हिंदी कहानी — लव यू है- हमेशा — अनुज

उत्तर आधुनिक जगत की कहानियों में युवाओं में प्रेम का जो स्‍वरूप आया है वह अकादमिक जगत का है युवाओं का प्रथम प्रेम सबसे पहले महसूस कालेज या विश्‍वविद्यालय (अकादमिक संस्‍थाओं से) में होता है। अनुज की कहानी ‘लव यू हमेशा' अकादमिक जगत में होने अंतर्द्धन्‍द का खुला चित्रण करती है। सोनल और तिमिर का ‘प्‍लेटोनिक लव' नहीं ‘रीयल लव' है, ‘‘हाँ मिलते हैं। चल फिर, लव यू है.................। लव यू है............।''  — नया ज्ञानोदय, सितम्‍बर 2009

Hindi Prem Kahani Love you hai - Hamesha — Anuj

Hindi Prem Kahani 

Love you hai - Hamesha — Anuj


"लव यू है- हमेशा —अनुज



{"यह एक काल्पनिक कहानी है। इस कहानी के सभी पात्र और स्थान काल्पनिक हैं जिनका किसी भी जीवित अथवा मृत व्यक्ति या किसी भी स्थान विशेष से कोई संबंध नहीं है। यदि किसी पात्र या स्थान विशेष से किसी व्यक्ति या स्थान विशेष की किसी प्रकार की समानता का कोई भ्रम होता भी है तो यह महज एक संयोग होगा। " -अनुज, (इस कहानी का लेखक)}



सोनल ने डायरी के पन्ने खोले और कुछ लिखने की कोशिश करने लगी। पहला शब्द लिखा- "तिमिर...ज़िन्दगी में सबकुछ पूर्वनियोजित हो, ज़रूरी नहीं होता। बहुत कुछ ऐसा भी होता चलता है जिसकी ना कोई पूर्वपीठिका होती है और ना ही अनुमान। आदमी बस उसे भोगते जाने को अभिशप्त होता है।"  फिर  लेट गयी चित। छत पर लटके पंखों को देखते हुए उसने कलम का पिछला हिस्सा मुँह से दबा लिया। ऐसा लगा जैसे खोई-सी जा रही हो किसी कभी ना ख़त्म होने वाले ख़यालों में।

सोनल की ज़िन्दगी में सब कुछ अप्रत्याशित ही तो था! एक छोटे से कस्बे से आकर किसी महानगर में पढ़ना उसकी ज़िन्दगी की कोई कम बड़ी घटना नहीं थी!  हिन्दू कॉलेज में दाखिला एक बड़ी बात होती थी। लेकिन 'प्लस-टू' में इतने अच्छे अंक थे कि दाखिला आसानी से मिल गया था। उस दिन सोनल ने तो फोन पर ही न जाने कितने ही रुपये खर्च कर दिए थे! सभी दोस्तों से लेकर रिश्तेदारों तक, सब को ख़बर देना ज़रूरी था। पापा भी फूले नहीं समा रहे थे! लेकिन ईर्ष्यालुओं की भी कहाँ कमी थी! उन्हें तो किसी का अच्छा भी बुरा ही लगता था।

कइयों ने तो यह उलाहना भी दे डाली, "एक तो बेटी, दूजे घर से इतनी दूर, इतने बड़े शहर में जाकर अकेले रहकर पढ़ना! और पढ़ना भी क्या- हिन्दी, राम-राम!" पूरी रिश्तेदारी में काना-फूसी होने लगी थी।

कुछेक को तो रहा न गया तो आकर बोल भी गए- "सोमेश्वर बाबू, आपकी एक बेटी डॉक्टर है और दूसरी इंजीनियर, फिर यह कहाँ से आ गयी टाट में पैबंद। इसे क्यों भेज रहे हैं हिन्दी-फिन्दी पढ़ने! अरे, जब दिन ही काटना है तो यहीं भागलपुर में रहकर पढ़ने में क्या दिक्कत है? यहाँ भी तो बच्चे पढ़ ही रहे हैं?"

लेकिन पापा पर कहाँ पड़ता था किसी का प्रभाव!  बस मुस्करा-भर रह जाते थे। वे जानते थे कि बच्चों को वही पढ़ाना चाहिए जिसमें उनकी  रुचि हो। पढ़ाई-लिखाई और कैरियर से लेकर शादी-ब्याह तक, पापा का विचार था कि बच्चों की इच्छा और रुचि ही सर्वोच्च होती है। पापा सामाजिक चाल-चलन से अधिक बच्चों की पसंद-नापसंद का ध्यान रखते थे।

वे कई बार हँसते हुए मम्मी को कहते -"मोनी-माँ, तुम्हारी इस कलाकार बेटी के लिए, कहाँ से ढूँढ़ कर लाएँगे चित्रकार-साहित्यकार!"

इसबात पर मम्मी हँसते हुए कहतीं -"आजकल का बच्चा लोग कहाँ है माँ-बाप के कहने में। ई सब तो अपने से कर लेगा अपने पसंद का।"

तब पापा हँसते हुए कहते-"अच्छा ही है ना। आप जितना हमसे चोरा-चोरा कर आलमारी में रखते रहते हैं, आपका उ सब बच जाएगा। कुछ देना नहीं पड़ेगा।"

इसबात पर मम्मी नाराज़ हो जातीं और बोल पड़तीं-"हाँ, हम तो उ सब लेकर ही ऊपर जाएँगे। अब हमलोग करें या फिर कि ई सब कर ले अपने से, देना तो पड़ता ही है। अरे, लोग तो दामाद को एस्टेट लिख देता है, हम तन्का सा बचा के रख लेते हैं बेटी-दमाद के लिए तो लगता है आपको आँख में गड़ने!"

मम्मी नाराज़ होकर रूठ जातीं और चोर नज़र से देखते हुए इंतज़ार करने लगतीं कि पापा मनाने के लिए आते हैं या नहीं।

पापा आकर मनाते और बोलते- "तुम आज भी गुस्से में उतनी ही सुन्दर दिखती हो।" मम्मी खिलखिला कर हँस पड़तीं।

हिन्दू कॉलेज आने के पहले तक सोनल का पूरा जीवन तो संरक्षण में ही बीता था। कब दाखिला मिला और कब फीस जमा हो गयी, कहाँ कुछ पता होता था! सबकुछ तो पापा ही कर आते थे। दो-दो बड़ी बहनें थीं संरक्षण को और एक छोटा भाई प्यार बाँटने को। सबकुछ कितना सुखद था जीवन में! ज़िन्दगी सुरक्षा घेरे में चल रही थी। शहरी वातावरण में पले-बढ़े किसी 'प्रोटेक्टेड चाइल्ड' की जैसी स्थिति हो सकती थी, सोनल की भी वैसी ही थी।

पापा और मम्मी दोनों स्कूल में शिक्षक थे इसलिए घर का माहौल भी स्कूल जैसा ही था। शिक्षा-दीक्षा का वातावरण बना रहता था। नैतिकता ही मूल-मंत्र होती थी। आँखें खुली तो घर में 'विज्ञान प्रगति', 'सार्इंस रिपोर्टर' और 'नंदन' जैसी मौजूदा समय की चर्चित और ज्ञानवर्धक बाल-पत्रिकाएँ दिखीं। बात 'चंपक' और 'चंदा-मामा' से आगे बढ़ी भी तो 'धर्मयुग' और 'फ्रंटलाइन' पर आकर टिकी। माँ अंग्रेजी पढ़ाती थीं इसीलिए पापा से जब लड़ाई भी होती, तो मम्मी के मुँह से 'यू टू ब्रूटस' से बड़ी झिड़की कोई दूसरी ना निकल पाती!

