श्याम बेनेगल — हम जंगल राज में नहीं रह रहे हैं #JNURow


Shyam Benegal श्याम बेनेगल — हम जंगल राज में नहीं रह रहे हैं #JNURow #shabdankan
Photo: courtesy 'thebigindianpictureDOTcom' © TBIP (Shantenu Tilwankar)

असहमति सहन करना आना चाहिए

— श्याम बेनेगल

सुकरात विचार-विमर्श को ही बढ़ावा देते थे और सोचिए कि इसीलिए उन्हें जहर पीने की सजा दी गई। 


यह सहज घटनाक्रम था, जिसे जटिल बना दिया गया। ऐसा मेरा आकलन है। विश्वविद्यालय से जुड़े छात्र संघों ने कुलपति से यूनिवर्सिटी में एक सभा करने की इजाजत मांगी थी, जो उन्हें दी गई। बाद में कुलपति ने समय और जगह बदल दी। इसमें कोई खास बात नहीं थी। सभा करने की मुख्य वजह देश में एकाएक बढ़ी असहिष्णुता के विषय पर बात करना था। धर्मनिरपेक्ष देश में जिस सहिष्णु और सहनशील माहौल की जरूरत है, छात्र उस संबंध में बात कर रहे थे। हुआ यह कि इस मुद्दे पर बात करने के लिए जो ज्यादातर छात्र संघ थे, वे विचारधारा के वाम पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेकिन वहां पर एक और छात्र संघ भी है एबीवीपी का, जिसका संबंध सत्ताधारी भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से है। दावा है कि सभा में देश-विरोधी नारे लगाए गए और अफजल गुरु को महिमामंडित किया गया। यह सब एक तरफ हो रहा था।

दूसरी तरफ एबीवीपी के लोगों ने तय कर लिया कि ये लोग राष्ट्रविरोधी हैं और इसलिए उन पर हमला बोल दिया। छात्रों के बीच ऐसी घटनाएं हो जाती हैं। पर इसका बुरा पक्ष यह है कि परिसर में पुलिस बुला ली गई। कुलपति को ऐसा नहीं करना चाहिए था। जब आप पुलिस बुलाएंगे, तो वह वही करेगी जिसके लिए वह है। वह ताकत से हर चीज को रोकेगी। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे निकृष्ट पक्ष यह था कि छात्र नेता कन्हैया को कोर्ट में ले जाया गया और वकीलों के एक समूह ने उन पर वहां हमला कर दिया। यह हमला किसी की भी कल्पना से परे था।

अब संपूर्ण घटनाक्रम का क्या निष्कर्ष निकलता है? यही कि वहां पर यदि राष्ट्रविरोधी नारे लगे, तो संभवतः उनके द्वारा लगाए गए होंगे, जो लोगों को उकसाना और इस मामले को भड़काना चाहते थे। यह संभव है। किसी मीटिंग में दो-तीन लोग कुछ भी बक सकते हैं। नतीजा सामने है। यह सब राजनीतिक रूप से प्रेरित लगता है। जिन लोगों ने छात्रों को अदालत में पीटा, जिन्हें टीवी पर सबने देखा, अखबारों में जिनके फोटो छपे, उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया। इसका क्या अर्थ है? इससे मुझे लगता है कि जो हो रहा है, यह एकपक्षीय और अन्यायपूर्ण है।

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय बेहद प्रतिष्ठित है। वहां शिक्षा के मानदंड देश के अन्य विश्वविद्यालयों से कहीं ऊंचे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं। वास्तव में विश्वविद्यालय ही वह जगह है, जहां आप किसी भी बात पर सवाल कर सकते हैं। शिक्षा का लक्ष्य आपको इतना सक्षम बनाना है कि आप किसी भी विषय पर सवाल उठा सकें। प्रश्न करना ही शिक्षा हासिल करने का पहला कदम है। ऐसी शिक्षा का क्या मतलब, जिसमें जो कहा गया, आप सिर्फ उसे रटते गए? विचार-विमर्श, बहस और प्रश्न करना शिक्षा का खूबसूरत पक्ष है। इस नजरिये से देखें, तो जेएनयू का रिकॉर्ड बेहतरीन है। राजनीति भी क्या है? उसमें भी आप हर मुद्दे पर बहस कर सकते हैं। बात कर सकते हैं। आप पक्ष में रहें या विपक्ष में, विवाद और संवाद कर सकते हैं। पूरा घटनाक्रम एक विश्वविद्यालय में हो रहा था। विश्वविद्यालय आपके मस्तिष्क को सोच-विचार के लिए स्वतंत्र बनाने का काम करता है। यही सीखने तो आप वहां जाते हैं!

शिक्षा के सुकरात मॉडल को देखिए। सुकरात विचार-विमर्श को ही बढ़ावा देते थे और सोचिए कि इसीलिए उन्हें जहर पीने की सजा दी गई। वह क्या कहते थे...? यही कि आपका मस्तिष्क स्वतंत्र होना चाहिए और आपको किसी भी बात पर संदेह/सवाल करना आना चाहिए। यही तो आपको सीखना है। जो विश्वविद्यालय यह सिखाता है, वह अच्छा है। इसीलिए जेएनयू की प्रतिष्ठा है।

हमें एक-दूसरे की असहमतियों को सहन करना आना चाहिए। अगर आप मुझसे असहमत हैं, तो मुझे आपकी असहमति को सहन करने की क्षमता रखनी चाहिए। यह अर्थहीन है कि आप मुझसे सहमत न हों, तो मैं आपको पीट दूं। हम जंगल राज में नहीं रह रहे हैं। हम एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं, जिसका संविधान है। संविधान में हमें कई तरह की आजादी दी गई है। आप अपने मन से संविधान में सिर्फ इसलिए कुछ अतिरिक्त नहीं जोड़ सकते कि उस बात में आपका विश्वास है।

हालांकि मैं किसी एक घटना से यह निष्कर्ष नहीं निकालता कि देश को किसी एक खास विचारधारा से चलाने की कोशिश हो रही है। प्रधानमंत्री ने इस मामले में अभी तक कुछ नहीं कहा है और हम सब इंतजार कर रहे हैं। इस किस्म की घटनाओं में अगर हम उनके विचार जानना चाहते हैं, तो वह तभी संभव है जब वह कुछ कहें। अन्यथा काफी असमंजस पैदा होता है, क्योंकि लोग अपने-अपने ढंग से मतलब निकालते हैं। आप एक तरफ से उनकी हां समझ सकते हैं और दूसरी तरफ से भी हां समझ सकते हैं। यह गलत है कि लोग अपने अनुरूप मतलब निकालें कि वह क्या सोचते हैं। असल में इस मामले की गंभीरता इतनी है कि प्रधानमंत्री हस्तक्षेप करें और सीधे अपनी बात कहें कि उन्हें क्या सही लगता है और क्या गलत। इससे काफी कुछ सुलझ जाएगा ।


अमर उजाला से साभार 
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