Marlon James - अमेरिकी रेसिस्ट यह नहीं समझ पाते कि वह रेसिस्ट हैं


मार्लोन जेम्स: यूरोपियन लोगों को बौद्धिक रूप से विकसित होने में काफी वक्त लगेगा #शब्दांकन



जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2016 में मार्लोन जेम्स  से बातें

- अमित मिश्रा 


वह दिखते रॉक स्टार से हैं और उऩकी बातें करने का अंदाज किसी जुनूनी नेता जैसा है। हम बयां कर रहे हैं 2015 के बुकर प्राइज विनर मार्लोन जेम्स की शख्सियत की। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल 2016 में अमित मिश्रा ने बात की मार्लोन जेम्स सेः


अमित मिश्रा: आपने लिखने की शुरुआत कब की और इसकी प्रेरणा कहां से मिली ?

मार्लोन जेम्स: जब से मुझे याद है मैं तबसे लिख रहा हूं। मैं एक्स मैन सीरीज की किताबें पढ़ कर बड़ा हुआ हूं और उनका थ्रिल और अंदाज मुझे खूब पसंद आता था। मेरी मां ने अब भी शायद वह कहीं संभाल कर रखी होंगी। शायद वहीं से लेखन मुझमें कुलबुला रहा था और वक्त से साथ यह मैच्योर होकर सामने आया।


अमित मिश्रा: भारत आते ही दिल्ली एयरपोर्ट पर आपके साथ जिस तरह का बर्ताव हुआ उससे देश के बारे में क्या छवि बनती है?

मार्लोन जेम्स: जब से मैंने सोशल मीडिया पर इस घटना के बारे में लिखा है तब से लोग इस घटना को लेकर मुझसे माफी मांग रहे हैं। यह मुझे काफी हास्यास्पद लगा। लगता है मुझे अब लोगों को कुछ ह्यूमर सिखाना पड़ेगा। कोई एक घटना किसी देश की छवि बना या बिगाड़ नहीं सकती। लंबी दूरी की यात्रा के बाद अथॉरिटी का रूखा व्यवहार परेशान करने वाला था लेकिन जयपुर पहुंचते-पहुंचते बुरी यादें पिघलने लगीं और सबकुछ अच्छा लगने लगा। मैं यहां आकर काफी खुश हूं और मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है।


अमित मिश्रा: आपने विचारों को रखने के मामले में आप काफी मुखर है क्या इसकी वजह से आप हमेशा मुश्किल में नहीं फंसते रहते?

मार्लोन जेम्स: मेरे बात करने के अंदाज से कोई मेरे बारे में क्या सोचता है मैं इसकी परवाह नहीं करता। मैं शुरू से ही ऐसा हूं। शायद यह आदत मुझे अपनी माता-पिता से मिली है। वह बचपन से ही खुल कर बात करने वाले थे। मेरी मां काफी सपाट बोलती थीं। मिसाल के तौर पर जब मैं अपने दोस्तों के साथ बाहर जाने की तैयारी कर रहा होता तो वह कहतीं बेहतर होगा तुम ब्रश करके जाओ क्योंकि मुझे तुम्हारी सासों की महक दूर से महसूस हो रही है। वह ऐसी बातें मेरे दोस्तों के सामने ही कह देतीं थीं। शायद ऐसे रहन-सहन ने ही मुझे मुंहफट बना दिया है। इसके अलावा शायद मेरे पास फालतू की बकवास सुनने के लिए धैर्य की भी कुछ कमी है।


अमित मिश्रा: आप का मानना है कि यूरोपियन रेसिज्म को लेकर पूरी तरह से गंवार हैं और उन्हें इसकी रत्ती भर भी समझ नहीं है, ऐसा क्यों.

