गोमा हँसती है - मैत्रेयी पुष्पा Goma Hansti Hai - Maitreyi Pushpa


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गोमा हँसती है - मैत्रेयी पुष्पा

(हंस, अगस्त 1995 में प्रकाशित लम्बी कहानी ) 




 कातिक के महीने में भी इस दगरे में सूखी रेत! साइकिल खींचते-खींचते किड्ढ़ा हाँफने लगा। उतरना पड़ेगा। साइकिल डगमगा रही है। उसने ब्रेक मारा और टाँग उलारता हुआ उतर पड़ा। डेढ़ा होता हुआ हैंडिल अपनी ओर मोड़कर सीधा किया। पाँव जमीन पर पुख्तापन से टिका लिए।

 पीठ पर पसीना है- लुढ़कती हुई छोटी-छोटी बूँदें। ठंड की रमक में भी भायटे गर्मी का-सा ताप इस दगरे में साइकिल खींचने की निशानी। अकेला होता तो इतना कसाला न पड़ता। ‘कैरियल’ पर बलीसिंह लदा है। घायल बलीसिंह, लटकते हुए घुटने और कमर थिर। इसीलिए साइकिल का सधाव नहीं। किड्ढ़ा को गुस्सा आ रहा है।

 ”सूधे नहीं बैठा जा रहा?“

 बलीसिंह ने धीमी-सी हरकत के साथ सिर उठाया। तनिक सीधा होने की कोशिश ही की थी कि चिल्ला पड़ा - ”हरे राम! हरी मइयाऽऽआ आ मरा रे ऽऽए!“

 कराहट के साथ ही किड्ढ़ा ने पैदल चलते हुए साइकिल रोक दी। उसकी नाक ने कई कोण बदले। आँखों के ऊपर त्यौरियाँ चढ़ गई। कनपटियों पर सिकुड़न पड़ी और ऐंठी हुई मूछें थरथराने लगीं होंठ फड़कने के कारण। मुँह से थूक के दो-चार छींटे बलीसिंह की ओर उछालते हुए कड़ी आवाज में बोला, ”सत्त साधकर बैठ। देख रहा है साइकिल को? गिरबाएगा? भाई हद्द है! हाथ-पाँवों का चूरन करा आया, पर अब भी नस-नस फड़क रही है!

 ”और यह हाय-हूय बंद कर। गांव तक गधा की तरह रेंकता ही जाएगा?“ बलीसिंह ने होंठ भींच लिए। रूआँसा मुँह बंद कर लिया, मगर कराहने का स्वर फिर भी रिस रहा है, कहीं न कहीं से। रेत तनिक कम हुआ तो किड्ढा फिर साइकिल पर चढ़ गया। गद्दी पर बैठ गया। पैडल मारने में पूरी ताकत लगा दी। जब वह पूरी ताकत से कोई काम करना चाहता है तब अनजाने ही दायाँ हाथ अपनी मूँछों पर फेरने लगता है। किड्ढा का हाथ मूँछों की ओर उठा कि साइकिल फिर डगमग....

 दाईं-बाईं ओर मूँज के झुंड हैं। मूँज की लंबी-लंबी पतली पत्तियाँ दोनों ओर से दगरे में मुँह झुकाए खड़ी है। देखने में हरी कोमल, पर बडी बेरहम। धारदार पतेल के बीच से निकलते हुए किड्ढ़ा की उघड़ी बाँहें चिरने लगीं। मूँज बलीसिंह की देह को भी... किड्ढ़ा ने गर्दन मोड़कर पीछे की ओर देखा। नहीं, वह तो पिछौरा ओढ़े हुए है। कितना अच्छा हुआ जो पिछौरा उढ़ा लाया, नहीं तो दर्द के मारे का बुरा हाल हो जाता।

 साइकिल के पिछले पहिए में जरूर कुछ फँसा है। फट्-फट् कोई लत्ता-सा फड़फड़ा रहा है।

 ”बलीसिंघा, धोती समेट ले रे। मेरे ख्याल में पहिए में आ रही है। इतनी लंबी धोती आई कहाँ से? लाँग नही लगाई तैने?“

 किड्ढ़ा ने एक हाथ से कसकर हैंडिल साधा, दूसरी बाँह के सहारे से बलीसिंह को उतारकर खड़ा कर दिया।

 ”सधके। सधके रे। लग रही है ज्यादा?“

 बलीसिंह आँख मीचकर ऐसा कराहा, ज्यों दम निकल रहा हो। टेढ़े होंठों मे भिंचे हुए दाँत दिखाई दे रहे हैं।

 ”अरेऽ़ऽए! तू बिलकुल ही हिम्मत हार रहा है!“ किड्ढा की आवाज मे अजब-सी खनक है। बलीसिंह हाय-हाय चिल्ला रहा है। किड्ढ़ा के हाथ-पाँव फुर्ती से चल रहे हैं। आँखें मटर-मटर ताक रही हैं - चंचल गति से-कितनी मार मारी है!

 ”मेरे साले, तू तो बड़ा मलूक बनता था। सज-बजकर गया था, छैला! टूट गई कमर? बिगड़ गई धजा? कुँवर जी, अब महीनों ठाड़े नहीं हो पाओगे। मालुम तो खुब थी कि बिसाहुली वाले कैसे मारा-धारा (खूँखार) आदमी हैं। वे न बखसें अपने बाप को भी। तू खुद ही ओखली में मूँड धरने चला गया!“ किड्ढ़ा ने अपनी साइकिल बबूल के पेड़ के सहारे टिका दी। धरती में दो-चार सूखे काँटे बिखरे पड़े थे, उन्हें बीनकर एक ओर फेंक दिया। तनिक-सी लापरवाही से साइकिल पंक्चर हो सकती है, फिर चलना-पहुंँचना भी मुश्किल, जानता है किड्ढा।

 ”अच्छा तू एक बात बता, साँची-साँची। सुसरार जाने का तुझे ही चंदुर (शौक) चढ़ा था कि उस ठरगजी (ठगिनी) गोमा के हुकम की तामील बजाने गया था?“

 बलीसिंह चुप। सिर झुकाए हुए....

 ”बोलती बंद है अब! हाँ, काहे को बताएगा?“

 किड्ढ़ा उसको सहारा देकर अधखुली धोती करसकर बाँधने लगा। बलीसिंह का स्याह चेहरा कैसा दयनीय हो आया है। बेचारे के माथे पर पड़े गूमड़ लोंक रहे होंगे। खूनी खरोंचों में दर्द की धार.... दाँती भींचकर, होंठ सिकोड़कर दर्द पी रहा है बलिया!

 फेंटा कसकर लाँग लगाने के लिए उसे खड़ा कर दिया किड्ढ़ा ने। ”नउआ की तो घिघ्घी बँध रही थी। नहीं तो मैं पहले तुझे हाथरस के सफाखाने ले जाता। मल्लिम-पट्टी करवाता। नाई पर तो छोटे सिंह का भूत सवार था। काँप-काँपकर कह रहा था, अब आया छोटेसिंह, अब आया। एक से एक डरपोक-सा आदमी है दुनिया में।“

 किड्ढ़ा ने अपनी मूँछों पर हाथ लगाया, भाले की नोक की तरह तनी हैं। वह बलीसिंह को कैरियर पर लादकर फिर चल दिया गाँव की ओर।

 और दिन होता तो इतना बोल लेता किड्ढ़ा? छाती पर चढ़ बैठता बलीसिंह। बाघ की तरह हमला करता सीकिया पहलवान। आलू बोने वाली कोई बात-सी बात थी? इतना ही तो कह दिया कि फिर गाजर कहाँ लगाएँगे भैंस-बर्दों के लिए? अजी रन-भंगन मचा दिए। गोमा अलग इठी-इठी सी रहने लगी। जानता है किड्ढ़ा, आदमी हमला नहीं करता, हमला करती है उसकी हिम्मत। बलीसिंह का हौसला, क्या पूछे? धरती से दस गज ऊपर रहता है इन दिनों।

 अपने ऊपर कम झँुझलाहट नहीं उसे। लंबी-चैड़ी देह, तलवार-सी तनी मूँछें तो ऊपरी दिखावट है ससुरी। वह रेत भरी गैल पर भड़ास निकालने लगा - ”बलिसींगा, सो गया क्या रे? देख ले, कब से हल्ला है नई सड़क बनने का? प्रधान के बाप जब प्रधान थे और हम लोग नाक पोंछना तक न जानते थे, तब से सुनते चले आ रहे हैं- सड़क अब बनी, तब बनी। अब तो मेरे ख्याल में हमारे नाती-बेटा भी इसी रेतभरे दगरे में साइकिल घसीटेंगे। बन गई सास सड़क!” कहते हुए उसने पूरी ताकत लगाकर पैडल मारे।

 नाती-बेटा कहते हुए कसक जगी कि खुनक? हाँ, बलीसिंह की आवाज जरूर निकली - ”तब तक....साइकिल ही...प्रधान का....छोरा....तो..... फटफट।“

 किड्ढ़ा के मन मे एक चित्र उभरा। जवान भँवर, अपने बेटे की तस्वीर। फटफट चलाते हुए। भँवर नहीं, बलवान। गोमा बलवान कहकर ही तो पुकारती है।

 बलवान नाम उसके होठों में दगरे की रेत की तरह किसकिसा उठा। मन में न जाने क्या आया, पीछे को अँगोछा फेंकता हुआ बोला, ”यह ले रे! मुँह पर डाल ले। माथे के घाव में माटी चली गई तो विस पैदा करेगी।“ बलीसिंह में इतनी कूवत कहाँ कि अपने कंधे पर पड़ा अँगोछा भी हाथ से खींच ले। बाँह हिलाते ही कंधा कटता होगा। सचमुच पीछे से लंबी कराह उठी- ”आऽऽआय!“

 किड्ढ़ा को अनचाहे ही हँसी आ रही है। भला यह है कि उसका मुँह बलीसिंह की उलटी दिशा में है। वह हँसी को होंठों में रोक रहा है। पर नहीं रूकती। कोई गंभीर बात सोच रहा है कि आवाज में हँसी की खुनक न शामिल हो पाए। ”यार, हुआ तो बुरा! पर तू भी मूरख कहाँ जा उलझा? सेर पर सवा सेर। तुम बदमास तो हम सवाए बदमास। मुझसे ही पूछ लेता।“

 साइकिल सपाट ऊसरा में आ गई। पैडल कुछ हलके हो गए। किड्ढा की टाँगों का खिंचाव कम हुआ। उसकी इच्छा है, चहककर बात करे बलीसिंह से। ”नाऊ बेचारा अच्छे सुभाव का था। पराए गाँव के आदमी की मदत करी। प्रधान की बहौत अच्छा निकला, तुझे पिटने से बचाया। संत आदमी भी हैं दुनिया में। सियाराम भगत ठीक कहते हैं, कलजुग में सज्जन आदमी न हों तो परलय हो जाए।“ कहते हुए कुर्ते पर आई रेत झाड़ दी।

 बलीसिंह केवल कराह रहा है-”हाय! हाय! लै जारी मइयोऽऽओ.....“

 गाँव की बसावट-बुर्जी-बटौरा, कच्ची-पक्की भींतें, छान-छप्पर दखते ही किट्ढ़ा का दिल धक्-धक् करने लगा। क्या कहेंगे गाँव के लोग? वैसे ही रास्ता चलते टोकते हैं। सामने ऊँची ठेल आ गई, उसका ध्यान पलटा-”बलिया, गद्दी दाबकर पकड़ना रे। कहीं उछिट जाए! सँभल के।“ साइकिल ऊँचाई पर चढ़कर नीचे को सरक आई।

 कातिक मास में फसल धरती से बालिश्त भर ऊँची हो जाती है। खेतों में किसान पानी लगा रहे हैं। बम्बा खुला है। और दिन होता तो किड्ढ़ा साइकिल मोड़ देता। दरियाफ्त करता कि किधर के खेतों में गूल खुली है? कुछ नहीं तो इधर-उधर गपशप करता।

 ....मगर आज, इस समय कहाँ रूके? किसके पास जाए? पाथर लदा है कैरियर पर। जो लोग उसकी ओर देख रहे थे, उनकी ओर से मुख मोड़ लिया। दरियाब ने उल्लू की नजर पाई है। रात के समय भी आदमी को पहचान ले। टोकने-टोकने की बुरी आदत है। मानेगी नहीं.....

