उपन्यास अंश: 'माधो, मैं ऐसो अपराधी' - अल्पना मिश्र : Excerpts from Alpana Mishra's Novel

'माधो, मैं ऐसो अपराधी', उपन्यास 'हर्फ हर्फ मुलाकात' का अंश 

उपन्यास अंश: 'माधो, मैं ऐसो अपराधी' - अल्पना मिश्र : Excerpts from Alpana Mishra's Novel

- अल्पना मिश्र

ये सुनहरे दिन छोटे थे। छोटे इसलिए कि जल्दी बीत गए थे और सुनहरे इसलिए कि बिना सोचे लिखते जाने में भी नौकरी पा लेने का संतोष और बेरोजगार से कुछ उपर उठ जाने का सुख छिपा था। उस कमरे का काम जब रूक गया तो मेरी जरूरत भी वहाँ चली गयी। मैं पूरी कचहरी में घूमता रहता कि कोई कैसा भी लिखने का काम मिल जाये। अगर मैं फेरीवाला होता तो ‘लिखवा लो’ की पुकार वाली फेरी लगाता। अगर मैं शायरी करता तो मिर्जा गालिब की तरह ‘हुई सुबह और कान पर रख कर कलम निकले’ की तरह कुछ कहता। लेकिन यहाँ मैं आँखों से काम तलाशता और ‘लिखवा लो’ की फेरी लगाने में शर्म महसूस करता। कोई कोई कहता भी-‘‘लिखने में होशियार है’’। पर जो कहता, वह काम पर नहीं बुलाता। मुंशी सस्ते में काम कर देते। कोई किसी लड़के को बुला कर काम करा लेता। मैं और सस्ते में काम करने को तैयार हुआ। मुंशी 20 रूपये कहता तो मैं 18 कह देता। फिर मैं 15 में तैयार होने लगा। कभी कभी तो 10 रूपये में ही मैं काम करने लगता। मैं और भी तरह के कामों को अपनी योग्यता में शामिल करने की बावत जान गया था। इसलिए कभी कभी चाय लाने या पान लाने के काम को भी तत्पर हो जाता। जर्दे की किस्में मैं पहचानने लगा। तम्बाकू के नम्बर मुझे याद हो गए। मैं अपनी बड़ी मुश्किल से मिली बी. ए. की डिग्री को भूल गया। एक कप चाय पा जाने की एवज में जब मैं चाय ला रहा था या शायद जरा सा तम्बाकू पा जाने की एवज में तम्बाकू ला रहा था, ऐसे ही किसी समय में मुझे गुप्ता वकील ने टोका था-‘‘हे... रे, ऐ... हे...’’ बस, इसी में मैंने अपना नाम पुकारा जाना समझ लिया था। 

दौड़ कर आया और टाइपराइटर के आगे बैठ गया। 

‘‘हैं, हैं, लिखो भई, सोचो मत।’’ 

गुप्ता वकील के मुँह में इतना तम्बाकू भरा था कि आखिरी शब्द तक आते आते उनके मुँह से कुछ थूक बाहर आ गयी। वे थूकने के लिए दौड़े। थूक कर आए तो लिखवाने लगे। लिखवाते लिखवाते उठ कर थूकने जाते। थूक कर फिर लिखवाते। इस तरह एक छोटा सा पत्र लिखवाने में उन्होंने चालीस मिनट खा लिया। पत्र में किसी पिछले दिन की तारीख डलवायी। नीचे वही सब, किसी न्यायाधीश का मय बेंच, जिला सत्र न्यायालय आदि का उल्लेख। पत्र पूरा करवा जब वे थूक कर लौट रहे थे तब किसी किसी से कहते हुए आ रहे थे कि ‘‘बस, भई एक मिनट में आता हूँ।’’ कमरे में लौटे तो किसी अदेखे से मिलने की हड़बड़ी उनसे चिपकी हुई थी। आते ही मेरी मेज पर हाथ मार कर दिशा निर्देश देने लगे - ‘‘दो घंटे रूक कर जाना। 50 रूपये। लौटकर आ कर देता हूँ। बस अभी आता हूँ। एक लड़का और एक लड़की आएंगे। पत्र उन्हें पढ़ा देना। देना मत। क्या समझे? देना नहीं है। फोटोस्टेट कराने के लिए भी नहीं। कहना सर से पूछ कर आइए। बस, टाल देना। अब कुछ दिमाग तो लगा लो यार। समझ गए न!’’ झल्लाते हुए वे निकल कर पहले बाँयी तरफ फिर मिनट भर में दॉयीं तरफ चले गए। 

सौदा बुरा नहीं था। मैं बैठ कर इंतजार करने लगा। इंतजार उबाउ था। उबते हुए मैंने पत्र को आठ दस बार पढ़ डाला। यह अजीब था। क्लाइंट का नाम नहीं था। दूसरी तमाम संख्याएं थीं फाइल संख्यॉ वगैरह। मैं लड़के लड़की के इंतजार में था। 

वे नहीं आए। 

एक मोटा, काला, एकदम कद्दू की तरह फूला हुआ आदमी घुसा। उसने मेरी तरफ अँगुली कर के कहा-‘‘ गुप्ता वकील।’’