मार्लोन जेम्स: हां वे ऐसे हैं और शायद उन्हें किसी ने यह पहले बताया नहीं है। ये वो लोग हैं जो खुद को रेसिस्ट कहे जाने पर चौंक जाते हैं लेकिन बराक ओबामा पर जोक बनाते हैं। इनकी फुटबॉल लीग से ही कोई अश्वेत खिलाड़ी जब मैदान पर आते हैं तो उसका स्वागत मैदान में केले फेंक कर करते हैं। मुझे लगता है अभी यूरोपियन लोगों को बौद्धिक रूप से विकसित होने में काफी वक्त लगेगा और फिलहाल मुझे ऐसा होता दिख भी नहीं रहा है।


अमित मिश्रा: अमेरिका को भी आप रेसिस्ट मानते हैं।

मार्लोन जेम्स: अमेरिकी लोगों के साथ दिक्कत यह है कि वह यह जानते हैं कि रेसिज्म बुरा है लेकिन सारे अमेरिकी रेसिस्ट यह नहीं समझ पाते कि वह रेसिस्ट हैं। उन्हें लगता है कि जब तक किसी अश्वेत या एशियन को उसके रंग की वजह से बुरी तरह परेशान न किया जाए तब तक सब ठीक है। रेसिज्म सिर्फ बुरी चीज ही नहीं बल्कि अब यह सिस्टम में घर कर चुकी है। आप दुनिया में सबसे अच्छे इंसान होकर भी रेसिस्ट हो सकते हैं। कहीं न कहीं आप उस रेसिस्ट सिस्टम से फायदा तो उठा ही रहे होते हैं जो किसी खास रंग और रहन-सहन के लोगों को संसाधनों से वंचित कर रहा होता है। अपने से अलग दिखने वाले को सिर्फ देखने भर से जजमेंटल हो जाना रेसिस्ट होने की पहली निशानी है। श्वेतों को यह बात समझ में नहीं आती चाहें जितनी बार भी उन्हें इस बारे में समझाया जाए।


अमित मिश्रा: ऑस्कर पुरस्कारों पर भी इस बार रेसिस्ट होने के आरोप लग रहे हैं, आपका क्या कहना है।

मार्लोन जेम्स: वहां बैठे लोग सिर्फ रेसिस्ट ही नहीं आलसी भी हैं। वो फिल्म देखने की जहमत ही नहीं उठाना चाहते। मैं ऐसे पैनलिस्ट को जानता हूं कि वह थियेटर में जाकर मूवी देखने की बात तो दूर अगर उनके पास डीवीडी भी भेज दी जाए तो उसे भी आलस की वजह से पूरी नहीं देखते। उनेक पास इतना वक्त और दिमाग नहीं है कि वह सोच-समझ कर अश्वेत या एशियन को पुरस्कारों से दूर रखने की साजिश रचें। असल में वह यह सब सोच ही नहीं सकते। मुझे लगता है कि पुरस्कारों का चयन करने वाले ज्यादातर पैनल इस तरह के आलसी लोगों से भरे पड़े हैं।


अमित मिश्रा: आपका लेखन समाज की उस परत को कुरेदता नजर आता है जिसमें ढेर सारे बुरे कैरक्टर्स हैं, क्या ऐसा जानबूझ कर करते हैं।

मार्लोन जेम्स: मैंने जमैका में 70-80 के दशक का वह दौर करीब से देखा है जब आपको अपने आसपास वैसे तो सबकुछ बहुत शांत नजर आता है लेकिन पॉलिटिक्स से लेकर क्राइम तक जिंदगी में शिद्दत से घुलामिला रहता है। डर का एक सम्राज्य लोगों के दिमाग में घर कर चुका था। मेरी कहानियां उसी माहौल से निकली हुई कहानियां हैं।


अमित मिश्रा: अब जब लोग हल्की-फुल्की और साइज में पतली किताबें पढ़ना चाहते हैं लेकिन आप अब भी नैरेशन का काफी डिटेल स्टाइल अपनाते हैं इसका कोई खास कारण।

मार्लोन जेम्स: (मुस्कुराते हुए) मेरे लिखने का यही स्टाइल है। मैं डिटेलिंग में जाता हूं जिसकी वजह से किताब मोटी हो जाती है। शायद यही एक वजह थी कि मेरी पहली किताब को तकरीबन 70 पब्लिकेशंस ने रिजेक्ट कर दिया। मैं अपने कैरक्टर्स की शख्सियत और उनके साथ होने वाली घटनाओं की परत में जाना चाहता हूं। कहानी का असली तत्व वहीं से निकल कर आता है।


अमित मिश्रा: आपकी कहानियों में असल जिंदगी के कई कैरक्टर्स जैसे बॉब मार्ली, जमैकन गैगस्टर विंस्टन बरी बॉय और सीआईए एजेंट नजर आते हैं। क्या ऐसा जानबूझ कर करते हैं जिससे कहानी असल जिंदगी सी नजर आए।