बच्चों पर पापा से अधिक मम्मी का ज़ोर चलता था। पापा ने बच्चों को एक बात ख़ूब अच्छी तरह से समझा दी थी कि पढ़ाई-लिखाई से जी चुराने वाले बच्चों को ज़िन्दगी में बकरी चरानी पड़ती है या  फिर कि उन्हें भीख माँगनी पड़ती है। लेकिन पापा को शायद पढ़ाई से जी चुराने वाले बच्चों में ही सबसे ज्यादा दिलचस्पी रहती थी! तभी तो सोनल के घर के दलान में शाम के समय बकरी चराने वाले तमाम छोटे-छोटे बच्चों का मजमा जमा रहता और पापा उन्हें अपनी फुलवारी से तोड़े हुए आम-अमरूद और लीची बाँटते हुए गिनती-जोड़-घटाव सिखलाया करते।

पापा ज्ञान बाँटने में कभी कोताही न करते। जब भी मौका मिलता पूरा फायदा उठाते। रोटी खाते हुए भी पापा को चाणक्य और चन्द्रगुप्त की कहानी ही याद आती। मम्मी भी कोई कम ना थीं! एक दिन सोनल को अँधेरे में कोई भूत दिखा। मम्मी ने भूत के फेरे में पूरा हैमलेट ही बाँच डाला था।

सोनल अबतक गिन नहीं पाई थी कि हिन्दू कॉलेज में कितनी दीवारें और कितने खंभे हैं। लेकिन बीतते समय के साथ यह जानने लगी थी कि दीवारें लाल और खम्भे सख्त हैं। जब भी समय मिलता फूलों की क्यारियों के बीच पीपल के पेड़ के साथ बने चबूतरे पर आकर बैठ जाती। पीपल के पेड़ के चारों तरफ लाल-पीले धागे लिपटे रहते और फूल-अक्षत के बीच कभी कोई छोटा सा आईना और एक कंघी पड़ी रहती। पेड़ को प्रणाम कर सोनल आईना उठा लेती। आईना इतना छोटा होता कि उसमें एक बार में चेहरे का कोई एक भाग ही दिख पाता। आँखें दिखतीं तो नाक नहीं, होंठ और दाँत दिखते तो गाल नहीं। शायद सोनल इसी छोटे से आईने में अपने लिए एक 'इमोशनल सेल्टर' ढूँढ़ने लगी थी।

यही वह समय था जब तिमिर ने सोनल की ज़िन्दगी में हौले से कदम रखा था। तिमिर ने उसे वैसा ही इमोशनल सेल्टर दिया था जिसकी ज़रूरत शायद उस उम्र के सभी युवाओं को होती है। अब तो दोनों प्राय: रोज मिलने लगे थे।

"आज बहुत देर कर दी? मुझे मेट्रो पर इंतज़ार करना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।"

"सॉरी यार"

"अच्छा अब चलो"

"चलो"

"कुत्ता वाले प्लेस पर चलें?"

"चलें, कुत्ता भी सब समझता होगा, बोलता कुछ नहीं है।"

"एक सभ्य कुत्ता है, हमलोगों को देखते ही जगह खाली करके उठ जाता है।"

तिमिर और सोनल साथ टहलते हुए हल्की-हल्की झाड़ियों के बीच बने चबूतरे की ओर बढ़ने लगे थे। आज सोनल थोड़ी शान्त सी दिख रही थी। सोनल को थोड़ी शांत देखकर तिमिर बोला,

"आजकल तो सभ्यता सिर्फ कुत्तों में ही बच गयी है। आदमी हों तो अभी आ जाएँ लाठी लेकर।"

"उस कुत्ते को भी यही जगह पसंद आती है"

"थोड़ा-थोड़ा अँधेरा और कोजी-कोजी लगता है ना? शायद इसीलिए।"

"हाँ, कोजी तो लगता है।" फिर थोड़ा थमकर बोला, "लेकिन कई बार मुझे यह भय लगता रहता है कि वो सामने के ग्राउंड में लड़के वॉलीबॉल खेलते रहते हैं, किसी दिन मामला ना फँसा दें!"

"तुम इतना क्यों डरते रहते हो लोगों से? छोटी सी तो ज़िन्दगी होती है, और वो भी हमसब जीवन-भर डरते-डरते गुज़ार देते हैं।"

फिर थोड़ा थमकर बोली, "मैं तो उस पार्क वाले फील्ड में भी खुलेआम बैठने से नहीं डरती।"

"अच्छा......भूल गयी वह जाड़े की दुपहरी जब हमलोग उस पार्क में बैठे थे और अपने-अपने कैरियर के बारे में डिस्कश कर थे, तब कैसे वो सिक्योरिटी गार्ड आ गया था और डंडा दिखाकर आलतू-फालतू बातें बोलने लगा था?"

"हाँ याद है, सब याद है, और तुम भी लगे थे उससे लड़ने। तुम ये हर जगह लड़ने क्या लगते हो? ऐसे हर जगह लड़ा मत करो। तुम मेरे लिए बहुत प्रेसस हो। उसी दिन, वो गार्ड कहीं एक-दो डंडा लगा देता तो?"

"उसी डंडे से साले का सिर तोड़ देता।"

"ओह-हो, मुझे तो मालूम ही न था कि मैंने किसी अखाड़े के पहलवान से फ्रैंडशिप कर ली है।"

"अखाड़े के पहलवान से नहीं मैडम, ताइक्वांडो के ब्लैक बेल्ट सेकण्ड डैन प्लेयर से।"

"प्लीज, गिव मी ए ब्रेक......झूठे कहीं के।"

"नहीं यार, सच्ची ..."

"रीयली...आई एम इम्प्रेस्ड! कब घटी ये दुर्घटना?"

"दुर्घटना नहीं है मैडम, कड़ी मेहनत की है, तब जाकर कहीं पाँव जमा पाया हूँ इस फील्ड में।"

"मुझे मालूम है कि कितनी मेहनत की होगी, आलसी कहीं के।"

"ताइक्वांडो की दुनिया आपकी ऐकेडमिक दुनिया नहीं है मैडम, जहाँ कई अकड़म-बकड़म लोग भी समीकरण जोड़-जाड़ कर लेक्चरर-प्रोफेसर बन जाते हैं, आता-जाता चाहे उन्हें घास-फूस ना हो। इस खेल में कुछ पाने के लिए फाइट करनी पड़ती है। सीधी-सीधी फाइट," तिमिर ने अपने बाजुओं को सख़्त बनाकर दिखाते हुए कहा था।

तिमिर की बातें सोनल को चुभ-सी गयी थीं।

धीमे स्वर में बोली, "ऐसा नहीं है तिमिर कि अकड़म-बकड़म लोग ही भरे हुए हैं इस फील्ड में। बहुत अच्छे-अच्छे लोग भी हैं। मेरे पापा-मम्मी और दादा जी भी तो अकादमिक दुनिया के ही लोग हैं। और सब छोड़ो, यहीं इसी हिन्दू कॉलेज में, प्रो.राणा, प्रो.जकरिया और सुचिता मैम जैसे लोग भी तो हैं जो पढ़ाते हैं तो ऐसा लगता है कि साक्षात् सरस्वती उतर आई हों सामने। ये लोग जब पढ़ाते हैं तिमिर, तो पापा-मम्मी और दादाजी याद आ जाते हैं।"

यह सुनकर तिमिर चुप हो गया था। वह समझ गया था कि सोनल फिर से दुखी हो गयी है।

सोनल का साहित्य-प्रेम शायद मम्मी की ही देन थी। कला की सूक्ष्म समझ और बौद्धिकता तो दादा जी ने विरासत में ही दे दी थी। दादाजी कला की मार्क्सवादी आलोचना के विशेषण माने जाते थे और अपने देश में ही नहीं, पूरी दुनिया के कलाविदों में उनकी अच्छी साख थी। पापा बताते थे कि किस तरह घर पर देश के बड़े-बड़े चित्रकारों का मजमा जमा रहता था। चित्रकार तो चित्रकार, कहते हैं कि बाबा नागार्जुन से लेकर राजकमल चौधरी जैसे हिन्दी के शीर्षस्थ साहित्यकार तक उनके मुरीद हुआ करते थे। जब पाब्लो पिकासो ने लेनिनग्राद में दादाजी से विशेषकर मुलाक़ात की थी, तब इस ख़बर को लंदन टाइम्स ने अपना फर्स्ट लीड बनाया था और मास्को के एक लीडिंग जर्नल ने दादाजी के व्यक्तित्व का पूरा जायजा लेते हुए उनका एक लम्बा सा इंटरव्यू भी छापा था। लेकिन अब तो दादा जी ना सुनते थे और ना ही अब उनकी आँखें उनका साथ दे रही थीं। इसीलिए बाहर-तो-बाहर, घर के सदस्यों के बीच भी उनका रसूख थोड़ा कम हो गया था। दूसरी ओर, जब से बौद्धिक-समाज में बौद्धिकता के पैराडाइम धर्म, जाति और व्यक्तिगत संबंधों के आधार पर गढ़े जाने लगे थे, अपने देश के बौद्धिक-समाज ने भी उन्हें पूरी तरह से भुला दिया था। ऐसे में, वे भी मौजूदा व्यवस्था से नाता तोड़ अपनी दुनिया में लीन रहने लगे थे और कहने लगे थे-"काल ही सबका निर्णय करता है, मेरा भी करेगा।"

सोनल ने उनसे बहुत कुछ ले लिया था। यह दादाजी की ही विरासत थी कि उसकी बुद्धि तीक्ष्ण और विश्लेषण क्षमता इतनी प्रखर थी। उसकी प्रखर बुद्धि कला की उस सूक्ष्मता को देख लेती थी जिसे मौजूदा समय के चर्चित कला-मर्मज्ञ भी नहीं देख पाते थे और सोनल अनायास ही तथाकथित कला-मर्मज्ञों से बौद्धिक-बहस में उलझ पड़ती थी। उसकी मासूम सोच मौजूदा बौद्धिक-समाज के इस सत्य से अनभिज्ञ थी कि कला से संबंधित बौद्धिक परिचर्चा में कला की सूक्ष्मता से अधिक कलाकार और कला मर्मज्ञों का अहं महत्वपूर्ण होता है।

