गुलज़ार — एल.ओ.सी | LOC — #Gulzar Short stories hindi


India Pakistan Border Story in Hindi

गुलज़ार — एल.ओ.सी | LOC — #Gulzar

एल.ओ.सी
              — गुलज़ार  



1948 की झड़प के बाद... हिन्दूस्तान के बार्डर पर, फ़ौजें तक़रीबन बस चुकी थीं । बैरेकें भी पक्की हो गई थीं और बंकर भी... 1965 तक के पन्द्रह सालों में, एक रेवायत सी बन गई थी । फ़ौजी टुक्ड़ियों के आने, बसने और विदा होने की । बार्डर की ज़िन्दगी ने अपने आप एक निज़ाम बना लिया था । दोनों तरफ़ की धुऑं-दार तक़रीरों के पीछे, बन्दूक़ों की आइरिंग फ़ाइरिंग का मामूल भी बन गया था । नॉरमल मामूल यही था के जब भी कोई वज़ीर दौरे पर आता तो, आस पास के इलाक़ों में फ़ौजी फ़ाइरिंग करते थे । और कभी कभी किसी गॉंव में घुस कर कुछ भेड़ बकरियॉं उठा कर ले जाते और रात को कैम्प में दावत हो जाती । कुछ सीविलयन मारे जाते, तो अख़बारों को सुर्ख़ियाँ मिल जातीं और लीडरों को तक़रीरों के लिये मवाद मिल जाता ।  LOC एक ज़िन्दा तार की तरह सुलगती रहती । कभी बहुत बड़ा वक़्फ़ा आ जाता इस आपसी जंगबाज़ी में, तो लगता जैसे रस्म-व-राह ही नहीं रही । तालुक़ात ठॅंडे पड़ गये । तालुक़ात ताज़ा करने के लिये, फिर कुछ दिन आतिश बाज़ी कर लेते, ख़ून गर्म हो जाता । कुछ जवान इधर मारे जाते और कुछ जवान उधर मारे जाते । ख़बरों में एक गिन्ती का ज़िक्र होता, पॉंच इधर मारे गये, सात उस तरफ़... और जमा तफ़रीक़ का हिसाब बन जाता ।

दोनों तरफ़ के बंकर भी कोई दूर नहीं थे । कभी यूं भी होता था कि उधर की पहाड़ी से किसी ने कोई बोली या माहिया गा दिया ।

‘‘दो पुत्तर अनारां दे

साढी गली लंग माहिया

हाल पुछ जा बिमारां दे । ’’

तो इधर के सिपाही ने गाके जवाब दिया ।

‘‘दो पुत्तर अनारां दे

पहरे नहीं हड दे चनां

तेरे भैड़े भैड़े यारां दे । ’’

आमने सामने की पहाड़ियॉं भी, बस कन्धों ही की दूर पर थीं । झुक जायें तो शायद गले ही लग जायें । उधर की अज़ान इस तरफ़ सुनाई देती थी । और इधर की उस तरफ़ ।

मेजर कुलवंत सिंह ने एक बार अपने जूनियर कैप्टन से पूछा भी था ।

‘‘ओय, अपनी तरफ़ तो बांग एक ही बार हुआ करती थी । ये आधे घंटे बाद फिर कैसे शुरू हो गई.... ?’’

मजीद हंस पड़ा था ।

‘‘उस तरफ़ की है सर! पाकिस्तान का वक़्त हम से आधा घंटे पीछे है ना । ’’

‘‘तो तुम कौन सी बांग पर नमाज़ पढ़ने जाते हो ?’’

‘‘जो जिस दिन सुट कर जाये, सर!’’ और सैलूट मार के चला गया था । ’’

कुलवंत ने कहा था, उस नौजवान कैप्टन मजीद में कोई बात तो है कि बड़ी जलदी मुंह लग गया । उसकी मुस्कराहट यूं बोलती थी जैसे मेरा ही हाथ पकड़ के बड़ा हुआ है । एक रोज़ मजीद अहमद, रात के वक़्त इजाज़त लेकर उसके  खैमे में दाल हुआ और एक टिफ़िन लाकर दिया ।

‘‘क्या है ?’’

‘‘गोशत है सर, घर में पकाया है । ’’

कुलवंत अपना गिलास तपाई पे रखके खड़ा हो गया ।

‘‘अच्छा ?... अचानक ये कैसे भई ?’’

‘‘आज बक़रीद थी सर! क़ुर्बानी का गोशत है, खायेंगे ना ?’’

‘‘हॉं भई क्यों नहीं...’’ कुलवंत ने ख़ूद उठकर टिफ़िन खोला और भूने गोशत की एक बोटी निकालते हुये कहा...

