लखनऊ फैजाबाद, बाक़र गंज के सैयद - 4 : असग़र वजाहत | Baqar ganj ke Syed - 4 : Asghar Wajahat


बाक़र गंज के सैयद  4

~ असग़र वजाहत

लखनऊ आते वक्त ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ मिसरी बेगम और बच्चों को मुर्शिदाबाद छोड़ आये थे। लखनऊ में महलसरा बनवा लेने और कोड़ा में रिहायशी इंतिज़ाम पूरे कर लेने के बाद ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ अपने परिवार को लेने मुर्शिदाबाद चले गये। हैदर ख़ाँ को उनके खिलाफ एक और षड्यंत्र करने का सुनहरा मौका मिल गया। इस षड्यंत्र का पूरा हाल मिर्जा अबू तालिब ने अपनी किताब 'तारीखे अवध’ में लिखा है। हैदर बेग ने अपने एक खास आदमी इस्माइल बेग के जरिये लखनऊ में एक खौफनाक अफवाह फैलवा दी। अफवाह यह थी कि ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ मुर्शिदाबाद से वापस लौट कर लखनऊ नहीं आयेंगे। मुर्शिदाबाद से अपने खानदान को लेकर वे इलाहाबाद तक आयेंगे और फिर कानपुर होते हुए इटावा से आगे निकल कर नज़फ ख़ाँ ज़ुलफिराकउद्दौला की सेना से मिल जायेंगे। ज़ैनुलआब्दीन के पास आठ हज़ार फौज और तोपखाना है जो अवध के नवाब के दुश्मन की फौज का हिस्सा बन जायेगा। यह अफवाह शहर में ऐसी फैली कि दरबार से लेकर रेज़ीडेन्सी तक इसका चर्चा होने लगा। ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ को नवाबे अवध का दुश्मन करार दिया गया। उन्हें एहसान फरामोश बताया गया। उनके दोस्तों और शुभचिंतकों को भी शक के घेरे में लिया गया। धीरे-धीरे यह खबर इतनी गर्म हो गयी कि हैदर बेग ने ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ के उन रिश्तेदारों को गिरफ्तार कर लिया जो लखनऊ में थे। मिर्जा अबू तालिब जानते थे कि यह खबर अफवाह है। उन्होंने जगह-जगह इस षड्यन्त्र का भंडा फोड़ किया दरबारियों, आमिलों और अइलकारों को समझाया कि ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ ऐसा नहीं करेंगे और वे सीधे लखनऊ आ रहे हैं। हैदर ख़ाँ को यह खबर मिलती रहती थी कि मिर्जा अबू तालिब ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ का बचाव करने में लगे हुए हैं। हैदर बेग चाहता था तो ये था कि ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ को गिरफ्तार करने की इजाज़त नवाब से ले ले। उसने ऐड़ी चोटी का ज़ोर लगा दिया था लेकिन दरबार के ईरानी गुट ने उसे कामयाब नहीं होने दिया। तहसीन अली खाँ, मिर्जा हसन, मेंहदी अली वगैरा के दबाव की वजह से हैदर ख़ाँ अपने मंसूबे में कामयाब नहीं हो सका। एक महीने के बाद गोमती के रास्ते ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ और उनका ख़ानदान लखनऊ आ गया। अपनी इस चाल को मात होता देखकर हैदर ख़ाँ ने नया पैंतरा बदला। उसने ज़ैनुलआब्दीन को अकेला कर देने के लिए उनके सबसे बड़े हमदर्द मिर्जा अबू तालिब पर निशाना साधा। योजना यह बनाई कि अबू तालिब को न सिर्फ लूट लिया जाये बल्कि ज़लील भी किया जाये और फिर कत्ल कर दिया जाये। एक भयानक साज़िश को अमली जामा पहनाने के लिए उसने अपने खास खास लोगों से कहा कि वे घाटमपुर (अब कानपुर ज़िला) जाकर वहाँ के सरकाश जमींदारों से मिलें और उन्हें इस बात के लिए उकसायें कि अबू तालिब जब लगान वसूल करने आयें तो उन्हें लूट लें और कत्ल कर दें। सरकश जमींदारों के लिए नायब वज़ीरे आज़म का इशारा काफी था। 