अब तक दोनों चबूतरे पर आकर जम गए थे। कुत्ता भी हमेशा की तरह उन्हें देखकर दुम हिलाता हुआ उनके पैरों को चाटने लगा था और तिमिर के 'हट' कहते ही दूर जाने लगा था। एक लम्बी चुप्पी के बाद तिमिर ने बात आगे बढ़ाई।

"मैं भी तो तुम्हें कब से यही बात समझाना चाहता हूँ सानूं, कि दुनिया केवल बुरे लोगों से भरी हुई नहीं है। अच्छे-बुरे लोग तुम्हें हर जगह मिल जाएँगे, हर फील्ड में। हमें जीना तो इसी दुनिया में है ना। इसीलिए हमें हर हाल में परिस्थितियों से लड़ना चाहिए और अपने लिए रास्ते बनाने चाहिएँ। पंखे से लटक-कर मर जाना और सब छोड़-छाड़ कर ज़िन्दगी से भाग जाना किसी समस्या का समाधान थोड़े ही होता है! सारी लड़ायी तो ज़िन्दा रहने के लिए है। मरने के बाद क्या बच जाता है! इसीलिए मैं तुम्हें बार-बार कहता रहता हूँ कि तुम्हारे जैसी ब्रेव लड़की को लड़ना चाहिए, लड़ना चाहिए परिस्थितियों से।"

"लड़ ही तो रही हूँ, और कर क्या रही हूँ इतने दिनों से! तिमिर, जब से तुम मिले हो, लगता है कि अब बुरे दिन ढलने लगे हैं।"

"ठीक कह रही हो, बुरे दिन क्या अब तो शाम भी ढलने लगी है.....हमें अब चलना चाहिए।" सोनल जब भी अतीत में गोता लगाना शुरु करती, तिमिर उसे खींचकर वर्तमान में ले आता।

"मेरा तो जी नहीं करता तुम्हें छोड़ कर जाने को।"

"जी तो मेरा भी नहीं करता, लेकिन क्या करूँ, जाना तो पड़ेगा...।" फिर हँसते हुए बोला, "तुम्हारा ही डॉयलाग बोल रहा हूँ।"

दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े। दोनों ने हमेशा की तरह एक-दूसरे से विदाई ली,

"अच्छा तो चल, कल मिलते हैं..."

"हाँ कल मिलते हैं, लव यू है..."

"लव यू है...।"

सोनल को हिन्दू कॉलेज आए हुए अभी एक-डेढ़ वर्ष ही बीते थे कि सोनल का उत्साह ठंडा सा पड़ने लगा था।  अब तो जैसे उदास सी रहने लगी थी। नहीं तो एक समय था कि कॉलेज में उसका जज्बा देखते बनता था। कॉलेज में कोई सेमिनार हो या कि नुक्कड़ नाटक, वाद-विवाद प्रतियोगिता हो या कि खेल का मैदान, पूरा हिन्दू कॉलेज सोनल-मय रहता था। अध्ययन इतना गहरा था और पढ़ाई-लिखाई की ट्रेनिंग बचपन से ही ऐसी मिली थी कि सेमिनार में आए वक्ताओं को उससे जवाब-तलब करते हुए बार-बार पानी की बोतल मुँह से लगानी पड़ती थी। सेमिनार में चर्चा-परिचर्चा करते हुए सोनल तो यह सोचती थी कि उसने गेस्ट वक्ताओं की थोथी विद्वता की कलई खोलकर अपने कॉलेज के प्रोफेसरों का सिर ऊँचा कर दिया है। लेकिन उसे क्या मालूम था कि ऐसा करके वह एकसाथ कई-कई मुसीबतें मुफ्त मोल ले रही थी। पापा ने तो बचपन से यही सिखलाया था कि जो बच्चे कक्षा में क्यों, कब और कैसे पूछते हैं, वे ज़िन्दगी की दौड़ में सबसे आगे रहते हैं। लेकिन हिन्दू कॉलेज में परिस्थितियाँ अलग दिख रही थीं।

अबतक तो वह प्रोफेसरों की आँखों में खटकने भी लगी थी। नहीं भी खटकती यदि दुधारू बन जाती! लेकिन अपने को मारकर परिस्थितियों से समझौता करना कहाँ सीखा था उसने! इसीलिए एक समय की अव्वल डिबेटर अब कॉलेज के दिग्गजों के बीच मुँहफट नाम से पहचानी जाने लगी थी।

कॉलेज में भी तो आए दिन उसके साथ अप्रत्याशित घटनाएँ होती ही रहती थी। दूसरे लोग तो हँसकर उड़ा देते, लेकिन वह थी कि दिल से लगा बैठती। उसी दिन जब सोनल कॉलेज के कॉरीडोर में खड़ी अपनी अकड़न ठीक कर रही थी कि सामने से गुज़रते प्रो.कमल की आह सुनकर चौंक गई।

प्रो.कमल कह रहे थे, "यूँ मादक अँगड़ाई मत लो सोनल, हवायें थम जाएँगी, और लोग दीवानगी की हद से ज्यादा दीवाने हो जाएँगे।"

गुरु पिता के समान होता है। बचपन से तो यही सुनती आई थी! लेकिन शायद बड़े-बड़े शहरों में नैतिकता के मानदंड भी बदल जाते हैं! यह सब देख उसका मन छोटा हो जाता। जब भी ऐसा कुछ होता दौड़ कर पहुँच जाती तिमिर को बताने। तिमिर भी जैसे उसके दर्द को बाँटने ही उसकी ज़िन्दगी में आया था। तिमिर को वह पूरी बात तो नहीं बताती थी लेकिन उसकी बातों से तिमिर इतना तो समझ ही चुका था कि कॉलेज में हवा सोनल के खिलाफ बह रही है।

तिमिर ने पूछा, "मेरी समझ में ये बात नहीं आती है सानू कि आखिर सब तुम्हारे पीछे ही क्यों पड़े हुए हैं?"

आज सोनल भी जैसे भरी ही बैठी थी।

बोलने लगी, "देखो तिमिर, तुम लड़की होते ना तो तुम्हें कुछ बातें अपने-आप समझ में आ जातीं। कई बार एक लड़की अपनी जिस सुन्दरता पर इतराती फिरती है, वही सुन्दर शरीर कभी-कभी उसके गले का ढोल बन जाता है। दूसरी बात यह कि मैं बैक बेंच पर सिकुड़कर बैठने वाली कोई लड़की नहीं हूँ।" फिर थोड़ा दम भरकर बोली, "क्या समाज के ये तथाकथित ठेकेदार यह तय करेंगे कि मैं क्या पहनूँ और और क्या नहीं? वे चाहते हैं कि सभी लड़कियाँ सलवार-कुर्ती पहनें और चार मीटर चौड़ा दुपट्टा लपेटकर कॉलेज आएँ और किताबों को सीने से चिपकाकर ही चलें। नज़रें नीची रखें और खिलखिलाकर तो बिल्कुल ना हँसे। कहते हैं कि हमें भारतीय संस्कृति की रक्षा करनी चाहिए।" तिमिर मामले को ठीक से समझना चाहता था इसीलिए सोनल को बीच-बीच में कुरेद भी रहा था।

"सानू, भारतीय संस्कृति के कुछ मानदंड हैं, हम ख्याल नहीं करेंगे तो फिर कौन करेगा?"