 दरियाब का स्वर सनसनाता हुआ आया, ”अरेऽऽए! कहीं किड्ढ़ामल है क्या? कहाँ से चली आ रही है सवारी? मेरे जाने भइया-दौज खबाने संग-संग गए दोऊ जने? ज्यादा बोझ बाँध दिया था गोमा ने? चलो, मेल मे ही गैल है।“ मूँछों पर हाथ फेरने की तलब लगी थी, कि किड्ढा का हाथ बीच में ही रूक गया।

 ‘लुच्चा आदमी से कहाँ तक पेस जाए।’ होंठों में बुदबुदा लिया। अभी क्या है? गैल खतम थेड़ेई हो गई है? मानसिंह का बाबू अड़ा है सामने कंधे पर फावड़ा धरे टकटकी लगार देख रहा है। चल तू भी सुना- ”अई श्यावासे! रंघै रे रंघै! डबल सवारी खेंच रहे हो। साइकिल बिचारी ने क्या बिगाड़ कर दिया?“

 गैल चलते आदमी से अटकते हैं लोग। रोटी नहीं पचती इनकी, पराई पिछौरिया बिना खींचे। किड्ढ़ा ने एक गीत की कड़ी गुनगुनाना मुनासिब समझा। गौर करना बेकार है।.... पर पाँव तो सुन्न-से हो रहे हैं। मुँह उतर-सा गया। अभी क्या है, आगे चलो किड्ढासिंह.... बेध्यानी में ऐसा डूबा कि कलबतिया चाची से भिड़ते भिड़ते बचा। वह तो हाथों को खुद ब खुद ब्रेक मारने की आदत है, नहीं तो बूढ़ी कब कर लुढ़क जाती। चाची के मुख से गालियाँ फूट पड़ी, ”सत्यानासी! को है तू! फूट गई हैं?“

 वह साइकिल से झटपट उतर पड़ा । जोर से बोला, ”चाची, राम-राम।“ ”तू! किड्ढा?“

 ”पहचानेगी कहाँ से? बुढ़ापे मे भी हाथ-भर का घूँघट मारकर चलती है।“ ”मिटे, तू आ कहाँ से रहा है? और यह बलीसिंघा?“ चाची कैरियर पर बैठे बलीसिंह के पास जा पहुंची।

 ”कहाँ मिल गया रे बलिया, किड्ढा तो इगलास की पैंठ को गया था। और... क्यों रे, ये चोंट-फेंट? कहाँ मार लाया बंजमारे?“

 किड्ढा पीठ दिए सुन रहा है। क्या बोलेगा बलीसिंह? वह भी क्या बता दे कि क्यों आ रहा है इस बेहूदे की लदैनी लेकर?

 चाची भी सहज मानने वाली नहीं। पूरी दरियाफ्त करके रहेगी। ”कहाँ हो गई मारपीट? दोनों में से कोई बोलता क्यों नहीं रे?“ चाची सवाल नहीं कर रही, कनपटी पर चनकटे दे रही है। किड्ढा ने आव देखा न ताव, बलीसिंह की झुकी गर्दन पर तीन-चार थाप मारीं, मुँह बिगाड़कर बोला, ”पूछ इस भानजी के मामा से, कहाँ मिला था? बता देगा ये ही बिंदा में कितनी रकम लेकर आया है। मेहमानी मारकर लौटा है कुँवर जी।“ चाची अचरज से देखती रह गई। किड्ढा अपनी मूँछें सहलाता रहा। बलीसिंह ने मुँह बिलकुल ही नीचे गाड़ लिया।

 इतने में डोरिया आ गया।

 ”आज क्या कहने! सूरज नारायन पूरब में मुँदेंगे। भाई मेल हो तो ऐसा!“ किड्ढा ने अपनी नजर साइकिल के हैंडिल पर जमा ली। कुत्तों के भौंकने का मलाल माना तो हाथी चल लिया। साले लोखरा-गीदड़!

 रास्ते-भर आँखें खुली रखकर भी उसने दाएँ-बाएँ, आगे-पीछे कौन आ रहा है, ध्यान नहीं दिया। बचता-बचता साइकिल चलाता रहा। बलीसिंह की हालत देखकर कई बूढ़े, कई जवान, बहुत-से बालक, चार-पाँच औरतें पीछे-पीछे आ रही हैं, बातचीत से ऐसा मालूम हो रहा था।

 बलीसिंह को आँगन में उतारकर उसने साइकिल दुबारी में टिका दी। किड्ढा को होश नहीं, व सीधा कोठे में जा लेटा, जहाँ खाट बिछी थी। खाट पर दरी बिछी थी। सिरहान गेंदुआ (ताकिया) रखा था। यह गोमा की खाट है। गोमा इस पर सोती है। गोमा... देह में सिहरन होने लगी।

 गोमा हाथ में गिलास लिए खड़ी है। उसे पुकार रही है-भँवर के बापू! उठो, आँखें खोलो। देखो तो.... कहीं लगी-लगाई तो नहीं? मेरा कलेजा बैठा जा रहा है! अरेऽऽऐ... दो घूँट दूध पी लेते। हलक सूख रहा होगा।“

 उसने कनखियों से देखा, गोमा का गात काँप रहा है। गला भर्राया-सा। रिरिया रही है गोमा, चिरौरी कर रही है।

 किड्ढा का मन सरसों के पात-सा कोमल है। गोमा दुखी हो, वह कैसे देख सकता है?

 पर वह छोटे बालक-सा रूठा हुआ है। नहीं खोलेगा आँखें। मनाएगी अपने-आप। सच, उसे कुछ भी नहीं व्यापा-थकान न सदमा। कैसे कहे कि गोमा का मुख देखकर ‘अलस-निदरा’ लगी है उसे। जैसे शुरू के दिनों मे गोमा को लगती थी। वह घंटों आँखें मँूदे लेटी रहती थी। किड्ढा मगन मन उसकी पिंडलियां सहलाया करता । पाँव के तलवों में तेल-पानी की मालिश! प्राण-प्यारी का लाड़-किड्ढा का सौभाग!

 गोमा-गोमती! उसकी दुलहन!

 अमावस में पूरनमासी रूपवती का रूप! किड्ढा का मन कहाँ से कहाँ भटकने लगा! कहाँ से कहाँ जा पहुंचा.... गोमा लौट गई?

 कलबतिया चाची को माता मानता है वह। वह न होती तो किड्ढा कुँआरा ही बूढ़ा हो जाता। अच्छी-खासी जंग हुई थी चाची और बापू के बीच। बापू किड्ढा के ब्याह की बात पर बेआस हो बैठा था। चाची थी कि जब मौका देखती, बापू को कान पर भिनभिनाने लगती माछर की तरह। तमाम तरह की दलीलें ढँूँढ ली थीं उसने। कभी दुख जताती तो कभी उलाहना देती - ”किड्ढा के संग के छोरा लरकौरे-चरकौरे (बच्चे वाले) हो गए और तुम हो कि इसके ब्याह की फिकर नहीं करते। आज को इसकी महतारी होती तो सौ जुगत जुटाती।“

 ”कलबतिया बहू, तू सब जानती है। जैमा चढ़ते-चढ़ते रह गया ससुर का। मेरे क्या बस की बात है? कोई बेटी वाला रूके-रूपे तब न। करम काँकरी है। ”रूपेगा तो तब ही न, जब तुम ढंग का बिचैलिया पकड़ो।“

 ”ढंग का? कजरौठ का मानिकचंदी इसी गाँव में दस-पंद्रह ब्याह करा चुका है। और हजार रूपया दाबे बैठा है मरे। सुआ-डोरा बहुतेरे लगाए, पर नहीं बनी बात नसीबा पर जोर नहीं।“

 चाची क्या कहे आगे?

 ”दरियाब का साला पडि़या हाँक ले गया। कहता था, अपनी बहन की बाबत बाप से बात करेगा। सो आज तक आ रहा है.... अब क्या चून की लुगाई बिनबाऊँ, कि काठ की ला दूँ? इर-फिरकर तू मेरे सिर पड़ जाती है।“ चाची ने आधे घँूघट में से ताना मारा-”भली करी! रूपया लुटाते रहो, पर हुक्का को नै मत छोड़ना। कहीं आए-गए तुम?“

 बापू ने हुक्के को एक ओर सरकाते हुए कहा, अरे छोरी, जो चला जाऊँ वर ढूँढने और कर आऊँ सगाई! तू भी चली आई पंचायत छाँटती।“ चाची ने हाथ का पंजा मटकाया, ”मत जाओ। कौन-सा चूल्हा ठंडा पड़ा है। छोरा रोटी-पानी कर लेता है। साग-पात राँधकर भी खबा देता है। पेट भरे पीछे बूढ़े आदमी को लुगाई की जरूरत नहीं।“

 ”भाई रे भाई! फिर वो ही बात! अरे, यह कहों कि छोरा का भाग उलटा हो गया। माता-माई की मेहर कि चेहरा-मोहरा तो बिगड़ा ही, एक आँख और ले गई मइया परमेसुरी। बेटी वाले ससुर अकल के हेठे आते हैं। घर-खेती, पौहे-जेंगर (पशु) नहीं देखते। किड्ढा की आँख और दाँत के संग ब्याहनी है छोरी?“

 किवाड़ के पीछे दुबके किड्ढा का कलेजा दप-दप करता रहा। चाची क्या जाने, बाबू के पास सौ बहाने हैं। जीत नहीं सकेगी किसी विधि। चाची भी कच्ची गोलियाँ नहीं खेली, तू डाल-डाल तो मैं पात-पात! बोली, ”बड़े, न सही सूरत-शकल। न सही एक आँख। छोरा की उमर तो है। इतनी बात गाँठ बाँध लो कि जो उमर सरक गई तो फिर दाता बेली नहीं। उमर बड़ी दगाबाज चीज है। जवानी के दिन जेवरा तुड़ाकर भागते हैं, और आदमी फिर पड़ा दीखता है बुढ़ापे के सिवाने में। बूढ़े आदमी से क्या रास-रंग? उसके पास तो लुगाई सपने में भी नहीं झाँकती। जोर-जबरन ले भी आओ तो कब्जा नहीं मानती। बलीसिंह बखत ही तो चूक गया। डोल रहा है कुँआरा-लाँगुरिया। अपनी जात-बिरादरी में वैसे भी जनानी जिंस कम है।“

 बापू ने हुक्का अपनी ओर खींच। चिलम में फूँक मार आग दहकाई और लंबे-लंबे कश लिए-गुडुर-गुडुर। गुडुर-गुडुर।

 कली की नै (नगाली) पकड़े सामने की भीत को घूरता रहा बापू। तनिक कमजोर-सी आवाज में बोला, ”बलीसिंह रंग से मार खा गया। काले भूत को कौन ब्याहेगा अपनी बेटी? ऊपर से कुँवर जी के नखड़े! दरियाब की साली के फेर में पडे़ रहे। अब डोल रहे हैं भिंडी काटते......“

 कलबतिया चाची की जिंदगी-भर सेवा करेगा किड्ढा। एक वही थी, जो उसके मन की बात समझ रही थी। लालसा पहचान रही थी। बापू को तरह-तरह से समझा रही थी-

 ”बड़े... सूरत-मूरत का हेठा आदमी क्या मर्द नहीं होता? अंग-भंग आदमी के मन में उमंग नहीं होती? लोहू में गरमी नहीं होती? छोरा की जिंदगानी फूलने-फलने पर है और तुम बैठ-बैठ पाला गिराए दे रहे हो! धन-माया को रो रहे हो! भाड़ में गया मानिकचंदी और खाक डालो दरियाब के साले की बहन पर। बात आगे बढ़ाओ।

 ”खूब जानते हो तुम कि बलीसिंह रंग से नहीं, अपने भइया गंगाराम की मक्खीचूसी का पछाड़ा हुआ है। बखत खराब पड़ रहा है, भइया भइया की देहरी बसते नहीं देख सक रहा। सो ईंट का जवाब पाथर से उसने दे दिया। बँटा ली गंगाराम से धरती। कर लिया न्यारा खाता। घर न बार तो माया किस काम की? अब दोनों दुश्मन की निगाह से देखते हैं आपस में। तुम ऐसा मत करो कि एक दिन तुम्हारा किड्ढा तुम्हें पनहा दिखाबै।“

 बापू ने गहरी नजर से देखा चाची के घूँघट की ओर। ”ऐसा क्या देखा रहे हो? मेरी भतीजी है, दूर के रिश्ते की। उमर की छोटी है, पर ले-देकर बात बन जाएगी। खाली गाल नहीं बजाने आई मैं।“

 बापू ने फिर अपना ठस्स बयान जड़ दिया, ”भाई, छोरी-छापरी न हो गई, बछिया-पडि़या हो गई! बिना दिए-गए माँ-बाप नहीं करते। पैठ-हाट लगी है क्या?“

 चाची ने नाम पर आया घँूघट माथे तक खींच लिया, जैसे उसे बाबू को जेठ की निगाह से देखने की दरकार नहीं।

 ”बड़े, तुम इतनी उमर पाकर भी बैयर की जिंदगानी नहीं जाने-समझे? बछिया-पडि़या, कि डंगर से भी गई-गुजरी! पौहे (पशु) की रस्सी पकड़ाते बखत मालिक यह तो देखता है कि अगले के खँूटा पर अवस जीव दुख मे ही ढकेल रहे हैं अभागिन को।

 ”मैं मानती हूँ कि बेमेल रिश्ते की बात चलाई है मैंने, पर बैयरवानी हूँ, करमजली के लिए इतना तो कह ही सकती हूँ कि इस खूँटा बँध जाए। क्या मालुम कौन कसाई मोल देकर हाँक ले जाएगा? किड्ढा जैसा हीरा फिर कहाँ मिलेगा?“ किड्ढा का दिल बाँसों उछलने लगा। किवाड़ के पीछे तिरताल पर नाच रहे हैं पाँव।

 चाची ने उझककर देखा, ”छोरा!“

 वह बोला नहीं। साँस रोके खड़ा रहा।

 बापू ने चाची का का ध्यान खींचा, ”कितने?“

 चाची ने दोनों हाथों की पाँच -पाँच उँगलियाँ फैलाई।

 बापू ने चैंककर कहा, ”दस हजार!“

 नहीं में सिर हिला रहा है बापू, दाएँ-बाएँ, बाएँ-दाएँ।

 किड्ढा के कानों में कीलें ठुकने लगीं-नहीं-नहीं, नहीं-नहीं!