अबू तालिब हर साल की तरह पाँच सौ सिपाही लेकर घाटमपुर पहुँचे और हर साल की तरह किले में ठहरे। उनके आने की खबर फैलते ही किले के इर्द गिर्द इलाके के बदमाश जमा होने लगे। 
बाक़र गंज के सैयद - १ : असग़र वजाहत | Baqar ganj ke Syed - 1 : Asghar Wajahat
अबू तालिब को यह पता लगते देर नहीं लगी कि यह उन्हें घेरा जा रहा है। और सरकशी के पीछे किसका हाथ है। ऐसी सूरत में लखनऊ से मदद मिलने का कोई सवाल न था। घाटमपुर का किला चूंकि मजबूत किला था और चारों तरफ खंदके थी इसलिए हमला करना आसान न था। अबू तालिब के पास चार तोपें थीं जिन्हें सही जगहों पर लगा दिया गया था। उन्होंने इस घटना के बारे में ''तारीखे आसफी’’ में लिखा है, ''इस हंगामे में पन्द्रह दिन मैं कमरबस्ता (कमर बांधे) और चार पाँच सौ सिपाहियों के साथ हर वक्त मरने मारने पर तैयार रहा।’’ लेकिन अबू तालिब कहाँ तक घाटमपुर किले में कैद रहते। बाहर सरकशों की तादाद बढ़ रही थी। खबर उड़ा दी गयी थी कि अबू तालिब के पास बड़ा खज़ाना है। आखिरकार दुश्मन को धोखा देने के लिए उन्होंने एक चाल चली। यह मशहूर करा दिया कि वे मूसा नगर के रास्ते कन्नौज़ घाट से इटावा जायेंगे। वहाँ गढ़ी में ठहरेंगे। इस खबर के फैलते ही बदमाशों के गिरोह मूसा नगर के रास्ते पर घात लगा कर बैठ गये। अबू तालिब ने अपना सामान कोड़े की तरफ रवाना करा दिया और खुद पाँच सौ सिपाहियों के साथ किले से बाहर निकले। बाहर निकलते ही उन्होंने तोपें दगवा दी ताकि लोग दहल जायें। उन्होंने सिपाहियों को हुक्म दिया कि लगातार गोलियाँ चलाते रहें। उन्होंने लखनऊ के लिए कोड़े वाला रास्ता पकड़ा और खैरियत से लखनऊ पहुँच गये। लखनऊ में लोगों को जब इस घटना की जानकारी मिली तो अबू तालिब का बड़ा नाम हुआ। 
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"Bara Imambara Lucknow" by Muhammad Mahdi Karim (www.micro2macro.net) Facebook Youtube - Own work. Licensed under GFDL 1.2 via Commons.

कम्पनी बहादुर की भूख बढ़ती ही जाती थी। आसिफुद्दौला का खज़ाना खाली था। कम्पनी बहादुर एक ऐसा साहूकार था जिसके खाते में लेनदारी हमेशा बनी रहती है। गवर्नर जरनल वारेन हेस्टिंग ने जब नवाब पर कर्ज़ अदा करने के लिए ज़ोर डाला तो नवाब को फिर अपनी माँ और दादी की याद आई। लेकिन इस बार रास्ता दूसरा अपनाया गया। कम्पनी बहादुर की फौज और रेज़ीडेण्ट नवाब के साथ फैजाबाद गये और बेगमों के महलों पर कम्पनी की फौज ने कब्ज़ा कर लिया। बेगमों के ख्वाजासरा जवाहर अली ख़ाँ और बहार अली ख़ाँ जो बेगमों की जागीरों, खज़़ाने, फौज वगैरा का काम देखते थे गिरफ्तार कर लिए गये और यहाँ तक कि उन पर सख्ती की गयी। उनसे पूछा गया कि बेगमों का खज़ाना कहाँ है और उसमें कितना पैसा है। ख्वाजासराओं को बेडिय़ाँ पहना दी गयीं। सख्ती के बावजूद वे कुछ बता नहीं रहे थे। पता चला बहार अली ख़ाँ अफीम बहुत खाता है। उसकी अफीम बंद कर दी गयी ताकि खज़ाने का पता बता सके। अफीम बंद होने से बहार अली की जान पर बन गयी और आखिरकार उसने बताया कि मोती महल में ही खज़ाना है। हैदर बेग ने न सिर्फ नकद रुपया बल्कि हीरे जवाहरात, कीमती ज़ेवर और दूसरा सामान भी ज़प्त कर लिया। खजाने में सोलह लाख रुपये और सवा लाख अशर्फियाँ पायी गयीं। 