‘‘नहीं हैं।’’ मैंने गुस्सा कर कहा। 

मैं गुप्ता वकील नहीं दिखना चाहता था। मैं उन्हें ज्यादा जानता भी नहीं था। जो कुछ जानता था, उसमें जनश्रुतियों का बड़ा योग था। इनमें वे किसी फिल्म के खुर्राट खलनायक की तरह बड़े मजबूत दिखते थे। फिर भी, रुकिए, मैं आज आपको सच सच बता दूँ कि उनके तम्बाकू खा कर थूकते रहने से ज्यादा मुझे उनकी आँखें नापसंद थीं। उनकी आँखों में बरसात की काई हर समय जमी रहती। दोनों कोरों पर उस काई का कुछ हिस्सा आ आ कर रूकता रहता। वे जितना पोंछते, काई उतने वेग से उतरती। जिस रोज वे पोंछना भूल जायेंगे, उस रोज की कल्पना बड़ी भयावह लगती।  यही उनका सौंदर्य था और यही मुझे बर्दाश्त नहीं था। मन होता झाड़ू वाले से कहूँ ‘उनकी आँख में पोंछा मार दे।’ जरूरी है भाई। फर्श तो वह बाद में भी पोंछ सकता है। 

हालाँकि उन्होंने आज मुझे काम दिया था और पचास रुपये का नोट एकदम जीवित रूप में मेरी आँखों में तैर रहा था। 

मैं पसंद और जरूरत के घालमेल में उलझा था उनके बारे में कुछ भी कहना टाल रहा था। 

तो मोटू ने कहा-‘‘गुप्ता वकील।’’ और मैंने कहा-‘‘नहीं हैं।’’

इससे वह संतुष्ट नहीं हुआ। धम्म से कुर्सी पर बैठ गया। 

‘‘उनके टाइपिस्ट, हाँ, कहाँ से पकड़ा तुम्हें।’’

अब मैं समझा। दरअसल उसने मुझे गुप्ता वकील समझा ही नहीं था। उसने पहली नजर में ही मुझे टाइपिस्ट समझ लिया था। मेरे सामने टाइपराइटर रखा था और मैं गुप्ता वकील की कुर्सी पर भी नहीं बैठा था। मैं अपनी गलतफहमी पर मुस्कराया। मोटे आदमी ने यह देखा और कुछ खुश हुआ।

‘‘भई, कागज हो तो मेरा भी एक लेटर टाइप कर दो। इंतजार में तो समय चला जाएगा। फोन उठा नहीं रहे। इमरजेंसी में विदेश जा रहा हूँ। बता देना। उधर लड़ना है। धंधा नहीं है, असली लड़ाई है। चलो, लिखो।’’

मैं फिर भी मुस्कराता रहा। यह मुस्कराहट इस बात की तसल्ली थी कि मैं जो था, वही समझा गया था। उसने इसे भी देखा और एकदम से छलक पड़ा-‘‘ किसी खुशी में नहीं जा रहा। मुसीबत आ गई है भई।’’ 

इसके बाद वह बोलने लगा। मैं टाइप करने लगा। करीब पंद्रह मिनट बोलने के बाद उसने नीचे अपना नाम लिखवाया- 

आपका 

मोहन कुमार

प्रापर्टी डीलर

यह नाम देख कर मैं चौंक गया। तो मोटे का नाम ‘मोहन कुमार’ था। दोनों पत्र के तार एक दूसरे से जुड़ रहे थे। 

यह तो वही बात हुई बैठे बिठाए एक कहानी का हाथ लग जाना। 

‘‘आप केस वापस ले रहे हैं?’’ मैंने ऐसे ही पूछ लिया। 

हालाँकि उसने अभी अभी जो कुछ लिखवाया था, उसका कुल सार था कि उसने कोई केस अपने होशोहवाश में वापस ले लिया है। कृपया उसकी फाइल बंद कर दी जाए। इसी ध्वनि को पकड़ कर मैंने पूछ लिया था। इसके पीछे जानने की कोई बड़ी बेचैनी नहीं थी। यह बस, ऐसे ही था, कुछ टाइमपास और कुछ नई कहानी जानने का मनोरंजन जैसा। 

‘‘हाँ, भई, क्या है कि वहाँ परदेश में मेरी बेटी का देहात हो गया। एक बच्चा है। उसका साथी माने ‘लिव इन’ में रह रही थी। बच्चे को छोड़ कर भाग गया है। मैं भी देखता हूँ कहाँ भाग कर जाता है। छोडूंगा तो मैं भी नहीं। बेटी के नाम फ्लैट था। बहुत सामान था। सबका हिसाब करना है। लेकिन पहले बच्चा ले जाने को कह रहे हैं। इसीलिए यहाँ के पचड़े से निकल रहा हूँ। नही तो बैठे बिठाए मजे में पैसे बन रहे थे। ’’

‘‘क्या ये वही केस है लड़के लड़की वाला?’’ 

‘‘तो तुम जानते हो। गुप्ता ने तुम्हें बताया होगा। उन दोनों का बाप जेल में बंद है। मुझ पर हाथ उठाने चला था। दोनों को भीख न मंगवाता तो मेरा नाम भी मोहन कुमार नहीं। लकी हैं साले, अभी मैं कुछ और काम में फंस गया।’’

मैं इस पर भी मुस्कराया। ऐसी बातें अकसर सुनाई पड़ती थीं। अब सीधे मुझसे मुखातिब थीं। 

कुछ रूक कर उसने कहा-‘‘ लड़की को देखा है? देखा ही होगा। पूरी पटाखा है।’’ आगे उसने आँख मारी-‘‘तू भी साला। गुप्ता के लिए लगा रह। लौट कर आया तो देखूंगा। न आया तो।’’ कह कर वह उठा।

‘‘हाँ। गुप्ता को लेटर दे देना।’’ इस बार उसने कुछ अतिरिक्त आत्मीयता से कहा। 

‘‘सर, टाइपिंग के पैसे?’’