 ”सोच-समझ लो बड़े। बलीसिंह तैयार बैठा है। कहता था, दो-चार बीघा खेत निकाल दूँगा।“ चाची ने किड्ढा को उबार लिया।

 बापू ने फिर सिर हिलाया- ”ना जी ना। दाएँ-बाएँ।“

 किड्ढा ने बलीसिंह का नाम सुनते ही बापू को गाली दी- ”तेरी ऐसी कम तैसी बापू।“

 कलबतिया चाची ने अपने माथे पर हथेली मारी - ”हाय बड़े! तुमने कुछ न सोची। पर गलती नहीं है तुम्हारी। बूढ़ा सुआ और बिर्द्ध आदमी रख की बात भूल जाता है तुम्हें क्या याद होगी अब किड्ढा की महतारी। उसका किया-धरा. ... सुख साके।“

 बापू जम की जात! किड्ढा सामने नहीं पड़ता। उम्मीद ही मुरझाने लगे तो किस हुलास पर टिके आदमी! वह दिन-दिन-भर सियाराम भगत के पास बैठा रहता। सुस्त और अनमना-सा। सियाराम भगत अतंरजामी ठहरे। वे जान गए किड्ढा की मनोकामना। जब-तब रामायण पढ़ते धनुष यज्ञ पढ़ते। किड्ढा को गिनकर छः बार सीता-स्वयंवर सुनाया।

 यह नैन-टैम से नहाने-धोने लगा। सेर-भर निपनिया दूध, मल्सिया-भर दही और आधा सेर गुड़ की दछिना लेकर पहुंचने लगा। तुलसी की माला पहन ली। चंदन का टीका लगाता। भगज्जी का चेला होकर ज्ञान-ध्यान में मन रमाने लगा। किड्ढा भगत रोटी कब बनाए, बापू ने छींके के ऊपर से रोटी की टुकनिया उतार ली-रीती!

 ”रोटी?“

 ”चून नहीं था।“ वह आँगन में तुलसी का बिरवा रोपते हुए बोला।

 भूखा बापू किड्ढा के ऊपर अर्राकर आया, ”भैंचो हरामी! भगत बना डोल रहा है! यह नहीं कि घर में चाखी में सेर-भर नाज पीस लेता। हरम्मा! फलक (छाले) न पड़ जाते हाथों में।“

 किड्ढा ने आँखें मूँद लीं, जैसे भगज्जी मूँद लेते हैं। कहने वाले को कहने दो। तुम ध्यान में लीन रहो, सीता महारानी के ध्यान में।.... तू बक ले बापू! मैं चून पीसने से रहा।

 बापू की बाँहों में लपकन पड़ी थी। आँगन में बिरवा रोपते किड्ढा को झकझोर डाल, ”हैं रे, भैंस का दाना,? घेरा का गोबर-कूड़ा? बर्दों का पानी-पत्ता? पढ़ैनी के कल्सा-कल्सिया?“

 किड्ढा के मन में आया, तड़ाकू से बोले, ”नहीं किया दानी-सानी। नहीं डाला गोबर-कूड़ा। नहीं भरता कल्सा-कल्सिया। बैलों के संग जुतते-जुतते बैल के दर्जे का ही समझ लिया है, बापू बधिया, नपुंसक?“.... मगर किड्ढा बात को पीना जानता है। ज्यादा बखेड़ा करने में फायदा नहीं। लोग कहेंगे, ब्याह के मारे बाप से लड़ रहा है। इस गाँव के बालक बुरे हैं, गीत गा-गाकर गली गुँजा देंगेः ”फूटी तकदीर किड्ढा, नाँय लिखी लुगाई रे!“

 बलीसिंह का बुरा हाल कर दिया था। झुंड बाँधकर गाते थेः

 ”बलीसिंह बाजार से लाया काठ की लुगाई रे,

 काठ की लुगाई से उसने रोटी करबाई रे,

 बर गई आँच, दारी जर गई लुगाई रे,

 फूटी तकदीर बलिया, नाँय लिखी लुगाई रे।“

 बलीसिंह ईंट-डेल मारता था। नहीं मानते, मटक-मटककर गाते। हारकर वह घर में घुस जाता, तो द्वार पर गाते। नाचते। बलीसिंह ने दाँत पीस-पीसकर आगे के चार दाँत घिस लिए।

 सियाराम भगत का बड़ा आसरा है। बार-बार समझाते हैं -”आदमी अगर साँचे मन से अभिलाषा करे तो प्रभो पूरन अवश्य करते हैं।“ किड्ढा ने दीनबुंधु से लौ लगा रखी है। सुनेंगे उसकी विनती। जैसे गज की, ध्रुव प्रह्लाद की सुनी। भगज्जी देवता आदमी ठहरे। उनकी बानी झुठी नहीं गई। बापू चैत के नौदुर्गा उपासा रहा। फिर नगरकोट की देवी की जात्रा पर चल दिया। सियाराम भगत कहते हैं, शुभ घड़ी बार-बार नहीं आती। मानस-जनम एक बार मिलता है।

 किड्ढा ने शुभ घड़ी हाथ से नहीं निकलने दी। मानस-जनम मे ही ब्याह होता है आदमी का। पहले मंगल ही दोनों बैल खूँटे से खोले और मुरसान की पैठ को चल दिया। दोनों का रस्सा पकड़े हुए चल रहा था, पाँवों में कँपकँपाहट-सी लगी थी। अखेल बछड़ों को किड्ढा के चारा-दाना, सानी-पानी अपने हाथों खिला-पिलाकर बड़ा किया था। पाला हुआ जीव और अपना बालक बिछुड़ते समय बड़ा दुख देता है। मोह के मारे बाबरा हो गया किड्ढा। पैठ में जाकर मन बदल गया- नहीं बेचने।

 काले धौरे ने कान हिला-हिलाकर हठ पकड़ ली। वह अपने बर्दों के एक-एक संकेत को समझता है। सवेरे से साँझ हो गई पैठ में खड़े-खड़े। गाहक आए, सौदा करे, वह बेचने न बेचने के हिसाब में उलझ जाए। आसपास खड़े दलाल हँसने लगे।

 बापू कहता है, ”औरत का नशा भाँग-गाँजे, अफीम-दारू से दस हाथ ऊँचा चढ़कर बोलता है। किड्ढा के ऊपर कलबतिया चाची की अनदेखी भतीजी पूरी तरह सवार थी।“

 उसने झटपट सौदा कर दिया। काले धौरे का रस्सा गाहक के हाथ में थमा दिया।

 बैल पीछे देख-देखकर रँभाए - बाँऽऽआँ,बाँऽऽआँ!

 सपने में देखी-सुनी दो पाजेबों की झनकार ने किड्ढा को बहरा कर दिया। बैलों की सूखी आँखों से आँसुओं की धार.... वह होंठ खोल रह गया। मूँछें कँपकँपा उठी.... दस हजार के नोट आज तक न देखे थे उसने। गिनते-गिनते पगला गया।

 घर आया, देखा कि बापू लौट आया है। नगरकोट वाली देवी मइया बापू को हिरदय में नहीं, सीस पर बैठकर आई है। देह में भरी है। वह एक लट्ठ धरे तो दूसरा उठाए। पाँच पट्ठों का बल आ गया है बापू में। किड्ढा की बुरी गत कर डाली। फतूही धोती तार-तार चीर डाली, ”भानजी के मामा, तुझे न्यारी ज्वानी चढ़ी है। लुगाई ने ऐसी मति फेर दी कि खेत के पालनहारे बेच आया! अब? अब जुआ क्या अपने कंधा पर धरेगा? कि लुगाई को जोतेगा? धरती से बड़ी हो गई बैयरबानी?“

 किड्ढा के लिए चाची, भगत के लिए भगवान् की तरह है, बापू के फंदे से उबार लिया। मारते हुए बापू का हाथ पकड़ लिया, बोली, ”बड़े, लुगाई तो तब ही जोतेगा, जब लुगाई ले आवै। और आ जाएगी तो जुआ खुशी से धर लेगा अपनी ‘नार’ पै। मर्द होकर इतना नहीं जान पाए कि घरनी पाकर दस घरों का भार ढो ले जाता है आदमी। पूछो, क्यों? इतना मूरख भी समझता है कि औरत की कमर पर टिकी है दुनिया की धुरी। अकेला पुरिख तो औंधे मुँह गिरे। धरती और सरग की बातें करने लगे! छोड़ो छोरा को।“

 बापू हाँफ रहा था। चाची नरम हो आई, ”बड़े उफन रहे हो। पूछूँगी वा दिना, जब तवे की उतरी, घये की सिकी पनपथी रोटी खाओगे। अरे, आदमी के हाथ का मैल है पसुधन।“

 गोमा-गोमती! किड्ढा की रूपवती दुल्हन!

 उसके घर के उस कोठे में आ बैठी, जहां वह धरती पर पड़ा-पड़ा अकेला पाँव पीटता रहता था सारी रात। कोठा भाटियारखाना लगता था, सन्न-सन्न करता हुआ भूतों का वास! आज उसी कोठे में से बाहर निकलने का जी नहीं चाहता।

 गोमा बैठी है, गुलाबी रेशमी साड़ी में। कभी घूँघट खींच लेती है, अचानक मुँह उघार देती है। बादलों के बीच चंदा की लुका-छिपी बीसियों बार देखी होगी अकेले किड्ढा ने। उसका मनमोर आज पंख-पसार नाचना चाहता है। कभी बिजली कौंधती है तो कभी गड़गड़ाहट।

 ”आले-दिखालों में क्या टटोल रहा है रे?“ बापू की आवाज।

 ”खुरपी-फाबड़े।“ किड्ढा के मुँह से निकला।

 गोमा की हँसी ऐसे छनछनाती हुई फूट-निकली, जैसे काँच की चूडियाँ बिखेर दी हों। नारंगी की फाँक-से होंठ हँसे। किड्ढा के मन में रंग बिखर गए। नुकीली ठोड़ी पर एक बूँद गड्ढा पड़ा। उसकी इकलौती आँख पलक झपकना भूल गई। जुन्हैया-भरी रंगत घूँघट में छिपे चेहरे में से छिटक रही है, ध्यान में डूबे बगुला की तरह खड़ा है वह। शीश पर चाँदी का बोल्ला, नाक की सुनहरी लौंग, पाँवों में छमाछम पाजेब। किड्ढा के पास ले-देकर एक आँख। ज्यादा तिरपित होना भी प्यास बढ़ाना है। बापू की फिर वहीं हुंकार! किड्ढा चैंक पड़ा।

 ”जनानिया बहू का चेला हो गया है। पाँवों पर महावर धर रहा है या माथे पर बेंदी लगा रहा है? लुगाई के गुलाम, माँग-पट्टी करता रहेगा? पल्लू से बँधा रहेगा? लुगाई ले डूबेगी।“

 भैंस को पानी पिलाने गया था। क्या बताए बापू को कि पोखर के पानी में भी गोमा की छवि। हँसती हुई गोमा। गोमा की हँसी का दास है वह। टेढा होंठ करके हँसती गोमा का.....

