रविवार, मार्च 13, 2016

कहानी - नईम कव्वाल: इंदिरा दाँगी | Kahani 'Naeem Qawwal' by Indira Dangi


हिदी साहित्य की राजनीति पर इंदिरा दाँगी की कहानी Indira Dangi ki Kahani

कहानी - नईम कव्वाल

इंदिरा दाँगी



टूटी मज़ार के आगे एक सूनी सड़क जाती है। सड़क के भी आगे, कच्चे रास्ते पर चली जा रही है एक लेटेस्ट माडल कार। सामने, वक़्फ़ बोर्ड की ज़मीन पर बसे हैं ग़रीब मुसलमानों के मासूम घर। बस्ती एक नज़र में ऐसी दिख रही है जैसे बहुत सारे मुड़े-तुड़े टाय हाउस किसी ने मैदान भरकर करीने से रख दिये हों।

पता पूछने की गरज से साथी नौजवान एक कच्ची दुकान के पास कार रोकता है। नई-नई प्रसिद्ध हुई रिर्पोटर लड़की काँच उतारकर पूछती है,

‘‘नईम कव्वाल का मकान किधर को है ?’’

‘‘नईम भाई ?? सड़क पर सीधी ही चली जाईये। बाँये हाथ की पाँचवीं गली में मुड़ जाइयेगा।’’ -बताने वाले की आवाज़ में नरमी, मेहमानपुर्सी और गर्व है। नईम कव्वाल की मशहूरियत से यहाँ का बच्चा-बच्चा वाकिफ़ है -रिर्पोटर लड़की सोचती है, मतलब उसका निर्णय एकदम सही रहा। वो दिल में ख़ूब ख़ुश हो गई और उसकी वो फ़िक्र जाती रही कि इन्टरव्यूज़ की ये सीरीज़ -क्योंकि ये पहला ही होगा- इतनी हिट होगी भी या नहीं कि उसका पत्रकारिता कॅरियर नई ऊँचाईयों को छू सके; और वो प्रिंट मीडिया से उठकर टी.वी. पत्रकारिता के आकाश में दमक उठे। ...रजत शर्मा ने केवल साक्षात्कारों के बूते पद्मश्री पा लिया ! -रिर्पोटर लड़की की आँखें ऊँचे सपनों से हमेशा चैंधियाई रहती हैं।

पाँचवीं गली इस क़दर तंगहाल कि उस एक अकेली कार के घुस आने भर से ही रास्ता तक़रीबन बंद-बंद हो उठा है। यहाँ पार्किंग कहाँ मुमकिन है ? शर्मिन्दगी से आगे-पीछे होती कार की दुविधा एक पड़ोसी वाशिन्दा भाँप लेता है।

‘‘आप मेरे दरवाज़े पर कार लगा दें और इत्मीनान से जायें।’’

रिर्पोटर श्रेया को भोपाल की चौड़ी सड़कों वाले बंगले याद आते हैं जिनमें से हरेक के बाहर कम्प्यूटरीकृत तख़्ती चस्पा रहती है,

-नो पार्किंग !

नईम कव्वाल का पूरा परिवार दरवाज़े पर खड़ा है।

‘‘आईये, बेटे आईये।’’

स्वागत करती आवाज़ तहे-दिल से आती सुनाई देती है। घर की कालेज पढ़ी बेटी रुख़साना रिर्पोटर श्रेया को गले लगा लेती है, ‘‘आईये बाजी !’’

पुराने सोफ़े पर बैठती श्रेया ने पत्रकारों वाली लेज़र जीवनदृष्टि से माहौल को तुरंत स्केन करना शुरू कर दिया,

पूरे घर में, यकींनन यही एक पक्का कमरा है। बारह बाई आठ की ये चूना पुती बैठक जिसका फ़र्श पटियों का है। भीतर को जाते दरवाज़े से एक तंग रसोई और टीन की छतदार एक नीम अंधी कोठरी भी दिखाई पड़ती है। सब दरवाज़ों के आगे, बोरी पर ऊन से सुंदर कढ़ाई वाले पैरदान बिछे हैं। बैठक की दीवारों पर मुसलमानी कैलेण्डर और मक्का-मदीना की तस्वीरें हैं। खिड़की की चौड़ी पट्टी पर एक धुंधला आईना है और कंघी, पावडर, तेल, इत्र, डियो , क्रीम, सुरमा वगैरह सजे-से रखे हैं। दीवारों पर ऊँचे पटियों से चौतरफ़ा एक पट्टी बनी है जिस पर मिट्टी के तोते, काग़ज़ के रंगीन फूल और लकड़ी की पुतलियाँ सजी हैं। फ़र्श पर हाथ की बुनी दरी बिछी है और लकड़ी की टूटी, ईट लगी सेंटर टेबल पर पुराना, चमकीला दुपट्टा मेज़पोश की तरह बिछा है।

