शुक्रवार, अप्रैल 08, 2016

नमिता गोखले की कल्पसृष्टि की 'शकुन्तला' — पुरुषोत्तम अग्रवाल


Namita Gokhale Shakuntala the play of memory. Excerpts and Purushottam Agrawal's comment.

शकुन्तला — स्मृति जाल

उपन्यास अंश



पुरुषोत्तम अग्रवाल Purushottam Agrawalयह महाभारत की शकुन्तला की कथा नहीं, एक और शकुन्तला की कहानी है। नमिता गोखले की अपनी स्मृति और कल्पसृष्टि की शकुन्तला। उस समय की शकुन्तला जबकि भारत पर सिकन्दर के आक्रमण को हजार वर्ष बीत चुके हैं, और ‘शाक्य मुनि का नया धर्म प्राचीन मत के आधार को खंडित’ कर रहा है। यह उथल-पुथल पृष्ठभूमि में अवश्य है, किन्तु उपन्यास का मर्म उस समय की ही नहीं,  किसी भी समय की स्त्री द्वारा इस सचाई के साक्षात्कार का रेखांकन करने में है कि, ‘तुम्हारे संसार में शक्तिशालिनी स्त्रिायों के लिए बहुत कम स्थान है, और अबलाओं के लिए बिल्कुल नहीं’।

शकुन्तला के लिए सारा जीवन इस संसार में अपना मार्ग, अपना स्थान खोजने का अनुष्ठान है। इस खोज में पहाड़ी गीत की तरह सुख-दुःख का मिश्रण तो है ही, अप्रत्याशित स्वर-कम्पन और उतार-चढ़ाव भी हैं। शरीर और मन दोनों धरातलों पर चल रही प्रेम और तृप्ति की इस खोज में शकुन्तला के व्यक्तित्व का रेखांकन भी है, और निम्नतम इच्छाओं के सामने समर्पण भी। उसकी आत्मखोज का एक धु्रव इस बोध में है कि जीवन जिया और दूसरा इस अहसास में कि इस जीने में ही अपना एक अंश खो भी दिया।
मार्के की बात है इन दोनों स्थितियों के प्रति, शकुन्तला की सजगता-जिसे नमिता गोखले बहुत सधे हुए ढंग से, रोचक आख्यान में पिरोती हैं।

यह कल्पसृष्टि इतिहास के एक खास बिन्दु पर घटित होने के साथ ही ऐन हमारे समय की स्त्री द्वारा भी अपनी अस्मिता की खोज का आख्यान रचती है, स्त्री के कोण से यौनिकता को देखती है, रचती है और उसकी विवेचना करती है। कर्तव्य, अकर्तव्य और मर्यादा के ही नहीं, स्त्री के अपने मन के द्वन्द्वों से भी नितान्त गैर-भावुक और इसीलिए अधिक मार्मिक ढंग से साक्षात्कार करती है। अपने अप्रत्याशित फैसलों से रचे गये जीवन के अन्त में, शकुन्तला घृणा, स्पष्टता, उत्साह और अर्थहीनता के मिले-जुले भावों के बावजूद मानती है, ‘‘संसार सदैव अपने मार्ग पर चलता है, किन्तु कम से कम मैंने अपना मार्ग खोजा तो। यही तारक था, शिव का मुक्तिदायक मन्त्र’’।

अत्यन्त पठनीय, इस उपन्यास की खूबी यह है कि शकुन्तला द्वारा अर्जित साक्षात्कार किसी सपाट नैतिक फैसले का साक्षात्कार नहीं, बल्कि स्याह-सफेद के बीच के विराट विस्तार का साक्षात्कार है, जोकि पाठक के लिए भी अवकाश छोड़ता है कि वह शकुन्तला के जीवन जीने के ढंग से सहमत या असहमत हो सके। उसके द्वारा अर्जित ‘तारक-मन्त्र’ से विवाद कर सके।