 चाची न होती तो बापू जरापट... (जलन) के मारे हाथ छोड़ बैठता उसके ऊपर। चाची को बात साधना आता है। तनिक फटकारती हुई-सी बोली, ”अय बड़े! तुम्हारे मगज में जरा-माँकरे (जाले-मकड़े) लग गए हैं। अपनी याद भूल गए! लोग कहते थे, तुम किड्ढा की महतारी के पाँव धो-धो पीते थे। और आज भी, कहो चाहे मत कहो, आँगन में जनानी धोती सूखते, मोरी में ताजा पानी बहते देखकर तुम्हारा मुख दिपदिपाने लगता है। ऐसे ही नहीं खाँसना-मठारना सीख गए?“

 चाची की बात ईसुर का पैगाम। किड्ढा अच्छर-अच्छर पालन करेगा। ”कच्ची उमर की है रे गोमा, छोरा! छेड़-छाड़ मत करना रे अभी। खुराक देगा तो साल-भर में देह पकड़ लेगी।“

 गिरी-छुहारे की खीर-खिलाकर पाला है गोमा को। भैंस के लिए चरी-चारा न हुआ तो मेंड़-मेंड़ घास खोदी है उसने। खाली-बिनौले जुटाए हैं, पर कन्नी उँगली से नहीं हुआ। रस्सा कसे रहा अपनी इच्छाओं पर। वह तप करना जानता है।

 बिना बैल का किसान, बेहथियार सिपाही दाखिल ठहरा।

 पौहे-ढ़ोर के मामले मे उधारखाता भी कितने दिन चले?

 खेत आध-बटाई पर उठा दिया।

 एक साल। दो साल।

 पूरी खेती गाहने-उगाहने वाला आधी फसल पर कैसे संतोष कर ले? आधा अनाज खाए कि बेचे? और जिस घर में दुल्हन की चूडियाँ छनकती हों, वहां नित रोज के खर्चे। तीज-त्यौहार, मायका-पीहर, लिबउआ-चलउआ, कपडा-लत्ता, गहना-गुरिया के अलावा गृहस्थी के सत्तर सामान।

 पहले की बात और थी, बाप-बेटा अकेले ठोकते-खाते थे। सारे दिन किवाड़ बंद रहते थे। गली का कुत्ता भी मुँह फेरकर दूसरे घर की राह लेता था। गोमा के आते ही रिश्तेदारी जाग उठी। मोहल्ला-पड़ोसी आने-जाने लगे। बसी देहरी की महिमा न्यारी है, अपनी आँखों देख लिया किड्ढा ने। जीजा, मौसा, फूफा, मामा! तमाम अपने ही अपने।

 पर बैलों का देवाल कोई नहीं। किसनगत के चलते कौन अपना काम हदक करे?

 बलीसिंह कहता है - अकल की सोचो।

 क्या सोचे अकल की? अकल क्या बर्द बनकर खेत जोत लेगी?

 ”खेती तो बर्द ही जोतेंगे। अपनी खेती जोतकर मेरी मदद करा दिया करना, बस। गंगाराम भइया से तो अब उम्मेद नहीं।“

 नेकी और पूछ-पूछ! आज किड्ढा के चबूतरा पर सिंहासन धरा होता तो उस पर बैठा देता बलीसिंह को। मँझधार में से उबार लिया। इस काली देह की भीतर मन इतना ऊ़जरा! देवता निकला बलीसिंह।

 गोमा मुँह देखकर ही बता दे कि किड्ढा के मन में क्या है?

 ”आज कौन-सा काम बन गया?“

 ”भई मान गए बलीसिंह को।“ उसने सारी बात बता दी।

 ”हद्द है तुम्हारी! पड़ोस में रहते आदमी को नहीं पहचाने। तुम्हारे दरियाब डोरिया कुनबा-खानदानी बनते हैं, पर काम पड़े पर फिस्स! बापू तक ने माँग लिए बर्द।“

 बलीसिंह का कलेजा बहुत बड़ा है, आधी रात खोल लाओ बैल। यही नहीं, काम कीं कोई चीज उठा लाओ।

 गोमा होंठ तिरछा करके हँसती है। बोली, ”लेना-देना इकतरफा चलता कहीं? कोई सिंवाई में समझे, कोई ब्यौंताई में। दोनों बर्दों की चराई नहीं करते तुम? अपने काले धौरे के खूँटा पर बाँधे हो तब न अपने मालिक का खूँटा भूल गए। नेकी में तुमसे बढ़कर बलीसिंह दाऊजी नहीं।“

 गोमा की तिरछी मुस्कराहट पर मर मिटा किड्ढा। चिंता-फिकर क्या होती है? आलस-थकान, हुँह! कलबतिया चाची झूठ नहीं कहती-किड्ढा, तैने गंगा में जौ बोए हैं। सियाराम भगत भगवान् की दया मानते हैं कि ऐसी अप्सरा बहू, वह भी इतनी कदर जानने वाली! किड्ढा ने मूँछें ऐंठ-ऐंठकर तार-सी सीधी कर लीं। खेती-किसानी उसके मुकाबले कौन कर सकता है इस गाँव में! पंद्रह साल की उमर से हल चला रहा है। खेत बो-काट रहा है। बापू जवानी मे ही बूढ़ों की तरह हुक्का गुड़गुड़ाना सीख गया था। जिसका बेटा एक दिन में छः बीघा खेत अपने हल-बैलों से पलट डाले, वह पंचायत ही करेगा बैठा-बैठा। आज भी उसे फुरसत नहीं। जुताई-बुआई, पटेला-सिंचाई। किस काम को छोड़े, किसे पकड़े? किसान का जीवन-काम का दूसरा नाम।

 वह सपने में हल की मूठ पकड़े हुए, बैलों को पैना से तिक-तिक, तिक-तिक हाँकता है।

 ”हैऽऽअ, क्या बर्रा रहे हो?“ किड्ढा के कान के पास महीन आवाज गूँजती है।

 वह खेत में से ‘सुरग सेज’ पर लौट आता है - गोमा की हँसी। किड्ढा लहरों में कूद गया।

 अचानक लहरें तपने लगीं। पानी खौलने लगा। गोमा गज-भर की लाज मारे चूल्हे पर झुकी रहती है-गरमी के मौसम में डबल काम! धुएँ में तप-तपकर जुन्हैया फीकी! गोमा का मुख मुरझा जाता है। यह सुख कहा जाएगा? मगर गोमा की मनमोहिनी हँसी! ”तुम मेरी फिकिर न करना। किसी के बैल-बर्दों का अहसान क्यों ले हम? सो डबल खेती जोत देते हो तुम, और दोनों छाक की रोटी कर देती हूँ मैं। बेसक दाऊजी का मन करे तब तक खाएँ। एक आदमी का पेट क्या भारी है चढ़े चूल्हे पर? सब तरह से उतारेंगे उनका किया हुआ।“

 ”बापू को देखा है गोमा? इकलखुरा ठहरा। किसी को देखकर सिहाता नहीं।“ गोमा तवे पर रोटी डाल रही थी। झीने घूँघट में ही मुसका दी। ”बूढे़ आदमी की बात का क्या असर लेना? क्या बुरा मानना? अरे, वे हटका-बरजी न करें तो बड़े बूढ़े काहे के! फिर बापू क्या जानते नहीं कि दाऊजी के बर्द....“

 किड्ढा हाथ में रेाटी का गस्सा (कौर) पकड़े रह गया। यह वही गोमा है, जो कल तक अपने दूध के दाँत उखाड़कर मूसे के छेद में डालती फिरती थी! कैसी चतुराई की बातें करने लगी है! कलबतिया चाची की बात सोलह आना साँची है - गिरिस्ती का वजन आदमी को सालों में, तो औरत को महीनों मे बूढ़ी कर देता है।

 गोमा जिम्मेदार हो गई है। घर माया में मगन है। सवेरे मुँह अँधियारे ही चैका-चूल्हा लीप डालती है। पानी भर लाती है। कागा बोले तब तक तो कंडा सुलगाकर तवा चढ़ा चुकी होती है। असली घी के ‘परामटे’ सेंककर धर देती है। फिर दही बिलोना, भैंस-बर्दों के सानी-खड़ैरा।

 दो काँसे की थालियाँ। दो फूल के कटोर। किड्ढा के बराबर में बलीसिंह का आसन गोमा का मुसकाता चेहरा आँगन झिलमिलाता है।

 बलसिंह ने भी नहीं देखी ऐसी झिलमिलाहट। वह चकित-सा निहारता है। शरमीला है बलीसिंह। नीचा मुँह करके खाता रहता है।

 दो चंचल आँखें घूँघट में नाचती हैं। रोटी सेंकते, बरतन उठाते, पानी के लोटे भरते, रेशमी कलाइयों की चूडि़याँ छनन-छनन बाजती हैं। गामा की पैंजनी की झनकार पर बलीसिंह की कनखियाँ उठती हैं।

 ”दाऊजी मौनी महातमा ठहरे। ध्यान न राखो तो भूखे उठ जाएँ।“ गोमा की फिर तिरछे होंठों वाली हँसी! किड्ढा की उठती भौंह में बल पड़ते-पड़ते रह गया। ”अरे यह तो पाँत-पंगत तक में नही जाता। तुम्हारे हाथ में जादू है। क्या मिला देती हो रोटी-साग में?” क्या बोलना चाहता था, क्या बोल गया! गोमा उसकी मूँछों को देखती रह गई। शरारत-भरी इकलौती आँख तो मँूछों के ऊपर चिलकती रहती है। ”चलो, रहने दो। तुम्हें चुहल सूझती है। पर अब इन्हें गंगाराम रोटी देने वाला नहीं। खेत बाँट लिया, चूल्हे में साझेदारी कौन करने देगा।? दाऊजी हैं तो सूधे। बापू की चिलम भरें, खाट बिछाएँ, गोड़ दाबें।“ फिर महीन हँसी।

 डोरिया का घड़ी-घड़ी चिलम भरने आना गामा को सुहाता नहीं। वह कडुआ मुँह बनाकर बोली, “लुच्चा आदमी की आँख ही अलग होती है। हम क्या जानते नहीं? घर-घर चूल्हें नहीं, कि आग-धुआँ नहीं। मानसिंह के बाबू को बरज लेना, गैल-घाट बाँह भिड़ाए बिना निकलेगा नहीं। पाँच-छः बेर परचा चुकी हूँ।“ किड्ढा ने बाबू से बोलचाल बंद कर दी। औरत को तीगने वाले आदमी से हेलमेल अच्छा नहीं। बापू समझा चुका है यह बात।

 बलसिंह खुद नहीं देखता बाबू की तरफ। किड्ढा को एक सुझाव दिया उसने, ”यार, असल जड़ है पीपल वाले कुएँ पर पानी भरने जाना। बहू-बेटी को हर बुरी-भली नजर के नीचे से गुजरना पड़ता है। गाँव के तो गाँव के, आनगाँव के रसिया प्यासे बटोही बन, पस (अंजुली) आगे कर देते हैं। मेरी माने तो हैंडपंप लगवा ले।“

 किड्ढा के आँगन में खुदाई होने लगी। हत्था पकड़ते ही पानी की धार! पर बाबू हर नए काम का दुश्मन है, टाँग अड़ाए बिना मानेगा नहीं। वह भी बलीसिंह के मुँह से निकली बात.... चारा काटने वाली मशीन लगी थी तब भी बिदका था। और अब-

 ”पइसा चूरन कर रहा है फालतू में। बहू पानी नहीं भरेगी तो क्या गद्दी करेगी? किसान की बेटी है। बैठ-बैठ देह माटी हो जाएगी।“

 गोमा कहती है, बापू की बात का मलाल क्या मानना? दरियाब की बहू सरसुती ने अमुही-समुही वार किया है गोमा पर।

 खसम की एक आँख पर सबर किया है तो ‘कल’ का पानी तो पिएगी ही। लाड़ली है काने की। गाड़ी-भर रूपया फेंककर लाया है। बाप ने डलिया में धरकर बेची और गरब देख लो पटरानी पùिनी जी का.....“

 गोमा के मुख में जीभ है, सुना दी - ”हमारा आदमी हमारे लिए। छछूँदर लुगाइयों के पेट में काहे को सूल उठ रहे हैं? किसी सौतेला के दीदा नहीं माँगे उधार का।“

 सरसुती के हाथ की उँगलियों का घूँघट उठाया और क्रूर होंठों से चिल्लाई, ”दीदा क्या करेगी माँगकर? दीदा लड़ाकर लूट लिया बलीसिंह। खेत में खेत दे लिया बिचारे का।“

 गोमा के गुस्सा का आरपार नहीं, ”फस्सा पेला, तेरी मौसी नहीं भाग गई दर्जी के संग। तुम्हारे खसम-पूत मरें। कलेजा खाक हो रहा है तो पोखरिया में डूबक मारो।“

 ”हम काहे को डूबक मारें? तूने बेची है हैया-सरम, तू मार।“

 ”ज्यादा मत बोलियो। होनी होगी सो हो जाएगी। चटक छिनार!“

 गोमा के मुँह से निकली ‘चटक छिनार’ सरसुती के लिए ही नहीं, इस रस में शामिल हुई मोहल्ले-भर की औरतों के लिए नई खोज थी। एक-एक करके सबने जुगाली-सी की-चटक छिनार।

 तिरछी मुसकान पर निछावर हो जाता है किड्ढा। वीरता के साथ लड़ी इस लड़ाई पर उसका दिल बाग-बाग है। कलबतिया चाची जौहरी से कम नहीं, कैसी रतनार खोजकर बड़ी-बड़ी मूँछें सहलाईं।