 अपना पेन और नोटिंग पेड ठीक करती श्रेया इंटरव्यू तुरंत शुरू कर देना चाहती है लेकिन बात शुरू करे कैसे; पूरा मेजबान परिवार उसकी ख़ातिरदारी में मशगूल है।

चाय आने से पहले ही टेबल फुल भर गई: किसी मँहगी दुकान की बादाम-रसमलाई, विदेशी चिप कुकीज़, बहुराष्ट्रीय चिप्सें, उन्नत अनारों के गहरे सुर्ख दाने, सेव के कतरे और ख़ास भोपाली पान -चाँदी के वर्क में लिपटे हुए !

इतना मँहगा नाश्ता !! -श्रेया असहजता भरी आँखों से अपने याकूब को देखती है और वो उसके सँवरे-सजे हाथ पर अपनी वज़नदार हथेली रख देता है ...इनके दिलों का भी होमवर्क करो सिल्की !

‘‘तो नईम भाई, सबसे पहले तो मैं ये जानना चाहूँगी कि आपकी मशहूरियत का राज़ क्या है ? सुना है, जब आप गाते हैं तो जहाँ तक लाउडस्पीकर आपकी आवाज़ पहुँचाता है, लोगों के काम रुक जाते हैं ?’’

‘‘मालिक का दिया हुनर है वर्ना मैं तो एक निहायत ही आम...’’

‘‘अब्बा ये कहना चाह रहे हैं...’’ नईम की कालेज पढ़ी बेटी कहती है,

‘‘कि उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी म्यूज़िक के नाम कर रखी है। रायसेन के उर्स में जब हमारे अब्बा ने पहली मर्तबा गया, फ़क़त सात बरस के थे। तब से लेकर आज तक इन्होंने म्यूज़िक को दिया ही दिया है, पलटकर चाहा कुछ नहीं!’’

बेटी के शानदार जवाब पर पूरा परिवार उसकी तरफ़ तारीफ़ भरी आँख़ों से देखता है; दुबले-नाटे नईम भाई अपनी कुर्सी पर पैर सिकोड़े बैठे, कुछ और सिमट जाते हैं,

‘‘रुख़साना जो कह रही हैं, वही छापियेगा।’’

और इस बात में रुख़साना की अम्मी भी अपने ख़्यालात जोड़ देती हैं,

‘‘बचपन से ही ये गैबले-से रहे हैं। इनके वालिद की सब जायदाद इनके रिश्तेदारों ने दबा ली और इन्हें गाने के सिवाय किसी चीज़ से कोई मुरौव्वत न रही कभी।’’

‘‘ये एकदम सही कह रही हैं। रुख़साना की अम्मी ने ही मेरी ज़िन्दगी की पतवार को थामे रखा। तीनों बच्चों को स्कूल-कालेज करा पायीं तो ये ही और आग अगर सिर पर ये पक्की छत है तो वो भी यों हो सका क्योंकि इन्हें दुनियादारी आती है वर्ना मैं बेशऊर तो...’’

नम हो जाती आवाज़, उससे पहले ही चुप लगा गये नईम कव्वाल। श्रेया का पेन अब तक रुका है नोटिंग पेड के ख़ाली पन्ने पर। चेहरे पर बारीक़ बेचैनी की झलक है; ढंग की ओपनिंग नहीं मिली इंटरव्यू को अब तक !

‘‘अपने बारे में शुरू से बतायें। आपके दादा तो भोपाल नवाब के दरबारी गवैये हुआ करते थे। सुना, बड़ा नाम था उनका ?’’