‘‘रूपया गुप्ता से ले लेना। चलो, चलो, बेकार बकवास बंद करो।’’ आत्मीयता अचानक गायब हो गयी। लुढ़कता हुआ सा वह दरवाजे से बाहर चला गया। 

यह मुझे अच्छा नहीं लगा। रूप्ये की उम्मीद मुझे थी। कम से कम 10 रूपये तो दे ही सकता था। उसके लिए एक भद्दी गाली मेरे मन में उठी। 

मुझे दो घंटे से ज्यादा हो रहे थे और गुप्ता वकील लौट कर नहीं आए थे। 

मैं दोनों पत्रों को मिला कर कहानी बनाते बनाते थक गया तो सोने लगा। टाइपराइटर पर सिर रखकर। मैं जागा, जब किसी ने मेरे टाइपराइटर के पास दो बार ठक् ठक् किया। सामने एक लड़का था। लगभग सोलह सत्रह साल का। एकदम साफ धुली हुई आँखों से मुझे देख रहा था। आप जानते हैं मुझे ऐसी आँखें कितनी पसंद हैं। 

‘‘वकील साहब किसी आदेश के लिए कह रहे थे।’’

‘‘हाँ, हाँ।’’ मैं और जागा। 

‘‘मोहन कुमार वाला केस।’’ 

मैंने इतने आत्मविश्वास से कहा, जैसे मैं सब कुछ जानता हूँ। मैंने लड़के लड़की के लिए टाइप किया गया पत्र, जिस पर गुप्ता वकील ने कुछ मुहर भी लगायी थी, दिखा दिया।

पत्र पढ़ कर लड़का सन्न रह गया। उसकी धुली हुई आँखें परेशानी से सिकुड़ गयीं। 

‘‘जान्हवी!’’ उसने घबराहट वाली आवाज में पुकारा। 

लड़की बाहर थी। यह मैंने नोटिस नहीं किया था। बल्कि मैंने पूछने को सोचा भी था। लेकिन देर हो चुकी थी। और यह कोई जरूरी सवाल भी नहीं लगा था। लड़का बिना लड़की के भी आ सकता है, यह मैंने मोटे की बात सुन कर खुद ही मान लिया था।

लड़की कमरे में घुसी तो मैं मोहन कुमार, प्रापर्टी डीलर की बातों से उसे मिलाने लगा। वह एक बेहद सामान्य लड़की लगी, जिसने परेशानी के कारण अपना माथा सिकोड़ा हुआ था। रंग दूध धुला नहीं था। सांवला सा आम भारतीय चेहरा था, चिंता से सना हुआ। कपड़े बेहद सामान्य थे। सस्ते दर्जे की नीली जींस पर बहुत सस्ता छूटे हुए लाल रंग का टीशर्ट था। अगर मोहन कुमार प्रापर्टी डीलर ने ‘पटाखा’ न कहा होता शायद मैं उसके आने को अलग से चिन्हित भी न कर पाता। वह इतनी पतली दुबली थी कि अपनी उम्र से कम दिख रही थी। लड़के के अनुसार वह उससे बड़ी थी। मैं अंदाजा नहीं लगा पा रहा था कि कितनी बड़ी होगी। दो एक साल शायद। 

वह इतने ध्यान से कागज को पढ़ रही थी कि लगता था उसकी आँखें निकल कर कागज के भीतर चली जायेंगी। 

‘‘बब्बू! ये क्या! एक लाख रुपये देने पड़ेंगे। लेकिन वकील साहब तो कुछ और कह रहे थे!’’

मुझे लगा कि लड़की रो देगी। मैं इस कल्पना से घबड़ा कर घड़ी देखने लगा। 

‘‘इसकी एक कॉपी मिलेगी?’’

‘‘नहीं। नहीं, मैं नहीं दे सकता। वकील साहब से पूछिए।’’ मैं जाने कितनी बार यह वाक्य दुहरा चुका था। अभी एकदम से मुँह से गिर पड़ा। 

‘‘एक मिनट के लिए दे दीजिए। मैं फोटोस्टेट करा कर तुरंत लौटा दूंगा।’’ लड़के ने कुछ गिड़गिड़ाते हुए कहा। 

‘‘प्लीज, आप हमारी मदद कर दीजिए। असल में हम पहले फॉदर को छुड़वाने की कोशिश कर रहे थे। अब पहले ये आ गया।’’ लड़की ने रोने की आवाज में कहा। 

‘‘नहीं कर सकता।’’ यह कह कर मैंने कागज लड़की के हाथ से ले लिया। मैं चाहने लगा कि ये लोग जल्दी चले जाए। रोने वाली आवाज के विरूद्ध मैं तना था। लड़का इधर उधर रह रह कर देख रहा था। जैसे कोई कहीं से आने वाला हो। वह स्कूल यूनीफार्म में था। शायद सरकारी हाईस्कूल में रहा हो। खाकी रंग की फुल पैंट और सफेद शर्ट से मैं अंदाज कर रहा था। 

‘‘स्कूल से आए हो?’’

