‘बाँटों और राज करो' का चक्र तोड़ना होगा — अमीश त्रिपाठी @authoramish


The divided and the ruled Amish Tripathi ‘बाँटों और राज करो' का चक्र तोड़ना होगा — अमीश त्रिपाठी

भारत का दुर्भाग्य यह है कि आज़ादी के बाद भी अभिजात-सत्ताधारी   'बाँटों और राज करो' की नीति को चला रहे हैं 


 — अमीश त्रिपाठी

अमीश त्रिपाठी अंग्रेजी के युवा और चर्चित उपन्यासकार हैं, टाइम्स ऑफ़ इंडिया में अमीश का आलेख पढ़ने के साथ ही मैंने यह तय किया था कि इसे हिंदी के पाठकों तक पहुँचाना होगा, ज़रूरी महसूस हुआ था ऐसा। जिन मुद्दों को लेखक ने यहाँ उठाया है वे महत्वपूर्ण हैं और इसी लिए यहआलेख भी।   (‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ 2 मई 2016, में प्रकाशित Amish Tripathi के लेख ‘The divided and the ruled’ का हिंदी अनुवाद )

– भरत तिवारी
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‘बाँटों और राज करो' का चक्र तोड़ना होगा 

    अमीश त्रिपाठी

   
हमारा संविधान अपनी प्रस्तावना में अपने मार्गदर्शक उद्देश्यों को संक्षेप में बताता है, जिनमें से एक ये है : प्रतिष्ठा तथा अवसर की समानता । कोई भी समाज पूरी तरह से बराबर नहीं है (और कभी रहा भी नहीं है); यह एक कभी न पूरी होने वाली आकांक्षा है । इसकी मौजूदगी अच्छी भी है बशर्ते इसका पहला क़दम ' कानून के समक्ष समानता' हो । सारे सभ्य देश कानून के समक्ष समानता का पालन करते हैं; आदर्श स्थित तो यह सुनिश्चित करने में होगी कि धार्मिक मान्यताओं के आधार पर भेदभाव न हो । हम बड़े गर्व से ख़ुद को एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र होने का दावा करते हैं; इसका मतलब यह हुआ ; कि प्रत्येक भारतीय को हमारा कानून एक ही तरह का मानता है, उनके धार्मिक विश्वासों से उसका कोई सरोकार नहीं है । लेकिन अफ़सोस कि ऐसा है नहीं ...
   

WE, THE PEOPLE OF INDIA, having solemnly
resolved to constitute India into a 
SOVEREIGN SOCIALIST SECULAR DEMOCRATIC REPUBLIC and
to secure to all its citizens:
JUSTICE, social, economic and political;
LIBERTY of thought, expression, belief, faith and
worship;
EQUALITY of status and of opportunity;
and to promote among them all
FRATERNITY assuring the dignity of the individual
and the unity and integrity of the Nation;
IN OUR CONSTITUENT ASSEMBLY 
this twenty sixth day of November, 1949, do HEREBY ADOPT,
ENACT AND GIVE TO OURSELVES THIS CONSTITUTION.
     अगर अभी आप ये सोच रहे हैं - कि ये बात हो रही है यूनिफार्म सिविल कोड यानी शादी, तलाक़, जायदाद, और गोद जैसे मामलों में सबके लिए एक कानून की - तो आप गलत हैं । ये बात नहीं है । यह जानते हुए भी कि हमारे धार्मिक समुदायों के अलग-अलग व्यक्तिगत कानून (नियम) हैं, अम्बेडकर ने संविधान के डायरेक्टिव प्रिंसिपल्स में यूनीफार्म सिविल कोड की ज़रूरत को मसौदे में शामिल किया ।
   
     कुछ लोग इसे मुसलिम तुष्टीकरण की तरह देखते हैं । मुझे ये नहीं समझ आता । तुष्टीकरण में तो उन्हें दूसरों से बेहतर अधिकार मिलेंगे । सच्चाई तो यह है कि मुसलिम महिलाओं के पास उनकी हिन्दू और ईसाई बहनों की तुलना में बहुत कम अधिकार हैं । यह तुष्टीकरण महज़ चंद रूढ़िवादी पुरुष मुसलिम नेताओं का है । असलियत में मुसलमानों का एक बड़ा तबका परेशान है ।
   