‘‘उस्ताद हाफ़िज़! उस्ताद हाफ़िज़ कहा करते थे सब उनको। आगरा घराने के गायक थे। इस घराने की ख़ूबसूरती है लय के साथ चलने वाले शुद्ध बोल। फिर उस्ताद हाफ़िज़ तो जिस अंदाज़ में राग पेश करते थे, कुछ मत पूछिये ! ...और क्लासिक से लेकर कव्वाली तक -गायकी में उनके मुक़ाबिल पूरे मालवा में कोई न था ! असली मास्टर आदमी थे -असली मास्टर !

अब नईम कव्वाल ने कुर्सी पर पालथी मारी और हाथ उठाते-गिराते बताना शुरू किया,

‘‘नवाब साहब ग़ज़ब के मेहमानवाज़ आदमी थे; और अपने हरेक मेहमान को वे हमारे दादा का गाना ज़रूर-ज़रूर सुनवायें, ऐसे जैसे वे उनका कोई बड़ा क़ीमती हीरा या जवाहरात हों। जब भी नवाब साहब बाहर जाते, हमारे दादा को अपने साथ लिये जाते थे। दादा ने लंदन तक में महफ़िल जमाई है उनकी सरपरस्ती में। फिरंगी तो कहते थे, नवाब साहब ये थामिये लाख डालर के नोट और अब से ये आपका उस्ताद हाफ़िज़ हमारा हुआ ! हमारे दादा बोले - न! बिल्कुल न! मेरे लिए ऊपर मालिक है और नीचे नवाब साहब! ...और नवाब साहब थे भी ख़ानदानी नवाब! रियासत तो न रही थी मगर दिल -आ हा हा हा! मत पूछिये! जब तक जिये, दादा को अपने आठ बच्चों की परवरिश के लिए कोई काम हाथ से न छूना पड़ा। नवाब साहब के बाद भी, वो षोहरत क़ायम रही उस्ताद हाफ़िज़ की, कि भोपाल ही क्या सीहोर, विदिशा, रायसेन से लेकर उज्जैन, देवास तक के रईस किसान उन्हें शादी-ब्याह में ख़ासतौर पर कव्वाली के लिए पेशगी भिजवाकर बुलाते थे।’’

‘‘और वालिद आपके ?’’

‘‘अब्बू ने अपने शुरुआती दिनों में गाया। कभी महफ़िलों में, कभी उर्स में। दादा के लड़कों में वे क़माल के कव्वाल निकले थे। एक बार पाकिस्तान के एक मशहूर कव्वाल ने उन्हें सुना तो पेशकश कर डाली कि मियाँ, हमारे साथ पाकिस्तान चले चलो। हमारे अब्बू ने बड़ी नरमी से झुककर उन्हें सलाम किया और कहा -साहेबान! भोपाल की मिट्टी तो न छूटेगी हमसे!’’

‘‘फिर ?’’

‘‘फिर कुछ ख़ास नहीं। अब्बू गाते रहे कुछ और बरस; लेकिन हम छह भाई-बहनों की बेहतर परवरिश के नाम उन्होंने बाद में गाना छोड़ दिया। सब्ज़ी का ठेला लगाने लगे थे। मैं पाँच बरस का था, जब वे अल्लाह को प्यारे हो गये। उनकी धुंधली-सी याद कभी अगर रही भी होगी तो वो भी बाद में मिट गई ज़हन से। तस्वीर भी उनकी कोई न थी हमारे पास; मगर अम्मी की बातों से उन्हें जैसे मौजूद ही पाया हमने अपनी परवरिश में। वे दोनों वक़्त उनकी इस तरह बात करती थीं जैस अब्बू यहीं-कहीं निकल गये हैं ज़रा को; और अभी थोड़ी देर में लौट आने वाले हैं। अपनी आख़िरी घड़ी तक न अम्मी के सिर से कभी दुपट्टा उतरा, न ज़ुबान से अब्बू का ज़िक्र !’’

माहौल में कुछ पलों को चुप्पी छा गई। किसी को भी समझ नहीं आ रहा था कि तसल्ली में ऐसा क्या कहा जाये कि हवा का भारीपन ख़ारिज हो -और हुआ अगले पल ठीक यही! माहौल को लगी चुप टूटी, बाहर से आती कमसिन उम्रवाली एक बेहतरीन आवाज़ से,

‘‘अम्मी! रुख़ बाजी ! देखिये तो मैं क्या-क्या लाया हूँ !’’