 — पुरुषोत्तम अग्रवाल


शकुन्तला

— नमिता गोखले


काशी, शिव की नगरी। यहाँ मृत्यु का वास है, जीवन का उपहास उड़ाती मृत्यु। लोग यहाँ प्राण त्याग जीवन-मृत्यु के चक्र से बचने आते हैं। इन घाटों पर शिव मृतकों के बीच घूमते हैं, उनके कानों में तारक मन्त्र पढ़ कर उन्हें मुक्ति देते हैं।

बनारस की वह पहली छवि मैं कभी भूल नहीं पायी: घाटों पर लपलपाती चिताओं की अग्नि, लहरों पर टूटती उनकी परछाइयाँ। उनके प्रकाश से धूमिल पड़ गया चन्द्रमा। जिह्ना लपलपाती आकाश की ओर लपकती ज्वाला। चिताओं के प्रकाश और चरमराहट के पीछे अँधेरे में डूबा नगर। शकुन्तला ने यहीं प्राण त्यागे थे, इस पवित्र नदी के तट पर। उस जन्म का स्मृति जाल मुझे मुक्त नहीं होने देता।

वर्षा ऋतु के अन्तिम बादल आकाश के किनारों पर छाये हुए हैं। पवन के झोंकों के साथ वर्षा की हल्की, क्लान्त-सी बौछार आती है, मेरे चेहरे पर नम राख छितर जाती है, राख मेरे केशों में भर जाती है। बिखरी हुई स्मृतियों की यह अग्नि-शय्या इसे कैसे नकार दूँ मैं? वह मुझे नहीं त्यागेगी, वह शकुन्तला। मैं उसकी पीड़ा और उसके प्रेमों का यह बोझ उठाये फिरती हूँ, जिसे मैं अभी तक समझ नहीं पायी हूँ।

सदैव की भांति वही पथरीली दीवार पर दीये की काँपती-थरथराती लौ की प्रकाश-क्रीड़ा। बाहर पत्थरों और चट्टानों से टकराती नदी की लहरें, रेतीला तट जहाँ एक मछुआरा अलाव जलाए प्रतीक्षारत बैठा है। शकुन्तला अपने प्रियतम के समीप लेटी है। दोनों की श्वासों की लय जैसे परस्पर गुँथ जाती है। उस पुरुष की देह से मिट्टी और चन्दन की गन्ध उठती है। उसके वक्ष के एक-एक रोम को वह पहचानती है, कैसे उनमें घूँघर पड़ते हैं और कैसे उसके अंक में आते ही वे सपाट हो जाते हैं। उसका मुखड़ा अन्धकार में छिपा है, लेकिन वह जानती है उसके नेत्र शान्त और सतर्क हैं। उसके अंग-अंग को वह पहचानती है। इस पहचान में प्रेम है, समझ है। इसमें वेदना है।

जब वह उससे लिपटी हुई थी, तब उस पुरुष ने उसके कान में क्या कहा था? मुझे तो बस अहाते में मोरों की पिऊ, पिऊ और अशान्त नदी के बहने की प्रतिध्वनि ही सुनाई देती है। एक कौआ निरन्तर काँव-काँव कर रहा था, उसकी विचार-शृंखला को तोड़ता, उसे कुछ बताता।

जल पर प्रकाश का प्रतिबिम्ब पड़ रहा है, मेरी आँखें चुँधिया गयीं। मैं जैसे किसी और ही काल में पहुँच गयी थी, तब भी गंगा ऐसे ही दमकती थी। सूरज चढ़ आने के बाद भी नदी का जल शीतल है। शकुन्तला को लगा जैसे जल ने आतुरता से आकर उसके घुटनों को जकड़ लिया है, अधीर बालक की तरह उससे लिपट गया है, उसे खींचे ले जा रहा है। पीछे कुछ हलचल-सी हुई,
नमिता गोखले Namita Gokhale

नमिता गोखले


प्रख्यात भारतीय लेखिका, साहित्यकार व प्रकाशक हैं। भारतीय साहित्य के पाठ्यक्रम में पक्षपात को समाप्त करने में संघर्षशील, नमिता गोखले सकारात्मक विरोध की प्रतीक के रूप में जानी जाती हैं।