"तुम भी कोई कम बड़े एंटी-फेमिनिस्ट थोड़े ना हो! एक बात बताओ, क्या भारतीय संस्कृति को सुरक्षित रखने का सारा ठेका हम लड़कियों के ही जिम्मे है? और ये कौन होते हैं यह तय करने वाले कि भारतीय संस्कृति क्या है और कैसी होनी चाहिए? और ये कैसी संस्कृति है जो लड़कियों के शरीर पर के कपड़ों की लम्बाई से तय होती है? यह कैसा मानदंड है? किसी लड़की के शरीर पर यदि तीन मीटर कपड़ा है तो आपकी संस्कृति सुरक्षित है, और यदि वह कपड़ा घटकर ढाई मीटर हो जाता है तो आपकी यह महान संस्कृति ख़तरे में आ जाती है! और कहीं ग़लती से वह कपड़ा यदि डेढ़ मीटर हो जाए, तब तो बस समझ लो कि संस्कृति ध्वस्त ही हो गयी! अरे, यह कैसी संस्कृति है? कमाल की बात है! अगर वे इसी को भारतीय संस्कृति कहते हैं तो मैं नहीं मानती ऐसी संस्कृति को और मैं अपने को उस संस्कृति का अंग भी नहीं समझती।"

"अब तुम्हारी यही सब बातें हैं कि लोग तुमसे चिढ़ जाते हैं। देखो सानू, बहुत पुरानी कहावत है कि नदी की धार के साथ ही तैरना चाहिए।"

"अच्छा! तो फिर बड़ी-बड़ी फिलॉसफी तो ना झाड़ें! जुबान से कुछ और व्यवहार में कुछ! इन्हें जो जी में आता है वो कर सकते हैं, लेकिन गर हम कुछ करें तो भारतीय संस्कृति पर ख़तरा मँडराने लगता है! भारतीय संस्कृति...बुलशिट।" सोनल का चेहरा तमतमा उठा था।

फिर दोनों के बीच एक लम्बी चुप्पी छा गयी।

चुप्पी तोड़ते हुए तिमिर ने समझाया, "थोड़े दिनों की तो बात है, पास हो जाओगी फिर कहाँ मिलेंगे ये सब। छोड़ दो गुस्सा और मान लो वे जैसा चाहते हैं।"

"क्यों मान लूँ? और किस-किस की क्या-क्या मान लूँ? सारी ज़िन्दगी तो सामने वाले की ही मानती रही हूँ। पापा-मम्मी, अंकल यहाँ तक कि पड़ोसियों की भी! आजतक मानती ही तो रही हूँ...सिर्फ इसलिए कि लोग मुझे अच्छा कहें, सुशील और सभ्य समझें! लेकिन अब नहीं। अब नहीं यार, बहुत हो गया।"

तिमिर चाहता था कि सोनल में व्यावहारिक समझदारी आ जाए लेकिन उसकी तबतक ना चली जब तक कि सोनल ने मामले को बिल्कुल बिगाड़ नहीं लिया। और तिमिर को भी तो यह बहुत बाद में समझ में आया कि मामला इस कदर बिगड़ चुका है कि बात सम्भाले नहीं सँभलने वाली। उस दिन भी सोनल बहुत शांत सी दिख रही थी। एक गहरी उदासी उसके माथे पर खेल रही थी।

तिमिर ने सोनल को सीने से लगाकर माथा चूम लिया और समझाने लगा, "ये सब तुम्हारे लायक नहीं हैं सानू, तुम मिसफिट हो गयी हो इनके बीच। देखो सानू, आज के बाद इन मूर्खों की बात पर तुम कभी उदास हुई तो फिर मुझसे कभी बात मत करना। अरे, ये हिन्दू कॉलेज ही तुम्हारी ज़िन्दगी है क्या? दुनिया में बहुत कुछ पड़ा है करने को, अभी तुम्हारी ज़िन्दगी थोड़ ना ख़त्म हो गयी है! "

"तो फिर मैं क्या करूँ तिमिर, ये लोग मेरे घर पर लेटर भेजने वाले हैं। कहते हैं कि पापा को बुलवायेंगे। तिमिर, पापा ये सह नहीं पाएंगे। वे मर जाएँगे तिमिर। पापा को बहुत नाज है अपनी तीनों बेटियों पर।" बोलते हुए सोनल सुबकने लगी थी।

"तो क्या हुआ, पापा को बता देना सबकुछ सच-सच।"

"हाँ, और पापा सब मान जाएँगे! पापा सपने में भी नहीं सोच सकते हैं कि टीचर्स ऐसे हो सकते हैं जैसी-जैसी हरकतें करते हैं ये सब। वे कतई विश्वास नहीं करेंगे कि मैं जो बोल रही हूँ वह सब सच है। मुझे सीधे-सीधे घर बुला लेंगे और फिर चली जाएगी मेरी बाकी की पढ़ाई-लिखाई चूल्हे-चौके में।"

"किसी टीचर से बात करो ना।"

"किससे बात करूँ यार, कौन देगा मेरा साथ? किसी में इतनी हिम्मत नहीं है।"

"किसी क्लास मेट से बात करो।"

"अरे यार, ये सब ठीक रहते तो यही हालत होती विभाग की। कुछेक से बात की है, वे सब भी समझते हैं, लेकिन आखिर वे सब भी तो स्टूडेंट ही हैं, कैसे विरोध में खड़े हो जाएँ!"

"तुम क्यों उलझती रहती हो लोगों से? चुप नहीं रह सकती, और सब जिस तरह से रहते हैं?"

"क्या करूँ, कोई ग़लत बोलता है तो मन नहीं मानता। सर ने जो कह दिया वही मान लूँ, यह जानते हुए कि......! अरे यार, मैंने भी सिमोन को पढ़ा है। यदि कोई सिमोन को या बेटी फ्राइडन को गलत कोट करेगा तो मैं बीच में बोलूँ नहीं! हद हो गयी! मेरे पापा ने मुझे बचपन से ही सिखलाया है कि जो बच्चे क्लास में क्यों और कैसे पूछते हैं वे हमेशा ही आगे रहते हैं। क्या क्लास में सवाल पूछना गलत है? क्या सेमिनार में गेस्ट-वक्ताओं से किसी विषय पर खुली चर्चा करना गलत है?" सोनल तर्क-वितर्क करने लगी थी। तिमिर चुप होकर उसकी बातें सुनने लगा था।

"तुम नहीं जानते तिमिर, ये सब लोग सेमिनार करने का ढोंग-भर करते हैं। इनका मकसद स्वस्थ और ज्ञानवर्धक चर्चा करना नहीं होता, ये तो बस चापलूसी करना जानते हैं। चापलूसी में दोयम दर्जे के अपने-अपने लोगों को बुलाते हैं, और चाहते हैं कि सभी बच्चे गेस्टों की बकवास चुपचाप सुनते रहें, बीच में कुछ ना बोलें, और बीच-बीच में ताली भी बजाएँ। हॉरिबल.....सॉरी, मैं इतनी चापलूसी नहीं कर सकती और इस तरह की चप्पल-चट संस्कृति में नहीं जी सकती!" सोनल गुस्से में आ गयी थी।

"सानू, तुमने कभी नदी में उग आई बड़ी-बड़ी घास को देखा है? नदी की जब धार तेज होती है, ये घास झुककर लेट जाती है, और इंतज़ार करने लगती है धार के निकल जाने का। और जब पानी की तेज धार निकल जाती है तब घास फिर से पहले जैसी स्थिति में खड़ी हो जाती है। समाज में जीने के लिए भी ऐसी ही तरक़ीब अपनानी चाहिए।"

"अब मुझे नहीं आती इतनी राजनीति करने।" सोनल खीझ से भर उठी थी।

"लेकिन फिर भी, थोड़ा तो डिप्लोमैटिक होना पड़ता है, सानू।" तिमिर ने समझाने की कोशिश की।

"तो तुम क्या चाहते हो? मैं जाकर सो जाऊँ कमल सर और राय सर जैसे लोगों के बिस्तर पर!" बोलते हुए सोनल का गला भर आया था।

"नहीं बच्चे, मैंने ऐसा कब कहा!" तिमिर ने सोनल को सीने से लगा पीठ पर हल्की-हल्की थपकी देने लगा था।

"मैं पागल हो जाऊँगी तिमिर, मैं मर जाऊँगी। मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि मैं क्या करुँ।"

"ऐसी बुरी-बुरी बातें नहीं बोलते। ज़िन्दगी में कितनी सारी ही कठिनाइयाँ आती रहती हैं, फिर भी लोग-बाग उसका सामना करते हैं, डरकर भाग थोड़े जाते हैं। सब ठीक हो जाएगा, तुम चिन्ता ना करो। अच्छा, अब जाओ, हॉस्टल का टाइम हो गया है। समय पर नहीं पहुँची तो डिनर भी नहीं मिलेगा।"

"कल कब मिलोगे? तुम आ जाते हो तो मुझे नई ताक़त मिल जाती है।"

"हाँ, कल मिलते हैं। चल फिर, लव यू है..."

"लव यू है..."