सत्रह-अठारह का वो लड़का चेहरे-मोहरे और आवाज़ की खनक में नईम कव्वाल का नया जन्म मालूम पड़ता है।

ख़ुश दिख रहे लड़के ने अपने हाथ के पैकेट को खोलकर एक सस्ती रंगीन शर्ट निकाली ही थी कि उसकी नज़र सोफ़े पर बैठे मेहमानों पर पड़ी जो उसे अपलक घूर रहे थे । उसी हाल में वो चुप रह गया।

‘‘सलाम करो मियाँ। तुम्हारी ये बाजी एक बहुत बड़े अख़बार से आई हैं इंटरव्यू करने।’’

लड़का सलाम करके भीतर चला गया। नीम अंधी कोठरी में वो कोई खटका दबाता है। एक दबा-दबा-सा, पीला उजाला फैल जाता है। छोटा लड़का रेहान जो अब तक अपने अब्बा का मुँह देखता था, बे-आवाज़ उठकर उधर को चला गया है -उसके चेहरे पर उसके नये आईडियल का जबर्दस्त इम्प्रेशन है!

‘‘ वे हमारे बड़े साहबज़ादे हैं -रोशन। कल मुंबई जा रहे हैं।’’

‘‘किसी काम से जा रहे हैं ?’’ -इंटरव्यू से परे श्रेया बेतकल्लुफ़ी से पूछती है।

नईम कव्वाल एक चुप, हज़ार चुप ! कालेज पढ़ी बेटी फिर उनकी तरफ़ से शानदार उत्तर देती है,

‘‘भाई ने इसी बरस अपनी स्कूलिंग पूरी की है। अब वे मुंबई जा रहे हैं, सिंगिंग के फ़ील्ड में अपना कॅरियर बनाने।’’

‘‘और जो न बना तो भी...’’ रुख़ की, दुनियादारी में बेमिसाल अम्मी बात को मुक़ाम तक पहुँचाती हैं,

‘‘कमा-खा लेगा, यहाँ से तो बेहतर ही। बड़ा होशियार है हमारा रोशन।’’

‘‘अम्मी ! ज़रा सुनिये !’’

नीम अंधी कोठरी के नये उजाले में से आवाज़ आती है और माँ के पीछे बेटी भी उठ कर चली जाती है। रोशन वाकई कमा-खा लेगा; सोचती श्रेया एक गहरी नज़र उधर को डालती है। वहाँ कोठरी के एकमात्र पलंग पर रोशन की यात्रा की तैयारियाँ सबके सामने एक-एक कर नुमाया हैं -नई बुश शर्टें, बैग, टूथब्रथ, षेविंग क्रीम, परफ़्यूम ...और इस ख़रीददारी के दाम यक़ीनन ख़ुद जुटाये होंगे रोशन ने !

नईम कव्वाल पाँव सिकोड़े, प्लास्टिक की कुर्सी पर चुपचाप बैठे हैं। अपने इस आख़िरी चेहरे पर उभरते-डूबते न जाने कितने पुराने चेहरे जैसे मिलकर चीखते हैं,

‘‘साहेबान ! भोपाल की मिट्टी तो न छूटेगी हमसे !’’

‘‘नईम भाई, कुछ अपने बारे में बतायें।’’

‘‘नहीं; पहले आप नाश्ता करें। देख रहा हूँ कि आपने अब तक कुछ लिया नहीं है।’’ - इसरार करते नईम की कोशिश दरअसल अपनी रुलाई को क़ाबू करने की है।

‘‘अरे ! इन्होंने लिया ना ! चिप्स का आधा टुकड़ा ! हमेशा भूख़े रहना ही तो हमारी मैडम की ख़ूबसूरती का राज़ है!’’

‘‘याकी!’’ -सिल्की ने नोटिंग पैड से एक हल्की चपत उसके मज़बूत कंधे पर मारी; और दोनों साथ हँस दिये।

‘‘अब नईम भाई ने तुम्हारे लिए इतने प्यार से इतना कुछ परोसा है तो चलो फ़िलहाल के लिए तो छोड़ दो अपनी ये स्लिमिंग-ट्रिमिंग भुख़मरी।’’

याकूब ने एक पान उठाकर उसकी ओर बढ़ाया; और माहौल के प्रति हमेशा सजग उसकी सिल्की ने पान मुँह में न लेते हुए हाथ में ले लिया।

 इस जोड़े को देखते नईम के चेहरे पर एक गहरी मुस्कुराहट उतर आई,

‘‘याकूब, क्या आप दोनों एक ही दफ़्तर में काम करते हैं ?’’