 गोमा बरोसी में कंडे सुलगा रही है। हाथ तेजी से फोड़ रहे हैं कडे। एक छिन रूककर बोली, ”सुनो, अब तुम मेरी मानो तो फूस के छप्पर की जगह बरामदे के ऊपर लेंटर गिरवा दो। और बरसाती नाली छोड़ना इन बैरिनों के दरवाजे की ओर। दाऊजी से हाथ जोड़कर कह देना, पाई-पाई चुका देंगे उनका खेत जोत-बोकर।“

 दाऊजी अरहर की दाल नहीं खाते। गोमा ने पूरी की पूरी अरहर बाजार में बिकने भेज दी। मूँग की बडि़याँ रूचती हैं उन्हें, गोमा तीसरे दिन मूँग की दाल भिगोकर पीस लेती है। मसालेदार साग बनाने में गोमा के जोड़ की कोई जनी नहीं, दाऊजी दस बेर यह बात कह चुके हैं।

 हत्तुम्हारे की। बैंगन का साग कौन खाएगा? बलीसिंह टमाटर की पौध ले आया। जानता है, गोमा ने बैंगन त्याग रखे हैं।

 दाऊजी की पंचबीघा बोंहडी में आलू अच्छे होंगे। गोमा जानती है।

 सचमुच गोमा की जीभ पर सरसुती का वास हैं आलूभरी बैलगाड़ी देखते-देखते खाली होती इगलास की पैठ में। बैल बेचने के बाद खनन-खनन रुपया दबा आया किड्ढा की अंटी में बड़ी-बड़ी काली मूँछों में लहरें उठती हैं। ”दाऊजी से कहो, खाँसकर चढ़ा करें देहरी। फिर कहेंगे, गोमा आड़ नहीं करती।“

 किड्ढा गोमा की सुरीली गोली के हाथ बिका है। न चाहकर भी कहना पड़ा। मानसिंह का बाबू आज तक शिकायत करता है-सालों बीत गए गोमा भाभी का मुख नहीं देखा। मेला-दशहरा मिल जाएँ तो पहचानेंगे नहीं। बलीसिंह गोमा के कहे का बुरा नहीं मानेगा। उसे आड़ मरजाद तोड़ना पसंद नहीं।

 ”खेत कट रहे हैं। दाऊजी को चैत के महीने में जूड़ी ने धर दबोचा।

 साबूदाना बनाऊँ कि रोटी करूँ? साग राँधूँ कि चाह बनाकर दूँ। तुम खुद अकेले. ....“

 ”नहीं, अकेला कहाँ, चार मजदूर लगा दिए है। बलीसिंह ने।“

 ”मजूरों की बात छोड़ो। पीछे-पीछे न डोलोगे तो खाक न करके दें। वो ही बीड़ी-चिलम का बहाना। पिछियाए फिरो। एक और इल्लत।“ गोमा के सुदंर मुख पर झुँझलाहट है।

 चार मजूरों के लिए चार हँसिया भी तो चाहिए। किड्ढा द्वार पर खड़ा गोमा को आवाज दे रहा है।

 वह आँगन में आ गई। हँसिया उठाकर घूँघट डालती हुई बाहर। पोलका के सारे बटन खुले हैं.....

 किड्ढा की इकलौती आँख बड़ी जिद्दिन है, खुली रह गई।

 गोमा ने अपनी छाती पर नजर डाली। पल्ला ढक लिया। मुसकरा दी।

 ”बीमार आदमी घर में पड़ा हो, तो दूसरों को पागल बना देता है दौड़ा-दौड़ाकर। नहाने जा रही थी अब। कभी दूध दो, कभी पानी दो, कभी दबा पिबाओ।“

 किड्ढा को सियाराम भगत की बात याद आ गई। पाप-संका नहीं लाना कभी मन में। पाप-संका रामचंद्र जी ने करी थी सीता माता पर। सीता धरती में समा गई।

 नहीं, नहीं। माफी देना, छिमा करना प्रभो, मैंने पाप नहीं विचार। बलीसिंह बेचारे का हमरे सिबा है ही कौन? गोमा टहल न करेगी तो कौन करेगा? किड्ढा पसीने से तरबतर हुआ जा रहा है। नाक में से भट्ठी की सी झार...

 तुम पसीना-पसीना हो रहे हो! दो पल बिरमा लेते। लस्सी मठा ही पिए जाते सक्कर डालकर। कतीरा डाला था कोरे मल्सा में तुम्हारे लिए। चीनी मँगा ली थी बजार से। गुड़ की सक्कर नहीं सुहाती कतीरा में। सुनो! इतनी फाँय-फाँय ठीक नहीं। माँदी-बीमार गिर जाओगे तो हम तो कहीं के न रहेंगे। दाऊजी तो अपने घर चलते बनेंगे।“

 चिनगारियों की छींटे पड़ रहे हैं ठंडै पानी के। अगन की लपट मंद हो गई। अपनी औरत अपनी ही होती है। उसने नीचे की ओर झुकी हुई मूँछों को अँगूठा और उँगली की मदद से बटा रस्सी की तरह। आतमा में पड़ी ऐंठन ढीली हो गईं।

 जिस साल बापू मरा, उसी साल पीलिया ने धर दबोचा उसे।

 बापू बेईमान दो दिन के बुखार में ही छोड़कर चला जाएगा, क्या जानता था किड्ढा। गोमा हिम्मत देती रही। वह बाप की याद में आधा हो गया, कुछ पीलिया ने झटक दिया।

 बुरा हो ककरेठिया वाले बैद का, पीलिया की दवा कहकर न जाने कौन-सी रूखरी घोट-पीसकर दे दी कि किड्ढा किड्ढा न रहा।

 जो देखे, सो देखता रह जाए। जैसे वह कोई अजूबा हो।

 गोमा बावरी-सी बोली, ”ऐना देखा है तुमने?“

 ऐना काहे को देखूँ मैं?“

 ”अरे, तु देखो तो सही.... किसी ने कुछ कहा नहीं तुमसे?“ उसने अपने ब्याह वाला शीशा थमा दिया।

 किड्ढा ने बहुत दिनों से अपनी सूरत शीशे में नहीं देखी। उस दिन से, जब एक बार उसकी सगाई तय होने जा रही थी। तिलक का रूपया हाथ पर धरा जा रहा था। अचानक लड़की का भक्क-भूरा। जीजा चिल्लाया-”अजी इस ‘आँखूवली से ब्याहेंगे हम अपनी चंदा-सी साली। आप लोगों के पास रकम नहीं है तो मैं देता हूँ। चलो यहाँ से। लड़के का नाम क्या है - किड्ढा! हा हा हा हा! किड्ढा!“

 वे चले गए। किड्ढा दोपहर से साँझ तक पोखर की पार पर बैठा रहा। जल में झाँक-झाँककर अपना चेहरा देखता रहा। किसी को भी अपनी सूरत बुरी नहीं लगती। उसे भी नहीं लगी। अलबत्ता उस दिन के बाद अपना अक्स देखने की हिम्मत नहीं पड़ी कभी।

 कलबतिया चाची के पास बहुत रोया था वह, ”चाची, मेरा नाम किसने रखा- किड्ढा! किड्ढासिंह!“

 चाची ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,”बेटा, तेरा नाम तो किरोड़ीसिंह था। पर इस गाँव के आदमी नाम बिगाड़े बिना बोलते कहाँ हैं? मेरा नाम सूधा है - कलावती। पर कहेंगे कलबतिया। इनके सत्यानास जाए।“ किड्ढा की नुकीली तनी हुई मूँछ उसी दिन का संकल्प हैं।... पर आज जो गाज गिरी है! वह सूरत देखते ही ऐसा चैंका ज्यों करतें साँप पर पाँव पड़ गया हो।

 दरपन आँगन में दे मारा। झन्न-झन्न.... सैंकड़ों किरचें फैल गईं। गोमा उठी और आँगन में बिखरा काँच झाडू से सकेरने लगी। किड्ढा भावशून्य-सा बैठा रहा। इकलौती आँख में भी जैसे पुतली नहीं, पत्थर जड़ा है। अंधी हो गई। शीशे में देखा अक्स, नजर में नहीं। मन मे पैठ गया। काली छाया तनी है नजर के समाने। स्याह हो गए चेचक के दाग। इंधरिया छा गई मुख पर। अचानक दोनों कोयों में जल भर आया। बेनजर आँख भी रो रही है....

 आँखूवली!

 गोमा जार-जार रो उठी, ”भगवान् कैसा अन्यायी है! सूधे आदमियों के नसीब में दुख लिखा देता है। इससे अच्छा होता कि मैं.....“ किड्ढा ने गोमा के होंठों पर हाथ धर दिया - ”बाबरी!“ गाँव में एक बात अनेक रूप धरकर फैलती है। हींग के छौंक की तरह इस मोहल्ले से उस मोहल्ले तक पहले दिन उड़ी कि किड्ढा ककरेठिया के बैद के पास पीलिया की नहीं, मर्दानगी की दवा लेने गया था।

 दूसरे दिन दरियाव वाली गली में सुनाई दिया, बलीसिंह का यार है ककरेठिया का बैद, किड्ढा को जानबूझकर रूखरी दी है कि उसका रूप-रंग बिगड़ जाए।

 तीसरे दिन और कुछ..... गोमा हाथ पीट-पीटकर राह चलती औरतों को सुनाने लगी- ”अरे, कोई किसी का संग दे तो आतमा पजरती हैं लोग-लुगाइयों की। मैं तो कहती हूँ, नास कर देवी मइया कुढ़ने वालों का। नौदुर्गा के नौ दिन लौंग खाकर बरती रहँूगी।“

 किड्ढा गोमा को बाँह पकड़कर भीतर ले गया,”तू काहे को अपना गला दुखाती है। गाँव के लोग पागल हैं ससुर।“ किड्ढा की आँख नहीं, मूँछ दीख रही है गोमा को।

 गोमा जब शांत हो गई, उसकी हँफहँफाहट थम गई, तब किड्ढा ने खाट पर बैठकर समझाया, ”अज्ञानी लोग क्या जानें? विपता में संग देने वाले को सियाराम भगत भगवान् का रूप मानते हैं। मैंने बलीसिंह को अपनी हारी-बीमारी में भगवान् के ठौर पाया है। कंधे से कंधा मिलाए खड़ा रहा है तकलीफ में। सगा भाई तक नहीं करता इतना। हाँ!“ कहकर मूँछें सहलाने लगा किड्ढा गोमा रूआँसी होकर बोली, ”ककरेठिया के बैद की अच्छी तरह धुनाई कर आए हैं दाऊजी। रपोटा-रपाटी भी हो रही बताते हैं। उन्होंने कह दिया-परवाह नहीं। चार बीघा खेत बेच डालेंगे। दरोगा को घूस ही तो भरनी है। लड़ लेंगे मुकद्दमा-कचहेरी।“

 किड्ढा ने घर से निकलना छोड़ दिया। गाली के बालक झुंड बाँधकर पीछे-पीछे हो लेते हैं। एक-एक आदमी चार-चार सवाल करता है -किस बीमारी की थी रे रूखरी? पीलिया था भी कि नहीं? काला मुँह ठीक होगा भी? गोमा पास आने देती है कि..... खीं खीं खीं खीं, हा हा हा हा!

 सियाराम भगत न हों तो किड्ढा पागल हो जाए। उन्होंने ही समझाया था-”आदमी को जी छोटा नहीं करना चाहिए। प्रभो दीन-दुखियों के साथी हैं। एक द्वार बंद होता है तो वे दस द्वार खोल देते हैं।”

 ऐसी ही बेला में मालूम हुआ कि गोमा गर्भ से है।

 किड्ढा को कब विश्वास होने वाला था!

