नीरेंद्र नागर - मंडल कमंडल पर भारी पड़ा | Bihar - Nirendra Nagar


यह नीतीश की नहीं, गणित की जीत है

- नीरेंद्र नागर


Bihar Election Vote Share - Nirendra Nagar


जबसे बिहार के चुनावी नतीज़े आए हैं, सभी नेता और एक्सपर्ट महागठबंधन (मगब) की जीत के लिए नीतीश की आरती उतार रहे हैं। उन्हें एक नया हीरो बता रहे हैं जिसपर बिहार की जनता ने लगातार तीसरी बार अपना भरोसा जताया है। लेकिन सच कुछ और है। सच यह है कि यह महागठबंधन की नहीं, महागणित की जीत है।

मैंने नीचे एक टेबल दी है जिसमें सभी पार्टियों को इस बार और पिछले लोकसभा चुनाव में मिले वोटों का हिसाब है। जिनको आंकड़ों से प्यार है, वे इनमें डुबकी लगाएं लेकिन जिनको आंकड़ों से परेशानी होती है, उनके लिए मैं संक्षेप में बता देता हूं कि मैं किस आधार पर कह रहा हूं कि यह नीतीश की नहीं, गणित की जीत है।





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सबसे पहले देखें कि 2014 में एनडीए को कितने वोट मिले थे। 39.41 यानी क़रीब 40 प्रतिशत। मतलब अगर 100 लोगों ने वोट डाला तो उनमें से 40 लोगों ने एनडीए को वोट दिया। उसके विरोधी दो गुटों में बंटे थे — जेडीयू एक तरफ़ था और आरजेडी+कांग्रेस एक तरफ़। जेडीयू को 16 प्रतिशत और लालू-कांग्रेस-NCP को 30 प्रतिशत वोट मिले। इसे सिंपल गणित से समझें तो औसतन हर सीट पर एनडीए को 100 में से 40 वोट मिले, जेडीयू को 16 और लालू-कांग्रेस-NCP को 30 । इस तरह हर सीट पर एनडीए को 10 वोटों की बढ़त प्राप्त थी। चूंकि हर सीट पर एक जैसे वोट नहीं पड़ते इसलिए 40 की 40 सीटें तो एनडीए को नहीं मिलीं। लेकिन 31 सीटें तो उसकी झोली में गईं ही।

जब नतीजा आया तो इन तीनों पार्टियों ने देखा कि हम तीनों का कुल वोट प्रतिशत (45) तो एनडीए (40) से ज़्यादा है लेकिन सीटें 8 ही आईं क्योंकि हमारा वोट बंट गया। तो क्यों न हम मिलकर लड़ें? सो इस बार वे मिल कर लड़े और देखिए, कैसे बाज़ी पलट गई। मेरा तो मत है कि जिस दिन ये तीनों एक हुए, उसी दिन बीजेपी चुनाव हार गई थी। इसके साथ उसने कुछ ऐसी ग़लतियां भी कीं जिससे यह हार महापराजय में बदल गई। 

लोकसभा के मुक़ाबले विधानसभा में लोकल प्लेयर्स ज़्यादा हावी होते हैं जो बड़ी पार्टियों का शेयर खा जाते हैं। इस बार भी वही हुआ और इस कारण एनडीए का ही नहीं, महागठबंधन का वोट शेयर भी घटा। लेकिन एनडीए का हिस्सा जहां 40 से घटकर 34 हो गया, वहीं महागठबंधन का कुल हिस्सा 46 से घटकर 42 हो गया। यानी एनडीए को 6 प्रतिशत का घाटा हुआ है जबकि महागठबंधन को 4 प्रतिशत का। ये 10 प्रतिशत वोट निर्दलीयों तथा अन्य के खाते में गए जिनका हिस्सा पिछले साल के 15 प्रतिशत से बढ़कर इस बार 24 प्रतिशत हो गया। लेकिन मगब के मुक़ाबले एनडीए के वोट शेयर में 2 प्रतिशत की अतिरिक्त कमी एनडीए के लिए चिंताजनक है क्योंकि इस बार जीतन राम मांझी भी एनडीए में शामिल हो गए थे जिसके कारण उसका वोट शेयर बढ़ना चाहिए था लेकिन वैसा नहीं हुआ।