‘‘हाँ’’ उसने इंकार नहीं किया। 

‘‘बीच से निकल आया हूँ। बहन को अकेले आना पड़ता।’’

‘‘बहन’’ शब्द कौंध कर मेरे कलेजे में गिरा। 

मुझे अपनी बहन की याद आयी। क्या मेरी बहन सुंदर थी? क्या लोग उसके लिए ऐसा ही बोलते होंगे? शायद वह इसी लड़की जैसी दिखती थी। बेहद सामान्य, दुबली पतली, मरियल सी। क्या मेरी बहन 17, 18 साल की इस लड़की जितनी हो गयी है? मैं कितनी लापरवाह जिंदगी जीता जा रहा हूँ कि पिछले कितने वर्षों से मैंने ध्यान ही नहीं दिया था कि मेरी एक बहन थी, जो बड़ी हो रही थी। मुझे उसके कहीं भी अकेले आने जाने का बिल्कुल ध्यान नहीं था। वह अकेले कचहरी नहीं आ रही थी। मेरे पिता जेल में बंद नहीं थे। मेरे पिता फर्नीचर की दुकान में काम कर रहे थे। वे कारीगर थे। मगर कोई उन्हें कारीगर नहीं बुलाता था। मेरी बहन को एक दिक्कत थी। वह स्कूल जाना चाहती थी। मैं भी चाहता था कि वह स्कूल जाए। लेकिन स्कूल जाना जीवन से हट कर एक अतिरिक्त काम था और इस अतिरिक्त काम की इजाजत हमारा जीवन नहीं दे रहा था। जब भी वह स्कूल की बात करती, सारा घर उस पर चीखने लगता। अंततः स्कूल से उसका छुटकारा करा दिया गया। लेकिन छुटकारा कहाँ हुआ? इसी बीच मौलवी मास्टर साहब प्रकट हुए और बताने लगे कि उत्तर प्रदेश सरकार की घोषणा हुई है कचहरी में उर्दू में काम काज के लिए कुछ उर्दू पढ़े लिखे आदमी रखे जायेंगे। वे उर्दू में लिख देंगे, अर्थ बता देंगे और जरूरत पड़ने पर तर्जुमा भी कर देंगे। योग्यता, दसवीं, बारहवीं पास लड़के लड़कियाँ। मौलवी मास्टर साहब ने अपनी लड़कियों को उर्दू पढ़ने भेज दिया था।  

‘‘मियाँ, बेवकूफ न बनो। लड़की को उर्दू पढ़ाओ।’’ यह उन्होंने अस्पष्ट रूप से कहा। 

‘‘कुछ नहीं, सब ससुर वोट की राजनीति खेल रहे हैं।’’ मेरे कारीगर पिता मलूकदास ने जरा सा भी उत्साह नहीं दिखाया।

‘‘हमें क्या? पहले नकल को वोट दिया था तो तमाम बच्चे डिग्रियाँ लाद लाए थे। अबकी नौकरी को देकर देख लेते हैं।’’ मौलवी मास्टर साहब ने कुछ तर्क जमा किए। 

‘‘डिग्रियाँ लाद के क्या हुआ माट् साब! इस सरकार ने सब मामला पलट दिया। अब चलो, उर्दू की डिग्री पाओ। जब तक डिग्री ले कर आयेंगे, पद आयेंगे, नियुक्तियाँ शुरू होने की उम्मीद बनेगी, सरकार बदल जायेगी या उसकी योजना चली जायेगा रद्दी की टोकरी में।’’ मलूक दास हँसे। हँसते हँसते गजब कर गए। 

‘‘ आपके जरूर फायदा हो जाई कछु माट् साब! हमनि का करब उर्दू पढि़ के? सबके मुहम्मडन बनावै क तइयारी होय रही है। हाँ भइया, काटे के बेरा आखिर कहाँ से ढेरों ढेर मुहम्मडन अइहैं? रहै दें, हमैं न पड़ना है इ सब में। ’’ मलूकदास हँसने लगे। 

‘‘कहाँ की बात कहाँ ले जा रहे हैं? कौन आपको मुल्तान में बसा रहा है। भाषा जानने में फायदा है तो जानना चाहिए। हमने तो एक फायदे की बात कह दी और आप उसे ...’’ मौलवी साहब चोटिल हो चुके थे। वे लगे अब तक के हिंदू मुसलमान का इतिहास बताने। 

‘‘बोलते अवधी हैं और जब उर्दू की बात आवेगी तो उर्दू की तरफ हो लेंगे! भई पूछे कोई, जनगणना के बखत उर्दू लिखाने की क्या जरूरत है? खाते इसका हैं और गाते उर्दू का हैं!’’ लेकिन मलूक दास ठहरे अजब गजब आदमी, कहाँ मान में आने वाले! 

यह जहरबुझा बाण निशाने पर लगा। मौलवी साहब ने मान लिया कि वे बोलते अवधी हैं लेकिन उर्दू से अलग भी नहीं हैं। वे गुस्से में यहाँ तक पहुँच गए कि भारत पाकिस्तान बँटवारे से संतोष नहीं हुआ है न अभी... अभी और बँटवारा करना है आपलोगों को ... न्याय मिला मुसलमानों को यहाँ, बताइए? वह तो आपका लड़का पढ़ा लिखा है, लगा रहता है ‘चाचा - चाचा’ करके तो नेहवश चले आते हैं हम भी , नहीं तो कौन गरज पड़ी है हमें... कदम भी न रखें हम आपकी गली में... 