यह सब माल लखनऊ रवाना कर दिया गया ताकि कम्पनी बहादुर के कर्ज़ देनदारी हो सके। 1783 में पड़ा अकाल भयानक था। इसकी चपेट में अवध ही नहीं लगभग पूरा उत्तरी हिन्दुस्तान आ गया था। दाने-दाने को तरसते किसान गाँव छोड़ रहे थे। बड़े बूढ़े कहते थे कि ऐसा भयानक अकाल न उन्होंने कभी देखा था और न पुराने लोगों ने कभी ऐसा अकाल के बारे में बताया था। गाँव में अनाज न था। लखनऊ के चारों तरफ हज़ारों किसान मौत और जि़न्दगी की लड़ाई लड़ रहे थे। बिकते बिकते नौबत लड़कियाँ बिकने पर आ गयी थी। माना जाता था लडक़ी तो बच ही जायेगी और परिवार के बचने की उम्मीद बढ़ जायेगी। लखनऊ में लड़कियों का बाज़ार गर्म था। हैदर बेग के हरम का इंतिज़ाम करने वाले अपने मालिक की ख्वाहिशात को समझते हुए अच्छी जवान खूबसूरत लड़कियाँ खरीद रहे थे। बुढ़ापे में हैदर ख़ाँ का यह शौक कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया था। लखनऊ के बड़े-बड़े हकीमों के पास सैकड़ों नुस्खे थे जिनकी मदद से हैदर ख़ाँ बुढ़ापे में जवानी का आनंद बटोरा था। अवध के नवाब ने भूख से मरते हुए किसानों के लिए राहत कार्य के तौर पर बड़ा इमामबाड़ा बनवाने का फैसला किया। ये खबर जंगल की आग की तरह फैल गयी कि नवाब आसिफुद्दौला दुनिया का सबसे बड़ा इमामबाड़ा बनवाना चाहते हैं और इमारतें बनाने के किसी भी माहिर को अपना नक्शा पेश करने की इजाज़त है। जल्दी ही नक्शे पेश होने लगे। नवाब की आँखें एक ऐसे नक्शे की तलाश में थीं जो खूबसूरत होने के साथ-साथ ऐसा हो कि दुनिया में अपनी आप ही मिसाल हो। हमारत साज़ी में माहिर किफायतउल्ला का नक्शा आसिफुद्दौला को पसंद आया । किफायतउल्ला का दावा सही था कि यह खूबसूरत इमारत कई तरह से नायाब होगी। इस जैसी दूसरी इमारत हिन्दुस्तान में तो क्या दुनिया में न होगी। इमामबाड़ा बनना शुरु हुआ। कहते हैं दिन में गरीब गुरबा, गाँवों से आये किसान, मज़दूर और दूसरे खस्ताहाल लोग इमामबाड़ा बनाने का काम करते थे। मज़दूरी पाते थे। रात में शहर के सफेदपोश मज़दूरी करने आते थे ताकि उन्हें कोई मज़दूरी करते देख न लें। इन शरीफ मज़दूरों से दिन में बनाई गयी इमारत को तोडऩे का काम लिया जाता था और उसकी मज़दूरी दी जाती थी। 1791 में इमामबाड़ा बन कर तैयार हुआ था।  


