मंजरी श्रीवास्तव : कविताओं का गुलदस्ता | Manjari Shrivastava - Poems


Manjari Shrivastava - Poems shabdankan मंजरी का अर्थ

मंजरी श्रीवास्तव...

एक चुलबुली-साहसी-मित्र, एक सच्ची-लड़की, एक खूबसूरत इंसान और एक बेहतरीन कवि... मंजरी के परिचय का मंजर बयां करती हैं, उनकी ही यह कविता 
बड़े मज़े से पक्षी गाते रहते हैं ज़िन्दगी भर वही गीत
जो सीखते हैं बचपन में एक ही बार अपने माँ-बाप से
नदी भी रहती है मस्त
एक ही धुन पर थिरकती हुई, गाती हुई
पर मैं...
मैं तो नहीं गा सकती न एक ही गीत बारम्बार
मुझे तो अपनी छोटी-सी ज़िन्दगी में रचने हैं इतने गीत
जो काफ़ी हों सालों-साल तक
और
मेरे मरने के बाद भी गाये जाते रहें बार-बार
पर मैं क्या रचूँ
कुछ भी तो नहीं बचा
न योग, न वियोग, न संयोग, न दुर्योग
न काम, न क्रोध, न लोभ, न मोह
न क्षमा, न दया, न ताप, न त्याग
न साम, न दाम, न दंड, न भेद
फिर भी
लम्बी और उनींदी रातों में
एक खेतिहर की तरह
शब्दों के सर्वोत्तम बीज चुनकर
काँटों और घास-पात से बचाते हुए
उनकी बुआई, निराई, गुड़ाई करती हूँ और
कोशिश करती हूँ
सभी हानिकारक जीव-जंतुओं, कीड़ों-मकोड़ों, टिड्डियों, चूहों और
अपने सबसे भयानक शत्रु ‘समय’ के भय से मुक्त
कविता और गीत की ऐसी फसलें पैदा करूं जो सदियों तक ज़िन्दा रहें. 
मंजरी की तीन कवितायेँ हैं... तीनो में खूबसूरत रंग भरे हैं उन्होंने फिर बदरंग भी तो एक रंग होता है, वो जब कविता में उतरता है तो दर्द सीने में उठता है... 'मैं...टूटे सपनों की बालकनी में' कविता के कैनवास पर  मंजरी का एक रंग देखिये -  हर कोई इस दोज़ख से निकलने की ज़द्दोज़हद में है और / बैकग्राउंड में चल रहा है फ़रीदा खानम का गीत – / “आज जाने की जिद न करो.” 'हड़ताल' कविता के केंद्र में भले महानगर की लड़की है, लेकिन रंग यूनिसेक्स हैं, जिनमे सब की खुशियाँ और न-खुशियाँ दीख पड़ती हैं - क़ायदे से बहुत पहले ही हड़ताल कर देनी चाहिए थी मुझे / क्योंकि / मुझे मेरे काम से कभी फ़ुर्सत नहीं दी गई / न मैंने ही लेने की कोशिश की. 'शून्य को निमंत्रण' देती हैं मंजरी और एक रूमानी छवि भी उकेरती हैं शून्य में -  पहनते ही पोल्का डॉट्स की अपनी टी-शर्ट या नाईट गाउन / महसूस करती हूँ अनगिनत शून्यों का रूमानी स्पर्श / अपनी दहकती देह पर / एकदम हल्का होकर / शून्य के आवर्तों में घिरकर...

Manjari Shrivastava - Poems shabdankan मंजरी का अर्थ
आनंद  उठाइए  इन तीन कविताओं के रंगों का जिन्होंने मुझसे इन्टरनेट पर वो तस्वीरें तलाशने को कहा जो कविताओं के साथ लगी हैं, जिन्हें हवाई में जन्मे शॉन योरो (हुला) ने अपने पैडल बोर्ड पर जाने कैसे संतुलन बनाकर, खँडहर इमारतों को बड़ी विशाल पंटिंग से सजा दिया, जिनमें आदिवासियों के चेहरे और उनके शरीर पर बनने वाले निशान नज़र आते हैं – वैसे ही सुन्दर रंग और बदरंग जैसे मंजरी ने अपनी कविताओं में भरे हैं... 
 - भरत तिवारी



हड़ताल


मैं सोच रही हूँ कि कुछ दिनों के लिए हड़ताल पर चली जाऊं
क़ायदे से बहुत पहले ही हड़ताल कर देनी चाहिए थी मुझे
क्योंकि
मुझे मेरे काम से कभी फ़ुर्सत नहीं दी गई
न मैंने ही लेने की कोशिश की.