‘‘मेक ऐ ड्रिंक फ़ोर योर सेलफ़!’’

‘‘नो सर! थैंकयू सर!’’

‘‘कम ओन... ड्रिंक बनाओ... ईद मुबार्क!’’

बोटी हाथ में झुलाते हुये वो तीन बार मजीद के गले मिला था ।

‘‘किसी ज़माने में फत्तू मासी खिलाया करती थी । मुशत्ताक़ की अम्मी, सहारनपूर में । काले चने की घुंघनियॉं और भुना गोशत खाया है कभी ?’’

मजीद कुछ कहते कहते रुक गया... फिर बोला ।

‘‘मेरी बहन ने भेजा है सर । ’’

‘‘वो यहॉं है ? कशमीर में ?’’

‘‘सर है यहीं, कशमीर में लेकिन...’’

‘‘लेकिन क्या ?...’’

‘‘ज़रगुल में है, उस तरफ़!’’

‘‘अरे ?...’’ कुलवंत दायें हाथ से बोटी चूस रहा था और बायें हाथ से उसने व्हिस्की का गिलास बना कर मजीद को पेश किया ।

‘‘चियर्ज़..... और फिर से ईद मुबार्क । ’’

चियर्ज़ के बाद कुलवंत ने फिर पूछा... ‘‘तो टिफ़िन भेजा कैसे तुम्हारी बहन ने ?’’

मजीद थोड़ा सा बेचैन मेहसूस करने लगा, कुलवंत ने फ़ौजियों की तरह सख़्ती से पूछा ।

‘‘तुम गये थे उस तरफ़ ?’’

‘‘नो सर!... नेवर, हरगिज़ नहीं!’’

‘‘तो...!’’

‘‘मेरे बहनोई उस तरफ़ लेफ़टेनन्ट कमान्डर हैं । बहन मिलने आई थी । ’’

कुलवंत ने गिलास उठाया, सिप लिया । टिफ़िन बन्द किया और मजीद के सामने आकर खड़ा हो गया ।

‘‘हाओ डिड यू मैनेज देट ?... क्या बन्दोबस्त किया था ?’’

मजीद चुप रहा ।

‘‘क्या बन्दोबस्त था ?’’

रुकते रुकते मजीद ने बताया.....

‘‘नीचे गॉंव में बहुत से लोग हैं जिनके घर इस तरफ़ हैं और खेतियॉं उस तरफ़ । इसी तरह उस तरफ़ भी ऐसे ही कुछ गॉंव हैं, जिनके घर और खेत बटे हुये हैं । ख़ान्दान भी, रिश्तेदार भी । ’’

अल्फ़ाज़ से ज़्यादा कुलवंत सिंह को कैप्टन मजीद की आवाज़ पर यक़ीन था । थोड़े से वक़्फ़े के बाद कुलवंत ने जब पिलेट में गोशत निकाला तो मजीद ने बताया ।

‘‘उस तरफ़ के कमान्डर आपके दोस्त हैं सर! मैंने आपका एक आर्टीकल पढ़ा था इस लिये जानता हूं । ’’

कुलवंत सिंह का हाथ रुक गया । फ़ौरन एक नाम का शक हुआ उसे । और जब मजीद ने नाम लिया तो उसकी ऑंखें भर आईं ।

‘‘मुशताक़ अहमद खोखर... सहारनपूर से!’’

कुलवंत का हाथ कांप गया । और वो  खैमे की खिड़की के पास जाकर खड़ा हो गया, बाहर कुछ फ़ौजी क़दम मिला कर कैम्प क्रॅास कर रहे थे । मजीद ने धीमी सी आवाज़ में कहा ।

‘‘कमान्डर मुशताक़ अहमद, मेरी बहन के ससुर हैं सर!’’

‘‘ससुर.... ? ओये नसीमा के बेटे से शादी हुई तुम्हारी बहन की ?’’

‘‘जी...!’’

कुलवंत ने तेज़ी से कहा! ‘‘ओये तू...’’ इससे आगे वो कुछ नहीं कह पाया, उसका गला रूंध गया । कुलवंत ने जब गिलास उठाया तो लगा वो कुछ निगलने की कोशिश कर रहा है ।

मुशताक़ और कुलवंत दोनों सहारनपूर के थे । किसी ज़माने में एक साथ ‘दून कॉलेज’ में पढ़ते थे । और दोनों ने ‘‘दून मिलेट्री ऐकडमी’’ में ट्रेनिंग ली थी । मुशताक़ की अम्मी और कुलवंत की बेजी बड़ी पक्की सहलियॉं थीं । फिर मुलक तक़सीम हो गया । फ़ौजें भी तक़सीम हो गईं । मुशताक़ अपने ख़ानदान समेत पाकिस्तान चला गया । और कुलवंत यहीं रहा । दोनों ख़ानदानों में उसके बाद कोई मेल न रहा ।

