सोमवार, अक्तूबर 19, 2015

तालिबानी फरमान की सरगोशियां - प्रेम भारद्वाज | India and Indians - Prem Bhardwaj


india freedom of expression

पैगाम-ए-सियासत क्या कहिए…

~ प्रेम भारद्वाज 

वे सम्मान लौटा रहे हैं / नहीं, वे प्रतिरोध की गोलियां दाग रहे हैं... 

चरम निराशा की अवस्था में किसी उम्मीद की आकांक्षा समय के साथ हमारे रिश्ते का एक अभिन्न अंश है। नाउम्मीदी इसलिए है क्योंकि हमें उम्मीद है कि कुछ अच्छा और सुंदर घटित होगा... 
[ देरिदा ]


धूरेपन को रिक्त स्थान समझने की
भूल मत करना
उससे कुछ अलग है यह
अधूरी चीजें
कभी भूलती नहीं
वह बार-बार अपनी ओर खींचती हैं
हम
लौटते हैं
उस ओर कि इस बार उसे
पूरा
जरूर करेंगे।  ~ प्रेम भारद्वाज


तालिबानी फरमान की सरगोशियां - प्रेम भारद्वाज |  India and Indians - Prem Bhardwaj's Editorial
‘‘किसने हत्या की है... किसने बुझाया है चिराग।’’

‘‘सरकार! हत्यारे का नाम, पता, चेहरा तो नहीं मालूम। मगर भीतर दहाड़ों-चीत्कारों के बीच लाश पड़ी हुई है... चिराग बुझाने वाले ने अपनी कोई शिनाख्त नहीं छोड़ी। अंधेरा है गहरा। डर लग रहा है, यह सोचकर कि कोई हमसे सुबह न छीन ले।’’

लिख कुछ और रहा था। उसे बीच में अधूरा छोड़कर इसे लिख रहा हूं। इसका पूरा-पूरा भरोसा नहीं कि जो लिख रहा हूं उसे पूरा कर पाऊंगा। अधूरेपन पर अंतहीन की हद तक लिखना भी अधूरा रहेगा। रहना भी चाहिए। दुनिया के तमाम भरे-पूरे लोग मुझे यह कहने की अनुमति प्रदान करें कि आग की तरह अधूरेपन की भी अपनी खूबसूरती होती है। मुझे वे लोग भी माफ करें जिन्होंने अपनी अधूरी ख्वाहिशों-ख्वाबों को पूरा करने के वास्ते मस्जिदों-दरगाहों पर माथा टेकते हुए मन्नतें मांगी हैं। मंदिरों में हाथ जोड़कर प्रार्थनाएं की हैं। वट के वृक्ष में बांध आए हैं रंगीन धागे।

हम में से अधिकतर बिना आदमियत के आदमी हैं। बगैर मन के मनुष्य। बिना पूंछ वाला वह जानवर जो जंगल के खत्म होने पर घरों में रहने लगा है। अच्छे कपड़े पहनता है। अच्छा भोजन। इबादत करता है। उसके सारे ऊपरी लक्षण ‘सभ्यता’ के हैं। मगर भीतर से वह सभ्य नहीं, हिंसक जानवर है। 

अधूरेपन के गमगीन हसीन पन्नों को पलटने से पहले जरा उन हौलनाक हर्फों का घायल बयान भी सुन लिया जाए, जो हमारे ‘होने’ और ‘बने रहने’ को शर्मसार करते हैं। शर्मिंदा है वह वक्त जिसके शामियाने की नीचे हम छलांग भर रहे हैं या रेंग रहे हैं... बेशक हम में से बहुत बुत बन गए हैं। और यह भी तय है कि इनमें ‘मुगल-ए-आजम’ की कनीज अनारकली जैसी जिंदादिली भी नहीं जो एक अफसाने को हकीकत में ढलते देखना चाहती थी, अपनी जान को जोखिम में डालकर भी।

हम में से अधिकतर बिना आदमियत के आदमी हैं। बगैर मन के मनुष्य। बिना पूंछ वाला वह जानवर जो जंगल के खत्म होने पर घरों में रहने लगा है। अच्छे कपड़े पहनता है। अच्छा भोजन। इबादत करता है। उसके सारे ऊपरी लक्षण ‘सभ्यता’ के हैं। मगर भीतर से वह सभ्य नहीं, हिंसक जानवर है। इतने सब कुछ के बावजूद वह सभा-गोष्ठियों में मानवतावाद की महान बातें भी करता है— करुणा, शांति और प्रेम पर पूरे पचास मिनट का भाषण भी झाड़ देता है।