 गोमा कमजोरी के कारण हलके से हँसी, ”तुम तो बाप बन जाओगे तब भी पतियारा (विश्वास) न करोगे। ऐसे सूधे आदमी भी क्या....“

 किड्ढा की खुशी का ठिकाना नहीं। सच नहीं लगता। ऐसे ही हो जाती हैं मुरादें पूरी। इतर-पितर निहाल हो उठे होंगे। बापू होता तो सोहर गाने लगता। बाज ही एक भैंस खूँटे पर ला बँाधता- गोमा के नाम की। दूध-घी की नदियाँ बहा देता आँगन में। काम.... अरे, फली के दो टुकड़े न करने देता। पलंग पर बिठाकर रखता पटरानी की तरह। बापू, तेरे भाग में नहीं था न नाती का मुख देखना? बलीसिंह बार-बार किड्ढा को बरजता है- ”गोमती के कसाले का काम न कराया कर। गोबर-कूड़ा डालने की क्या जरूरत है? हम बैलगाड़ी में भरकर डाल देंगे एक बार में। रोटी तीन टैम नहीं, एक बखत बहुत है। ठंड़ी-सीरी खाने में हमें क्या एतराज?“

 किड्ढा के माथे पर बल पड़ गए। इकलौती आँख के नीचे फड़कन..... कलबतिया चाची कहती है- ”गोला का बीज और मिसरी की डली खाया कर गोमा! शर्तिया बेटा होगा।

 किड्ढा की आँखों में घुटनों के बल चलता नन्हा बालक! वह गोमा के छोटे बच्चे की तरह लाड़ लड़ाता है। बलीसिंह इगलास गया था। कहता है, मेवा और चीनी लेता आया हूँ। चाची हलुहा बना दिया करेगी। किड्ढा ने अपनी साइकिल में ताला लगा दिया।

 चाची एक बात और बोली, ”ऐसे में खट-मिट्ठी चीज खाने को मन चलता है रे किड्ढा।“ वह इगलास जाकर इमली-अचार ले आया। इमरती-जलेबी अँगोछा में बाँकर लाना न भूला।

 किड्ढा को गोमा की फिकर है, पर गोमा को घर-खेतों की। दाऊजी वाले पाँच बीघा में सरसों बोना नहीं भूलना। अपने सात बीघा में गेहँू। दो बीघा वाली बोंहड़ी में तो अबकी बेर मसूर डालना, अच्छे भाव बिकेगी। और खेतों की दाऊजी से पूछ लेना, वे जानकार हैं। बन-कपास किस खेत में बोया जाएगा? दाऊजी के पटनियाँ बारे में।“

 खेत-क्यार नहीं सूझते इन दिनों, किड्ढा का मन गोमा को पेट में बढ़ते बच्चे से लगा है। मन में बार-बार एक शंका उठती है। वह छिपा जाता है। गोमा से पूछने ही हिम्मत नहीं होती। उसने मौका देखकर चाची से पूछा लिया, ”चाची, बालक का रंग मेरे मुँह की तरह हो गया तब?“

 कलबतिया चाची चिल्लाकर पड़ी, ”चल मिट! तू क्या काला था? रूखरी ने बदल दी तेरी रंगत। सत्यानास जाए ककरेठिया के बैद का।“

 डोरिया बाबरा है ससुर। कहता है, किड्ढा के घर काला कौआ जनम लेगा। काला कौआ.... है चाची?

 गोमा ने बीच में ही बात काट दी, ”कहने वालों को गोली मारो। हमारी सुनो, दाऊजी कह रहे थे, खेती इस बालक के नाम करेंगे। उनके और है कौन?“ किड्ढा की इकलौती आँख फैलकर दोगुनी हो गई। वह अपनी मूँछ नोचने लगा।

 ”भूल ही गई एक बात तो। वे कहते थे, गोमती को एक दिन चलकर इगलास की डाकधरनी को दिखा दो। गाँव की दाई तो निपट मूरख.....“ गोमा की आँखें चमकने लगी। चेहरे पर हुलास छा रहा है। किड्ढा के मन में ऐसी लपटें उठीं कि तन-मन झुलसने लगा। साँस गहरी, और गहरी हो गई।

 ”नहीं जाना इगलास-फिगलास। कहाँ की लगाई डाकधरनी? चाची बहुत कुछ जानती है। जिसे दिखाना होगा, दिखा देगी।“

 गोमा बोली तो कुछ भी नहीं। सारा दिन पड़ी रही। रोटी खाई, न पानी पिया। वह घबराने लगा। बच्चा को कुछ हो गया तो? गोमा ने ऐलान कर दिया, उससे कोई न बोल।

 कितनी बार कोठे में गया। कितनी बार निकल आया। अंत में गोमा का पाँव हिलाते हुए बोला, ”उठ रोटी खा ले। भूखी रहेगी तो बालक ..... चाची कहती है, पेट वाली औरत को निरजल नहीं रहना चाहिए। बच्चा बिलबिलाता है।“ गोमा बहुत देर गुस्सा नहीं रह सकती। किड्ढा की आँखों में आँखों डालकर बोली, ”मर जाने दो बच्चा को। मर जाने दो मुझे। तुम्हें क्या? अपनी बीमारी में तो दाऊजी कहाँ-कहाँ नहीं नचाए थे और मेरी बेर को....?“ उसने गुस्से से भौंहें तरेरीं।

 किड्ढा का मन मोम का बना है। गोमा का मुख हथेलियों के बीच लेकर बोला, ”खेत की किरिया-किरिया बेच डालूँगा तेरी खातिर, हाँ!“ और अपनी मूँछ सहलाने लगा धीरे-धीरे ।

 थोड़ी देर बाद देखा, गोमा धोती पहनी है। आँगन महक रहा है, खसबोईदार तेल डाला है । और, और नई चप्पल पहने चली जा रही है। बलीसिंह के पीछे-पीछे। घूँघट वाली बहू-गोमा है? किड्ढा को एक पल विश्वास नहीं हुआ। चाची आकर बोली, ”इगलास गई है डाकधरनी को दिखाने।“

 गोड़ टूट गए किड्ढा के। खड़े होने तक की गुंजाइश नहीं रही। सारा दिन खरहरी खाट पर पड़ा रहा। भूखा-प्यासा, पेट में घुटने दिए। साजी और फूटी दोनों आँखों खारा पानी बहाती रहीं। अनेक सपने देख डाले, अनेक इच्छाओं को साकार करता रहा।

 वह डंडा लेकर चला जा रहा है पीछे-पीछे। ऊसरा में पकड़ लिया है बलीसिंह को। मार-मारकर पछाड़ डाला। साला आस्तीन का साँप! इगलास के सरकारी अस्पताल में घुस गया। डाकधरनी के ऐन सामने से चुटिया पकड़कर घसीट लाया गामा को। साली! माँ मरी धिय को, धिय मरी धींगरों को!

 धतूरे के बीज पीस लिए हैं सिल पर। चून में मिलाकर माँड़ लिए। रोटियाँ बला लीं। बापू बलीसिंह की थाली में रोटियाँ परोस रहा है। बली सिंह सबकी सब रोटियाँ खा गया। वह बेहोश हो गया। मर रहा है बलीसिंह। गोमा रो नहीं रही। चुपचाप देख रही है।

 किड्ढा हड़बड़ाकर उठा बैठा। इधर-उधर देखा। गोमा कहीं नहीं। उसके होंठों के कोनों से लार की धार बह रही है। नींद नहीं, झपकी लगी थी उसे। झपकी में ही आते हैं आधे-अधूरे सपने।

 किड्ढा पागल हो गया था उस दिन। गोमा आई, उसकी गर्दन दबोचते हुए बोला, ”जा साली! यहाँ काहे को आई है? निकल मेरे घर से।“ बलीसिंह भीगी बिल्ली की तरह न जाने कब खिसकर गया। फिर कई दिन तक नहीं आया। वह गोमा का ताबेदार है। हुकुम मानेगा नहीं? मगर किड्ढा को चैन है। भरपूर नींद में सोता है। कोई छटपटाहट नहीं।

 गोमा ने पाजेबें उतार दीं। चूडियाँ छनकती नहीं। एडियाँ पीली और खुददुरी। चेहरा रोया हुआ। बिना बिन्दी के सूना माथा। किड्ढा से बोलना तो दूर, उसकी ओर देखती तक नहीं। पड़ी रहती है कोठे में, धरती पर दरी बिछाकर। उसका मन हुआ, गालियाँ दे। उठाकर पटक दे गोमा को। साली शोक मना रही है? चूड़ी-बिछिया फोड़कर रो रही है! मर गया है क्या तेरा खसम? राँड़ हो गई? तिरिया चलित्तर! पड़ी रह भूखी-प्यासी। देखें कितने दिन चलेगा तेरा स्वाँग?

 ....लेकिन तीन दिन भी नहीं बीते। गोमा का दुबला पीला मगर तना हुआ मुख उसे भीतर से तोड़ने लगा। यह सब क्या कर डाला उसने? गोमा ने ऐसी खता कर दी? बच्चा पेट में है, बिलबिलाता होगा। अन्न-पानी त्यागे पड़ी है गोमा। डाकधरनी ने क्या बताया, उसने पूछा नहीं।

 कैसे कहे कि तेरे बिना नहीं रहा जाता गोमा। घर मसान-सा भयावना... धीरे के पास आ बैठा। हिम्मत करता रहा कुछ देर। शायद गोमा भाँप गई है कि वह ....उसकी पीठ हिलने लगी। गोमा रो रही है? नामालूम-सा हाथ का परस किया गोमा की बाँह पर - ”उठ गोमा!“

 गोमा ने हाथ झटक दिया। वह कटे तने की तरह ढ़हने लगा। भीतर की नसें, देह की मसें टुकड़े-टुकड़े होने लगीं। मन मे आया, दहाड़ मारकर रोने लगे। घिघियाए-मुझसे बोलना न छोड़ गोमा! गालियाँ दे। लड़। कपड़े फाड़ दे मेरे, पर मुझसे बोल। बात कर। नरम होंठों से हँस। उदास मत हो। तेरी तिरछी मुसकान...!

 मगर वह कह कुछ भी नहीं सका। गोमा के पाँव पकड़ लिए। वह फफक-फफककर रोने लगा।q किड्ढा को नहीं मालूम कि वह उसकी तिरछी मुसकान से खिल उठता है या उसे रोती देखकर पिघलकर बहने लगता है। दोनों ही दशाएँ एक-सी हैं। ऐसी दोनों ही घडि़यों में उसे लगता है, वह गोमा को अपनी बाँहों में भरकर छाती से लगा ले। खूब प्यार करे। संसार की हर चीज उसके पाँवों में डाल दे, जो कुछ भी वह चाहे। जिस कुछ की वह इच्छा करे।

 पाँवों से होता हुआ हाथ गामा के कंधों पर आ गया। वह दरी पर लेटी थी। किड्ढा ने जतनपूर्वक उसे अपनी बाँहों में लिया। बचाते हुए समेटा कि कहीं पेट में बच्चे को नुकसान न पहुँचे। गोमा देख ले कि वह अकेली नहीं रो रही, एक नदिया किड्ढा की आँख में से भी बहती चली जा रही है।

 बलीसिंह के पास जाकर बोला, ”माफी दे दे भाई! मेरा मगज ही फिर गया है।“ बलीसिंह को लिवाकर आया, फिर गोमा को उठाया। आज बहुत दिनों बाद रोटी बनाई। गोमा के लिए थाली परोसी। अपने हाथ से खिलाने लगा। नहीं खा रही थी तो बोला, ”बलीसिंह तू कह देख, तेरे कहने से खा लेगी।“ किड्ढा अपनी मूँछें खुजाने लगा।

 खेत पर रहा करेगा आज से। बहुत ताका-झाँकी करने लगा है-पाप-संका! नरक होगा। सियाराम भगत के पास बहुत दिनों से गया नहीं। भूल गया पाप-पुन्न।

 कोठे में पड़ी गोमा कराह रही है वह रोने लगी। क्या हुआ? चाची को बुलाऊँ? लेकिन उसके मुँह से निकाला- ”बलीसिंघऽऽअ!“

 नहीं, क्यों बुला रहा हूँ बलीसिंह को? वह क्या करेगा? कौन होता है वह? चाची आ गई। गोमा ने बालक को जन्म दिया है। चाची थाली बजाने लगी। किड्ढा के घर बेटा पैदा हुआ है।

 बलीसिंह कोठे की चैखट पर खड़ा होकर पूछ रहा है- ”गोमती ठीक है। बच्चा?“

 एक तीखी धार-सी खिंचती चली गई भीतर। मूँछें फड़कने लगीं, ज्यों खुद ही उखड़ जाना चाहती हो। डोरिया-दरियाव का ठहाका भीतर तक घुस आया। बातें सुन रहा है वह - ”बालक किड्ढा के घर हुआ है या किड्ढा का?“ एक ऐना और टूटा-झन्न! सैकड़ों किरचें बिखर गईं।

 घर-घर बुलावे दिए जा रहे हैं। चैक पूरकर साँतिये धरे जाएँगे। चाची कोरा-चरूआ भर रही है। बत्तीसा डालकर उबालने धरेगी। गोमा को बत्तीसा का पानी पीना है। नेग-सगुन हो रहे हैं। किड्ढा की पुकार पड़ी है। वह कुर्ता की जेब में से पाँच का नोट, एक का नोट निकाल-निकालकर दे रहा है। बलीसिंह एक क्षण को आया। दस-दस के कुछ नोट देकर बोला, ”खर्च कर लेना। मैंने अलग रख दिए थे।“

 मुँह पर मार दे इन रुपयों को? क्यों दे रहा है? पूछे?

