Mihir Sharma on PM Modi — मिहिर शर्मा @mihirssharma



Maaf kijiye Pradhanmantri ji, Desh badal nahi raha filhaal - Mihir Sharma

Maaf kijiye Pradhanmantri ji, Desh badal nahi raha filhaal

- Mihir Sharma

माफ कीजिए प्रधानमंत्री जी, देश बदल नहीं रहा फिलहाल

— मिहिर शर्मा

मुझे इसमें संदेह नहीं है कि 2016 की शुरुआत से ही मोदी सरकार पहले से ज्यादा ऊर्जा के साथ, एक दिशा में और एक मकसद से काम कर रही है। एक विश्वसनीय और भविष्योन्मुखी केंद्रीय बजट अपेक्षाकृत संयत राजकोषीय गणित के साथ पेश किया गया। कंपनियों को दिवालिया घोषित करने के बारे में नया कानून भी पारित किया गया। आधारभूत ढांचे के अवरोधों को दूर करने की दिशा में भी मिली जुली सफलता के साथ काम चल रहा है। बैंकों के एकीकरण और फंसे हुए कर्जों की वसूली की प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। आधारभूत ढांचे पर हुए खर्च और गतिविधियों में आई तेजी ने जमीनी स्तर पर व्यवसाय के लिए कहीं अधिक सकारात्मक माहौल बनाया है। मांग और उत्पादन में आई तेजी के छोटे लेकिन सशक्त संकेतों से भी इसमें मदद मिली।

जलसा अटपटा

सरकार की दूसरी वर्षगांठ पर पत्र सूचना कार्यालय की तरफ से बांटी गई रंगीन पुस्तिकाओं, कभी न थमने वाले ट्वीट संदेश, कैबिनेट मंत्रियों के एक ही समय लिए गए साक्षात्कारों, ट्रांसफॉर्मिग इंडिया के वीडियो और उसके रिंगटोन डाउनलोड की अपील करने वाले फोन संदेशों की भरमार रही। इंडिया गेट पर 5 घंटे तक चले कार्यक्रम के साथ इस जश्न का समापन हुआ। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कार्यक्रम को संबोधित किया। लेकिन सरकार की सीमित आकांक्षाओं और उपलब्धियों को देखते हुए इस तरह का जलसा अटपटा लग रहा था।

 वास्तविक बचत Vs संभावित बचत 

अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल को दिए साक्षात्कार में मोदी ने निजीकरण और भूमि एवं श्रम सुधारों को आगे बढ़ाने में अपनी नाकामियों का पुरजोर तरीके से बचाव किया था। उन्होंने कहा कि वह जन-धन योजना जैसी कामयाबियों के 'दर्जनों’ उदाहरण दे सकते हैं। उन्होंने इंडिया गेट पर दिए अपने भाषण में भी कहा कि उनकी सरकार के नाम पर इतनी उपलब्धियां दर्ज हैं कि दूरदर्शन 5 घंटे के बजाय पूरे सप्ताह तक कार्यक्रम दिखा सकता है। अलबत्ता स्क्रॉल नाम की वेबसाइट ने इंडिया गेट पर प्रधानमंत्री के भाषण में किए गए दावों की सच्चाई का परीक्षण किया। उसका कहना है कि एलपीजी कनेक्शनों में होने वाले रिसाव पर काबू पाने से ही करीब 15 हजार करोड़ रुपये बचाने संबंधी प्रधानमंत्री के दावे के विपरीत असल में 150 करोड़ रुपये की ही बचत हुई। सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार ने भी कहा है कि यह वास्तविक बचत न होकर संभावित बचत का आंकड़ा है। उन्होंने आर्थिक समीक्षा में इसके 12,700 करोड़ रुपये रहने का अनुमान जताया था। सबसे ज्यादा हैरत भरा मोदी का वह बयान है जिसमें उन्होंने वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा था कि कोई भी विशेषज्ञ उन्हें यह नहीं बता सकता है कि वे किन 'बड़े सुधारों ‘ की उम्मीद कर रहे हैं? हम कुछ देर के लिए मोदी के बयान को सच मान लेते हैं और यह समझने की कोशिश करते हैं कि अधिकतर विशेषज्ञों की नजर में कौन से 'बड़े सुधार’ बाकी हैं?