‘‘कबीर मध्ययुग में आंखों देखी कहने के लिए राजतंत्र में बख्श दिए गए थे। यह आधुनिक काल प्रजातंत्र है। यहां जो भी कबीर बनेगा उसे मरना होगा।’’

एक बार फिर से भारत में महाभारत। सारा देश हस्तिनापुर और कुरुक्षेत्र में तब्दील हो गया है। राजा धृतराष्ट्र की तरह अंध नहीं है। मगर गांधारी की तरह उसने अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली है। हम सबके भीतर ‘अंधा युग’ उतर आया है। झूठा सच, खोल दो, ठंडा गोश्त, तमस, गर्म हवा, अमृतसर आ गया, ब्लैक फ्राइडे, फिराक फिल्म के पात्र पुस्तकों-पर्दों से बाहर आ गए हैं। वे सड़कों, गलियों, घरों में हैं। राजधानी दिल्ली से सटे दादरी के एक गांव में उन्मादी भीड़ के हाथों मारे गए अखलाक अहमद के परिजनों के आंसू पोंछ रहे हैं। तसल्ली दे रहे उन ‘नूर मियां’ को जिनको बकरीद पर बकरे की जगह अपने बेटों की कुर्बानी देने की सलाह धमकी के अंदाज में दी गई...।



‘‘मैं आप जैसा बनना चाहता हूं।’’

‘‘और मैं पलायन की सोच रहा हूं।’’

‘‘आप इस देश के सबसे लोकप्रिय पत्रकार हैं।’’

‘‘अपने बीस साल की पत्रकारिता के बाद मैं खुद को फेल मानता हूं। कुछ भी नहीं बदला है। बदल भी नहीं सकता... न कोई सच के साथ है, न क्रूर होती सत्ता के खिलाफ। तमाम लोग 2BHK की कैद को आजादी समझ रहे हैं तो उनका कुछ नहीं किया जा सकता।’’

‘‘रामदास (कलबुर्गी) की हत्या क्यों हुई?’’

‘‘वह तय थी?’’

‘‘क्यों?’’

‘‘उसमें कबीर की आत्मा प्रवेश कर गई थी।’’

‘‘फिर?’’

‘‘कबीर मध्ययुग में आंखों देखी कहने के लिए राजतंत्र में बख्श दिए गए थे। यह आधुनिक काल प्रजातंत्र है। यहां जो भी कबीर बनेगा उसे मरना होगा।’’

ईमानदार पत्रकार की बातें हमें डराती हैं। हम पहले से ही डरे हुए हैं। अपने डर को नकली हंसी, झूठे आचरण से छिपाते हैं। जब डर ज्यादा गहराता है तो जोर से हंसते हैं, पटियाला पैग पीते है... पत्नी के साथ बहुत जोरों से चिपट जाते हैं या बच्चे की मासूम आंखों में छिप जाते हैं। कई बार ऐसा भी होता है कि इन मासूम आंखों में भी न जाने कैसा भय दबे पांव आकर पसर जाता है। तब हमें या तो हत्या करने का मन करता है या आत्महत्या करने का। आत्महत्या करने से फिर बच्चों की आंखें ही रोकती हैं और हत्या करें किसकी। दुश्मनों का चेहरा साफ नहीं है... इस कलयुगी कुरुक्षेत्र में शत्रु पक्ष में अपने ही तो खड़े हैं। भाई, पिता, दोस्त, रिश्तेदार वध करें भी तो किसका। ‘जय’ का मुकुट किसके सिर, ‘पराजय’ का शूल किसे गले। ये किसने कृष्ण का वेश धारण कर लिया है जो ज्ञान के नाम पर राजनीति कर रहा है, ‘कुटिलता’ रच रहा है। ‘महाभारत’ का ताना-बाना बुन रहा है। जीत अपने को ही मारकर मिलती है... सत्ता स्वजनों, परिजनों की औंधे मुंह गिरी लाशों से गुजरकर ही हासिल होती है? अर्जुन की सी ‘हिचक’ महाभारत में थी, भारत में नहीं। इसीलिए कृष्ण का काम आसान हो गया है, उन्हें अपनों की जान लेने के लिए अर्जुन को कनविंस नहीं करना पड़ रहा है।



‘‘तुम इतनी उदास क्यों हो?’’