जबसे होश संभाला
Manjari Shrivastava - Poems shabdankan मंजरी का अर्थ
हमेशा काम ही करती रही
खाने के वक़्त और थिएटर में
बैठक में और शिकार के समय
कॉफ़ी पीते हुए और मातम मनाते हुए भी
शादी के मौक़े पर, मेज़ पर
सैर के समय पहाड़ी पगडंडियों पर
सफ़र के समय रेलगाड़ी, हवाई जहाज, ट्राम, मेट्रो, बस, ऑटो में
चौक-चौराहे, नुक्कड़, नदी के किनारे, समंदर तट पर
जंगल और किसी ए.सी. केबिन में भी
खेत में भी
अपने प्रियतम के लिए दोपहर का भोजन गठरी बाँधकर ले जाते समय भी
यहाँ तक कि नींद में भी करती रहती हूँ काम
नींद में भी जारी रहता है मेरा कार्य-दिवस
नींद में भी बनती रहती है कविता
कविता की पंक्तियाँ, उपमाएं और विचार तथा
कभी-कभी तो दिखाई देती है पूरी की पूरी तैयार कविताएँ
ऐसा लगता है
पृथ्वी पर हर पल, हर जगह मेरा ही कार्यक्षेत्र है.

बड़े मज़े से पक्षी गाते रहते हैं ज़िन्दगी भर वही गीत
जो सीखते हैं बचपन में एक ही बार अपने माँ-बाप से
नदी भी रहती है मस्त
एक ही धुन पर थिरकती हुई, गाती हुई
पर मैं...
मैं तो नहीं गा सकती न एक ही गीत बारम्बार
मुझे तो अपनी छोटी-सी ज़िन्दगी में रचने हैं इतने गीत
जो काफ़ी हों सालों-साल तक
और
मेरे मरने के बाद भी गाये जाते रहें बार-बार
पर मैं क्या रचूँ
कुछ भी तो नहीं बचा
न योग, न वियोग, न संयोग, न दुर्योग
न काम, न क्रोध, न लोभ, न मोह
न क्षमा, न दया, न ताप, न त्याग
न साम, न दाम, न दंड, न भेद
फिर भी
लम्बी और उनींदी रातों में
एक खेतिहर की तरह
शब्दों के सर्वोत्तम बीज चुनकर
काँटों और घास-पात से बचाते हुए
उनकी बुआई, निराई, गुड़ाई करती हूँ और
कोशिश करती हूँ
सभी हानिकारक जीव-जंतुओं, कीड़ों-मकोड़ों, टिड्डियों, चूहों और
अपने सबसे भयानक शत्रु ‘समय’ के भय से मुक्त
कविता और गीत की ऐसी फसलें पैदा करूं जो सदियों तक ज़िन्दा रहें.

रचना चाहती हूँ ऐसे गीत
जो उस शराब की तरह हो
जिसका ख़ुमार हमेशा बना रहे.

इसके लिए जागना ज़रूरी है
जागती रहती हूँ उन रातों में भी
जब बाहर बारिश पटापट का अपना राग अलापती होती है और
उन सर्द रातों में भी जब लम्बे गर्म लबादे में
अपने प्रियतम के साथ दुबककर मज़े की नींद ली जा सकती है.
उस सर्द रात के बाद ज़रूर सुबह होती है,
फिर दिन निकलता है और
दिन के बाद रात आती है...
जाड़े के बाद वसंत आता है और
वसंत के बाद प्यारी गर्मी
फिर छिन्न-भिन्न होते बादलों के पीछे से
सूरज कभी-कभार झाँकने लगता है
बुलबुल चाँदनी रात की निस्तब्धता में गाने लगती है
पर मुझे नींद नहीं आती
आराम करने का भी मन नहीं करता
इन चीज़ों को महसूस करती रहती हूँ
अपने दिल में एक न बुझनेवाली आग लिए
वे अलाव लिए
जिनसे मुझे बचपन में ही बहुत प्यार हो गया था
हरपाल सोचती रहती हूँ कि
ऐसा क्या लिखा जाए उस अलाव की रौशनी में
जो किसी को गरमाए बिना
अँधेरे में किसी का पथ रोशन किए बिना
बुझने न पाए

अब आप ही बताएं
हड़ताल पर जाने के बारे में मेरा सोचना
कितना उचित है....?  