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"Claudemartin-engraving". Licensed under Public Domain via Wikipedia.
उन्नीसवीं शताब्दी के लखनऊ में, खासतौर पर नवाब आसिफुद्दौला के दौर, में क्लाड मार्टिन नाम का एक फ्रांसीसी बहुत अनोखा और प्रतिभाशाली आदमी था। फ्रांस के एक छोटे से कस्बे में जन्में मार्टिन जवानी के दिनों में जब भारत जाकर धनवान बनने के लिए कमर कसी थी तो उसकी माँ ने उससे कहा था कि तुम जब लौट कर आना तो बग्घी पर आना। मार्टिन लौटकर अपने गाँव तो कभी नहीं जा सका लेकिन उसने अपार धन कमाया। यदि फ्रांस में क्रांति न हो गयी होती तो वह निश्चय ही सैकड़ों बग्घियों पर बैठ कर अपने गाँव जा सकता था। मार्टिन फेंच कम्पनी की सेना में भारत आया था। लेकिन उसे जल्दी ही पता चल गया था कि इस देश में अंग्रेजों का प्रभुत्व ही चलेगा और वह अंग्रजी सेना में शामिल हो गया था तरक्की करते-करते वह मेजर जरनल के पद तक पहुंच गया था। मार्टिन सैनिक था टीपू सुल्तान के खिलाफ लड़ी जाने वाली अंतिम लड़ाई में वह शामिल हुआ था। वह तोपे ढालने से लेकर बड़े घंटे और सिक्के ढ़ालने तक का काम जानता था। 

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वह कमाल का वास्तुशास्त्री था। उसने कई भव्य इमारतों के नक्शे बना कर इमारतें बनवाई थीं। आज जो लखनऊ का राज भवन है उसका नक्शा और इमारत क्लाड मार्टिन ने ही बनाया था। वह पाण्डुलिपियों और कलाकृतियों का बहुत प्रसिद्घ संग्रहकर्ता था। उसकी लायब्रेरी में अनेक भाषाओं की चार हज़ार पाण्डुलिपियाँ थी। वह सफल बैंकर या उस समय की शब्दावली में महाजन था। उसने अवध के नवाब को उस समय का सबसे बड़ा कर्ज़ दिया था जो दो लाख पचास हजार पाउण्ड था। उसका 'नील व्यापार’ हिन्दुस्तान से लेकर योरोप तक फैला हुआ था। दिल्ली, बम्बई और कलकत्ता में उसकी बड़ी सम्पत्ति थी। मार्टिन केवल धनवान ही नहीं था। वह समाज सुधारक भी था। विशेष रुप से शिक्षा के क्षेत्र में उसका बड़ा योगदान है। आज भी उसके बनाये तीन विख्यात स्कूल लखनऊ, कलकत्ता, और उसके पैत्रिक गाँव लिन (फ्रास में) चल रहे हैं.  मार्टिन ने अपना एक अनोखा आपरेशन भी किया था। मुत्राशय में फंसी पत्थरी को उसने तार अंदर डालकर तोड़ा था और फिर वह पेशाब के साथ बाहर आ गयी थी। 1785 में मार्टिन ने नवाब आसिफुद्दौला और लखनऊ वासियों को एक नया चमत्कार दिखाया था। फ्रांस में पहली 'हाट एयर बैलून’ गर्महवा भरी गुब्बारे से उडऩे का दिसम्बर 1783 में प्रदर्शन हो जाने के दो साल के अन्दर मार्टिन ने लखनऊ में यह करिश्मा कर दिखाया था। नवाब आसिफुदौला को अपने स्वभाव और प्रकृति के कारण यह खेल बहुत मज़ेदार लगा था। नवाब ने मार्टिन से कहा था कि उसे इतना बड़ा गुब्बारा बनाना चाहिए जिसके माध्यम से बीच पच्चीस लोग उड़ सकें। मार्टिन ने कहा था यह खतरनाक हो सकता है। लोगों की जान जा सकती है। नवाब ने जवाब दिया था कि इससे तुम्हें क्या मतलब।  

सत्ता के अनगिनत रुप है। हैदर ख़ाँ के पास सत्ता थी। उन्होंने दीवान टिकैत राय को एक इशारा किया और ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ के मालगुज़ारी के बही खातों में सैकड़ों कमियाँ निकलने लगीं। उन्हें दीवानी दफ्तर में रोज़ बुलाया जाता था और दो-दो चार-चार साल पहले किए गये हिसाब को खोल कर यह बताया जाता था कि उसमें क्या कमी रह गयी है। ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ समझ गये थे कि अब इस परेशानी से छुटकारा मिलना मुश्किल है। उनके करीब तरीन दोस्त भी यहाँ उनका साथ नहीं दे सकते थे। कुछ मिलाकर सिर्फ मिर्जा अबू तालिब थे जो उन पर किए जाने वाली ज़्यादतियों की इधर-उधर जिक्र करते थे। लेकिन सुनने वाले कानों में उंगलियाँ डाल लेते थे कि उन्हें कुछ सुनाई न दे। फारसी शायरी और घुड़सवारी के शौकीन ज़ैनुलआब्दीन हिसाब किताब के दौरान की जाने वाली पूछताछ और अइलकारों के अपमानजनक व्यवहार से बहुत टूट गये थे।  