मामला बिगड़ गया था। मुझे बीच बचाव के लिए मैदान में कूदना पड़ा। 

लेकिन यह जरूर हुआ कि अचानक स्कूल एक गैरजरूरी और अतिरिक्त काम से जरूरी और मुनासिब काम हो गया। मेरी छुटकी सी बहन डाली नौंवी कक्षा में उर्दू ले कर पढ़ने जाने लगी। हम उसका नाम बदल कर उसे ‘अनीसा’ कहने लगे। ‘अनीसा’ अक्सर ‘अनीता’ का भ्रम देता था। अगर जरूरत पड़ी तो मैं भी अपना नाम बदल कर कुछ और कर लूंगा मसलन महमूद, यूसुफ या जावेद। कम से कम नौकरी तो मिलेगी। ‘भूखे भजन न होइ गोपाला, ये लो अपनी कंठी माला’। अरे भई, मन में चाहे अल्लाह कहूँ या राम, किसी से क्या? पिछले दिनों मेरा विश्वास जीसस के नाम पर बैठ गया था। जब भी घर से निकलता, जीसस का नाम ले कर निकलता और काम मिल जाता। जीसस के क्रास वाला एक लॉकेट मैंने काले धागे में बाँध कर गले में लटका लिया था। लेकिन इधर यह फंडा भी बेकार गया। कितना भी जीसस का नाम लो काम नहीं मिलता। फिर अल्लाह की तरफ मुड़ा। कई मज़ार, जो मैंने इससे पहले नहीं देखे थे, खोज खोज कर वहाँ तक गया और मत्था टेक आया। चादर चढ़ाने की मानता रख आया। पर कुछ ही महीने बाद काम छूट गया और इसके बाद फिर लौटा शिव जी की तरफ कि खेवनहार तुम्हीं कुछ करो। इसतरह कभी किसी के नाम पर तुक्का बैठ जाता, कभी किसी के नाम पर। यह भी अब मुझे समझ में आया। अब यह सब कहना करना छोड़ दिया है। खालिस अपने अनुभव से बात कह रहा हूँ। सोलह आने सच। मुझे अब इसके किसी नाम में दिलचस्पी नहीं रह गयी। इसलिए अब डाली को अनीसा पुकार लेने में भी कोई असुविधा नहीं रही। हाँ, बस, इतनी तसल्ली चाहता हूँ कि मास्टर मौलवी साहब को यह न लगे कि हमने किसी का हक मारा है। असल में जो उनकी हालत है, हमारी उससे कोई अच्छी नहीं। या शायद जो हमारी हालत है, उससे उनकी कौन सी अच्छी है? बस, यही हुआ है कि फर्नीचर की दुकान के कारीगर का लड़का कचहरी में गाहे बगाहे कुछ कमा लेता है। इससे चाहे तो उनके बराबर मान लें। उनके यहाँ कोई नहीं कमाता। बस, उन्हीं की प्राइमरी की मास्टरी है। परिवार बहुत बड़ा है। लड़कियाँ ही बड़ी हैं, इसलिए उन्हें ही उर्दू पढ़ा रहे हैं। बड़ी लड़की नसीबा बी. ए. में पढ़ रही है। वह बिना उर्दू पढ़े निकल गयी थी। उनके पास कम से कम यह झमेला तो नहीं कि लड़की है तो उर्दू पढ़ा कर नौकरी न करायें। हमारे घर में ये झमेला था। बड़ी मुश्किल से लोग माने। पता नही लोग यह क्यों नहीं मान पाते कि गरीब को जीने के लिए पैसा चाहिए, चाहे किसी भी नौकरी से मिले। कल को मेरी भी बहन कचहरी के बाहर की किसी झोपड़ी में बैठेगी। उर्दू में लिख देगी। उर्दू में अनुवाद कर देगी। उर्दू में लिखा, पढ़ कर सुना देगी। पता नहीं वह क्या कहलायेगी? लेखक तो नहीं कहलायेगी ? यहीं मैं चौकन्ना हो गया। 

सामने लड़की खड़ी थी। एकदम पीली आँखें थीं। 

मैं इतने दिनों में बाहर की झोपडि़यों से ले कर वकीलों के केबिन, नोटरी के लिए टीन की छत और बरसाती के नीचे बैठे ढेर सारे लोग, बैनामे और दस्तावेज के दफ्तरी कमरों और यहाँ तक कि कुछ कुछ जजों को भी जानने लगा था। 

‘‘पीलिया के इलाज में हमारे यहाँ एक पेड़ की जड़ को भिगो कर उसका पानी पिलाते हैं।’’ पता नहीं यह मैंने किस आवाज में कितनी तेजी से कहा। 

यह मैंने क्या कहा? शायद मैं यह पूछना चाहता था कि आपने उर्दू पढ़ा है? तो एक नौकरी मिल सकती है। शायद मैं ठीक ठीक यह भी नहीं कहना चाहता था। शायद मैं कहना चाहता था कि आप नौकरी करिए और अपने पिता को छुड़ाने का कोई दूसरा रास्ता देखिए। कौन सा दूसरा रास्ता? यह मैं स्पष्ट नहीं जानता था। बस, इस न्यायपालिका को छोड़ कर कोई दूसरी न्यायपालिका! जनता न्याय के लिए कोई और विकल्प तैयार करना चाहिए। मैं यह उन्हें नहीं समझा पाया। लड़की बिना बोले केबिन से निकल गयी। लड़का भी बिना बोले चला गया। 

तब जाकर मुझे ख्याल आया कि जब वे दोनों यहाँ खड़े थे तो मैं क्या क्या सोचे जा रहा था। थक हार कर वे चले गए थे। मैं कागज पर कोहनी तक हाथ दाबे बैठा था। 

लड़का एकदम दरवाजे तक पहुँच कर मुड़ा था। उसने मुझे अपनी उन्हीं साफ धुली हुई आँखों से देखा था, जो साफ, धुली हुई होने के बावजूद बहुत निरीह लग रही थीं। मुझे उसके जाने के कुछ मिनट बाद समझ में आया कि वह चला गया है। इस कुछ मिनट में ही पता नहीं उसके देखने और चले जाने से क्या लगा कि मैं किवाड़ धकेल कर भागा। 