कॉलेज छोड़ने के तुरन्त बाद नमिता गोखले ने वर्ष 1977 के अन्त में ‘सुपर’ नाम की फिल्मी पत्रिका प्रकाशित की। उनका पहला उपन्यास ‘पारो: ड्रीम्स ऑफ पैशन’ अपनी बेबाकी और स्पष्ट यौन मनोवृत्ति के कारण काफी विवादों में रहा। भारतीय साहित्य के प्रसिद्ध नीमराणा अन्तरराष्ट्रीय महोत्सव और अफ्रीका एशिया साहित्य सम्मेलन शुरू करने का श्रेय उनको ही जाता है। गोखले जयपुर साहित्योत्सव की भी सह-संस्थापक हैं। साथ ही भूटान के साहित्यिक समारोह की सलाहकार भी हैं। वह ‘यात्रा-बुक्स’ की सह-संस्थापक हैं। ‘पारो: ड्रीम्स ऑफ पैशन’, ‘हिमालयन लव स्टोरी’, ‘द बुक ऑफ शाडौस’, ‘शकुन्तला: द प्ले ऑफ मेमोरी’, ‘प्रिया इन इनक्रेडिबल इण्डिया’, ‘द बुक ऑफ शिवा’, ‘द महाभारत’ और  ‘इन सर्च ऑफ सीता’ उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं।

ईमेल: namitagokhale@gmail.com

मद्धम-सी छपाक और मृदु हास्य। वह पलट कर देखती है, जल के समीप एक अश्व खड़ा है, उसके उन्नत मस्तक पर एक बड़ा-सा श्वेत चिद्द है। उसकी लगाम थामे खड़ा है एक पुरुष — सुन्दर, बलिष्ठ पुरुष, एक पथिक जिसके नेत्रों में अदमनीय उल्लास झलक रहा है।

और फिर स्वर्ण शिखर पर लहराता-फरफराता लाल ध्वज। दोपहर की बयार उस शाश्वत नगरी की भूलभुलैयों और भवनों से होकर बहती है। नदी के पार, पहले रेत और फिर जंगल हैं। मन्दिरों की घंटियाँ बिना थमे मानो आर्तनाद करती गूँजती हैं। उसके गर्भ में एक घाव है, रक्त की धारा बह रही है। शकुन्तला की श्वास टूट रही है।

स्मृतियों से पीड़ित, पहचान लिए जाने के भय से व्याकुल, वह काशी में परित्यक्ता-सी पड़ी है, लहरों की तटस्थ झिलमिल जैसे उसका उपहास कर रही है। एक श्वान मार्ग के दूसरी ओर से लँगड़ाता हुआ आता है और उत्सुकता से उसे तकता है। उसकी पीड़ा को महसूस कर वह सखा की भाँति उसके समीप बैठ जाता है। भगवा वस्त्राधारी संन्यासियों का एक समूह वहाँ से निकलता है, पाँच संन्यासी। क्या उनमें संन्यासी गुरेश्वर भी है? गुरेश्वर की शान्त दृष्टि उसकी दृष्टि से टकरायी, उनमें भय नहीं है, बस एक नकारने का भाव है। उसमें, उसके भाई में दया नहीं है।

स्वप्न में मैं सियार को देखती हूँ, उसकी आँखें जल प्रवाह में कुछ खोज रही हैं, हमले के लिए प्रतीक्षारत-सी। काली, उसके वक्ष पर मुंडमाला सजी है, वह उसके साथ चल रही है। काली, इच्छाओं की संहारक, स्वप्नों के अवशेषों का भोज करने वाली। यद्यपि वह लगती निर्मम है, पर अत्यन्त ममतामयी है, उसके समीप पीड़ा नहीं है, कोई आशा-आकांक्षा नहीं है। पर शकुन्तला इस सान्त्वना से बच निकली और धारा के विपरीत संघर्ष करती उस जीवन की ओर चल पड़ी, जिसे वह बिना विचारे त्याग आयी थी।

इन छायाचित्रों के मध्य एक जीवन छिपा है।

हम किसलिए जीते हैं? किसलिए मृत्यु को प्राप्त होते हैं? स्वयं से भागने के लिए? क्या जीवन-क्षुधा स्वयं अपना आहार बन जाती है? क्या नदी का जल कभी अपनी पिपासा मिटा सकेगा?