सोनल हॉस्टल की ओर जाने लगी थी। वह आज जैसे भरी जा रही थी। अचानक पलटी और फिर दौड़ पड़ी तिमिर की ओर। तिमिर के क़रीब आकर अचानक उससे लिपट गयी। आँखें डबडबा आई थीं। कंधे पर सिर रखकर सुबकने लगी।

वास्तव में, सोनल की मुश्किलों की शुरुआत तो उसी दिन से हो गयी थी जिस दिन प्रो.रामजनम राय ने उसे ड्रामा-क्लब में शामिल होने के लिए कहा था। सोनल ने अपनी नारी-सुलभ सूक्ष्म दृष्टि से प्रो.राय की गुप्त मंशा भांप ली थी और क्लब की सदस्यता से इनकार कर दिया था। राय साहब ने अपने लिए दूसरा ठिकाना तो ढूँढ़ लिया था लेकिन उनके मन में यह शूल चुभा रह गया था।

लेकिन ऐसा नहीं था कि सिर्फ प्रो.राय ही चिढ़े बैठे थे। सोनल को भोगने की अदम्य इच्छा रखने वालों में प्रो. कमल का नाम भी अव्वल लिया जाता था। प्रो. अर्चना अब उनके लिए काफी नहीं रह गयी थीं। लेकिन सोनल की ओर उनका झुकाव डा. अजय के लिए सुखद न था, क्योंकि सोनल पर नज़र गड़ाए रखने वालों में डा. अजय भी शामिल थे। जब डा. अजय इस बात पर प्रो. कमल से विवाद करते और उनके तथा सोनल की उम्र के बीच के फासले का हवाला देते तब प्रो. कमल प्रेम को परिभाषित करते हुए कहते, "ना उम्र देखो, ना जाति देखो, ना देखो किसी का मन, प्यार करो जब भी, तो देखो केवल तन.....।"

कॉलेज में यह चर्चा आम थी कि डा. अजय सोनल से मन-ही-मन प्यार करने लगे हैं। डा. अजय विभाग के अपने क़रीबी दोस्तों के बीच यह बात बड़ी बेबाक़ी से बताते भी थे कि वे किस तरह अपनी कल्पना में सोनल को कई बार भोग चुके हैं। डा. अजय अभी तक कुँवारे थे इसीलिए उनकी इन बातों को विभाग के अनुभवी लोग बहुत गंभीरता से नहीं लेते थे और यह कहकर टाल जाया करते थे कि कुँवारा आदमी तो कल्पना में जीता ही है।

 उधर अर्चना जी भी बूढ़ों से थक चुकी थीं और अब उनका झुकाव अजय की ओर होने लगा था इसीलिए जब डा. अजय को सोनल के लिए बेचैन होते देखतीं तो चिढ़ जातीं थीं। धीरे-धीरे उनकी यह चिढ़ नारी-सुलभ ईर्ष्या में बदलने लगी थी और समय के साथ-साथ तो अर्चना जी कुछ ज्यादा ही आक्रामक हो गयी थीं।

डा. अजय विभाग में सबसे जूनियर थे और अभी उनकी नौकरी भी पक्की न थी। ऐड-हॉक पर पढ़ा रहे थे इसलिए सोनल-प्रसंग में वे आगे विवाद करने की स्थिति में नहीं थे। चूँकि इन दिनों अर्चना जी और प्रो. कमल के बीच दूरी बढ़ गयी थी और अर्चना का डा. अजय से क्रश हो गया था इसीलिए वे भी प्रो. कमल और सोनल के संभावित रिश्तों को गाहे-बगाहे हवा देती रहती थीं ताकि डा. अजय और सोनल के बीच किसी भी प्रकार की खिचड़ी के पकने की कोई गुंजाइश बची न रह जाए। डा. अजय चाहते तो थे कि सोनल को इस भँवर से उबार लें और ले जाएँ छुपाके कहीं दूर किसी दूसरे द्वीप पर, लेकिन क्या करते! प्रो.कमल के प्रसाद से ही तो यह लेक्चररशिप मिली थी। और वह भी अभी स्थायी नहीं थी। कॅरिअर का दबाव प्रेम पर भारी पड़ जाता था और वे यह सब सोचकर चुप हो जाते थे कि इस एक स्थायी नौकरी के लिए ऐसी कितनी ही सोनलों को कुर्बान किया जा सकता है!

कहते हैं कि सोनल की मुश्किलें अपनी पराकाष्ठा पर तब पहुँची जब एक दिन प्रो. अर्चना ने अपनी किसी शिष्या रीना खन्ना के हाथों प्रो. कमल का प्रणय-संदेश सोनल को पहुँचवाया था। इसबात पर सोनल बहुत नाराज हुई थी और उसने रीना खन्ना को 'पिम्प' और 'बिच' जैसी पता नहीं कितनी ही गालियाँ दे डाली थी। सोनल को जब रीना खन्ना ने यह बताया कि उसने यह सबकुछ अर्चना मैम के कहने पर किया है, तब सोनल आपे में ना रही थी और उसने जाकर अर्चना को भी बहुत भला-बुरा कह डाला था। उसी दिन से केवल प्रो. अर्चना ही नहीं, आधा विभाग सोनल का विरोधी हो गया था। रीना खन्ना और अर्चना की शिकायत पर विभाग ने सोनल के विरूद्ध प्रशासनिक कार्यवाही की भी शुरुआत कर दी थी। उसी दिन से प्रो. कमल और प्रो. अर्चना के नेतृत्व में विभाग का एक विशेष ग्रुप सोनल के विरूद्ध साजिश रचने में मशगूल हो गया था।

प्रो. कमल रंगीन तबियत के व्यक्ति थे। छप्पन की इस उम्र में भी कैसेनोवा बने फिरते थे। पत्नी को मरे कई साल गुज़र चुके थे। कुछ लोग तो बताते हैं कि उनकी लम्पटई से तंग आकर ही पत्नी ने आत्महत्या कर ली थी। लेकिन कुछ क़रीबी लोग यह बताते हैं कि दोनों पति-पत्नी के बीच किसी शोध-छात्रा को लेकर आए दिन लड़ायी होती रहती थी और एक दिन इसी रोज़-रोज़ की  लड़ाई से तंग आकर गुरुदेव ने शिष्या के साथ मिलकर पत्नी को अपने जीते-जी सती कर डाला था। अब सच्चाई तो किसी को पक्के तौर पर मालूम था नहीं सभी अपने-अपने तरीके से अंदाज भर लगाते थे। पुलिस की रिपोर्ट तो यह बताती थी कि मौत एक असाध्य रोग से पीड़ित होने के कारण हुई थी। हालांकि अबतक तो लोगबाग़ सारा वाकया भूल भी गए थे। मौका-ए-वारदात पर कोई मौजूद भी तो नहीं था! घर में और कोई होता भी नहीं था। एक बेटी थी, वह भी उस समय स्कूल गयी हुई थी। उसी बेटी को लेक्चरर बनवाने के लिए प्रो. कमल पिछले कुछ दिनों से भागा-भागी कर रहे थे। सभी जानते थे कि इसके लिए उन्होंने क्या-क्या जोड़-तोड़ नहीं की थी! अंत में सफल भी हुए।

जब से प्रो. कमल की बेटी को नौकरी मिली थी, विभाग के थर्ड डिविजनरों में भी एक आस जग आयी थी। छात्र उनके इर्द-गिर्द ऐसे डोलने लगे थे जैसे किसी मुर्दा जानवर के इर्द-गिर्द गिद्ध मँडराने लगते हैं। ऐसे भी, डोलना तो फर्स्ट डिविजनरों को भी पड़ता था, ये तो बेचारे थर्ड डिविजनर ही थे! जो डोलने में हिला-हवाली करते, प्रोफेसर साहब उसके कैरियर को ही हिला-डोला देते थे। इसीलिए नहीं चाहते हुए भी सब को डोलना पड़ता था। जो नहीं डोलना चाहते थे वे अपने लिए एस.एस.सी, यू.पी.एस.सी या मीडिया जैसे दूसरे दरवाज़े टटोलना शुरु कर देते थे। और फिर साहित्य पढ़के कौन सी नौकरी रखी हुई थी मल्टी नैशनल्स में! प्रो. कमल जैसे लोग इस तथ्यों से भली-भांति परिचित थे, इसीलिए छात्र-छात्राओं को दुहते भी रहते थे।

तभी तो प्रो. राय ने एक दिन यह कह डाला, "छोड़िये ना सर, आप क्यों चिन्ता करते रहते हैं। अरे, वन का गिदर जाएगा किधर! यदि अकादमिक दुनिया का सहारा चाहिए तो फिर इसी कवरेज एरिया में रहना होगा। और इस कवरेज एरिया के ऑपरेटर हम हैं, सिर्फ हम। नहीं तो जाएँ जहाँ जाना हो। हमने कोई निमंत्रण-पत्र थोड़े ही भेजा था कि आइये और हमारे विभाग की शोभा बढाइये।"