मार्लोन जेम्स: मैंने अपनी किताब  अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ सेवन किलिंग्स  में मशहूर कल्चर स्टार बॉब मार्ली की हत्या को मेन प्लॉट के तौर पर रखा है। असल में यह कहानी मेरे दिमाग में 1991 से घूम रही थी जब मैं ग्रेजुएशन में था। अभी मेरा लेखन शुरु होने को था। मैंने टिमोथी व्हाइट की एक कहानी पढ़ी जिसमें एक युवा बॉब मार्ली की हत्या की साजिश रचता है। मेरे दिमाग में यह कहानी घर कर गई। उसके बाद बरसों तक यह प्लॉट मेरे दिमाग में घूमता रहा। चूंकि मैंने अपने आसपास खबरों में गैंगस्टर से लेकर सीआईए तक सबको महसूस किया है तो उनका इस कहानी में उतर आना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है।


अमित मिश्रा: आपकी कहानी में ढेरों ग्रे शेड के कैरक्टर्स नजर आते हैं। इनको इतनी तफ्सील से कैसे लिख पाते हैं।

मार्लोन जेम्स: मेरे माता-पिता दोनों ही पुलिस सर्विस में रहे हैं। मेरी मां डिटेक्टिव रही हैं। ऐसे में इन कैरक्टर्स को लेकर मेरा अलग तरह का आकर्षण है। ऐसे कैरक्टर्स लोगों को अपनी तरफ खींचते हैं। एक पाठक को भी किताब पढ़ने के बाद अक्सर वे कैरक्टर्स याद रह जाते हैं जिनमें ग्रे शेड ज्यादा होता है। शायद यही मेरे लेखन का आकर्षण है।


अमित मिश्रा: आपके फेवरेट राइटर कौन हैं।

मार्लोन जेम्स: मैं इस मामले में कुछ अलग हूं। मुझे लेखक नहीं लेखन आकर्षित करता है। मैं किताबों को आदर्श बना कर बड़ा हुआ हूं। मैं जॉन ओ हारा की किताब अपॉइंटमेंट इन समारा को पढ़ कर आश्चर्यचकित रह गया था। मैं किताब को आदर्श मानता हूं। हमारे साथ दिक्कत यह है कि हम किताबों से ज्यादा राइटर को पढ़ते हैं। लोग एक महान राइटर की दरमियांना किताब पर घंटो बर्बाद कर देते हैं जबकि एक छोटे राइटर की महान कृति को मिस कर देते हैं।


अमित मिश्रा: जमैका से अमेरिका आने के बाद वहां क्या बदलाव महसूस करते हैं।

मार्लोन जेम्स: वहां कहने को तो बहुत कुछ बदल रहा है लेकिन अब भी वहां बहुत कुछ ऐसा हो जो बदलने का नाम नहीं ले रहा है। मैं बात कर रहा हूं राजनैतिक परिस्थितियों की जो जैसी की तैसी हैं। करप्शन अब भी चरम पर है। आर्थिक रूप से जमैका कहीं पहुंचता नजर नहीं आ रहा, लोग मर रहे हैं सरकार बेमायने कदम उठा कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेती है। यह सब काफी निराशाजनक है, शायद उतना ही निराशाजनक जितना 10 साल पहले 20 साल पहले या शायद 50 साल पहले था।


अमित मिश्रा: आपने खुद को गे स्वीकार किया है। ऐसे में आप दुनिया भर में एलजीबीटी राइट्स के बारे में क्या सोचते हैं।

मार्लोन जेम्स: हर इंसान अपनी सोच को लेकर आजाद है और किसी को हक नहीं कि उस पर कोई विचार थोपे। किसी सरकार को भी नहीं। किसी के रहन-सहन पर टोका-टाकी साम्राज्यावाद का पहला लक्षण है। हम अब क्वीन के राज में नहीं रह रहे हैं। क्या अच्छा है क्या बुरा यह हमें क्वीन नहीं बताएंगी। इन बातों से बाहर आने का वक्त आ गया है। रोकटोक से कुछ होने वाला नहीं है। जो जैसा है वो वैसा है।


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