गंगा किनारे एक पंडे से मैं पूछती हूँ कि ये स्मृतियाँ क्यों मेरे पीछे पड़ी हैं। वह क्लान्त है, कुछ उकताया सा। रुपये और सिक्के उसके फटे आसन के नीचे से निकले पड़ रहे हैं। सहस्रों वर्षों से उसके पूर्वज इस नगरी की इन्हीं सीढ़ियों पर बैठते रहे हैं और मेरे जैसे तीर्थयात्रियों का विवरण दर्ज करते आये हैं। शीत ऋतु का आरम्भ है, पर उसने मात्र एक धोती पहन रखी है। नग्न वक्ष पर मात्र एक जनेऊ पड़ा है। उसका वक्ष ढलक गया है और बड़े-बड़े नेत्र दृष्टिविहीन हैं।

‘‘तुम पहले भी यहाँ आयी हो, बहन,’’ उसने कहा, ‘‘इसी नदी के तट पर, इन्हीं सीढ़ियों पर।’’ अपने प्रकाशविहीन नेत्रों से नदी के बहाव को देखते हुए उसने अपनी काँखें खुजाईं। ‘‘अतीत जीवित रहता है। हम सब अपने साथ अपने अपूर्ण कर्मों के अवशेष लेकर आते हैं, ऋणों का बोझ जिन्हें हमें इस जन्म में उतारना होता है। तुम और नहीं भाग सकतीं, बहन। इस जीवन का सामना करो। स्वीकार करने में ही मुक्ति है।’’

सन्ध्या की आरती का समय है। आरती के दीयों की आभा गंगा में बिम्बित हो रही है। घड़ियाल और शंखों की ध्वनि के बीच, मैं घंटियों का रुदन सुनती हूँ। अनवरत रुदन। यहाँ तक कि उनकी प्रतिध्वनि भी अनवरत थी।

कहते हैं भगवान शंकर संहारक हैं, स्मृहर्ता, स्मृतियों के विनाशक। उनकी ही नगरी में मैंने प्राण त्यागे, किन्तु मैं तो कुछ नहीं भूली। अभी तक मुझे याद है कि कैसे शकुन्तला की देह भूखी थी, और कैसे देह को भोगती, उसे चूस कर फेंकती वह वीभत्स हो गयी थी। धूमकेतु की तरह, उस जीवन का अवशिष्ट जन्म-जन्मान्तरों से मेरा पीछा कर रहा है।


लखाती, पतित-पावनी गंगा आषाढ़ माह पार कर गयी। पहाड़ियाँ दूर तक फैले मैदानों को तकती हैं। काँपता नीला-हरा आकाश कमल की पंखुड़ी के रंग का सा हो गया है। ग्रीष्म ऋतु की शान्त धुन्ध में बिजली की पहली गूँज छुपी है।

माँ को घर के कामों में लगा छोड़ कर मैं जंगल में खेलने भाग आयी हूँ। लम्बी घास पर लेट कर आकाश में मँडराते गिद्धों और उकाबों को देखती हूँ, और फिर बादल गिनने में लग जाती हूँ, सबको कोई आकृति और नाम देती हूँ। आकाश में दुन्दुभि बजाता हाथी और एक गदबदा-सा खरगोश मुझे दीख पड़ता है।

बादल छा जाते हैं, और नियति के अपशगुन की भाँति एक अन्धकारपूर्ण समूह बना लेते हैं। मेरा संसार छोटा होने लगता है, आकाश दूर हो जाता है, सब जैसे बच भागते हैं। निराशा का अथाह बोझ मुझे सुन्न कर देता है। व्यक्ति पर यह तब हावी होता है जब सब कुछ समाप्त सा होता लगता है। मैं बदली में डूब जाती हूँ। दुख की आँधी मुझे साथ उड़ा ले जाती है। मैं कहीं गहरे छुपे, अनजाने क्रोध के प्रचंड वेग से संघर्ष करती हूँ। कड़कती बिजली मेरे भयों का उपहास उड़ाती है। वर्षा, गड़गड़ाहट, बिजली, ये सब क्या मेरे दुख, मेरी हताशा को जानते हैं?