इस बात पर विभाग में ख़ूब ठहाका लगा था। विभाग में ऐसे ठहाके दिन-भर लगते रहते थे। जब भी कोई सीनियर ठहाका लगाता, जूनियर्स यूँ भी ठहाका लगा देते थे। चाहे बात समझ में आई हो या कि नहीं। अधिकतर लोगों को चापलूसी की आदत-सी पड़ गयी थी। वे भी क्या करें, छात्र-जीवन से ही यह सब करते आ रहे थे। ख़ूब मन लगाकर पढ़के भी तो देख लिया था। कहाँ कोई पूछने वाला था, और पचपन प्रतिशत के भी लाले पड़े रहते थे अलग! जबकि जी-हजूरी वाले दूसरे मेडिऑकर्स हमेशा साठ से ऊपर ही रहते थे। ऐसा नहीं था कि यह केवल इसी एक कॉलेज या विभाग की बात थी, कहीं कम कहीं ज्यादा, स्थिति लगभग हर जगह एक जैसी ही थी। पूरी अकादमिक दुनिया में पढ़ाई-लिखाई से ज्यादा ध्यान आदरणीयों की खुशामद पर दिया जाता था। इस खुशामदी संस्कृति में प्रतिभा का कोई अर्थ नहीं होता था। 'ऑब्लाइज करना' और 'ऑब्लाइज्ड होना' अकादमिक दुनिया का आधुनिक यथार्थ बनता जा रहा था और हर पीढ़ी अपने बाद की पीढ़ी में अपने जैसा ही क्लोन पैदा करती जा रही थी। इसतरह एक 'ऑब्लाइजिंग पीढ़ी' बड़ी तेजी से निर्मित होती जा रही थी। इस पीढ़ी के पास पढ़ने-लिखने का अवकाश कम ही होता था, लेकिन इस पीढ़ी के पास भविष्य की संभावनाएँ असीम होती थीं। इस पीढ़ी में शिक्षकों के प्रति श्रद्धा से अधिक आतंक व्याप्त रहता था। लेकिन यह आतंक तभी तक व्याप्त रहता जबतक कि शिष्य अपना लक्षित हित साध नहीं लेता। हित सध जाता और शिष्य गुरु का सबसे कटु आलोचक बन जाया करता और प्रायः स्थितियों में गुरु के प्रतिपक्ष में खड़ा भी हो जाता। हालांकि गुरु को भी इसका कोई मलाल न होता क्योंकि उसने अपनी गुरु-दक्षिणा तो बहुत पहले ही वसूल ली होती थी। इसतरह एक नई तरह की गुरु-शिष्य परम्परा भी बड़ी तेजी से विकसित होती जा रही थी। कहने को तो यह एक जुझारू और कुछ कर गुजरने वाली इक्कीसवीं सदी की युवा-पीढ़ी थी जो आसमान में भी सुराख कर देने का उत्साह रखती थी, लेकिन छात्र-जीवन में इनकी नकेल 'ऑब्लाइज्ड होने' वाले शिक्षकों के हाथों में इस सख्ती से जब्त रहती थी कि ये बेचारे मिमियाते रह जाते थे। भय से सिर उठा नहीं पाते थे। सिर उठाएँ भी तो उठाएँ कैसे! 'इंटरनल्स असेस्मेंट' का सवाल सामने खड़ा हो जाता था। एकबार सिर उठा नहीं कि बस समझो कैरियर गया जॉगिंग करने! 'इंटरनल्स असेस्मेंट' में मिलने वाले प्राप्तांक से लेकर एम.फिल में दाखिले तक और पी-एच.डी से लेकर लेक्चररशिप तक, इसतरह सिर उठाने का खामियाजा आने वाले कई वर्षों तक कैरियर के कई पड़ावों में भुगतना पड़ सकता था। दूसरी तरफ, गाँव-घर में बैठे माता-पिता कहाँ समझने को तैयार थे इस बात को कि 'इंटरनल्स असेस्मेंट' में कम प्राप्तांक का कारण पढ़ाई-लिखाई में की गई कोताही नहीं, बल्कि कुछ और है। वे तो बस यह मान लेते थे कि बच्चे ने ही पढ़ाई-लिखाई में कोताही की होगी। दूसरी बातें तो उनकी कल्पना से भी परे की बात होती थी। इसीलिए बच्चे भी इन प्रो. कमल और प्रो.राय जैसे शिक्षकों के आगे-पीछे डोलने में ही अपनी भलाई समझते थे। इस खेल में सबसे अधिक कठिनाइयाँ सोनल जैसी लड़कियों के सामने आ रही थीं जो किसी के सामने किसी भी तरह से आत्मसमर्पण को तैयार न थीं। शायद इसीलिए कैम्पस की लड़कियों में 'सिनिसिज्म' बड़ी तेजी से बढ़ता जा रहा था।

जब से विश्वविद्यालय प्रशासन ने 'इंटरनल्स असेस्मेंट' का नियम बनाया था, घास-फूसों में भी जैसे हरियाली छा गयी थी। यह एक ऐसी व्यवस्था थी जहाँ हरेक क्लोन साठ प्रतिशत या उससे अधिक के सपने बुनने लगा था, जबकि प्रतिभाशाली छात्रों का तबका भयाक्रांत हो गया था। छात्राओं की तो जैसे घिग्गी ही बँध गई थी। अकादमिक दुनिया का सफर उनके लिए अब इतना आसान न रह गया था। इस व्यवस्था में सभी शिक्षक विलक्षण माने जाने लगे थे और छात्र भी उनका गुणगान करते नहीं थकते थे। तभी तो कॉलेज की हस्तलिखित पत्रिका में भी छपा प्रो.अर्चना का लेख छात्रों के बीच ख़ूब पढ़ा गया और टर्मपेपर के लगभग हर पृष्ठों पर उस लेख से उद्धरण दिए जाने लगे। प्रो. अर्चना भी इससे फूली नहीं समा रही थीं और कई शीर्षस्थ आलोचकों को भी अपने इस लेख से आलोचना के गूढ़ सीखने की प्रेरणा दे डाल रही थीं। टर्म पेपर में उन लड़कों को ख़ूब अच्छे अंक प्राप्त हुए जिन्होंने अर्चना के इस लेख को उद्धरित किया था। अनंत पासवान जैसे कई ऐसे छात्र भी थे जो टर्म-पेपर आदि तो नहीं लिख पाते थे लेकिन विविध अन्य तरीकों से प्रो. अर्चना को 'ऑब्लाइज' किया करते थे। शायद इसीलिए उन्हें 'इंटरनल्स’ में अच्छे अंक मिल जाते थे। इस तरह के कुछ दबंग छात्रों का प्रो. अर्चना जैसे प्रोफेसरों के घर सतत आना-जाना लगा रहता था। प्रो. अर्चना भी ऐसे छात्रों को अपना ख़ूब स्नेह देतीं और ऐसी आवाजाही के लिए अपने दरवाज़े बड़ी दरियादिली से खोल देतीं। उनके घर छात्रों की यह आवाजाही अगर कभी बाधित भी होती तो तभी जब अर्चना जी के पति शहर में मौजूद होते थे। उनके पति श्री प्रभाकर बेलवाल किसी मल्टी नैशनल्स में काम करते थे और साल के छ: महीने शहर से बाहर ही रहते थे।

ऐसा नहीं था कि ऐसी स्थिति के लिए किसी व्यक्ति विशेष को जिम्मेवार ठहराया जा सकता हो। यह एक 'चेन-क्लोनिंग' जैसी स्थिति थी जहाँ हर एक व्यक्ति अपनी-अपनी मजबूरियों से बँधा हुआ था। शिक्षक भी क्या करते! जीवन-भर तो 'डिप्राइव्ड' ही रहे थे। कुछ भी तो नहीं मिला था जीवन में! ना सत्ता, न शरीर। एक नौकरी भी मिली थी, वो भी पता नहीं उसके लिए क्या-क्या नहीं करना पड़ा था! जीवन-भर तो शोषित ही होते रहे थे! प्रो. अर्चना के तो पिता इतने बड़े आलोचक ही थे, लेकिन अर्चना जी को भी लेक्चररशिप के लिए क्या कोई कम पापड़ बेलने पड़े थे! ज्यादातर लोगों की भी यही हालत थी, इसीलिए अब जबकि सत्ता हाथ में आई थी, कोई भी व्यक्ति मिला हुआ छोटा-से-छोटा मौका चूकना नहीं चाह रहा था। सभी अपने-अपने ढंग से पिल पड़े थे अपनी-अपनी कुंठा-तुष्टि में।



अर्चना को सोनल के कहे हुए शब्द भुलाये नहीं भूल रहे थे। मन इन्तकाम को मचला जा रहा था। अर्चना ने प्रो. कमल से लेकर प्रो. राय और डा. अजय तक से समीकरण फिट कर लिया और साजिश को अंतिम रूप देने की योजना बनाने लगी। योजना को अंतिम रूप देने का कार्य साल के अंतिम दिन पर रखा गया। उस दिन न्यू ईयर की पार्टी प्रो. कमल के घर होनी थी जहाँ इस योजना को अंतिम रुप दिया जाना था।

प्रो. कमल पर नशा चढ़ता जा रहा था। शराब भी अपना काम ईमानदारी से कर रही थी और बारह बजने के पहले ही प्रो. कमल गाना गाने लगे थे। प्रो. कमल जब गाने लगते, शिष्यगण यह समझ जाते कि अब बोतल सामने से हटा ली जानी चाहिए। लेकिन प्रोफेसर साहब कहाँ मानते! कहते "ये बोतल लेकर मत जाओ। सुनो, तुम लोग अब और न पीओ क्योंकि तुम लोगों की सूरत मुझे धुँधली दिखने लगी है।"

