शनिवार, मई 14, 2016

अपूर्वानंद — विद्वानों का भीड़ के न्याय के सुपुर्द किया जाना चिंता का विषय है



कौन तय करे कि हम क्या पढ़ें? 

Apoorvanand on Delhi University's ban on books


आश्चर्य नहीं है कि बहुत वक्त नहीं हुआ, पढ़ना इतना सुरक्षित न था, जितना आज समझा जाता है. वे औरतें अभी भी ज़िंदा हैं, जिन्हें पढ़ने पर सजा मिली हो, या जो उस वजह से बदमान की गई हों. पढ़नेवाली बहू लाजिमी तौर पर घर के लिए बड़े-बूढों की इज्जत नहीं करेगी, यह ख्याल आम था और हर स्त्री का पारम लक्ष्य समाज ने कहीं की बहू होना तय कर रखा था — अपूर्वानंद



भारत का स्वतंत्रता संघर्ष

इसका तो हमें कभी पता ही नहीं चलेगा कि कानूनी आपत्ति के चलते किताबों से क्या कुछ हटा दिया गया है.

भगत सिंह को ‘क्रांतिकारी आतंकवादी’ कहने के लिए बिपन चंद्र की किताब ‘भारत का स्वतंत्रता संघर्ष’ की बिक्री और आगे की छपाई पर दिल्ली विश्वविद्यालय ने रोक लगा दी है. यह फैसला राज्य सभा के उपसभापति की आपत्ति के बाद लिया गया है. खबर थी कि भगत सिंह के परिवार के सदस्यों को भी इस शब्द पर ऐतराज था. ’पाठ्य पुस्तक योद्धा’, दीनानाथ बत्रा ने आगे बढ़कर इसकी सभी पार्टियों को बाज़ार से हटाने की और उन्हें नष्ट कर देने की मांग की है.

किताब पुरानी है और छात्रों के बीच लोकप्रिय है. इसकी लाखों प्रतियां बिक चुकी हैं और छात्रों की अनेक पीढ़ियों ने इसे पढ़ा है. यह बिपन चन्द्र, के. एन. पणिक्कर, मृदुला मुखर्जी, आदित्य मुखर्जी, सुचेता महाजन के द्वारा लिखी गई और पहले अंग्रेज़ी में प्रकाशित हुई. दिल्ली विश्वविद्यालय के ‘हिंदी माध्यम कार्यान्वयन निदेशालय’ ने इसका अनुवाद प्रकाशित किया.
हमें बताया गया है पिछले सालों में प्रकाशक ऐसी किताबॉन को छापने से पहले कानूनी राय लेने लगे हैं और वकीलों द्वारा कोई भी आशंका जाहिर करते ही किताब छापने से मना कर देते हैं

जो किताब तीस साल से बिक और पढ़ी जा रही हो, उसपर आज अचानक हंगामा क्यों? ध्यान रहे, किताब से नाराजगी सिर्फ भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को हो ऐसा नहीं. राज्यसभा के उपसभापति कांग्रेस पार्टी के हैं. उनके अलावा दूसरी पार्टियों ने भी भगत सिंह और उनके साथियों को ‘क्रांतिकारी आतंकवादी’ कहने पर क्षोभ जाहिर किया है.
हमें बताया गया है पिछले सालों में प्रकाशक ऐसी किताबॉन को छापने से पहले कानूनी राय लेने लगे हैं और वकीलों द्वारा कोई भी आशंका जाहिर करते ही किताब छापने से मना कर देते हैं

इस ऐतराज के मुताबिक़ अपने स्वाधीनता सेनानियों को आतंकवादी कहना उनका अपमान है. आज जो माहौल है, उसमें यह आपत्ति ठीक ही जान पड़ती है. आतंक ने एक ख़ास मायने हासिल कर लिए हैं. अपने अपने नायकों को कैसे आतंकवादी कहना बर्दाश्त कर सकते हैं?