 गोमा ने कहलवाया, ”दाऊजी रूपया दें तो धर लेना। फसल इकट्ठी ही बिकी थी। हिसाब नहीं हुआ। हमारे कि उनके, बात एक ही है।“

 सोहर गाए जा रहे हैंः

 ”ऐसे फूले सालिगराम डालें, हाथ लिए रमपइया,

 ए लाला के बाबा, आज बधाई बाजी त्यारे।

 ऐसे फूले किड्ढा सिंह डोलें, हाथ लिए रमपइया।

 ए लाल के बाबुल आज बधाई बाजी त्यारे।“

 बाहर से फिर मिले-जुले ठहाकों के साथ कहावत-”हाथी डोले गाँव-गाँव, जाकौ हाथी, ता कौ नाम।“

 समुंदर का खारा पानी कभी देखा नहीं किड्ढा ने। सियाराम भगत की रामायण में सुना है - सागर का जल पीने लायक नहीं होता। नुनखरा समुंदरा ठाठें मार रहा है किड्ढा के कलेजे में।

 कौन बाबा? कौन बाबुल? सौर में पड़ी गोमा का झोंटा पकड़कर घर से बाहर कर दे। साली, चली जा इसी यार के संग, जो मुझसे पहले बालक को देखने पहुँचा है। किवाड़ की झिरी से न चाहते हुए भी देख लिया किड्ढा ने। बलीसिंह चाँदी का जैसा झुनझुना और कुछ नोट रख रहा है खाट पर बैठी गोमा के पास। चाची कहाँ मर गई?

 ”चाची! तू गाना बंद कर। फेंक ढोलक।“ वह कहना चाहता है।

 लेकिन एकांत पाकर चाची के कंधे पर सिर धरकर फूट पड़ा। वह पीठ थपथपाती हुई बोली, ”बेटा, मुकद्दर को फेर है। बुरा हो ककरेठिया के बैद का, छोरा का मगज खराब करके धर दिया। सगुन-सात रोजाना-पीटना क्यों मचाता है मिटे!“

 आँखें पोंछकर देखा, चाची के कोयों में ताल भरे हैं। भर्राई हुई आवाज में बोल रही है- ”चल उठ, हाथ-मुँह धो। बाजार चला जा। गुड़ और मेवा ले आ। हरीरा बनेगा। सोंठ-पंजीरी होगी। जच्चा को जैसी खुराक दोगे, बच्चा बैसे ही तंदुरस्ती पाएगा। गोमा का खयाल राख बेटा। तेरी महतारी परसूत में मरी।“ किड्ढा भीतर तक दहल गया। उठा और गोमा के पास जा पहुँचा। गोमा के होंठों पर कमजोर-सी हँसी खेल रही है - ”लो देख लो, दुस्स-मुस्स तुम पर गया है। नाक तो ज्यों कि त्यों धर दी है - तोड़कर।“

 किड्ढा के मन में खुशी की लहरें आ-जा रही हैं। तुरंत बाँहें फैला दीं, मतलब कि दो बच्चा। छोटी-सी ठोड़ी पर अपनी नाक छुआने लगा।

 ”अरे, तुम तो बड़े ले पाओगे, बाँह रह जाएगी। गर्दन उतर जाएगी।“ गोमा की हँसी खुनखनाने लगी। किड्ढा कभी गोमा को देखे तो कभी बालक को। आनंद! ”दाऊजी झुनझुना और रूपया दे गए हैं। लौटा देना। हम क्या नदीदे हैं? ब्यौहार कर रहे हैं हमसे। यह नहीं याद रहा, इस बच्चा के बाप ने खेत में कितना पसीना बहाया है।“

 किड्ढा को हार्दिक खुशी। गोमा खफा है।

 दूसरे ही दिन गाँव के कई लोगों ने अलग-अलग कहा- ”बलीसिंह तो कचहरी में बैनामा के कागज लेते देखा है।“

 गंगाराम को मौका मिल गया। अपने चबूतरे पर खड़े होकर दिन मुँदे धरउअल चिल्लाया- ”लिखकर तो देख धरती। मुकदमा ठोक देंगे। दादालाई धरती को वह अकेला कौन होता है उस नाखंदी को देना वाला? साले किड्ढा का भी मूँड फोड़ देंगे।“

 किड्ढा को गुस्सा गंगाराम पर नहीं, बलीसिंह पर नहीं, गोमा पर आया। साली ढोंगिन! कहती थी, रूपया लौटा दो, झुनझुना लौटा दो।... और खेत लिखवा रही है!

 घर के भीतर आँगन में खड़े होकर वह गंगाराम से ज्यादा जोर से चिंघाडा, ”हिम्मत हो तो बाहर खड़ी होकर सुन। तेरा बाप गंगाराम क्या कह रहा है? बैठी-बैठी नंदलाल को दूध चुखा रही है! उठ भेंचों बदमास...“

 गोमा की बाँह पकड़कर बहशियों की भाँति खींचने लगा।

 वह आँखे फाड़े देख रही है।

 ”बोल! दे जवाब।“ मूछों का एक-एक बाल थरथरा रहा है। ”नहीं चाहिए भैंस-बर्द। नहीं चाहिए रूपया-पइया। नहीं चाहिए कल-मसीन.... बलिया का चाकर हूँ मैं? उसका हरहारा (हल जोतने वाला) कि मेहनती?“

 गोमा की मछली-सी आँखें आँसुओं में तैरने लगीं।

 ”मैं अपनी खातिर कर रही हूँ सब? दाऊजी लिख देंगे तो मालिक कौन होगा? जोतेगा-बोएगा कौन ? आज तुम दाऊजी की धरती समेत पूरे चालीस बीघा के मालिक हो। गंगाराम पजरेगा नहीं? अरे, लोग अपने लत्ता-कपड़ा फाड़ेंगे। बाबरे होंगे। किसी की बढ़ती देख कौन सिहाता है?“ अंतिम वाक्य रूदन में मिला हुआ था।

 किड्ढा मन ही मन पछताया। नामालूम कौन-से देवता आ विराजते हैं सिर पर कि वह बिफर उठता है। वह गोमा के पास आया। क्षण-भर बालक को देखता रहा। अपने जिगर के टुकड़े को कैसे फेंके फिर रहा है! बापू होता तो लतिया देता किड्ढा को।

 उसे बालक को चुपचाप गोद में ले लिया। बोला, ”गोमा, भँवर नाम से बुलाना इसे। बापू कहता था, किड्ढा, मैंने तो तेरा नाम भँवरसिंह रखा था। तेरे बाबा ने किरोड़ीसिंह।“

 गोमा के होंठों पर अचानक तिरछी मुसकान खेल गई, बोली, ”अपने पुरखों का धरा हुआ नाम तो पुकारेंगे ही। तुम दाऊजी से मना कर देना, बलवानसिंह न कहा करें।“

 ....मगर भँवर कब कहा गोमा ने! बलवान कहकर ही पुकारती रही।

 किड्ढा की छाती में मनों ईंधन स्वाह होता रहा-बलीसिंह-बलीसिंह! हुँह! ससुर बलिया! मूँछ पर हाथ गया कि मूँछ पकड़े ही बैठा रहा देर तक।

 खेतों की ओर निकल गया था। सतबीघा की मेंड पर चाची मिल गई। उसका हाथ पकड़कर बोली, ”बता, कहाँ जा रहा है? तैने सुन ली? मुझे क्या मालुम थी कि गोमा रंडी...भइयादौज लेकर उस नाग बलिया की भेज रही है पीहर।“ किड्ढा ऐसे देखने लगा, ज्यों कुछ समझा न हो।

 ”अरे, बाबरा-सा काहे को खड़ा हो गया? भेज रही है तो भेजे। तू मन मैला मत करे बेटा....“

 सामने खड़ी फसल में आग लगी है। खेत धू-धू करके जल रहे हैं। भेजेगी क्यों नहीं असली खसम को... अपनी आँखों से परलय देखी है चाची! तुझे क्या बता दे! तूने मुझे तो बरज दिया था चाची कि जंपाते के तीन महीना तक गोमा को छूना नहीं रे। छूने का मतलब में समझ गया था। गोमा को कैसी भी तकलीफ हो, वह कभी नहीं चाहता।

 ”चाची, तू बूढ़ी, माँ-समान, खोलकर क्या बताता? बलिया बीस दिन भी नहीं निकाल सका। इतना तो समझता है कि गोमा जरूरत से ज्यादा आय-ऊय काहे को मचा रही है ? नींद कैसे लगती फिर? ओसारे में सोता हुआ देखता रहा- बलीसिंह दर्द की गोली लेकर उठा। भीतर पहुँचा। पर निकला नहीं। आधी रात में ज्यादा बीत गई। मैं खाट में लेटा-लेट हाँफ रहा था चाची, ज्यों सौ कोस भागकर आया हूँ। मन में आया, मोरी पर पड़ा पत्थर उठाकर दे मारूँ बलीसिंह के मूँड़ में। किबाड़ तोड़कर फेंक दूँ। अपनी धोती कस रहा था कि भीतर बालक रो पड़ा। बलीसिंह निकल आया कोठे में से। निकल गया बाहर जल्दी से।“ वह गोमा के ऊपर बाज-सा झपटा - ”आयंदा यह मेरे घर आया तो तेरा सिर फोड़ डालूँगा कुतिया! इस हरामी को फेंक दूँगा गोद में उठाकर। उस भुजंगी को देखकर खिलती है सूरजमुखी! मुझे देखकर तो तेरा मुँह तोरई की तरह लटक जाता है।“

 गोमा रोई नहीं, देखती रही उसकी ओर। तनिक तिरछे होंठ करके मुसकाई और बोली, ”निकाल बाहर क्यों नहीं करते? पराये आदमी को रहतवा मानना चाहिए सो अपना खून जलाते हैं देख-देखकर। भँवर के बापू, तुम्हारी किसम, भगा दो दाऊजी को। भला तुम्हारी मालिकी के दावेदार हो जाएँगे? रहतवा जानते हो? रोटियों पर चाकरी करने वाला।“

 गोमा ने अपनी नरम हथेली से किड्ढा का हाथ थाम लिया। मुलायम उँगलियों से सहलाती रही।

 ताज्जुब कि गोमा हँस रही है। अचरज कि गोमा मुसकराती ही। उसके बाँके होंठ किड्ढा की इकलौती आँख में मटर के बैंगनी-गुलाबी फूलों की तरह खिले हैं। पलक कैसे झपकाए वह? फूलों की पाँखुरी मुरझाएँ नहीं। किड्ढा का कडि़यल रुख धुनी रूई से भी ज्यादा कोमल हो गया।

 दो जुमलों में ढेर है वह। गोमा के बोल-झरते हुए मोती।

 वह रूपमती ही नहीं, बुद्धिमती भी है। सियाराम भगत परम ज्ञानी ठहरे। तिरिया की सच्ची परख जानते हैं। जो स्त्री अपने पति को माता की तरह भोजन परोसकर खिलाए, विपत आने पर मंत्री की तरह सलाह दे, सेज पर रंभा परी अप्सरा के समान व्यौहार करे, वह सच्ची पतिव्रता नारी है। गोमा सब गुणों की खान है। किड्ढा परम मूढ़ ठहरा। बात-बात पर अपनी प्राण-प्यारी सुकुमारी से उलझ बैठता है। ऐसे आदमियों को भगज्जी झाड़-झंखाड़ कहते हैं। बलीसिंह बिसाहुली जा रहा है। उसकी ससुराल। एक अवा सुलगने लगा फिर से। अकेली आँख भस्म करना चाहती है गोमा हरजाई को। किड्ढा ने मूँछों को दाएँ हाथ से इतनी जोर-जोर से बट डाला कि वे उखड़ने को हो आईं। गोमा कैसे पहचान गई? किड्ढा के रोम-रोम की जानकार है वह। उसने चटपट गोद का बालक खाट पर खेस बिछाकर लिटा दिया। उसके ऐन आगे आ खड़ी हुई। रौस पर जहाँ वह सोच में डूबा बैठा था, दोनों पाँवों के बल। मूँछों को तोड़ता-मरोड़ता....।

 ”बोझ बहौत है। तुम लादकर ले जाओगे? फिर दाऊजी के बस की है खेती की देखभाल? खेती-किसानी हरएक कर ले तो फिर क्या नहीं? बम्बा में से ”मजूर सड़क तक धर आएगा दाऊजी, सड़क से सूधे इक्का में।“ गोमा कह रही है। पहले-पहले गोमा को बलीसिंह से बोलते देखा था तब कितना पीटा था उसे। नील पड़ गए थे गोरी देह पर। चाची ने समझाया था - कढ़ी खाए, यह मर गई तो जन्म-भर बैठे रहना रँडुआ। फिर नहीं होने धरेजे।

 बलीसिंह को जाते देखता रहा। बालक चुपचाप खाट पर लिटा दिया। गोमा को आवाज मारी - ”बलवान को ले आओ, दूध पिला दो।“ किड्ढा का दिल काठ का भी बना होता तो राख हो जाता। पर सात पर्दो के पार मांस-खून का बना दिल केवल धुँधुआता है। सुलगता है। तड़पता है। कलेऊ नहीं किया। नहाया-धोया नहीं। सूरज देवता नहीं ढारे।

 बालक रो रहा है।

 किड्ढा के जबड़े कस गए - साला बलिया की औलाद! लेंडिया। वह उठा झटके से। अपनी साइकिल उठा ली और तेजी से घर से निकल आया। चल दिया, न जाने कहाँ ? कहाँ भी.....