फिर वर्षा थम गयी। नम, दबी घास से मिट्टी की सुगन्ध का भपारा फूट निकला। झींगुरों ने अपना उत्तेजक, क्रुद्ध गान छेड़ दिया। तीव्र बौछार ने नीले कीड़ों की समूहबद्ध पंक्ति को डुबो दिया। पहाड़ों में इन्हें इन्द्रगोपा कहते हैं। मेढकों की टरटराहट और मोरों की तीव्र पुकार ने मेरे कानों को बींध दिया। अपने चारों ओर की नमी, थम गयी वर्षा की कोंचती स्मृति से घबरा कर मैंने रोना बन्द कर दिया। भावनाओं को निरन्तर रौंदे जाने से थक कर मैं रीत गयी थी, मृतप्राय हो गयी थी। मेरा मलमल का घाघरा भीग कर कीचड़ में लिथड़ गया था, और जब किसी तरह घर पहुँची तो माँ ने मेरे मुँह पर तीन-चार चाँटे जड़ दिये।

‘‘दुष्ट, निर्लज्ज लड़की!’’ वे चिल्लाईं। ‘‘तू क्या मुझे सताने, यातना देने के लिए ही जन्मी है?’’

शुष्क नेत्रों से मैं उन्हें जैसे दूर से देखती रही: झुर्री पड़ा धँसा चेहरा, काँपता मुँह, फटे, सफेद होंठ, उनके किनारों पर थूक की हल्की सी परत जम गयी थी। मुझे उन पर दया आयी, कुछ-कुछ घिन भी।

एक बार पुनः, भावनाओं का बोझ मेरे भीतर टूटने लगा। मैं अनबहे आँसुओं से काँप उठी। माँ ने अचकचे भाव से मुझे सीने से लगाना चाहा, वे जानती थीं कि मैं उन्हें परे कर दूँगी। पूरी रात मैं बाँज की लकड़ी की पुरानी देहरी पर बैठी रही, अकेली अपने क्रोध और दुख से जूझती। मेरे रोने-धोने के बीच किसी पल पूर्व से प्रभात की सुनहरी किरणें फूट पड़ीं, और तब मैं पीछे के कमरे में अपनी छोटी-सी पुआल पर सोने चली गयी।

कालिदास के महाकाव्य की नायिका के नाम पर मेरा नाम शकुन्तला रखा गया था, यद्यपि उसकी शकुन्तला मेरी भाँति मनुष्य नहीं थी। मेरी नामराशि वह दिव्य थी, अमरत्व प्राप्त अप्सरा मेनका की पुत्री। मेनका, जिसने ऋषि विश्वामित्र की तपस्या भंग करके उनका वीर्य चुरा लिया था। उस शकुन्तला को उसकी माँ मेनका ने त्यागा, जन्मदाता पिता विश्वामित्रा ने त्यागा और बाद में उसके पति दुष्यन्त ने त्याग सम्भवतः वह अपने भीतर त्यागे जाने का संस्कार वहन कर रही थी। कुछ लोग इस नाम को अभागा कह सकते हैं।

मेरी माँ ने मेरा नाम शकुन्तला रखा था। मैंने कभी इसका कारण नहीं पूछा। वे कोई दिव्यात्मा या अप्सरा नहीं थीं, न ही विदुषी रसिका थीं, बल्कि एक मामूली-सी पहाड़ी स्त्री थीं, जिन्हें जड़ी-बूटियों द्वारा चिकित्सा करने का व्यसन था। मैं चार वर्ष की थी तभी मेरे पिता चल बसे थे। हमारे अरक्षित जीवन में उनकी अनुपस्थिति सदैव उपस्थित रही। मुझे अपनी माँ की पहली याद उनके चिकित्सा में रत होने, हमारे उपवनों में लगन से जड़ी-बूटियाँ छाँटते रहने की ही है। मेरे पिता वैद्य थे। माँ ने जो थोड़ा-बहुत जड़ी-बूटियों का ज्ञान पाया, वह उन्हीं की देन थी। आमलक का तेज कसैलापन, अश्वगन्धा की खट्टी गन्ध बचपन की इन्हीं स्मृतियों में स्वयमेव जुड़ गये थे।