इस टिप्पणी में इस पर बहस करने का इरादा नहीं है कि भगत सिंह और उनके साथियों या मास्टर सूर्य सेन, आदि को ‘क्रांतिकारी आतंकवादी’ के रूप में वर्णित करना उचित है या नहीं. जिन्होंने इन क्रांतिकारियों के दस्तावेज पढ़े हैं, वे जानते हैं कि वे खुद अपने संघर्ष के तरीके को आतंकवादी कहते थे. 2004 में आधार प्रकाशन से प्रकाशित , चमन लाल द्वारा संपादित ‘भगत सिंह के दस्तावेज’ के पृष्ठ संख्या 241 के पहले पैराग्राफ को पढ़ना ही काफी होगा. तो, क्या हम भगत सिंह की इस किताब को भी बाज़ार से हटाने की सिफारिश करेंगे? क्या हम यह कहेंगे कि बेचारे क्रांतिकारी खुद अपने बारे में जो कह रहे थे, वह किसी बेहोशी या जोश के लम्हे में कह रहे थे और उसे गंभीरता से लेने की ज़रूरत नहीं?

आधार प्रकाशन से प्रकाशित , चमन लाल द्वारा संपादित ‘भगत सिंह के दस्तावेज’


लेकिन इस लोकप्रिय क्रोध के आगे ज्ञान और विवेक कैसे ठहर सकता है? जिसे इनके पोषण की जिम्मेवारी है, यानी विश्वविद्यालय, उसने हमेशा की तरह इस बार भी घुटने टेक दिए. याद कीजिए, कुछ साल पहले ए. के. रामानुजन के लेख ‘तीन सौ रामायण’ को इसी तरह राम और सीता के अपमान के आरोप में दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपनी पाठ-सूची से हटा दिया था. लगभग उसी समय बंबई विश्वविद्यालय ने रोहिंग्तन मिस्त्री के उपन्यास को हटा दिया था. उसके आस-पास अमरीकी विदुषी वेंडी दोनिगर की पुस्तक पर हंगामा करके उसे भी बाज़ार से हटवा दिया गया था. इस बीच ऐसी कई किताबें हैं, जिन्हें प्रकाशकों ने राष्ट्रवादी भय के कारण छापने से मना कर दिया.

विश्वविद्यालयों और प्रकाशकों के इस बर्ताव से कुछ सवाल उठते हैं. अगर विश्वविद्यालय विद्वानों और लेखकों के साथ खड़े न होंगे, तो कौन होगा? आखिर यह ज्ञान का व्यापार है और इसमें विवाद के बिना नवीन ज्ञान का सृजन संभव नहीं है. अगर परिसरों से विवाद को ही बहिष्कृत कर दिया जाए तो फिर ज्ञान के निर्माण की गुंजाइश कहाँ बचती है? क्या कक्षा और परिसर मात्र सुरक्षित चर्चा की जगह में शेष हो जाएँगे?

उसी तरह प्रकाशक भी अगर किताबें सिर्फ मुनाफे के लिए छापते हैं और विवाद होने पर अपने लेखकों के साथ खड़े नहीं होते तो प्रकाशन की नैतिकता क्या है? हमें बताया गया है पिछले सालों में प्रकाशक ऐसी किताबॉन को छापने से पहले कानूनी राय लेने लगे हैं और वकीलों द्वारा कोई भी आशंका जाहिर करते ही किताब छापने से मना कर देते हैं. दिलचस्प विडंबना यह है कि ये बातें कहीं रिकॉर्ड पर नहीं लाई जातीं . इसलिए ये मुद्दा भी नहीं बन पातीं. दूसरे, लेखक भी यह सब कुछ जानने के बावजूद प्रकाशकों के खिलाफ सार्वजनिक क्षोभ या विरोध व्यक्त नहीं कर सकते, क्योंकि उनके पास कोई सबूत नहीं और प्रकाशक को नाराज़ करने पर अगली किताब के न छपने का खतरा अलग है. इसका तो हमें कभी पता ही नहीं चलेगा कि कानूनी आपत्ति के चलते किताबों से क्या कुछ हटा दिया गया है.