चन्द रोज़ बाद कुलवंत ने अपने एक जुनियर विश्वा को साथ लिया और कैम्प से दूर एक पहाड़ी की आड़ से उसने मुशताक़ को वायेर्लेस पर कोन्टेक्ट कर लिया । कुछ हैरानी के बाद दोनों दोस्तों ने पंजाबी में ऐसी चुनी चुनी गालियॉं दीं एक दूसरे को, कि दोनों के सीने खुल गये और ऑंखें बहने लगीं । जब सांस में सांस आई तो कुलवंतने पूछा ।

‘‘फत्तू मासी कैसी हैं ?’’

मुशताक़ ने बताया ‘‘अम्मी बहुत ज़ईफ़ हो गई हैं । एक मन्नत मांगी थी उन्होंने कि अजमेर शरीफ़ जाकर ‘‘ख़्वाजा मोइन चुशती’’ के मज़ार पे अपने हाथों से चादर चढ़ायेंगी । दिन रात मन्नत को तर्सती हैं, और राबिया बच्चों को छोड़ कर जा नहीं सकती । राबिया को तू नहीं जानता । ’’

‘‘जानता हूं! मजीद की बहन है राबिया, है ना ?’’

‘‘तुझे कैसे मालूम ?’’

‘‘मजीद मेरा जुनियर है भई....!’’

‘‘ओये.....’’ फिर एक लम्बी सी बोछाड़ गालियों के साथ, ऑंखों से गुज़र गई ।

‘‘उसका ख़याल रखियो ओये....’’ मुशताक़ ने रूंधे गले से कहा ।

फिर दोनों में तैय पाया, कि मुशताक़ किसी तरह अम्मी को वाघा तक पहुंचा देगा । वहॉंसे, कुलवंत की बीवी, संतोष आकर उन्हें दिल्ली ले जायेगी, आपने घर । अजमेर शरीफ़ की जि़यारत करा देगी और जाकर सहारनपूर छोड़ आयेगी, बेजी के पास । अम्मी के साथ कुछ दिन बहुत अच्छे कटेंगे । मुशताक़ के सीने से बहुत बड़ा बोझ हट गया ।

फिर एक रोज़ .... मुशताक़ का पैग़ाम आया, अम्मी को वीज़ा मिल गया है । कुलवंत ने संतोष के साथ (बार्डर पर मिलने की) तारीख़ तैय कर दी । सब इन्तेज़ाम हो चुके थे, बस मुशताक़ को ख़बर करना बाक़ी था । उसी दिन डीफ़ेंस मिन्सट्र एल.ओ.सी पर आ धमके और दोनों तरफ़ से ताक़त के मुज़ाहरे शुरू हो गये । कुलवंत जानता था के ये झक्कड़ दो एक रोज़ में गुज़र जायेगा । वायेर्लस पर न भी राबता क़ायेम हुआ तो किया.....! नीचे गॉंव में जाकर किसी को उस तरफ़ भेजने की ही तो बात है । मजीद को वसीला भी पता है । फिर भी फ़िक्र ना गई । संतोष बताती थी कि अब तो बेजी-जी रोज़ डाक ख़ाने से फ़ोन कर के पूछ लेती हैं ।

‘‘नी फत्तू आ रही है न ?... तू वाघा पहुंच जायेगी । पहचान लेगी कि मैं साथ चलूं ?’’

मजीद ने ख़बर दी... ‘‘सर पाकिस्तान की तरफ़ से शैलिंग बहुत तेज़ हो गइ है । ’’

कुलवंत चिड़ा हुआ बैठा था... बोला:

‘‘ओ खसमानों खाये पाकिस्तान, फत्तू मासी का क्या होगा ?’’

पहली सितम्बर के दिन, पाकिस्तानी फ़ौजों ने, ‘‘चम्भ’’ पर हमला किया और एल.ओ.सी. के अन्दर चली आईं ।

28 अगसत हिंदूस्तानी फ़ौजों ने ‘‘हाजी पीर’’ अपने क़बज़े में ले लिया । उसी दिन की ख़बर है, 28 अगस्त 1965.....

....... सहारनपूर में फत्तू मासी घुंघनियॉं वाला गोशत पका रही थी । बेजी ने काले चने उबाले थे । और एल.ओ.सी. पर ग्यारह फ़ौजी हलाक हो गये, जिन में एक मेजर कुलवंत सिंह था ।

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