हमारी दोनों गायों का चारा-सानी भी माँ करतीं। उनके हाथों और कपड़ों में बसी पहाड़ी जड़ी-बूटियों की गन्ध में दूध और गोबर की गन्ध भी समा गयी थी। मुझे गायों से, उनके भले नेत्रों और लाल खुरदुरी जिह्ना से स्नेह था, लेकिन उन्हें दुहने में मुझे भय लगता कि मैं भी माँ के समान गन्धाने लगूँगी। माँ मुझे वक्ष से लगातीं, तो मिलीजुली गन्धों का एक भभका-सा आता, और मैं उनके बेध्यानी में भरे आलिंगनों से चुपचाप निकल भागती और घर के बाहर उद्यान में खेलने लग जाती।

सादा-सा उद्यान था हमारा। हमने पुष्प कम ही लगाये थे, किन्तु पोदीना, तुलसी, कान्ताकारी और अन्य उपयोगी जड़ियाँ बहुतायत से लगायी हुई थीं। माँ उन्हें स्वयं ही रोपतीं, उनका ध्यान रखतीं, उसी क्रम में जिसे उन्होंने यत्नपूर्वक सीखा था, समझा था और बाद में अपने अनुभव से सुधारा था। पटुआ को अमावस्या की चन्द्रविहीन अर्द्धरात्रि में ही रोपा जाता है, श्यामा तुलसी की पत्तियों को सूर्य देव के दिन अर्थात रविवार को नहीं तोड़ा जाता। उन्होंने ज्ञान की अपनी यह थाती मुझे सौंपनी चाही, किन्तु मैंने इस प्रबलता से इन प्रयासों का विरोध किया कि मुझे स्वयं पर आश्चर्य हुआ। माँ की हर बात से मुझे घृणा थी, उनके उलझे केशों, लँगड़ाती चाल और उनके कटे-फटे गन्दे पाँवों, सबसे। मैं उनके समान कभी नहीं बनना चाहती थी।

महाकाव्य की शकुन्तला की भाँति मैं भी पर्वतों में पली-बढ़ी थी। हमारी ओर के पहाड़ी लोग वनवासी कहलाते हैं। जीवन पथ कठिन था, सुख-साधन कम थे और नगरवासियों की तुलना में हमारा रहन-सहन अत्यधिक भिन्न था। नहाने आदि के लिए जल नहीं था, हमें बहुत दूर पहाड़ी के नीचे से जल भर कर लाना होता था। हमारा घर सदैव ठंडा, सीलनभरा और नम रहता था। मैं पुआल के बिस्तर पर सोती थी और प्रायः मकड़ी या कनखजूरे के रेंगने से जग जाती थी।

[ 2 ]

सँकरी घुमावदार गली के नुक्कड़ पर तीन गाय झुंड बनाये खड़ी थीं। उनकी उष्ण पशुगन्ध ने मुझे घर का स्मरण करा दिया। दास्यु और उसका बछड़ा मेरे नेत्रों के सामने साकार हो गये। क्या उन्होंने मुझे स्मरण किया होगा अथवा मेरी कमी अनुभव की होगी? इस विचार के साथ ही पहाड़ों के ताज़ा मक्खन और थक्केदार दही का स्वाद मेरी जिह्वा पर तिर गया।