‘‘नहीं जी। हम तो मैडम के पर्सनल ...मजूर हैं।’’

याकूब गहरी आँखों अपनी सिल्की को देख मुस्कुराता है; और वो मुस्कुराती, अपना नोटिंग पैड सम्हालती है। नईम भाई सोचते हैं -पता नहीं ये लड़की इस लड़के से शादी करेगी भी या नहीं ?

‘‘नईम भाई, अब अपने बारे में बताईये।’’

‘‘बेटी, अपने बारे में बताने को तो मेरे पास कोई ऊँची बात है नहीं। ’’ -मशहूर नईम कव्वाल की आवाज़ में विनम्रता और झिझक है,

‘‘छह बरस की उमर से गलियों में लाई-मुरमुरे और रजगिरे के लड्डू बेचा किया। सात बरस की उमर में पहली मर्तबा उर्स में गाया। तब से गा लिया करता हूँ जब कोई प्रोग्राम मिलता है। नहीं तो, सबेरे ठेला लेकर निकलता हूँ तो दिन ढले तक रद्दी ख़रीदने-बेचने का कारोबार किया करता हूँ। कभी मन करता है तो काम के बीच, ठेला खड़ा कर किसी पुलिया पर बैठकर गाने लगता हूँ। तब आते-जाते लोग सुनते हैं और वाह ! वाह ! किया करते हैं। कई लोग तब रुपये देना चाहते हैं, पर मैं कहता हूँ, साहेबान ! इस वक़्त रुपये न लूँगा; इस वक़्त अपनेआप के लिए गाता हूँ।’’

‘‘आप तो आवाम में इतने मशहूर हैं फिर आपको ये काम...’’

श्रेया ने अपना प्रश्न अधूरा ही छोड़ दिया; उसके चेहरे पर सच्चा दुख और आक्रोश है। याकूब उसकी असहजता को अपनी आड़ देता, मुस्कुराकर नई बात करता है,

‘‘नईम भाई, आप पर ख़ूब होमवर्क करके आई हैं हमारी मोहतरमा। इंटरनेट पर जितना कुछ मिल सका; प्रायवेट मोबाइल कैमरों वाली रिकार्डिंग में ही इतना कमाल लगता है आपका प्रोग्राम कि मैं तो आपका मुरीद हो गया हूँ।’’

‘‘कुछ सुनियेगा ?’’

‘‘ज़रूर !!’’ -श्रेया और याकूब ने एक आवाज़ में कहा।

आगरा घराने के उस्ताद हाफिज़ के पोते उस्ताद नईम ने राग तोड़ी के लिए आलाप लिया। गली से गुज़रते लोग अपनी राह भूल गये। भीतर से पूरा परिवार खिंचा चला आया। याकूब और श्रेया सुर, लय और राग से तराशी हुई उस महान आवाज़ को सुनने में ऐसे गहरे उतर गये कि एक-दूसरे का हाथ थामे बुतों की तरह बैठे रहे।

‘‘कहिये, कैसा लगा ?’’

नईम कव्वाल गा चुके; सब को अपनी-अपनी सामान्यताओं में लौटने में पल-दो पल लगने हैं। श्रेया को तो याद ही नहीं रहा कि वो इंटरव्यू ले रही है; दूसरे-तीसरे पल वो अपने को चौकन्ना कर पाई,

‘‘ग्रेट ! नईम भाई आपको तो इंटरनेशनल लेबल का सिंगर होना चाहिये था आज ! आपने कभी कोशिश नहीं की ? कोई सरकारी मदद ? कन्सर्ट ? अवार्ड या फेलोशिप ?’’

‘‘जवानी में चार-छह मर्तबा ये लालच भी पाले हैं इस ग़रीब ने। अपने प्रोग्रामों की कैसेट लिए फिरा सरकारी दफ़्तर-दर-दफ़्तर। जब सब जगह सिर फोड़ चुका तो किसी ने मशविरा दिया कि अल्पसंख्यक डिपार्टमेंट जाओ, न हो तो आयोग जाओ। देखना, तुम्हारी सब जगह की रुकी फ़ाईलों को पाँव लग जायेंगे; पर बेटे, सबसे ज़्यादा पाँव मेरे उधर के फेरों में ही घिसे। इस तरह इस-उस महकमे के फेरे लगाने के फेर में बहुत हर्ज़ा होता था काम-धंधे का। फिर मैं सरकारी मदद-इमदाद का ख़्याल छोड़कर इसी में ख़ुश रहा कि जहाँ खड़ा होकर गाने लग जाता हूँ, भीड़ लग जाती है। ...कव्वाली सुनियेगा ?’’