क्या हकीकत में मीर ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ मुर्शिदाबाद की नज़फी वंशावली के थे? मैंने उनकी पत्नी मिसरी बेगम, उनके मुर्शिदाबाद जाकर परिवार लाने और उनके नवाब मुहम्मद रज़ा ख़ाँ के साथ काम करने के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है कि उनकी नज़फी वंशावली थी। इस के आधार पर उनके पिता का नाम सैयद इस्माइल ख़ाँ , दादा का नाम सैयद ज़ैनुद्दीन और परदादा का नाम सैयद हुसैन नज़फी तबातबाई सुनिश्चित होता है। लेकिन मीर ज़ैनुलआब्दीन के समकालीन ही नहीं बल्कि उनसे निकट और व्यक्तिगत संबंध रखने वाले मिर्जा अबू तालिब अपनी पुस्तक में सैयद ज़ैनुलआब्दीन के बारे में लिखते हैं : ''इस साल (1775 ई.) में माहे रमज़ान में राकिमुल हुरूफ (अबू तालिब) सैयद ज़ैनुलआब्दीन के साथ मुख़्तारुद्दौला के बुलाने पर लखनऊ आया। मुख़्तारुद्दौला बड़ी इज़्ज़त से मिला और दो हज़ार सवारों व प्यादों पर अफसर मुकर्रर कर दिया। यहां पर अपना और ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ का इस सरकार (अवध) के साथ कदीम ताल्लुक बयान करना मुनासिब मालूम होता है। खान मैसूफ (मीर ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ ) मशहद (ईरान) के मशहूर सादात (सैयदों) में से थे। वो इल्मो फज़ल (ज्ञान और अच्छाइयों) और इल्मे तिब (चिकित्सा शास्त्र) में मुमताज़ (विशिष्ट) थे। हिन्दुस्तान आने के इब्तिदाई (शुरूआती) ज़माने में सफदरजंग के भतीजे मुहम्मद कुली ख़ाँ से दोस्ती पैदा करके हर जगह उनके साथ रहे। मुहम्मद कुली ख़ाँ के गिरफ्तार होने के वक्त उसकी रिहाई की कोशिश की और जब उसका कोई असर न हुआ तो शुजाउद्दौला के दबदबे से डर कर बंगाल की राह ली।’’ मिर्जा अबू तालिब का ऊपर दिया विवरण मेरी इस धारणा को पूरी तरह ध्वस्त कर देता है कि मीर ज़ैनुलआब्दीन का संबंध मुर्शिदाबाद के नज़फी वंश से था। मिर्जा अबू तालिब के अनुसार वे स्वयं हिन्दुस्तान आये थे और सफदरजंग के भतीजे मुहम्मद कुली ख़ाँ के साथ हो गये थे। इस तरह मीर ज़ैनुलआब्दीन का वंश मुर्शिदाबाद का नज़फी वंश नहीं हो सकता। इस धारणा पर दूसरा सवालिया निशान टाम विल्यम वेल के फारसी में लिखे इतिहास की किताब 'मिफ्ताहुत-तवारीख’ से लगता है। इसमें ज़ैनुलआब्दीन के संदर्भ में दर्ज है कि उनके पिता का नाम शुजाउद्दीन था और दादा का नाम शाह कुली ख़ाँ था। परदादा का नाम मुहम्मद तकी लिखा गया है। मुर्शिदाबाद के नज़फी वंश में ये तीनों नाम वहाँ नहीं मिलते। इस तरह यह निश्चित नहीं हो सका है कि मीर ज़ैनुलआब्दीन ख़ाँ का संबंध किस वंश से था।  


क्रमशः ...
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('हंस' में प्रकाशित हो रही कड़ी... )
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