शशि देशपांडे ने साहित्य अकादमी जनरल काउंसिल से इस्तीफा दिया | Shashi Deshpande resigns from Sahitya Akademi General Council


पद्म श्री व साहित्य अकादमी पुरस्कार सम्मानित प्रसिद्घ लेखिका और उपन्यासकार शशि देशपांडे ने साहित्य अकादमी की जनरल काउंसिल से इस्तीफा दे दिया है

साहित्य अकादमी को लिखे उनके पत्र का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद

शशि देशपांडे ने साहित्य अकादमी जनरल काउंसिल से इस्तीफा दिया | Shashi Deshpande resigns from Sahitya Akademi General Council

Dr Vishwanath Prasad Tiwari,
President,
Sahitya Akademi, New Delhi

Cc: Professor Chandrashekhar Kambar, Vice-President Sahitya Akademi, Dr K. Sreenivasarao, Secretary Sahitya Akademi

Dear Sir,
When I heard in November 2012 from the Sahitya Akademi that I had been nominated to the General Council of the Akademi in the individual category of writers, I felt honoured. I have always respected the Sahitya Akademi’s role as the single institution in India that brings together all the Indian languages under one umbrella, at the same time giving each language its rightful place and dignity.

Today, I am deeply distressed by the silence of the Akademi on the murder of Professor M. M. Kalburgi. Professor Kalburgi was a noted scholar, and a good and honest human being; he was also a Sahitya Akademi awardee and a member of its General Council until recently.

If the Akademi, the premier literary organisation in the country, cannot stand up against such an act of violence against a writer, if the Akademi remains silent about this attack on one of its own, what hope do we have of fighting the growing intolerance in our country? A few tame condolence meetings here and there for a member of our community cannot serve the purpose.

Sadly, it has become increasingly important to reaffirm that difference of opinion cannot be ended with a bullet; that discussion and debate are the only way a civilised society resolves issues. It has also become clear that writers, who are supposed to be the conscience-keepers of society, are no longer considered intellectual leaders; their voices no longer matter. Perhaps this is the right time for writers to reclaim their voices. But we need a community of voices, and this is where the Akademi could serve its purpose and play an important role. It could initiate and provide space for discussion and debate in public life. It could stand up for the rights of writers to speak and write without fear; this is a truth all political parties in a democracy are supposed to believe in. Silence is a form of abetment, and the Sahitya Akademi, which should speak for the large community of Indian writers, must stand up and protest the murder of Professor Kalburgi and all such acts of violent intolerance.

In view of the Akademi’s failure to stand up for its community of writers and scholars, I am, out of a sense of strong disappointment, offering my resignation from the General Council of the Sahitya Akademi. I do this with regret, and with the hope that the Akademi will go beyond organising programmes, and giving prizes, to being involved with crucial issues that affect Indian writers’ freedom to speak and write.

Shashi Deshpande
Bangalore
October 9, 2015
डॉ० विश्वनाथ प्रसाद तिवारी
अध्यक्ष
साहित्य अकादमी, नयी दिल्ली

प्रति: प्रोफेसर चंद्रशेखर कंबर, उपाध्यक्ष साहित्य अकादमी, डॉ के. श्रीनिवास राव, सचिव साहित्य अकादमी

महोदय,

नवम्बर २०१२ में मैंने सम्मानित महसूस किया था - जब मैंने साहित्य अकादमी से सुना कि अकादमी की जनरल काउंसिल में लेखकों की व्यक्तिगत श्रेणी की लिए मेरा नाम मनोनीत हुआ है। मैंने हमेशा साहित्य अकादमी का सम्मान भारत की उस एकमात्र ऐसी संस्था के रूप में किया है - जो सारी भारतीय भाषाओं को एक छतरी के नीचे एकत्र करती है, साथ ही साथ हर भाषा को उसका उचित स्थान और गरिमा देती है।

नेक, ईमानदार विख्यात विद्वान प्रो० कलबुर्गी की हत्या पर अकादमी की चुप्पी से आज, मैं बहुत व्यथित महसूस कर रही हूँ; वो साहित्य अकादमी सम्मानित थे और हाल ही तक अकादमी की जनरल काउंसिल के सदस्य भी थे।

यदि अकादमी जो कि भारत की प्रमुख साहित्यिक संस्था है, लेखकों के साथ होने वाली ऐसी हिंसक घटना के विरुद्ध नहीं खड़ी हो सकती, अगर अकादमी अपने में से एक पर हुए हमले पर चुप रहती है, हम ऐसे में देश में बढती असहिष्णुता से लड़ने की क्या उम्मीद रखें ? हमारे समुदाय के सदस्य के लिए यहाँ-वहां की गयीं इन दो-चार शोक सभाओं से उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता।

यह दुखद है कि इस बात की तसदीक करना आज बहुत ज़रूरी हो गया है कि विचारों में असहमति का अंत गोली से नहीं हो सकता; कि चर्चा और बहस ही किसी सभ्य समाज में समस्याओं के निराकरण का रास्ता हैं। यह बात भी साफ़ हो गयी है कि लेखक, जो समाज की अंतरात्मा के रखवाले समझे जाते हैं; उनकी आवाज़ का आज कोई महत्व नहीं रह गया है। शायद लेखकों का अपनी आवाज़ को वापस पाने का यही ठीक समय है। लेकिन, आज हमें आवाजों का समूह चाहिए, और यहीं अकादमी अपने उद्देश्य को पूरा कर, एक ज़रूरी भूमिका का निर्वाह कर सकती है। वो सार्वजनिक जीवन में चर्चा और बहस शुरू करने के लिए मंच प्रदान कर सकती है। अकादमी लेखकों के निडर हो कर बोलने और लिखने के अधिकार के लिए खड़ी हो सकती है; ये एक सच है और ऐसा माना जाता है कि प्रजातंत्र के हर राजनीतिक दल को यह सच स्वीकार्य है। चुप्पी, उकसाने का ही एक रूप है, और साहित्य अकादमी, जिसे लेखकों के एक वृहत समूह के लिए बोलना चाहिए, उसे अवश्य ही प्रो० कलबुर्गी की हत्या व ऐसी सारी हिंसक असहिष्णुता के विरोध में खड़े होना चाहिए।

अकादमी की अपने लेखकों और विद्वानों के समुदाय के लिए खड़े होने की असफलता को देखते हुए, मैं, भारी निराशा की भावना के चलते, साहित्य अकादमी की जनरल काउंसिल से अपने इस्तीफे की पेशकश करती हूँ। मुझे अफसोस के साथ ऐसा करना पड़ रहा है, इस उम्मीद के साथ कि अकादमी सम्मान देने व कार्यक्रमों के आयोजनों से ऊपर उठेगी, कि वह उन महत्वपूर्ण मुद्दों से जुड़ेगी जिनसे भारतीय लेखकों की लिखने-बोलने की आज़ादी प्रभावित होती है।


शशि देशपांडे
बैंगलोर
अक्तूबर 9, 2015

(अनुवाद - भरत तिवारी)
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1 comments :

  1. शशि देशपाण्डे ने एक उचित और साहसी क़दम उठाया है, इसके लिए मैं उनकी सराहना करता हूँ। प्रतिरोध ज़रूरी है।

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