नईम कव्वाल की आवाज़ के कंपन ने जैसे एक-एक चीज़ पर जादू कर दिया है। काग़ज़ के फूल ज़िन्दा-से हो उठे। मिट्टी के तोते बस अब उड़े कि तब ! लकड़ी की पुतलियाँ जैसे नाचती परियों में बदल गयीं।

कुछ तस्वीरें खीचीं नई-नई मशहूर रिर्पोटर लड़की ने: नईम कव्वाल, उनकी कालेज पढ़ी बेटी, रुख़साना की अम्मी, होशियार रोशन, इम्प्रेस्ड रेहान, मकान, पड़ोसी, गली की भी।

वे चलने को हुए तो पूरा परिवार दरवाज़े तक विदा करने आया।

‘‘नईम भाई, आप पर मैं वो कवर स्टोरी बनाने वाली हूँ कि ऊपर से नीचे तक हरेक अफ़सर पढ़ेगा इस सिस्टम का। आपका घर अवार्डों से भर जायेगा क्योंकि एक इंटरव्यू मैं अंग्रेज़ी में बनाकर बी.बी.सी. को भेजूँगी अलग से। आप तो पद्मश्री डिजर्व करते हैं!’’

‘‘अब मैं और क्या कहूँ बेटे; हमारे लिए तो दूसरी रुख़साना हो तुम। ये तुम्हारा अपना घर है। जब चाहे आओ।’’

नईम कव्वाल और उनके परिवार की आँखों में पद्मश्री का सपना झिलमिलाता छोड़ श्रेया पैदल ही आगे बढ़ आई है। गली, मोड़, बस्ती की मुख्य सड़क की तस्वीरें उतार रही है कि ये सेलफ़ोन बजा उसका।

‘‘जी सर । ...जी ! ...जी ! ...व्हाट ?? ...ओ माय गाड ??? ...ज़रूर !! बिल्कुल, मैं अभी निकलती हूँ वहाँ के लिए !!’’

‘‘याकी !!’’ -ख़ुशी से काँपती आवाज़ में वो पुकारती है।

सिल्की की प्रतीक्षा में धीमी चलती कार की गति थम जाती है। वो दौड़कर पहुँचती है और कार का दरवाज़ा खोलती, बैठती, बंद करती बेहद हड़बड़ी में है,

‘‘जल्दी चलिये।’’

‘‘कहाँ ?’’

‘‘चीफ़ एडीटर साहब का फ़ोन था । वे गृहमंत्री जी का इंटरव्यू लेने गये थे। गृहमंत्री जी एक दिन के दौरे पर भोपाल आये हुए हैं ना ।’’

‘‘हाँ। हाँ। फिर ?’’

‘‘तो, तो उन्होंने हमारे चीफ़ एडीटर साहब से कहा कि वे इस अख़बार की मशहूर रिर्पोटर श्रेया से मिलना चाहते हे। और वे अपना इंटरव्यू भी मिस श्रेया को ही ...!’’

वे ज़ाहिर तौर पर ख़ुशी से काँप रही है। लौटती राह पर उसके दोस्त की लेटेस्ट माडल कार, उसकी तरक़्क़ी की तरह तेज़ रफ़्तार पकड़ने को है।

‘‘वे मेरा नाम जानते हैं !! आपको पता है याकी, भारत में गृहमंत्री की हैसियत ?? वे कह भर देंगे और बड़े से बड़ा काम हो जायेगा ! वे मुझसे मिलना चाहते हैं -मुझसे ???

कार बस्ती के आगे की सूनी सड़क से आगे होती हुई, टूटी मज़ार को पीछे छोड़ती, अपनी राह चली गई है।

...नईम कव्वाल का इंटरव्यू जिसमें लिया था, वो नोटिंग पैड बस्ती की सड़क पर ही कहीं गिरकर, खो चुका है !


००००००००००००००००


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

गूगलानुसार शब्दांकन