कई लोग यह कहते पाए जाते हैं कि पढने को इतना कुछ है फिर बेकार ही इस तरह की विवादास्पद चीज़ों को पढ़ाने पर जोर क्यों? ज़रूरी पढ़ाई क्या है और फालतू या छोड़ दिए जाने लायक क्या है, इस पर कैसे विचार किया जाए? इस तर्क से कहानी, कविता, उपन्यास, आदि सब अतिरिक्त हैं, इनके न पढ़ने से कोई नुकसान नहीं होता, ज़िंदगी चलती ही रह सकती है. लेकिन इस तर्क को थोड़ा बढ़ा दें, तो पढ़ना मात्र ही जीवित रहने के लिए आवश्यक नहीं.

आश्चर्य नहीं है कि बहुत वक्त नहीं हुआ, पढ़ना इतना सुरक्षित न था, जितना आज समझा जाता है. वे औरतें अभी भी ज़िंदा हैं, जिन्हें पढ़ने पर सजा मिली हो, या जो उस वजह से बदमान की गई हों. पढ़नेवाली बहू लाजिमी तौर पर घर के लिए बड़े-बूढों की इज्जत नहीं करेगी, यह ख्याल आम था और हर स्त्री का पारम लक्ष्य समाज ने कहीं की बहू होना तय कर रखा था.

पढ़ना भारत में ‘शूद्र’ कहे जाने वालों के लिए भी आवश्यक नहीं माना जाता था. ऐसा करने पर उन्हें दंड मिलना ही था. ऐसा करके प्रभु जातियों ने ठीक ही किया था अपने हित के लिए क्योंकि जब ‘शूद्र’ पढने लगे तो जाति-व्यवस्था की वैधता ही खत्म होने लगी और उनके प्रभुत्व पर भी सवाल उठे. यह बात सिर्फ भारत तक सीमित हो, ऐसा नहीं.

ताज्जुब नहीं कि पढ़ने पर नियंत्रण रखने में हर सत्ता की दिलचस्पी रहती है. जनतंत्र अगर बाकी व्यवस्थाओं से बेहतर है तो इस कारण भी कि उसमें जनता को अपनी मर्जी का पढ़ने की आज़ादी है. लेकिन धर्म, नैतिकता और दूसरी राज्येतर व्यवस्थाएँ राज्य पर दबाव डालती हैं.

जो सभ्य समाज हैं, उनमें इस तरह के विवादों पर निर्णय करने के तरीके हैं. अगर आधुनिक भारत की इतिहास की किसी पुस्तक पर किसी तरह का ऐतराज है, तो कायदा यह होना चाहिए कि उसके विशेषज्ञों से राय-मशविरा किया जाए. जिसे स्वाधीनता आन्दोलन का कुछ पता नहीं, जिसने उस दौर के दस्तावेजों का सावधानी से अध्ययन नहीं किया, वह आखिर इस मसले पर किस अधिकार से बोल सकता है.

कोई भी ख्याल रखना एक बात है, लेकिन वह पर्याप्त सूचनाओं पर आधारित और उनसे प्रमाणित हुए बिना ज्ञान के क्षेत्र में स्वीकार नहीं किया जा सकता. बिपन चंद्र और अन्य विद्वानों के वर्षों के शोध के बाद लिखी किताब पर विचार उनके जितना ही बौद्धिक श्रम करने वालों के पास है, भाषणबाजी करने वालों के पास नहीं. इस अधिकार का दावा अब हमारे विश्वविद्यालय नहीं कर पा रहे हैं और अपने विद्वानों को भीड़ के न्याय के सुपुर्द कर रहे हैं, यह चिंता का विषय है.

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1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (16-05-2016) को "बेखबर गाँव और सूखती नदी" (चर्चा अंक-2344) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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