज़ैनुलआब्दीन के रिश्ते के चचा थे। 

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('हंस' में प्रकाशित हो रही कड़ी... )
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