 इगलास के हाथरस चैराहे पर खिच्चो की चक्की है। किड्ढा सदा अपनी साइकिल यहीं रखता है। भीतर से साइकिल टिकाकर पानी पीने चल दिया। पीछे से बोल मारा किसी ने -”ओ किड्ढासिंह! मेहमान! अरे सुनो तो लल्लू!“ मुड़कर देखा-बिसाहुली का नाई। ससुराल का आदमी। हड़बड़ाया हुआ भागता-सा चला आ रहा है बूढ़ा।

 पास आ गया। कंधे पर पिछौरा डाले हाँफ रहा है।

 ”लल्लू! किड्ढासिंह! अरे, तुम्हें क्या हो गया मेहमान? पहचान में नहीं आ रहे? चेहरा काला स्याह......“

 ”मैं तुम्हारे गाँव ही जा रहा था। भले मिल गए यहाँ।“ ”बात क्या है नाऊ ठाकुर?“ परेहट कर ली इनने तो। धरती मइया भी पहचानती है अपने पूतों को। दाऊजी कमा पाए अपने खेतों से दस मन का बीघा! फिर सौ बातों की एक बात, तुम चले जाओंगे तो मैं अकेली रह जाऊँगी।“

 किड्ढा ने सिर नहीं उठाया ऊपर। आग होती तो गोमा की बातों के ठंडे जल से बुझ जाती। धुएँ को कोई नहीं बुझा पाया। कहने को वह ठीक ही कह रही है, मीठे के संग पंद्रह सेर चावल हैं। बलीसिंह लाद ले जाएगा। मन समझाना कठिन नहीं, पर मन माने तब न।

 ईंट के मारे आज खोपड़ी न फोड़ दी साले की तो मेरा नाम किड्ढा नहीं। सालिगराम से जायंदा नहीं। असल जाट का बेटा नहीं। बापू की लठिया से ही टाँगें। झाड़ दूँगा, चल बेटा! बाहर निकल तो सही।

 अंधड़-तूफान में गोमा बरखा की धार! रिमझिम बरस उठी। बालक धर दिया किड्ढा की गोद में, ”साँची कहती हूँ, तुम्हारे बिना यह बहलने वाला नहीं। रोएगा। माँदी जो जाएगा, भँवर के बापू! तुम सुन रहे हो या नहीं?“ भँवर के बापू! गोमा कह रही हे, भँवर के बापू! किड्ढा का सिर एक पल को चक्कर खा गया। छाती के भीतर मीठी चाशनी बहने लगी। मटर-मटर देख रहा है। काला रंग-रामचंद्र जी की छवि। सियाराम भगत कहते हैं-गोरे नंद, जसोदा गोरी, मनमोहन थे श्याम। किड्ढा के हाथ में आई ईंट, लठिया न जाने कहाँ विरमा गई?

 बलीसिंह नल के नीचे नहा रहा है गोमा ने लाज मारकर हत्था चला दिया। साबुन लगे काले बदन पर पानी का धार बही। किड्ढा की भीतर लपटों ने जोर पकड़ा। गोमा ने खोया औटा, पेड़े बनाए, तिल चामरी और गोला बाँधा। इन अनेक कलापों के चलते वह बालक को पकड़े रहा, खिलाता रहा।

 बलीसिंह ने नई फाइन की धोती पहनी है, टैरीकाॅट का कुर्ता-सफेद झक्क। ऊपर के काली सदरी। जुल्फों में तेल-खसबोई उड़ रही है।

 गोमा के बनाए हुए क्रोशिया के रंग-बिरंगे झोला में सामान धर रहा है।  “अजी बात क्या? बड़ा बनउआ है भेंचो....“

 किड्ढा अपनी मूँछों मरोड़ने लगा।

 ”तुम्हारे गाँव के को आए हमारे यहाँ, जानते हो?“

 ”बलीसिंह? बलीसिंह ही आया होगा।“ किड्ढा उत्तेजित-सा हो गया। ”उनकी तो हालियत खराब है।“

 ”बीमारी-हारी हो गया?“

 ”अजी नाँय। बड़ी मार मारी है तिहारे सालों ने।“

 ”मार?“

 ”अजी हाड़-पसुरियाँ चूरन कर दीनी।“

 ”बलीसिंह की मारपीट।“

 ”बलीसिंह हो चाहे ध्यानदास। बड़ी कुदिसा करी है। चलो, तुम देख लो, मेरे छोरा की दुकान में पड़े हैं।“

 ”बेबात ही मारेंगे?“ किड्ढा का अविश्वास कम न हुआ।

 ”बात तो कछू जरूर होगी। बड़े जहरा रहे तुम्हारे ससुरारिया। हमे तो यों कहते हैं कि भइयादौज तुम ही दे जाते। एक दिना में खेती कितनी बिगर-तुगर जाती?“

 किड्ढा कहे तो क्या कहे?

 ”जि समझ लो कि जो प्रधान बीच-बिचाव न करें तो लहास हो जातीं। वे दोऊ भइया तो ऐसे फैले कि पूछो मत कुछ। लठिया, जूता जो कुछ हाथ पड़ा - धमाधम। लात-घूँसा तड़ातड़, लगै चाँद में, लगै पीठ में, पाँयन में। एक ही बात बोले-बता, तू हमारा जीजा है? बहनोई है? ला, हम खबाबें तुझे मेहमानी। ला, हम दें तुझे विदा। ले, जूता खा। ले, डंडा खा। ले, घूँसा खा। ससुर जी, अब आना अगली बेर।“

 ”ऐसा क्या खता बन गई, किड्ढासिंह? तुम्हें तो मालुम होगी।“

 किड्ढा के मन की दशा न पूछो।

 उठते ज्वार की लहरें समतल हो गईं। लपटें बुझने लगीं। सब कुछ शांत, चुप। उसने आँखें मूँद लीं। गहरी-गहरी साँसें लेने लगा। सियारा भगत, तुम सोलह आना साँचे। रावण मरता है एक न एक दिन। बलिया, तू सड़-सड़कर मरेगा। बुला ले उस ठगिनी को। बचा ले अब आकर। खिला रही है तेरा कुँवर। मन में आया, कह दे-गोमा को लिवा लाओ नाऊ ठाकुर। देख जाए। नाई बोला, ”तुम क्या सोच-विचार रहे हो लल्लू? जादा टैम नहीं है। बेगि चलो। माथा फूट गया है। खून बह रहा है।“

 ”मर जाएगा साँझ तक। मैं नहीं जाता।“ किड्ढा कहना चाहता था। ....मगर उसके पाँव उठ गए अपनी साइकिल की ओर। पैदल चलता रहा साइकिल लेकर। फिर बोला, ”देर होगी ऐसे तो। नाऊ ठाकुर, तुम कैरियल पर बैठ जाओ।“

 बलीसिंह मुर्दे की तरह पड़ा है खाट पर। बिछौना खून में तर है। किड्ढा का दिल दहल गया। स्याह रंग पर लाल खून। माथा घावों से भरा हुआ। मुँह में फावड़ा मारा है क्या? उसका हाथ बलीसिंह के सिर पर जा पहुँचा। बलीसिंह ने अपनी सूजी हुई आँखें कठिनाई से खोलीं। किड्ढा को देखकर होंठ हिले, पर बोली नहीं निकली। खून की पपड़ी पड़ी है होंठों पर। ”मर जा साले। तू इसी लायक है। भोग अपनी करनी।“ उसके मन में अनेक बातें हाहाकर कर उठीं।

 नाई बोला, ”किड्ढासिंह, मल्लिम-पट्टी करा लेते डाकधर से। पर मेरा छोरा कह रहा था, पुलिस केस हो जाएगा। अस्पताल में मत जाना। नातेदारी वाली बात है, दुसमनी हो जाएगी। सो मेहमान, तुम जल्दी करो। ले जाओ इन्हें।“ ”इसे सड़ने दो, थाने में चाहे अस्पताल में। मैं नहीं ले जाऊँगा। चील-गिद्धों के आगे डाल देना चाहिए।“ कहना चाहता था वह।

 ....मगर उसकी आँखों के सामने गोमा! देख ही है चैखट पर खड़ी-खड़ी। बलीसिंह लौटेगा। पीहर की राजी-खुशी देगा।

 यहाँ से लौटकर क्या कहूँगा मैं? मैं क्या जानूँ? क्यों पूछेगी मुझसे? और यह नाई! गोमा के पीहर का आदमी! कहेगा, कैसा मनिख है किड्ढासिंह ? अपने सालों से ज्यादा कसाई!

 नाई बोला, ”देर मत करो अब एक पल की भी। तुम्हारा छोटा साला सिरफिरा है। जब से मलेटरी में भरती हुआ है, बंदूक-पिस्तौल छोड़ दूसरी बात नहीं करता। मुझे डर है, आ न रहा हो। जो साँस चल रही हे उसे भी निकालकर धर जाएगा।“

 एक बार को लगा कि छोटा साला ही आ जाए। कर दे किस्सा खतम। ”अजी तुम असमंजस में डूबे खड़े हो!“

 किड्ढा अपनी साइकिल लेकर आगे बढ़ा। ठीक है, बैठा ले जाता हूँ। गैल तो सूनी है। बड़े-बड़े घने मूँज के झुंड हैं। पटक दूँगा उनके बीच। मर-खप जाएगा। किसी को पता न चलेगा। गोमा को भी नहीं।

 नाई ने किड्ढा से संग मिलकर बलीसिंह को साइकिल के कैरियर पर लाद दिया। दोनों हाथों से सीट के नीचे की स्प्रिंग पकड़वा दी।

 किड्ढा क्या करे? साइकिल पर सवार होकर चल दिया।

 बलीसिंह को धीरे-धीरे होश आ रहा है। जोर से कराहने लगा। तनिक दूर और! थोड़ी दूर और!

 दगरा आया ही चाहता है। फिर कहाँ रहेगा होश-हवास.....

 रेत-भर दगरा। मूँजों के झुंड... गोमा प्रकट हो पड़ी। साइकिल के आगे-आगे चल रही है। पीछे मुड़-मुड़कर देख रही है -तिरछे होंठ करके हँसती हुई.... किड्ढा पलक झपकना भूल गया।

 पतेल की तीन-चार पत्तियों के बारी-बारी चीर दी किड्ढा कि बाँह।

 गोमा के सामने ही डाल दूँगा कि ले, आ गए तेरे प्यारे मीठे दाऊजी। सेंकती रह धरके। लगा हल्दी-चूना। टहल पर। बलीसिंह दाऊजी की सेवा करने का बड़ा शौक था। हो गई इच्छा पूरन।

 ”अरे मरा रे। मराऽऽआ!“

 ”ज्यादा तकलीफ है रे? जी कड़ा करके बैठ।“

 पता नहीं मन की आग क्यों बुझाती नहीं..... अब चूका तो इस राक्षस के फंदे में ही बीतेगा पूरा जनम। सियाराम भगत जी कहते हैं- राक्षसों का संहार करना सबसे बड़ा धरम है। सो लाला बलीसिंह, तू हो जा तैयार।

 गोमा हँसती है तो उसकी आँखें चमकती हैं। ये बलीसिंह दाऊजी.... मैं कहती थी न, इस धरती पर तुम जैसा पुरिख.....

 किड्ढा का ध्यान अचानक बदला। इस गैल के मूँज-पतेल तो अच्छे-भले आदमी की देह छीलकर धर दें- उस्तरा की तरह.... बेचारे के घाव पर घाव! उसने हैंडिल पर लटके झोले में रखी चादर पर निगाह डाली।

 उतरकर उढ़ाने लगा। पर बलीसिंह अपना वजन नहीं साध पा रहा। साइकिल गिरी पड़ रही है। उसने बलीसिंह की गर्दन पर दो थाप दीं- ”अपने संग मुझे भी ले मर।“

 बलीसिंह सीधा होने की कोशिश करते ही चिचिया पड़ा - ”आय, हाऽऽ-आय....“

 ”आ रे रे रे! लग गई! ज्यादा लग गई?“

 किड्ढा ने साइकिल बिलकुल धीमी कर ली। बहुत सध-सधकर चलाता हुआ बलीसिंह को मँूज के हर झुंड से बचाने लगा।

 अंत में घर के आँगन तक उसे ऐसे ले आया, ज्यों भँवर को, नहीं-नहीं, नन्हें बलवानसिंह को गोमा की गोद तक ले आया हो......



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