अब मगब के मुक़ाबले एनडीए का शेयर क्यों ज़्यादा कम हुआ, इसके एक या अधिक कारण हो सकते हैं। महंगाई, आरक्षण पर भागवत का बयान, दलितों के मामले में वी. के. सिंह की टिप्पणी, बीफ़ विवाद, मोदी का नकारात्मक प्रचार आदि बहुत सारे कारण प्रथम दृष्टया नज़र आते हैं जिन्होंने एनडीए का समर्थन घटने में अपनी भूमिका निभाई।

लेकिन मेरा यह मानना है कि यदि ये सारे कारण नहीं भी होते और बीजेपी के समर्थक 2014 के मुक़ाबले कम नहीं हुए होते तो भी उसकी हार निश्चित थी। 


कैसे, आइए, आगे देखते हैं। ऊपर हमने पिछले लोकसभा चुनाव का नज़ारा देखा कि कैसे 40 प्रतिशत वोट पाकर एनडीए 16 प्रतिशत पानेवाले जेडीयू और 30 प्रतिशत पानेवाले लालू-कांग्रेस अलायंस को बुरी तरह हराकर 31 यानी तीन-चौथाई सीटें जीतने में कामयाब हुई। आज अगर बीजेपी का वोट शेयर नहीं घटा रहता तो भी क्या आज का नज़ारा नहीं दोहराया गया होता?

तब औसतन हर सीट पर एनडीए के 40 वोट के मुक़ाबले मगब के 45 वोट होते (NCP मगब से बाहर था इस बार इसलिए 46 में से 1% घटा दिया है)। माना जाता है कि सीधे मुक़ाबले में 1 प्रतिशत का अंतर 15 सीटों का फ़र्क़ लाता है। इस हिसाब से नतीजा बीजेपी के लिए भले इतना बुरा नहीं होता (दोनों अलायंस में 5% के हिसाब से क़रीब 70-75 सीटों का अंतर होता) लेकिन बीजेपी की हार तो तय थी।

नीरेंद्र नागर नवभारतटाइम्स.कॉम के संपादक हैं। इससे पहले वह नवभारत टाइम्स दिल्ली में न्यूज़ एडिटर और आज तक टीवी चैनल में सीनियर प्रड्यूसर रह चुके हैं। 31 साल से पत्रकारिता के पेशे से जुड़े नीरेंद्र लेखन को इसका ज़रूरी हिस्सा मानते हैं। वह देश और समाज और समूह की तानाशाही के खिलाफ हैं और मानते हैं कि हर व्यक्ति वह सबकुछ करने के लिए स्वतंत्र है जिससे किसी और का कोई नुकसान नहीं होता और समाज का सीधे-सीधे कोई लेना-देना नहीं है। इसीलिए राजनीतिक मुद्दा हो या इंसानी रिश्तों का तानाबाना, उनके लेखों ने अक्सर उन लोगों को बौखलाया है जिन्होंने खुद ही समाज की ठेकेदारी ले रखी है और दुनिया को अपनी सनक के मुताबिक चलाना चाहते हैं।

अब देखें कि वास्तव में क्या हुआ। जैसा कि ऊपर बताया, दोनों अलायंस के वोट घटे हैं लेकिन एनडीए के ज़्यादा घटे हैं। इस बार महागठबंधन के 42% के मुक़ाबले एनडीए को 34% वोटरों का साथ मिला है। यानी दोनों गठजोड़ों के बीच वोटों का अंतर रहा 8 प्रतिशत। सो 15 गुणा 8 के हिसाब से मगब 120 सीटों के अंतर से जीता। लेकिन क्या नीतीश को पिछले साल के मुक़ाबले समर्थन बढ़ा है? नहीं, उनकी पार्टी को आज भी क़रीब 16 प्रतिशत वोट मिले हैं -- पहले 16.04 प्रतिशत था, अब 16.8 प्रतिशत। लालू की पार्टी को 18.40 और कांग्रेस को 6.7 प्रतिशत वोट मिले हैं।