जब प्रो. कमल नशे में आ गए तो प्रो. राय ने चुटकी लेनी शुरू की।  प्रो. राय और प्रो. कमल के छत्तीस के आंकड़े रहते थे। अब तो खैर सीनियॉरिटी की लड़ाई शुरू हो गयी थी, लेकिन इनकी पहली लड़ाई काफी सालों पहले तब शुरू हुई थी जब अर्चना पहली बार इस कॉलेज में गेस्ट-लेक्चरर बनकर पढ़ाने आई थी और राय साहब ने उसे 'मेरी वाली' घोषित कर दिया था। लेकिन उसी समय प्रो. कमल 'रोटेशनल-हेड' बन गए और अर्चना पाला बदलकर प्रो. कमल के अहाते में जा गिरी थी। कहते हैं कि अर्चना जी की स्थायी लेक्चररशिप के लिए प्रो. कमल 'यूनिवर्सिटी-हेड' तक से भिड़ जाने का जोखिम उठा लिया था और अंत में अपने हर मिशन में सफल रहे थे। उसी समय से प्रो. कमल और प्रो. राय के बीच का आंकड़ा तिरसठ से बदलकर छत्तीस का हो गया था।

प्रो. राय ने चिढ़ाने वाले अंदाज में प्रो. कमल से पूछा, "क्या हुआ बॉस, वेनू आपके घर का है, इसका मतलब तो यही है कि मछली फँसी नहीं अबतक! मामला फिट हुआ नहीं क्या?" राय ने पके हुए जख़्म को कुरेद दिया।

प्रो.कमल ने राय की मंशा भांप ली। नशे में गुस्सा तेज चढ़ता है। गुस्से में आ गए।

अपनी जांघ ठोकते हुए बोल पड़े, "क्या बात करते हो राय, कैसी-कैसी सांड लड़कियों को नकेल पहनाकर इसी जंघे पर बिठाया है इस डा. राजकमल रजौरिया ने। अरे, ये अर्चना बेलवाल भी क्या कोई कम सांड थी! डाली थी कि नहीं मैंने नकेल, भूल गए? सबकुछ तुम्हारी आँखों के सामने ही तो हुआ था, याद नहीं है?"

अर्चना का नाम सुनते ही राय तिलमिला गए। यहाँ उनकी दुखती रग दब गयी थी। राय साहब को आजतक इस बात का मलाल था कि अपनी लाख़ कोशिशों के बावजूद वे अर्चना को भोग नहीं पाए थे और प्रो. कमल ने शिकार को उनके जबड़े से छीन लिया था। अभी दोनों भिड़ने ही वाले थे कि वहाँ अर्चना आ गई, और दोनों चुप हो गए थे।

प्रो. राय ने अपनी योजना बताई - "देखिए भाई, ऐसे तो प्रिन्सिपल साहब नहीं मानेंगे। वे ठोस सबूत माँगेंगे...।"

अभी राय की बातें समाप्त भी नहीं हुई थी कि अर्चना बीच में टपक पड़ी, "गवाह मैं बन जाती हूँ। रीना खन्ना से सारी बातें प्रिन्सिपल साहब के सामने कहलवा दूँगी, आप यह सब मुझपर छोड़ दीजिए।"

प्रो, राय उनके उतावलेपन पर थोड़े मुस्कराये और फिर गंभीर होते हुए बोले, "आप दोनों की गवाही नहीं चलेगी, क्योंकि आप दोनों तो पार्टी ही हैं। किसी तीसरे को ढूँढिए। और फिर यह मत भूलिए कि प्रो. सुचिता श्रीवास्तव सोनल के पक्ष में खड़ी हैं। दूसरी ओर, प्रो. जकरिया और प्रो. राणा तो बिना ठोस सबूत के टस-से-मस नहीं होने वाले!"

"तो फिर उपाय क्या है?" डा. अजय ने सवाल उठाया।

"अजय, क्यों ना तुम ही गवाही दे दो। तुम प्रिन्सिपल साहब के सामने यह कह दो कि सोनल रीना खन्ना प्रकरण के समय तुम मौका-ए-वारदात पर मौजूद थे।" अर्चना ने अजय की ओर प्यार भरे अंदाज़ से देखते हुए कहा।

"नहीं अर्चना जी, मुझे रहने दीजिए, उसके अंकल मेरे दोस्त हैं, मेरा गवाही देना अच्छा नहीं लगेगा, प्लीज़।" अजय ने अपनी मजबूरी जतायी।

इतना सब सुनकर प्रो. कमल बोल पड़े, "अरे यार, जकरिया और राणा तो हम लोगों के विरोधी हैं ही, इसमें आश्चर्य की क्या बात है। इन सालों की चले तो इस देश को सऊदी अरबिया बनाके ही छोड़ें! ऐसा थोड़े है कि ये सोनल के बड़े भारी हितैषी हैं! इनकी रंजिश तो हिन्दू राष्ट्र की हमारी परिकल्पना से है। ये लोग हमें सांप्रदायिक मानते हैं और इन्हें उम्मीद है कि वे सोनल को एक-न-एक दिन अपने खेमे से जोड़ लेंगे, इसीलिए आज हितैषी बनकर खड़े हो गए हैं।" फिर थोड़ा दम भरकर बोले, "मैं तो कब से कह रहा हूँ कि कोई भी जतन कर लोगे, ये नहीं मानेंगे। आप सब यदि आज वामपंथी खेमे का दामन थाम लें, देखिए जकरिया जैसे लोगों का सारा आदर्श कैसे एक मिनट में भाप बनकर उड़ जाता है!"

"और सुचिता?" राय ने पूछा।

"पगली है साली। अरे, ये सोनल हमेशा जो सीमोन-सीमोन बोलती रहती है ना, इसीलिए सुचिता को लगता है कि सोनल बड़ी भारी फेमिनिस्ट है, और इसतरह वह उसी के पाले की शिष्या है। भूल जाइये इनको, जैसी परिस्थिति आएगी, निपट लिया जाएगा।" प्रो. कमल ने साथियों को विश्वास दिलाया।

"सर, मेरे मन में एक योजना है।" राय ने बोलते हुए सब की ओर देखा। जब सभी उनकी ओर उत्सुकतावश देखने लगे तब उन्होंने अपनी योजना बताई, "मुझे लगता है कि मेरी यह योजना फुल-प्रूफ योजना है, बाकी आप सब समझदार हैं।"

"बताइये तो सही, योजना क्या है?" कमल ने बेसब्री से पूछा।

प्रो. राय ने बताना शुरू किया, "देखिए सर, सोनल यदि हम सब में सबसे ज्यादा विश्वास किसी एक व्यक्ति पर करती है तो वह मैं हूँ। ऐसा करता हूँ कि कल मैं उसे अपने पास बुलाता हूँ। पहले तो उसे यह बोल-बोलकर ख़ूब डराऊँगा- "तुम्हारे पापा को बुलवाया जाएगा, उनको ह्यूमिलियेशन झेलना होगा, तुम्हें कॉलेज से निकाला जाएगा, सब जगह बदनामी होगी, मामला मीडिया में भी जाएगा, फिर कहीं एडमिशन भी नहीं मिलेगा तुम्हें, पूरा कॅरिअर बरबाद हो जाएगा आदि-आदि।" फिर उसे एक सलाह दूँगा- "वह एक 'कॉन्फेशनल-स्टेटमेंट' दे जिसमें वह अपने ऊपर लगे सारे आरोपों को सच बताते हुए लिखित में माफी माँगे।" फिर मैं उससे कहूँगा - "जब तुम माफी माँग लोगी, तब मैं ख़ुद जाकर प्रिन्सिपल साहब को समझाऊँगा और कॉलेज प्रशासन से बात करके मामले को रफा-दफा करा दूँगा।"

थोड़ी देर चुप्पी छाई रही, फिर राय ने सब की ओर देखते हुए कहा, "...मुझे पूरी उम्मीद है कि सोनल मेरी बात मान लेगी। और जब एकबार उसके हाथ का लिखा हुआ 'कॉन्फेशनल-स्टेटमेंट'  हमारे हाथ लग जाएगा, मैडम सुचिता या किसी भी शूरमा के लाख़ विरोध के बावजूद कॉलेज प्रशासन सोनल को रस्टिकेट करने में एक पल की भी देरी नहीं करेगा....।"

अभी प्रो. राय की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि सब के चेहरे उत्साह से खिल उठे और उत्साहातिरेक में सभी एक साथ बोल पड़े, "...और हमलोग अपनी इस लड़ाई में पक्के तौर पर जीत जाएँगे..."