     लेकिन समस्या अकेले निजी कानूनों तक ही सीमित नहीं है । मैं आपका ध्यान उस सांप्रदायिकता की तरफ़ आकर्षित करना चाहूंगा जो कि कुछ कानूनों में समावेशित है । इनमें से कई कानूनों के बीज तो अंग्रेजों ने अपने शासनकाल में बोये थे । अफ़सोस ये है कि ऐसे कानून भी हैं जिन्हें भारतीय शासक वर्ग ने आज़ादी के बाद बनाया है ।
   
     मसलन, हिन्दुओं को 'अविभाजित हिन्दू परिवार' 'Hindu United Family' HUF के चलते टैक्स में मिलने वाली छूट मुस्लिमों और ईसाइयों को नहीं मिलती है । बहुत से मुसलमानों और ईसाइयों ने इस भेदभाव की शिकायत टैक्स-अधिकारियों से की है ।
   
     देश भर की राज्य सरकारें मौजूदा कानून का प्रयोग करके मंदिरों से स्थानीय समुदायों का अधिकार अपने हाथों ले लेती हैं । इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, उन नौकरशाहों पर भ्रष्टाचार और कुशासन के आरोप लगते रहते हैं, जिनपर इन मंदिरों के रखरखाव की जिम्मेदारी होती है । आश्चर्यजनक रूप से, सरकार द्वारा ऐसा अधिकार मुसलिम या ईसाई धार्मिक स्थानों पर नहीं किया जा सकता, वहां यह गैरकानूनी है ।
   
     फलस्वरूप, अपने-अपने धर्म के पालन की स्वतंत्रता पर होने वाले इस भेदभाव पर अनेक हिन्दुओं को आश्चर्य होता है । शिक्षा का अधिकार' RTE अधिनियम और 93वां साम्प्रदायिक संशोधन दोनों आपस में मिलकर भेदभाव करने का एक और तरीका देते हैं । उदाहरण हिन्दू-संचालित स्कूलों पर सरकार सीटों पर 25% निशुल्क कोटा लागू करती है, सैधांतिक रूप से इसकी पूर्ति सरकार के द्वारा ही की जानी होती है । मगर वस्तुतः अकसर इस पूर्ति की भरपाई में देरी या मनाही होती है । इस नीति वह अन्य ऐसी नीतियों के चलते हज़ारों हिन्दू-संचालित स्कूल, मजबूरन बंद हो गए ।
   
     93 वां संशोधन / 'शिक्षा का अधिकार' गठजोड़, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के शैक्षणिक हितों को — सरकारी सहायता प्राप्त अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों में आरक्षण का लाभ सीमित होने के कारण — नुकसान पहुँचाता है । विडंबना यह है कि कुछ अल्पसंख्यक भी असंतुष्ट हैं । महाराष्ट्र में आर । टी । ई में भेदभाव के कारण, अल्पसंख्यक-संचालित-स्कूल शिक्षकों की भर्ती बिना अध्यापक पात्रता परीक्षा के कर सकते है, इसके चलते ऐसे आरोप लगते रहते हैं कि स्कूल प्रबंधन ने निम्न-स्तर योग्यता के शिक्षक नियुक्त किये ।
   