दूर कहीं से मन्त्रोच्चार की ध्वनि उभरी, संन्यासियों की एक शोभायात्रा आती दिखाई दी। उनमें सबसे लम्बे संन्यासी में उसे गुरेश्वर की सी छवि प्रतीत हुई, वही सकुचाहटभरी उदारता, अपूर्ण सा अलगाव। क्या यह वही है? वे अभी भी दूर हैं। वह समझ नहीं पाती कि संन्यासियों की ओर बढ़े अथवा छुप जाए। उनके पीछे कहीं से एक आक्रामक साँड़ दौड़ा चला आता है, उनको छिटका कर अलग करता, मन्त्रोच्चार को शान्त करता। एकनिष्ठ उद्देश्य से वह शकुन्तला पर आक्रमण कर देता है। उसका गर्भ अनार की भाँति फट जाता है, पथरीली पगडंडी पर रक्त की बूँदें बिखर गयीं।

एक संन्यासी उसकी ओर दौड़ा। अपने भगवा वस्त्रा को फटकार कर उसने क्रुद्ध पशु को दूर किया। इस दंड से शान्त हो वह शिव का वाहन दूर चला गया। तीनों गाय, नियति की मूक त्रिधारा सी मन्दिर के बाहर पड़ी भेंटों और प्रसाद के अवशिष्ट खाती रहीं।

एक काषिणी ऊँचे तलवों वाली पादुकाएँ पहने पगडंडी पर लड़खड़ाती-सी चली जा रही थी। धूप से बचने के लिए उसने बाँस और रेशम से निर्मित छत्रा ले रखा था। शकुन्तला की याचक दृष्टि उसके नेत्रों से टकराई। ‘मेरी पुत्री को बचा लो,’ वह कह रही थी, यह मौन स्वर काषिणी को खींच लाया। स्त्री पगडंडी पर बहते रक्त को पार कर शकुन्तला के समीप आ कर बैठ गयी। सतर्क हाथों ने उसके गर्भ को जाँचा, रक्त के ढेर में जीवन के चिद्द खोजे।

‘‘अपना वस्त्र दीजिए,’’ काषिणी ने आदेशात्मक स्वर में संन्यासी से कहा। विनीत भाव से उसने अपना वही भगवा वस्त्रा काषिणी को सौंप दिया, जिससे उसने शिव के बैल को भगाया था। काषिणी ने मरणासन्न स्त्राी के उदर पर वस्त्रा बाँध दिया। क्षणांश में वस्त्र पर माणिक की सी गहरी लाल बूँदें झलक आयीं।

शकुन्तला पीड़ा से दोहरी हो रही थी। गहन पीड़ा से वह कराह रही थी, छटपटा रही थी। शिशु को गर्भ से निकालती काषिणी की उँगलियों में धारण की रत्नजड़ी अँगूठियों ने उसके घाव को और छील दिया था। जीवन का रुदन गूँज उठा, शिशु का कोमल रुदन।

‘‘वह जीवित है,’’ भयाक्रान्त स्वर में संन्यासी कह उठा, ‘‘शिव की कृपा से बालक जीवित है!’’ उसने बालक को लेने के लिए बाँहें फैला दीं।

‘‘एक शिशु और है,’’ काषिणी ने कहा। ‘‘इसके गर्भ में एक जीवन और है!’’ शकुन्तला को अपनी पुत्री की आशा थी, उसकी प्रतीक्षा थी। संन्यासियों के मन्त्रोच्चार के साथ ही शिशु के रुदन का स्वर भी दूर होता गया। ‘‘ईश्वर के अनुगामी तुम्हारे पुत्रा को साथ ले गये हैं,’’ काषिणी ने कहा। ‘‘यह तुम्हारा सौभाग्य है कि वह उनके आश्रय में है।’’

शेष बचे जीवन के भार को अपनी देह से निकालने के प्रयास में शकुन्तला के अधरों पर रक्त झिलमिला उठा। काषिणी ने उसे सान्त्वना दी, उसका मस्तक सहलाया। अपनी पुत्री का, उसके साथ अकेले जीवन बिताने का स्वप्न देखती शकुन्तला मुस्कुरा दी। उसका मस्तिष्क भटकता हुआ निर्जन परित्यक्त मन्दिर में उसे ले गया, उसके गर्भगृह में जहाँ थरथराती-सी दीये की लौ है, पाषाण-योनि पर पुष्प अर्पित हैं।