शून्य को निमंत्रण


शून्य
एक ऐसा शब्द
जिसे सुनना नहीं चाहता कोई भी
पर मैं हूँ एक ऐसी अजीबोग़रीब शख्सियत
जो हर पल देती रहती हूँ
शून्य को निमंत्रण

कड़ाके की सर्दी की उस सुबह में
जब घने कुहरे में
हाथ को हाथ नहीं सूझता
मॉर्निंग वॉक करते समय भी
शून्य को महसूस करती हूँ मैं
मेरे इर्द-गिर्द घूमती रहती हैं तुम्हारी आँखें
उस कोहरे के अन्धकार को दूर करती
चमकते शून्य-सी
जो रोशन करती हैं मेरी राहें
और शून्य हर पल बना रहता है मेरा पथ-प्रदर्शक।

ब्रेकफास्ट के साथ कॉफ़ी मग में भी होते हैं एक साथ हजारों छोटे-छोटे शून्य
जिन्हें निमंत्रित करना तो दूर
जिनका निर्माण भी करती हूँ मैं स्वयं
और रोज़ गटकती रहती हूँ न जाने कई हज़ार शून्य
याद भी नहीं अब तो कि
कितने शून्यों को मैंने अपने भीतर समाहित कर लिया है
और कभी नहीं रुकेगा यह सिलसिला
जबतक है ज़िन्दगी
जब तक है कॉफ़ी
रोज़ गटकती रहूंगी अनंत शून्यों को।

पहनते ही पोल्का डॉट्स की अपनी टी-शर्ट या नाईट गाउन
महसूस करती हूँ अनगिनत शून्यों का रूमानी स्पर्श
अपनी दहकती देह पर
एकदम हल्का होकर
शून्य के आवर्तों में घिरकर
रुई के फ़ाहे-सा उड़ने लगता है मेरा शरीर
और भर जाती है उसमें
हजारों शून्यों की पुलक
हजारों पोल्का डॉट्स की सिहरन
महसूस करती हूँ अपने सिहरते बदन पर अनगिनत शून्यों का चुम्बन
उस पल।

चश्मा उतारते ही घिर जाती हूँ मैं
कई काले और रंगहीन शून्यों में
फिर होने लगते हैं ये स्फटिक की तरह पारदर्शी, आबदार, शफ़्फ़ाक़
और अनायास घेरने लगते हैं मुझे अपनी सतरंगियों में
अपनी आँखों में इन पारदर्शी, काले और रंगहीन सतरंगियों को बसाए
इनका अक्स लेकर
वापस पहनकर चश्मा
निकल पड़ती हूँ काम पर

शाम को लौटकर अपने कमरे में आते ही
महसूस करती हूँ शून्य के बीच की अदम्य शान्ति
उस शांत शून्य में आते रहते हैं कई विचार
कुछ अच्छे, कुछ बुरे
देख रही हूँ बचपन से
जिस शून्य से इतना दूर भागती है दुनिया
मुझे सबसे शाश्वत लगता है वही शून्य
जिस पर कभी महर्षि विवेकानंद ने तीन दिनों तक शिकागो सर्वधर्म सम्मेलन में व्याख्यान दिया था;
शायद उन्होंने भी महसूस किया होगा मेरी तरह अपने-आप को शून्य से घिरा
जैसे आज उनके इतने वर्षों बाद मैं महसूस करती हूँ।

शून्य में ताकते-ताकते
Manjari Shrivastava - Poems shabdankan मंजरी का अर्थ
भीड़ में भी पाती हूँ खुद को तन्हा
मग़र सबसे ख़ुश
शून्य को आँखों में बसाए
देखती हूँ सपने भी शून्य के ही
जब लग जाती है आँख
और जागती हूँ अगली सुबह
एक बहुत बड़े शून्य के आवर्त में घिरी
जिसे संसार सूरज के नाम से पुकारता है।

अच्छा लगता है हरपल शून्य से घिरे रहना
मेरी अपनी एक अलग दुनिया है
जहाँ हूँ मैं और सिर्फ़ मेरा शून्य
नहीं कोई अन्य
शून्य के दायरों में घिरी
मैं खुद ही हूँ एक शून्य
शून्य ही आदि
शून्य ही अंत
पर शून्य अनंत
और इन अनंत शून्यों से घिरी
अनंत शून्यों के साथ जीती हुई भी
मैं ज़रूरत से ज़्यादा जीवंत।