पहला सुधार:

सरकार उन व्यवसायों का निजीकरण कर दे जिनमें उसे मौजूद नहीं होना चाहिए। जैसे कि एयर इंडिया, एमटीएनएल और बीएसएनएल जैसी सरकारी कंपनियां करदाताओं के पैसे को डूबोने का ही काम कर रही हैं। अभी तक ये कंपनियां कारोबार के नए तौर-तरीकों को नहीं लागू कर पाई हैं। हो सकता है कि मोदी कुछ सार्वजनिक कंपनियों को राष्ट्रीय विकास के लिए अनिवार्य मानते हों और वाकई में कुछ कंपनियां ऐसी हैं भी, लेकिन कई इस श्रेणी में नहीं आती हैं। फिर उन्हें क्यों नहीं बेच दिया जाता है?

दूसरा सुधार: 

श्रम बाजार को लचीला बनाइए। यह सरकार भी पिछली कई सरकारों की तरह श्रम सुधारों के मामले में वही पुराना राग अलाप रही है कि पहले उसे मजदूर संघों की सहमति लेनी होगी और इसे नियोक्ताओं के प्रति पक्षपातपूर्ण नहीं होना चाहिए।

तीसरा सुधार: 

वास्तविक प्रशासनिक सुधारों को शुरू किया जाए। भारतीय अर्थव्यवस्था को पीछे धकेलने में सबसे बड़ा हाथ सरकार की अक्षमता और नाकामी का रहा है। इसे भी सुधारने और दुरुस्त करने की जरूरत है। प्रशासनिक सुधारों का खाका कई वर्षों से बना हुआ है। मंत्रालयों को नीति-निर्माण के बजाय नियम निर्माण का केंद्र बनाने की जरूरत है। नौकरशाही के हरेक स्तर पर पार्श्व भर्ती और जवाबदेही सुनिश्चित करने की जरूरत है। स्थानीय प्रशासन को भी सशक्त करने और वित्तीय स्वतंत्रता देने की जरूरत है। लेकिन इन सुधारों पर अमल करना तो दूर की बात है, सरकारी बाबुओं के प्रति दोस्ताना रुख रखने वाले प्रशासन के दौर में इसके बारे में सोचा तक नहीं जा रहा है।

चौथा सुधार:

बजट और व्यय की समूची प्रक्रिया में सुधार लाया जाए। केंद्रीय बजट में नकदी आधारित लेखाकार्य के बजाय संग्रहण आधारित लेखांकन का इस्तेमाल किया जाय। इससे पी चिदंबरम जैसे कुछ चतुर वित्तमंत्रियों को व्यय संबंधी आंकड़े छिपाने के मौके नहीं मिल पाएंगे। केंद्र सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि राज्य सरकारों को दिया गया धन उसी मद में खर्च हो रहा है या नहीं जिसके लिए उन्हें धन दिया गया है। अगर ऐसा होता है तो इसका यह मतलब है कि आप 'प्रतिस्पर्धी सहकारी’ संघवाद के प्रति गंभीर हैं। लेकिन उठाए गए कदमों को देखकर तो लगता है कि वे आगे ले जाने के बजाय पीछे ही ले जा रहे हैं।

दुखद बात यह है कि क्या वाकई में मोदी सरकार वित्तीय समावेशीकरण, प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन और सबको बिजली आपूर्ति जैसी पिछली सरकारों की योजनाओं को सही तरीके से अमल में लाने का दावा कर सकती है? इसके साथ ही कारगर प्रबंधन और आधारभूत ढांचे के बेहतर प्रदर्शन से भरोसा पैदा होगा और इन पंक्तियों के लेखक समेत बहुत सारे लोग खुलकर मोदी की तारीफ करेंगे। निश्चित रूप से पिछले दो वर्षों में वह भारत को बेहतर बनाने की दिशा में काम करते रहे हैं लेकिन देश के कायाकल्प की बात तो अभी सामने भी नहीं आई है।

बिज़नस स्टैंडर्ड, 6 जून ,2016 से साभार

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