वह काषिणी की रत्नजड़ित उँगलियों को शिशु को निकालते अनुभव करती है। वह धैर्य से शिशु आगमन की सूचना देते रुदन को सुनने की प्रतीक्षा करती है, किन्तु कुछ सुनाई नहीं देता। समय विस्तृत होता है, संकुचित होता है। शिव, स्मृहर्त्ता, स्मृति-विनाशक। वे शकुन्तला के ऊपर झुकते हैं, उसके कान में तारक मन्त्र पढ़ते हैं। वह उनके वाहन, बैल के क्रुद्ध नेत्र देखती है, उसके सींग शिव के मस्तक पर विराजे चन्द्रमा की भाँति चमक रहे हैं। मृत्यु-छाया उसे घेर लेती हैं।

यह उसे नदी की कलकल सुनाई दे रही है, अथवा शिव का डमरू, समय की ताल है अथवा उसके रक्त का प्रवाह, अथवा उसकी टूटती साँसों की लय है? वह अपनी पुत्राी को पकड़ने का यत्न करती है, काषिणी उसे रोकती है। ‘‘इस संसार में हमारे लिए स्थान नहीं है,’’ वह हौले से कहती है।

सूर्य अभी आधा ही चढ़ा है, दोपहर ठहर गयी है। एक श्वेत प्रकाश मुझ पर छा जाता है। उदार हाथ पीतल के पात्रा से जल उड़ेल रहे हैं, किन्तु मेरे मुख में रक्त और ज़ंग का ही स्वाद है, मैं जल नहीं पी पाती। नदी असहज हो रही है। मेरे भीतर एक क्रोध फन उठाता है, घृणा, स्पष्टता और उत्साह का मिलाजुला भाव। यह अर्थहीन था, मैं जान गयी थी कि मैंने अपना जीवन निश्चित मार्ग की जगह अन्य प्रकार से जीना चाहा। संसार सदैव अपने मार्ग पर चलता है, किन्तु कम से कम मैंने अपने मार्ग को खोजा तो। यही तारक था, शिव का मुक्तिदायक मन्त्र।

सम्भवतः मैं सो गयी थी, क्योंकि जब दुबारा आँख खोली, तो मेरे समक्ष तारे जगमगा रहे थे। मैंने चिरपरिचित त्रिकोणीय वाण को देखा। ओरायन नक्षत्रा, नीरकस कहता था। उसने कहा था जब श्वान नक्षत्रा ऊपर उठता है, तो एजिप्टस नदी के पास की धरती को बाढ़ निगल लेती है।

संसार बहुत विशाल है, किन्तु यहाँ, नदी के किनारे, रात्रि की मन्द बयार मेरे मस्तक को शान्त करती है, लहरों की ध्वनि मेरा आलिंगन करती है।

उषा ने आकाश में अपना कपटजाल फैला दिया है। ब्रह्ममुहूर्त है, जब विधाता सारे संसारों को सन्तुलन में रखते हैं। मैं आने वाले वर्षों की झलक देखती हूँ, वे प्रातः की श्वास की भाँति थे, मेरे कानों में एक फुसफुसाहट के समान, एक आमन्त्राण देते से। तभी मन्दिर के घंटे अनवरत रूप से बजने लगे।

लम्बे अन्तराल के पश्चात मुझे अपनी माँ का ध्यान आया, वे कभी किसी बात से नहीं डरती थीं। उनका मुख मेरे स्मृति-पटल पर साकार हो गया, चिन्तित, सतर्क, जब मैं शिलाजीत की खोज में पहाड़ी पर चढ़ रही थी, क्या उनके नेत्रों में अश्रु थे?

‘‘मेरे लिए रोओ मत,’’ मैंने धीमे से कहा, प्रत्यक्षतः किसी से नहीं। मैं अपनी पुत्री के लिए नहीं रोऊँगी, अपने अश्रु व्यर्थ नहीं करूँगी। मैंने अपना जीवन भी वृथा नहीं किया। मैंने जीवन जिया।

मन्द पवन की भाँति मैं स्वयं को तैरते, ऊपर और ऊपर आकाश की ऊँचाइयों में एक काली पतंग के समकक्ष उड़ते देखती रही।
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