इसका मतलब क्या हुआ? यही कि जिन लोगों ने 2014 में नीतीश को वोट दिया था, क़रीब-क़रीब उन्हीं लोगों ने इस बार फिर उनको वोट दिया है। जिन लोगों ने 2014 में लालू को वोट दिया था, उन्हीं लोगों ने इस बार भी एक-दो प्रतिशत के अंतर से लालू या उनको सहयोगियों को वोट दिया है।

दूसरे शब्दों में नीतीश वही हैं और वहीं हैं जो और जहां 2014 में थे। उनको मिलनेवाला समर्थन भी क़रीबन उतना ही है जितना 2014 में था। लेकिन चुनावी नतीज़ों की गहराई में न जानेवाला मीडिया एक साल पहले जहां नीतीश बाबू का मर्सिया पढ़ रहा था, वहीं आज उनका गुणगान कर रहा है।



सच यह है कि अगर नीतीश बाबू आज अकेले लड़े होते जिस तरह पिछली बार लड़े थे तो आज उनका और लालूजी का वही हाल होता जो बीजेपी और पासवान का होता दिख रहा है। 34 प्रतिशत समर्थन के साथ एनडीए 16 प्रतिशत वाले नीतीश और 25 प्रतिशत वाले लालू-कांग्रेस गठबंधन को वैसे ही धूल चटा रहा होता जैसे कि 2014 में चटाई थी। और आज नीतीश बाबू की जगह छोटे और बड़े मोदी की बिहार में जयजयकार हो रही होती।


तब मीडिया बीजेपी की जीत के 10 कारण गिना रहा होता जिनमें से एक होता - नरेंद्र मोदी का असरदार काम और असाधारण प्रचार! बिहार पैकेज और अमित शाह की रणनीति तब जीत के बड़े कारण गिनाए जाते और नकारात्मक प्रचार तब प्रभावशाली प्रचार बता दिया जाता। कोई यह नहीं देखता कि बीजेपी का वोट पहले से घटा है या नहीं। सब सीटों में ही उलझे रहते जैसे कि आज उलझे हुए हैं।

मीडिया और एक्सपर्ट्स आज की जीत को नीतीश के सुशासन की जीत बता रहा है लेकिन नीतीश की वाहवाही करनेवालों से मेरा बस एक सवाल है। यदि बिहार के वोटरों ने नीतीश के चेहरे और काम को देखकर इस बार वोट दिया है तो 2014 में (जब वह अकेले लड़े थे) और 2015 में (जब वह अलायंस में लड़े हैं) उनके समर्थकों की संख्या (16 प्रतिशत) करप्शन के कारण सज़ा पाए लालू यादव के समर्थकों (18 प्रतिशत) से कम क्यों है? क्यों आज भी घोटालापुरुष लालू को बिहार में विकासपुरुष नीतीश से ज़्यादा लोगों का सपोर्ट प्राप्त है?

बिहार में नीतीश की नहीं, (पूरी तरह) जातीय और (आंशिक तौर पर) धार्मिक ध्रुवीकरण की जीत हुई है। यदि यह धार्मिक ध्रुवीकरण पूरी तरह हुआ होता जैसा कि 2002 और उसके बाद भी गुजरात में हुआ या पिछली बार पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हुआ और जिसको बिहार में दोहराने की कोशिश मोदी और अमित शाह दोनों कर रहे थे तो बीजेपी आज वहां दो-तिहाई सीटों पर जीत रही होती। लेकिन जैसा कि पहले भी हुआ था, मंडल फिर कमंडल पर भारी पड़ा है।

यही इस नतीज़े का अंतिम सच है, बाक़ी सारी बातें बकवास हैं।
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