अर्चना दाँत पीसते हुए भुनभुना पड़ी, "बड़ी मिस इंडिया बनी घूमती फिरती है, साली को पागल बनाकर बीच सड़क पर दिन-दहाड़े चर्सियों और मवालियों के हाथों नहीं नोंचवाया, तो मेरा नाम भी ठाकुर अर्चना सिंह नहीं...।"

योजना पर सहमति बनते ही सभी अपनी-अपनी भूमिका को अंजाम देने में जुट गए। सबकुछ वैसा ही हुआ जैसी कि योजना थी। प्रो.राय सोनल की मासूमियत को झांसा देने में अंततः: सफल हुए। सोनल के 'कॉन्फेशनल-स्टेटमेंट' और कॉलेज के इन वरिष्ठ प्राध्यापकों की गवाही के आधार पर सोनल को तालाब की मरी हुई मछली मान लिया गया। और आखिरकार कॉलेज प्रशासन ने सोनल को रस्टिकेट कर दिया।

अबतक तिमिर सोनल के बहुत क़रीब आ चुका था और उसकी ज़िन्दगी के मायने तय करने लगा था।

 तिमिर ने अपनी पढ़ाई-लिखाई आई.आई.टी से पूरी की थी और सोनल से अधिक व्यावहारिक व्यक्ति था। सोनल ने यदि सभी बातें खुलकर उसे पहले ही बता दी होती तो शायद वह स्थितियों को सुधार भी लेता, लेकिन सोनल ने उसे सारी बातें तब बतार्इं जब चिड़िया खेत चुग चुकी थी। 'कॉन्फेशनल-स्टेटमेंट' देने के बाद सोनल को यह लगा था कि अब सबकुछ ठीक हो गया है और प्रो.राय सब ठीक कर देंगे। सबकुछ ठीक हो जाने के विश्वास के बाद ही सोनल ने तिमिर को सारी बातें बताई थीं। वह भी क्या करती! दोस्ती नई-नई थी। सोचती थी कि यदि तिमिर सबकुछ जान जाएगा तो उससे दोस्ती तोड़ लेगा। उसके इसी डर ने उसे रोके रखा और उसने तिमिर से सबकुछ तभी कहा जब उसे प्रो.राय का पक्का आश्वासन मिल गया था।

ऐसा नहीं था कि परिस्थितियों के दबाव में सोनल ने अपने-परायों से मदद नहीं माँगी थी! लेकिन क्या करती, दोस्तों में कहाँ थी इतनी हिम्मत कि प्रो.अर्चना और प्रो.कमल जैसों का सामना कर पाते! उसके एक अंकल ने तो ओझा बनकर भूतों से बात करने की कोशिश भी की थी लेकिन भूत तो भूत थे, कहाँ मानने वाले थे!

अर्चना ने तो साफ-साफ कह दिया था, "एक सड़े हुए आम के लिए हम पूरी टोकरी ख़राब नहीं कर सकते।"

हालाँकि अंकल ने बड़ी मिन्नत की थी और सोनल को बच्ची समझकर माफ़ कर देने की गुहार भी लगाई थी, लेकिन उनकी एक नहीं चल पाई थी। वास्तव में, ओझा जिस सरसों से भूत भगाने की कोशिश कर रहा था, भूत तो उस सरसों में ही घुसा बैठा था। इसीलिए ओझे की दाल नहीं गल पाई थी और प्रेत-पीड़िता छटपटाती रह गयी थी।

लेकिन तिमिर इतना आसान गणित न था। उसे जब सारा माजरा समझ में आया तो वह सतर्क और आक्रामक हो आया। उसने किसी प्रकार की मिन्नत नहीं की। उसने सीधे-सीधे लड़ायी अपने हाथों में ले ली। अब यह लड़ाई हिन्दू कॉलेज के चंद कद्दावरों और सोनल के बीच की नहीं रह गयी, बल्कि कद्दावरों और तिमिर के बीच की बन गयी। तिमिर आई.आई.टी. में फाइनल ईयर का छात्र था और अपने यहाँ की छात्र-राजनीति में अच्छी दखल रखता था। प्रशासन के सभी हथकंडों से परिचित तो था ही, सोनल की तरह कोरा कागज भी नहीं था। वह सोनल के लिए रणनीतियाँ तय करने लगा। अब सोनल अकेली नहीं रह गयी थी। तिमिर ने भी इस साजिश का पर्दाफाश करने की ठान ली थी और इसके लिए उसने एड़ी-चोटी एक कर दी।

सबसे पहले उसने सूचना का अधिकार का उपयोग करते हुए कॉलेज प्रशासन से रस्टिकेशन से संबंधित सभी ब्यौरे माँगे। फिर उसने विश्वविद्यालय प्रशासन को लिखा और कुलपति महोदय से इस मामले में हस्तक्षेप करने का आग्रह किया। विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी तत्परता दिखाई और इस मामले को एक छात्र के कैरियर का मामला बताते हुए इसे बहुत गंभीरता से लिया। कुलपति महोदय ने इस मामले की स्वतंत्र जाँच हेतु तत्काल एक समिति गठित की और सोनल के रस्टिकेशन को समिति की जाँच-रिपोर्ट आने तक स्थगित करने का आदेश दिया।

इन सभी कार्रवाइयों के होते-होते लगभग बीस दिन गुजर गए। इन बीस दिनों में तिमिर ने सोनल का साथ पल-भर के लिए नहीं छोड़ा। ऐसे में सोनल की ज़िन्दगी के अबतक के सबसे कठिन बीस दिन सोनल के लिए सबसे खूबसूरत बीस दिन बन गए थे। सोनल के लिए ये बीस दिन विध्वंसकारी हो सकते थे यदि ऐन वक्त पर तिमिर ने आकर सोनल का हाथ नहीं थाम लिया होता।

तभी तो जब भी दोनों मिलते सोनल एकबार यह जरूर कह डालती,

"तिमिर, तुम्हें भगवान ने मेरे पास ऐसे समय भेजा, जब मुझे तुम्हारी सबसे अधिक जरूरत थी। यदि तुम नहीं मिलते तो, या तो मैं पागल होकर सड़कों पर घूम रही होती, या फिर मैंने आत्महत्या कर ली होती।"

"क्यों हमेशा गंदी-गंदी बातें बोलती रहती हो?"

"तुम नहीं जानते हो तिमिर, अर्चना मैम ने तो साफ-साफ कहा था कि वो मेरा कैरियर बरबाद करके ही दम लेंगी। जरा सोचो, अगर तुम ना होते तो उनकी मंशा तो पूरी हो ही गयी थी ना! थैंक्स टू भगवान जी, कि उन्होंने मेरी सुन ली और मुझे दुष्टों के हाथों में जाने से बचा लिया।" इतना बोलते हुए सोनल अपने पीछे खड़े पेड़ को पकड़ लेती और बोलती 'टच वुड'।

सोनल का 'टच-वुड' बोलना तिमिर को बहुत भाता था और उसकी देखा-देखी वह भी गाहे-बगाहे पेड़ को छूकर 'टच-वुड' बोलने लगा था। लेकिन जब भी तिमिर किसी बात पर 'टच-वुड' बोलता, सोनल चेहरा सख्त बनाकर बोल पड़ती, "इसबात पर 'टच-वुड' नहीं बोलना था।"

फिर हँसते हुए तिमिर के दोनों गालों को अपनी चिकोटी में दबाते हुए प्यार से पूछती, "आखिर तुम यह कब सीखोगे कि 'टच-वुड' कब बोलना चाहिए और कब नहीं।"

यह सब सुनकर तिमिर भाव-विभोर हो जाता और सोनल को गले से लगाते हुए बोलता, "लव यू है।"



सोनल ने करवट ली और डायरी के पन्ने पर आगे लिखा, "तिमिर, तुमने जब समेट लिया था मेरे अतीत को एकबारगी अपनी बाँहों में और मेरा वह अनंत सा दिखने वाला अतीत, एकबारगी सिमट कर बेजान-सा झूलने लगा था तुम्हारे कंधों पर, तब जाकर यह अहसास हुआ था कि रात की बड़ी-बड़ी भयावह परछाइयाँ, कितनी बेमानी लगने लगती हैं, दिन के उजाले में। लव यू है तिमिर...लव यू है हमेशा..."

सोनल इससे आगे कुछ ना लिख पाई। आँखें भर आर्इं, कुछ भी साफ-साफ दिख नहीं रहा था। डायरी के कोरे कागज हवा के थपेड़ों से फड़फड़ाकर ख़ुद-ब-ख़ुद पलटने लगे थे।

अनुज
798, बाबा खड़ग सिंह मार्ग, नई दिल्ली -110001.
फोन :-   09868009750

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1 comments :

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (20-03-2016) को "लौट आओ नन्ही गौरेया" (चर्चा अंक - 2288) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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