बाहर दृश्य कुछ और था। हल्की हल्की झींसी पड़ रही थी। कुछ लोग सिर पर गमछा रखे और कुछ लोग फाइल रखे बूंदों से अपने को बचाने की कोशिश करते आ जा रहे थे। बहुत कम लोग थे, जो छाता ले कर चल रहे थे। लोग केबिन से झटके से निकलते और सिर पर फाइल ओढ़ कर एकदम टीन शेड तक छलांग लगा देते। बहुत से लोग अपनी मेजों को प्लास्टिक या चौड़ी पॉलीथिन से ढँक कर अंदर की बरसाती में खड़े इंतजार कर रहे थे। जिनके पास छाता था, वे भी नहीं खोलते थे। छाता खोलने, बंद करने के परिश्रम से वे अपने को बचा लेते थे। मैं ढूंढते ढूंढते कचहरी से बाहर निकल आया था। कचहरी की सड़क गड्ढों से भरी थी। हल्की बरसात से जगह जगह गड्ढे भर गए थे। छोटे छोटे गड्ढों में टेड पोल के आकार के कीड़े या शायद टैडपोल ही तैर रहे थे। गड्ढे कचहरी तक आने का रास्ता थे। गड्ढे बचाते बचाते लोग आते थे। गड्ढे में गिर जाएं तो भी आते थे। कोई और रास्ता नहीं था। होता तो शायद उसमें भी गड्ढे होते। बाहर झींसी में एक आम वाला ठेला लगाए बैठा था। लंगड़ा आम था। एकदम से मुझे पचास रूपये याद आए। अगर मुझे पचास रूपये मिल जाते तो भी मैं आम नहीं खरीदता। आलू प्याज खरीदता या शायद कुछ और। जो सबसे पहले चाहिए होता। मैंने आम के ठेले से निगाहें हटा लीं।

‘‘अरे, हे, ऐ, हेलो, भाई!’’ मैंने कई तरह से आवाज लगाई। 

दरअसल आम के ठेले से निगाह हटा कर मैंने जिस गली की तरफ देखा था, उसी में दोनों जाते दिखे। वे नहीं रूके।

‘‘न रूकें, मेरी बला से।’’ एक क्षण को मैंने यह भी सोचा। 

‘‘बब्बू!’’ ये मेरे मुँह से क्या निकला! 

यह नाम तो लड़की के मुँह से निकला था। मेरे दिमाग में यह कैसे अटका पड़ा था! 

बब्बू मुड़ गया। मुझे देख कर हैरान हुआ। हैरानी वाले इशारे से पूछा- क्या बात है? 

मैंने हाथ के इशारे से कहा- लौट कर आओ।

वह लौटा। बहन वहीं खड़ी रही। बब्बू मेरे एकदम पास आ कर खड़ा हो गया तो मुझे घबराहट होने लगी। मैं दो कदम पीछे खिसक गया। 

‘‘इस गली की तरफ रहते हो क्या?’’

‘‘इसलिए बुलाया था?’’

‘‘नहीं, ये बात नहीं थी।’’

बब्बू मुड़ कर जाने लगा। 

‘‘नहीं, जरा रुको!’’ मैंने उसे रोकने की बड़ी कमजोर कोशिश की। 

वह फिर मुड़ा और रूक गया।

मुझे कुछ कहते नहीं बना तो मैंने जेब से एक कागज निकाल कर उसके हाथ पर रख दिया। उसने खोल कर देखा। मोहन कुमार, प्रापर्टी डीलर की गुप्ता वकील के लिए लिखी सूचना थी। एक बार फिर वह सन्न रह गया। कुछ मिनट बीते तो उसने फिर मेरी तरफ देखा। इस बार धुली हुई आँखें कुछ भरी भरी थीं। वह कुछ कहना चाहता था पर उसे शब्द नहीं मिल रहे थे। 

बार बार मुँह खोलने की कोशिश करने के बाद आखिरकार उसने यह कोशिश छोड़ दी और हाथ उठा कर हल्का सा सलाम कर के मुड़ गया। 


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आकाश धुल कर निकलता था। फिर फिर भीगने के लिए  

मैं मौलवी मास्टर साहब के घर पहुँचा तो दरवाजा भिड़का हुआ था। खोल कर सीधा कमरे में दाखिल हो गया। कमरे में कोई नहीं था। चौकी पर कुछ कपड़े पड़े थे। मौलवी मास्टर साहब का गमछा मैं पहचान रहा था। कपड़े एक तरफ सरका कर मैं उसी चौकी पर बैठ गया और आँगन की तरफ खुले दरवाजे से आँगन को देखने लगा। आँगन में चापाकल लगा था। चापाकल के पास गीले कपड़ों का ढेर पड़ा था। कुछ गीले कपड़े आँगन में इस पार से उस पार तक खिंचे तार पर लटक रहे थे। वहाँ कपड़ों के बीच में, बहुत घिसी हुई, छूटे हुए भूरे रंग की पैंटी और गले हुए पीले पड़े इलास्टिक वाली पिलीयाई सफेद ब्रा टंगी थी। मेरी कल्पना में ऐसी चड्ढी और ऐसी ब्रा की कोई जगह नहीं थी। मैंने वह सब देख लिया था, जो मुझे देखने से बचाया गया था। तभी नसीबा बाल्टी लिए न जाने किधर से आ कर चापाकल के पास खड़ी हो गयी। चापाकल आँगन के बीचोंबीच था और जहाँ मैं बैठा था, वहाँ से एकदम सामने। यानी कि नसीबा मेरे सामने अचानक बाल्टी लिए खड़ी हो गयी थी। उसकी सलवार घुटने तक मुड़ी हुई थी और पैरों के काले काले रोयें दिख रहे थे। किसी लड़की के पैर पर इतने बाल! मैं एकदम देखने लग गया। रोओं पर पानी की बूंदें फँसी थीं। जैसे रेशम के कीड़े इधर उधर पड़े हों। हल्के से कम्पन में हिलते। बिखरे से। मेरी नजरें नहीं हटीं तो नसीबा ने बाल्टी चापाकल के नीचे जोर से रखा। 

‘‘ये क्या? बिना आवाज दिए अंदर घुस आए? घर में कोई कैसे हो? कोई तमीज़ तहज़ीब तो सीखो शहजादे साहब!’’