‘‘सब कुछ ठहर गया है... मन के साथ-साथ अब तन भी थक गया है... सब जस का तस... पचास की होने जा रही हूं, अब कब पूरे होंगे मेरे सपने। मन सपने से छिटक कर संन्यास की ओर अग्रसर है... मगर मैं संन्यासी नहीं बनना चाहती। श्मशान का सन्नाटा मन के मकान में फैल रहा है। मरने से पहले ‘गाइड’ की रोजी की तरह नाचना चाहती हूं, मगर मुझ में मरने की हिम्मत नहीं इसीलिए जी नहीं पा रही हूं।’’

ठीक इसी वक्त हम निदा फाजली की गजल ‘हर किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता’ को गुनगुनाते हुए हताश दिल को दिलासा दे सकते हैं। हम में से बहुत से लोग देते भी हैं। मगर बात मुकम्मल जहां की नहीं, मुट्ठी भर आसमां की है। चुटकी भर खुशी। बित्ता भर आजादी। बूंद जितने प्रेम की है। जो हमें भटकने के बाद भी नहीं मिलती। मुकम्मल जहां तो सिकंदर को चाहिए, ओबामा और उन्हें चाहिए जो देश से ज्यादा विदेश की धांग रहे हैं। आप मुझे गलत ठहराने और स्त्री के सितम को ‘मिनिमाइज’ करने के लिए समय के आसमान में चमकते सितारों की बातें करेंगे। लेकिन अर्ज इतना ही करना है कि आप सितारों की चमक तक ही सीमित रह जाते हैं... उसके पीछे आसमां के गहरे अंधकार को क्यों नहीं देखते? अब क्या करूं कि जब भी सितम, दुःख, कफस, आंसू लिखता हूं तो किसी न किसी स्त्री का बेबस छटपटाता चेहरा इन शब्दों में झांकने लगता है। मीना कुमारी की लरजती-थर्राती वह दिलकश आवाज, ‘जिंदगी अक्सर तमन्नाओं का गला घोंट देती है... कोई आए ऐसे में जहर दे दे मुझको... क्या जिंदगी इसी को कहते हैं, जिस्म तन्हा है, और जां तन्हा...।’



‘‘तुम हमेशा नेरुदा की निराशा और इलियट के ‘वेस्टलैंड’ की तरफ क्यों ले जाते हो... मृत्यु की ही बातें क्यों करते हो... अंधेरे ही क्यों पसंद हैं तुम्हें? रौशनी से इतना डरते क्यों हो?’’

 ‘‘क्योंकि मैं जिंदगी के पल-पल को जीता हूं, मैं मृत्यु नहीं जीवन के गीत गाता हूं जो तुम समझ नहीं पाते। जीवन-युद्ध की विभीषिका’ में मैं जिजीविषा की बांसुरी बजा रहा हूं, लेकिन तेज और कर्कश शोर सुनने के अभ्यस्त तुम्हारे कान इसे सुन नहीं पाते। इसे कान से नहीं, दिल से सुनो।’’

नाजिम हिकमत की एक कविता के शब्दों को थोड़ा बदल दिया जाए तो कहा जा सकता है कि वे तमाम चीजें जो अधूरी हैं, वे सबसे खूबसूरत हैं। अधूरी बातें, अधूरे ख्वाब, अधूरी यात्राएं, अधूरा प्रेम, अधूरी हसरतें हैं। अधूरेपन में जिंदगी कहां, पूरा होना मर जाना है। ठहर जाने जैसा। वह हमारे भीतर का अधूरापन ही है जो हमें गति देता है। विनोद कुमार शुक्ल भी लिखते हैं, ‘कोई भी पूरा, पूरा नहीं होता।’ पूरेपन की जमीन पर फिर किसी के लिए जगह ही कहां बचती है? अधूरापन एक तलाश है, खोज है, आकर्षण है, सफर है। अधूरापन नहीं होता तो प्रेम न होता। श्रद्धा और मनु, आदम और हव्वा नहीं होते। मतलब साफ कि यह सृष्टि न होती, हम आप न होते। पूरी कायनात, दुनिया, जिंदगी, हम, आप, सब अधूरेपन को भरने की कोशिश के नतीजे हैं। लेकिन अंतिम नतीजे नहीं। अधूरेपन के तालाब में ही खिलते हैं, प्रेम के सुंदर फूल। दुनिया का साहित्य और तमाम कलाएं अधूरेपन से पूरेपन की ओर एक रचनात्मक यात्रा हैं जो हजारों सालों की सभ्यता के बाद भी पूरी नहीं हो पाई हैं।



‘वे सम्मान लौटा रहे हैं’

‘‘नहीं, वे प्रतिरोध की गोलियां दाग रहे हैं... किसी भी कीमत पर पाने के महासमर में लौटाना अंधेरे में माचिस जला देने जैसा है... कई बार हासिल करना हारना और लौटाना जीतना होता है।’’

‘‘राजा से पाया जाता है।’’

‘‘जो बादशाह सत्ता के लिए ‘नरबलि यज्ञ’ करवाता हो वह किसी को क्या देगा, जो भी देगा वो खुदा देगा।’’