     अब ज़रा महाराष्ट्र अंधविश्वास विरोधी अधिनियम को देखिये । कथित तौर पर एक 'तर्कवादी कानून' है लेकिन अकसर यह अधिनियम निम्न-जाति के हिन्दुओं, अजलाफ़/अरज़ाल मुसलमानों और निम्न-स्तर के ईसाइयों में प्रचलित 'अंधविश्वासों' को ही घेरे में लेता है । यह कानून शायद ही कभी सवर्ण हिंदूओं, अशरफ मुसलमानों या उच्च वर्ग / गोरी-चमड़ी ईसाइयों के अंधविश्वासों को निशाना बनाता है । देखिये न, एक अंजान ईसाई पादरी को इसलिए हिरासत में लिया गया क्योंकि वो चमत्कार से रोग के इलाज का दावा कर रहा था मगर उन्हें कोई नहीं रोकता जो मदर टेरेसा की ऐसी ही कहानियों को बढ़ा-चढ़ा रहे होते हैं (तथाकथित चमत्कारों ने ही उन्हें संताकरण तक पंहुचाया है) । अघोरी (कुछ लोगों द्वारा जाति-निष्कासित) भारत का अकेला ऐसा धार्मिक समूह है जिसकी धार्मिक-स्वतंत्रता इसी कानून के अंतर्गत प्रतिबंधित है ।
   
     ऐसे कानूनों का क्या प्रभाव होता होगा जो विभिन्न समुदायों में भेद रखते हों? जैसी कि आप कल्पना कर सकते हैं, यह दरार और विद्वेष पैदा करता है । शायद आपको ध्यान हो कि जब जल्लीकट्टू (दक्षिण भारत का त्यौहार जिसमें बैलों की दौड़ होती है) पर प्रतिबन्ध लगाया गया था तब बहुत-से तमिल-हिन्दुओं ने गुस्से में यह सवाल किया था कि क्यों मुस्लिमों की बकरीद पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया जाता । बगैर बेहोश या दर्द कम करने वाली किसी प्रक्रिया के प्रयोग किये की जाने वाली जानवरों की सामूहिक धार्मिक-रस्म हत्या को, अदालत किस बिनह पर 'बैलों की दौड़' से अधिक क्रूर मानती है? यहाँ सनद रहे कि जल्लीकट्टू को प्रतिबंधित करने की मांग मुसलिम समुदाय ने नहीं की थी । उन्हें क्यों दोष दें ? हमारे बीच दरार पैदा करने के लिए ऐसे कानून अंग्रेजों ने बनाये थे । जिनसे दो समुदायों में हमेशा कुछ न कुछ अनबन होती रहे । जिसके बाद, साहब 'गोरा माई बाप' बीच में आयें और आपस में लड़ रहे समुदायों में 'बिचौलिया शांति' ले आएं; और इन दूरियों से अपने शासन को चिरायु बनायें । इतिहास की पुस्तकों में इसे 'बाँटों और राज करो' (divide and rule) कहा जाता है । ब्रिटिशों को इसमें महारत हासिल थी ।
   
     भारत का दुर्भाग्य यह है कि आज़ादी के बाद भी अभिजात-सत्ताधारी (इनमें कुछ नेता, कुछ नेशनल मीडिया और विधिविधाता, कुछ गैर सरकारी संगठन 'NGOs' और कुछेक नौकरशाह शामिल हैं) इस 'बाँटों और राज करो' की नीति को चला रहे हैं । ‘बाँटों और राज करो' के चक्र को हमें तोड़ना होगा ।
   
     और इसे तोड़ने का सबसे सही रास्ता यह होगा कि हम हर उस 'बाँटों और राज करो' कानून का विरोध करें जो भारतीयों के धार्मिक विश्वासों को ढाल बनाकर उनमें भेदभाव करता हो; और उस कानून को ख़त्म कराएँ । कानून में एक ऐसा संशोधन भी होना चाहिए कि संसद कोई कानून नहीं बना सकती, न ही अदालत कोई ऐसा निर्णय ले सकती हो जिसमें धर्म के आधार पर समुदायों को अलग-अलग नज़र से देखा जाये ।
   
     अंग्रेजों को यहाँ से गए क़रीब 70 साल हो चुके । अब वो वक़्त आ गया है कि हम उनके खेलों से ऊपर उठें ।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

अमीश त्रिपाठी @authoramish 
अनुवाद: भरत तिवारी @BharatTiwari 

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1 comments :

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (13-05-2016) को "कुछ कहने के लिये एक चेहरा होना जरूरी" (चर्चा अंक-2341) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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