भरत तिवारी: एक ग़ज़ल | A Ghazal - Bharat Tiwari

बची हो जो गर थोड़ी ग़ैरत एक ग़ज़ल - भरत तिवारी न इंसानियत का निशाँ ही बचेगा न काबा न मंदिर न गिरजा बचेगा बची हो जो गर थ...
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