मुझे फटकार कर वह अपने घुटने तक मुड़े सलवार को ठीक करने लगी। उसके सलवार की मोहरी गीली थी। मैं कुछ बोल नहीं रहा था। असल में ‘क्या बोलूं?’ यही समझ में नहीं आ रहा था। 

‘‘टेंशन में हो क्या? चाय बनाउं?’’

अब उसने आँगन में पड़े कपड़ों को देखा-

‘‘अभी धो कर डाला था। तब तक आँधी तूफान आ गया। आप कैसे आए? रास्ते में पेड़ टूट कर गिरे होंगे! गिरे थे क्या? यहाँ तो रस्सी टूट गयी। गिर गए सब। फिर से धोना पड़ेगा। कमबख्त! चैन नहीं! ’’ इतना कह कर उसने चापाकल के पास पड़े कपड़ों को देखा फिर तार पर टंगे कपड़ों को और अचानक शर्मिंदा हो उठी। घबड़ा कर उसने जल्दी से नीचे रखे कपड़ों में से एक कुर्ता उठा कर उन कपड़ों पर डाल दिया, जो मुझे नहीं देखने थे पर जो मैंने देख लिया था। मैं कुछ शर्मिंदा हुआ। अपने से ज्यादा नसीबा के लिए। मैं उसके हिस्से का शर्मिंदा भी हो लेना चाहता था। 

‘‘बारीश में भीग जाते हैं न।’’ उसने मुँह पीछे किए किए कहा। 

‘वैसे दिखते भी कहाँ हैं, अंदर के कपड़े हैं।’’ यह उसने नहीं कहा। अपने मन में कहा। 

मन के अपने जस्टीफिकेशन होते हैं। बड़ी तसल्ली देते हैं। 

कुछ देर ठहर कर वह फिर मेरे सामने आ गयी-‘‘ अब बताओ क्या बात है?’’

‘‘कुछ नहीं, बस ऐसे ही।’’

‘‘न बताओ मेरी बला से।’’

‘‘सब लोग कहाँ गए?’’ मैंने सहज होने की कोशिश की।

‘‘जहन्नुम में।’’ पहले जैसी तल्खी के साथ उसने कहा। 

‘‘मास्टर साहब भी?’’ मुझे चुहल सूझी। 

‘‘चुप रहो! बाल की खाल निकालने लगते हो। काम का वक्त है। सब आस पास ही हैं।’’

उसने अपनी उसी आवाज में कहा, जिसमें कुछ नाराजगी, कुछ शर्मिंदगी और कुछ लड़ाई थी।

वह लगातार लड़ती थी। लड़ रही थी। 

‘लड़ना’ एक सकारात्मक पद था। 

‘लड़ना’ एक जरूरी क्रिया थी।

मुझे उसकी यह आवाज पसंद थी। 

मुझे अपनी बहन डाली की आवाज एक बार तब अच्छी लगी थी, जब वह स्कूल जाने के लिए बाउजी और अम्मा से लड़ी थी। उसने कुएं में कूद कर आत्महत्या कर लेने की धमकी भी दी थी। तब मैं  आश्वस्त हुआ था कि उसमें हिम्मत है। बल्कि सच कहूँ तो मुझमें हिम्मत जागी थी और एक विकल्प भी। 

हालाँकि कुआँ दूर तक नहीं था। 

रस्सी भी नहीं थी। 

छत भी उँचा नहीं था। वहाँ से गिर कर सिर्फ हड्डी पसली टूट सकती थी। 

केमिस्ट साइनाइट की गोलियाँ नहीं रखता था। बल्कि नींद की गोलियाँ भी बिना डॉक्टरी पर्चे के नहीं देता था। 

बहुत समय से कीड़े मारने या चूहे मारने की दवा या तेजाब भी घर में नहीं आया था। 

चौकी पर से मास्टर मौलवी साहब का गमछा उठा कर मैं उसका गोला बनाने लगा।  

‘‘सुबह सुबह लाल मिर्ची का शोरबा पी लिया क्या?’’ मैंने गोले से निशाना मार कर कहा। 

इसी में मेरा आनंद था। 

गोला उसके पेट पर जा कर लगा। इस पर उसने तड़प कर गुस्से वाली आँखों से देखा। शायद कुछ और तीखा कहती, लेकिन उसी समय खाला का कई बच्चियों के साथ प्रवेश हो गया। बच्चियों समेत खाला कमरे में फैल गयीं। खाला विधवा थीं और ससुराल से निकाले जाने पर वहाँ की लड़ाई यहाँ रह कर लड़ रही थीं। उनकी चार लड़कियाँ यहीं रहती थीं। लड़कियाँ छोटी थीं। खुद मौलवी साहब की तीन लड़कियाँ थीं। नसीबा की अम्मी और खाला लगातार सिलाई बुनाई के काम खोज खोज कर लाती थीं और उसी में लगी रहती थीं। 

‘‘आज कल काम की कमी हो रही है। शादी ब्याह पड़े तो लोग चद्दरौ कढ़वा लैं। वैसे रूमाल न बनवावैं।’’ खाला ने मायूस हो कर कहा। 

‘‘अम्मी को लगातार कोई न कोई बीमारी जकड़ी रहती है। क्या करें? देखिए, कई जगह अप्लाई किया है।’’ नसीबा ने चाय रख कर कहा।