मैं...टूटे सपनों की बालकनी में


खड़े होते ही अपने घर की पीछे वाली बालकनी में
ऊपर नज़र आता है शफ्फाफ़ अर्श और बेदाग़ चाँद
और नीचे दिखती है दोज़ख से भी बदतर हक़ीक़त
जहाँ न टी.वी. है, न कंप्यूटर
न रूना लैला का दमादम मस्त कलंदर है और न ही छिटकती हुई चाँदनी का खुशनुमा एहसास
हर कोई इस दोज़ख से निकलने की ज़द्दोज़हद में है और
बैकग्राउंड में चल रहा है फ़रीदा खानम का गीत –
“आज जाने की जिद न करो.”
यहाँ दौलत नहीं पर मोहब्बत है
ऐसी मोहब्बत जहाँ एक छोटा सा बच्चा अपनी प्यारी छोटी बहन को
कभी रिक्शे पर बिठाकर
कभी उसके पीछे के स्टैंड पर खड़ा करके
रिक्शा गोल-गोल घुमा कर उसे घुमाता है
बकरियों के दो चितकबरे बच्चों के साथ फुदकते हैं इंसानों के भी बच्चे
और पुआल के ढेर पर आपस में लिपट कर बैठे कुत्ते के पिल्ले

कई छोटे-छोटे कॉटेजनुमा घरों पर हैं मॉडर्न एब्सट्रैक्ट से सजे कोचिंग व विज्ञापनों के परदे
कॉटेज के सामने बने हैं चबूतरे
जिनपर हर सुबह और शाम
कपडे धोती और बर्तन मांजती हैं औरतें
कूड़े के ढेर में बने इन घरों के सामने फेंके जाते हैं टायर, पॉलीथीन, टूटे कमोड, सूप, मटर के छिलके, सैनिटरी नैपकिन्स और न जाने क्या-क्या ....
उन अपार्टमेंट्स से
जिनकी छाँव में बने हैं ये
बसे हैं ये
वहीँ घर के सामने
कितकित खेलते हैं रोज़ बच्चे
शाम होते ही आता है रोज़ हर बच्चे का बाप दारू के नशे में धुत
और पीटता है अपनी जोरू को
एफ़. एम. के ‘पुरानी जीन्स’ पर चलता रहता है जब ये गाना
“ ओ साथी रे...तेरे बिना भी क्या जीना ..”
Manjari Shrivastava - Poems shabdankan मंजरी का अर्थ

सामने ही टंगी है अलगनी
जिनपर रोज़ सुखाते हैं ये कपडे
और सूख जाते हैं रोज़
इनके होंठों से ज़िन्दगी के जाम के छलकते पैमाने भी
तभी आता है एक साइकिलवाला
सपने बेचता हुआ, नज़र उतारता हुआ
उतारता है नज़रें फुदने बेचकर
उसके बक्से में हैं ईयररिंग्स, नेकलेस, चूड़ियाँ, रंग-बिरंगे और काले फुदने
खरीदती हैं औरतें काले फुदने और उतारती हैं नज़र अपने बच्चों की
पास आने वाली है वसंतपंचमी
इसलिए पहन रही है एक औरत पीली-पीली चूड़ियाँ
चूड़ियों के पैसे मांगती है पति से और पति ही तोड़ देता है चूड़ियाँ यह गाते हुए –
“चूड़ी नहीं मेरा दिल है ...देखो, देखो टूटे ना ...”

चला जाता है वापस वह सपने बेचने वाला सबकी आँखों के सपने लेकर
पूरी बस्ती है उदास
पूरा माहौल है उदास
एक बच्चा पेशाब की धार के छल्ले बना रहा है अपार्टमेंट की तरफ़ मुड़कर
अचानक आवाज़ होती है शीशे के टूटने की
दौड़कर देखती हूँ तो चकनाचूर है मेरे बाथरूम की खिड़की का शीशा
और वापस आ गई है हंसी उन बस्तीवालों की
उभरता है उनका समवेत स्वर –
“ जो हमसे टकराएगा....चूर-चूर हो जाएगा ..”

अनायास ही एक खीझ के साथ मुस्करा उठती हूँ मैं.      
 
संपर्क: manj.sriv@gmail.com
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