कहीं कोई एलान नहीं है, मगर तालिबानी फरमान की सरगोशियां फिजा में हैं। संगीत को सरहद पार ही रोक दिया जाता है। बौद्धिकता के चेहरे पर कालिख पोत दी जाती है। देश भीतर देश पूर्वोत्तर में पखवारे से सड़ती लाशें इंसाफ की बदबू फैला रही हैं। प्रतिरोध जताने के लिए स्त्रियां नग्न हो जाती हैं या कर दी जाती हैं — दोनों ही स्थितियां उतनी ही शर्मनाक और असहनीय हैं जितना जवान बेटे के सामने मां का बलात्कार। आग का ठीक-ठीक पता नहीं पर पूरे देश से धुआं-सा उठ रहा है। धुआं पुख्ता सबूत नहीं पर पैगाम होता है कुछ जलने का। इस धुएं से हम लड़ें भी तो कैसे? कहीं धुएं से लड़ते हुए हम धुआं ही न हो जाएं। मगर हसरत यह है कि हम आग बन जाएं जो पकाती, खौलाती और जलाकर भस्म कर देती है। मैं इस देश को खौलते हुए देखना चाहता हूं बशर्ते हम में से कुछ आग बनने को तैयार तो हों। बेचैनियों का प्रतिरोध के चिराग में तब्दील होना गवाह है इस बात का कि बुतों-मुखौटों के बाहर भी जीवन है। जीवन का ताप है। और जज्बात हमारी पोशाक नहीं हमारे जिंदा होने की गारंटी एमआरआई रिपोर्ट हैं।

जिंदगी का अधूरा न होना सबसे बड़ा अधूरापन है। भूख, प्यास और प्रेम... अधूरी चीजें हैं जो रोटी, पानी और व्यक्ति से पूरी होती हैं। स्त्री-पुरुष के बीच भी शायद इसलिए तीव्र आकर्षण होता है क्योंकि दोनों ही एक दूसरे के बगैर अधूरे हैं। सपने अधूरे हैं, इसलिए संघर्ष हैं। सत्ताएं हैं। सपनों के सौदागर हैं। बहुत से चित्र कैनवस पर अधूरे रह जाते हैं। हर लेखक की फाइलों में ढेरों अधूरी कविताएं, अधूरी कहानियां और भी बहुत-से पूरे होने के इंतजार में सनम को लिख वे अधूरे खत जो कहीं पहुंच नहीं सके। वे बहुत अजीब होते हैं। अधूरेपन को रिक्त स्थान समझने की भूल मत करना। उससे कुछ अलग है यह। अधूरी चीजें कभी भूलती नहीं। वह बार-बार अपनी ओर खींचती हैं। हम लौटते हैं उस ओर कि इस बार उसे पूरा जरूर करेंगे।

एक चांद है यह जो सारी रात हमारी खूबसूरत तमन्नाओं के साथ चलता है। चलते हुए ढलता है। जो सुबह की दस्तक के बाद भी फना नहीं होता। हर अधूरेपन में एक इंतजार होता है और तमाम रंजो-गम, टीस, थकान के बावजूद इंतजार से खूबसूरत इस दुनिया में और कुछ भी नहीं।

हम सब आधे-अधूरे हैं। यहां तक कि सूरज-चांद, कविता, जंगल, जमीन सब कुछ। पूरी एक चीज है— वह है अधूरी। अंतरिक्ष, ग्रह, हर शय और उसमें हम भी शामिल हैं। हम एक अधूरे से शुरू होकर दूसरे अधूरे तक पहुंचते हैं। आज तक न कोई जिंदगी पूरी हुई है, न कोई अफसाना। इसलिए अधूरेपन पर अपनी अधूरी बात अधूरी ही छोड़ रहा हूं...

'पाखी' अक्टूबर-नवंबर-2015 अंक का संपादकीय

००००००००००००००००

सुनिए 

अगर जो पढ़ा है उससे मानसिक उथलपुथल बढ़ी हो तो अपनी टिप्पणी दीजियेगा और इसे शेयर कीजियेगा और अगर हंसी आ रही हो तो कोई बात नहीं ... 

1 टिप्पणी:

  1. बहुत से चित्र कैनवस पर अधूरे रह जाते हैं। हर लेखक की फाइलों में ढेरों अधूरी कविताएं, अधूरी कहानियां और भी बहुत-से पूरे होने के इंतजार में सनम को लिख वे अधूरे खत जो कहीं पहुंच नहीं सके। वे बहुत अजीब होते हैं।

    उत्तर देंहटाएं

गूगलानुसार शब्दांकन