‘‘अप्लाई करना नौकरी मिलने की गारंटी नहीं है।’’ मैंने पता नहीं कैसी आवाज में कहा। 

‘‘तो क्या करें? बताइए? एक दुकान पर एकाउन्टेंट का काम मिल रहा है। छोड़ दें?’’ उसने गुस्सा कर कहा।

‘‘अरे नहीं, मेरा मतलब ये नहीं है। मुझे किसी ने बताया ही कहाँ? सपना आयेगा क्या मुझे?’’ मैंने भी नाराज हो कर कहा।

‘‘ दुकान का हिसाब देखे के है। दो बजे से नौ बजे तक के लिए कहे रहिन, पढ़ाई के साथै निभ जाए ताकि। ठीक हौ न बबुआ?’’ खाला ने बड़ी चिंता के साथ कहा।

‘‘और उस उर्दू वाले काम का क्या हुआ?’’ मैं भी कुछ चिंतित हुआ। 

‘‘देखिए, उर्दू ले कर इंटरमीडिएट अलग से किया था न। उसी के भरोसे हूँ। आप कचहरी जायेंगे तो जरा देखिएगा कि लोग क्या कह रहे हैं? भर्तियाँ होने तो नहीं लगीं? यहाँ तो ठीक से पूरी सूचना भी नहीं है।’’

‘‘मैं अब कभी कचहरी नहीं जाऊंगा।’’ मैंने उसकी बात बीच में रोक कर, हाथ हवा में लहरा कर किसी फिल्मी हीरो की तरह कहा।

खाला परेशान हो उठीं-‘‘ अइसन न करौ लल्ला। केहू से लडा़ई झगड़ा मोल लियौ हौ का? आपन काम काहैं बिगारत हौ?’’

नसीबा कुछ देर सन्न रही। कुछ देर के लिए उसका चेहरा जान्हवी नाम की लड़की जैसा लगने लगा। माथे पर वैसी ही सिकुड़ने घिर आईं। फिर धुली हुई आँखों वाले लड़के जैसा हो गया। निर्मल जल में नहा कर आया हुआ। फिर वह लौट आयी।

‘‘मैं ही चली जाऊंगी किसी दिन।’’ हताश सी एक आवाज थी।
अल्पना मिश्र
कहानी संग्रह : भीतर का वक्त, छावनी में बेघर, कब्र भी कैद औ' जंजीरें भी
उपन्यास : अन्हियारे तलछट में चमका
संपादन : सहोदर (संबंधों की श्रृंखला : कहानियाँ)

सम्मान :
शैलेश मटियानी स्मृति सम्मान (2006), परिवेश सम्मान (2006), रचनाकार सम्मान (भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता 2008), शक्ति सम्मान (2008), प्रेमचंद स्मृति कथा सम्मान (2014)

संपर्क :
एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली-7
मोबाईल: 09911378341
ईमेलalpana.mishra@yahoo.co.in
‘‘वह लड़कियों के जाने की जगह नहीं है।’’ अचानक मुझे जान्हवी नाम की लड़की दिखने लगी। 

‘‘केवल लड़कों के जाने की जगह है हमारा न्यायालय?’’  नसीबा ने व्यंग्य किया। 

‘‘नहीं। बल्कि किसी के भी जाने की जगह नहीं है।’’ मुझे धुली हुई आँखों वाला लड़का दिखा। 

‘‘अच्छा, तो फिर कौन लोग जायेंगे? हमारा न्यायालय है वह। वहाँ आप न जायें, मैं न जाउं, डाली भी न जाये, फिर कौन जाये? नौकर जाये? लॉट साहब बन गए तब तक आप?’’ 

‘‘नहीं समझती हो तुम कुछ भी।’’ कह कर मैं बड़ी नाराजगी में उदास हुआ। 

खाला नसीबा को रोकने की कोशिश करने लगीं। 

‘‘अब्बै जीजी जाग जइहैं, तनी धीमे बोलौ नसीब! लल्ला बुरा जिन मानौ, जे लड़की को का कहैं?’’

मैं उठ गया। उठ कर दरवाजे तक आया तो नसीबा भी मेरे पीछे आई।

‘‘अभी कुछ रह गया? तसल्ली नहीं हुई?’’ मैंने नाराज आवाज में कहा। वह कुछ नहीं बोली। मुस्कराई। कमबख्त! ये कोई वक्त है मुस्कराने का!

गली के नुक्कड़ तक पहुँच कर मैंने मुड़ कर देखा। बस, यों ही। उम्मीद के विरूद्ध कोई उम्मीद थी शायद। वह दरवाजे पर खड़ी थी। मेरी तरफ देखती हुई। मैं रूक गया। वह दरवाजे से निकल कर मेरी तरफ आने लगी। झींसी फिर पड़ने लगी थी। लेकिन वह आती रही। उसके सलवार की गीली मोहरी पैरों से लिपट कर रोकती रही। वह आती रही। आकाश उसे धोता रहा। मैं खड़ा रहा। आकाश मुझे गलाता रहा। बहुत नजदीक आकर वह रूक गयी। फिर हम दोनों बरसात के जल में घुलने लगे।

‘‘जनाब!’’ 

उसके चेहरे पर बहुत सी बूंदें थिरक रही थीं। 

‘‘आपका मोबाइल सुबह से स्विच्ड आँफ आ रहा था।’’

बोलते हुए उसके होंठों से टकरा कर वर्षा का जल भीतर जा रहा था। 

‘‘रीचार्ज खतम था।’’

मैं मुस्करा पड़ा। बूंदें मेरे होंठों से भी भीतर चली गयीं। 

यह सुख था। 

वह मुड़ गयी। 

‘‘हद है यार!’’ मैंने तीन बार हथेली पर बूंदें छलका कर अपने आप में कहा।

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