नामवर सिंह — आ० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने नहीं दी थी काशी हिन्दू वि.वि में नौकरी (जीवन क्या जिया : 4अ )


सचमुच वाजपेयी जी ने विरोध किया था।

नामवर सिंह — आ० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने नहीं दी थी काशी हिन्दू वि.वि में नौकरी  (जीवन क्या जिया : 4 )

Jeevan kya Jiya - 4a

Namvar Singh

जीवन क्या जिया! 

(आत्मकथा नामवर सिंह बक़लम ख़ुद का अंश)


मैंने आजीविका के लिए भी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया। अपने स्वाभिमान और अपने आत्मविश्वास के कारण मैं कहीं सिर नहीं झुका सकता। संतोष है कि मुझे कहीं सिर नहीं झुकाना पड़ा।

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में मुझे जो नौकरी मिली थी, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने नहीं दी थी। अपने लिए पोस्ट मैं खुद ले आया था। इस प्रसंग को मैं बतलाना चाहूंगा।



नयी पंचवर्षीय योजना शुरू हुई थी। मेरे एक वरिष्ठ सहपाठी विश्वम्भर नाथ पाठक मुझसे एक साल सीनियर थे। मैं बी.ए. प्रीवियस में था, वह बी.ए. फाइनल में थे। मैं एम.ए. प्रीवियस में, वह एम.ए. फाइन में। कल्चर के विद्यार्थी थे वह और हास्टल में हम साथ रहते थे। बड़े ही घनिष्ठ मित्र थे हमारे। एम.ए. करने के बाद शिक्षा मंत्रालय में उनकी नियुक्ति हो गयी। बनारस आये और कहने लगे, ”पंचवर्षीय योजना बन रही है। आचार्य द्विवेदी से कहो कि एक योजना बना कर अपने विभाग में दें और उसके तहत कुछ पोस्ट मांगें। मैं दिला दूंगा।“ मंत्रालय में इस काम को वे ही हैण्डल कर रहे थे। मैंने दो योजनाएं बनवा कर आचार्य द्विवेदी से भिजवायीं। किसी को उम्मीद नहीं थी कि वे स्वीकृत होंगी। एक योजना हिन्दी साहित्य के वृहद इतिहास से जुड़ी थी, दूसरी ऐतिहासिक व्याकरण की थी। वृहद् इतिहास वाली तो नहीं, मगर व्याकरण वाली स्वीकार हो गयी और लेक्चरर के दो पद मिले। ये दोनों पद पाठक जी मेरे मित्र ने दिलवाये थे। एक पद पर रामदरश मिश्र की नियुक्ति कमक्षा में हुई। वहां उनको इंटरमीडिएट तक पढ़ाना था। दूसरे पद पर मुझे विश्वविद्यालय में पढ़ाने को मिला। लेकिन इस प्रसंग में विडम्बना यह हुई कि मेरी नियुक्ति को लोगों ने अस्थायी मान लिया। यह समझा कि पंचवर्षीय योजना के अंतर्गत मिलने के कारण यह पद केवल पांच वर्षों के लिए ही है। अतः मैं अस्थायी ही रहा। अगली पंचवर्षीय योजना में यह पद बना रहा, तो मुझे पुनर्नियुक्ति दी गयी। जो भी हो, एक तरह से अपने लिए जगह मैं खुद ले आया था और उसका श्रेय पुनः मैं अपने मित्र विश्वम्भर नाथ पाठक को देता हूं।

पाठक जी ने जीवन में दो बार मेरी मदद की। दूसरी बार तब, जब मैं बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से निकाल दिया गया था। उस समय संयोग से वह सागर विश्वविद्यालय में थे। होली में बनारस आये थे तो फार्म लेते आये थे। बोले, ”सागर वि.वि. में लेक्चरर की एक जगह विज्ञापित हुई है, यह फार्म तुम भर दो, मैं लेता जाऊंगा। बाजपेयी जी वहां हैं। यद्यपि मैं जानता हूं कि वह तुम्हारे विरुद्ध हैं लेकिन कुलपति द्वारिका प्रसाद मिश्र हैं जो आचार्य द्विवेदी को बहुत मानते हैं। इसलिए बहुत उम्मीद है कि तुम्हारी नियुक्ति हो जायेगी।“ फार्म भरवा कर वह ले गये।

सचमुच वाजपेयी जी ने विरोध किया था। चयन समिति में पंडित जी के अलावा धीरेन्द्र वर्मा जी थे, उन्होंने और द्वारिका प्रसाद मिश्र जी ने मुझे वाजपेयी जी के घोर विरोध के बावजूद चुन लिया। तीसरी नौकरी मुझे जोधपुर वि.वि. में मिली। वहां मैंने नौकरी के लिए आवेदन भी नहीं किया था। जोधपुर वि.वि. के वी.सी. वी.वी. जान थे। वह मुझे जानते थे, मेरे बारे में सुन रखा था। बाद में जान ने मेरी नियुक्ति के बारे में पूरी कहानी बताते हुए कहा, ”मैं एक्सपर्ट सुमन जी से बोला कि मैं इस आदमी को चाहता हूं, आपकी क्या राय है? सुमन जी ने कहा, ”वह कम्युनिस्ट है। सोच लीजिए, बड़ा विवादास्पद भी है।“ सुमन जी ने बाद में स्वयं भी मुझे यह प्रसंग बताया था। तो सुमन जी की कम्युनिस्ट वाली बात सुन कर वी.वी जान बोले, ”वह मुझे तो कन्वर्ट नहीं कर लेगा न। और फिर वह योग्य तो है न?“ सुमन जी ने कहा, ”योग्य है।“ यह बात सन् 1970 की है जब मेरी पुस्तक ‘कविता के नये प्रतिमान’ प्रकाशित हो चुकी थी और दिल्ली में आलोचना का सम्पादन कर रहा था मगर फिलहाल बेकार ही था।

वी.वी. जान की तरह ही प्रोफेसर बी.डी. नाग चौधरी ने मुझे जे.एन.यू. के लिए आफर दिया था। उसके पहले बालकृष्ण राव जी मुझे आगरा वि.वि. में कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी इंस्टीट्यूट का निदेशक बना चुके थे। राव साहब मुझे इलाहाबाद में सुन चुके थे, जानते थे। मैंने आवेदन नहीं किया था, उन्होंने स्वयं आफर देकर बुलाया था।



यहां लोगों को लग सकता है कि मेरे जीवन में कोई संघर्ष नहीं रहा। एम.ए. किया। पीएच.डी. की। नौकरी की। प्रोफेसर हुआ। ऐसे शुभचिन्तकों और मित्रों से कहने को जी होता है कि बीच में पांच साल बेकार रहा। काशी हिन्दू वि.वि. में नौ साल अस्थायी बना रहा और फिर निकाल दिया गया। क्या इन स्थितियों में मुझे कोई पीड़ा नहीं हुई? फिर जो कुछ मुझे मिलता, वह मैंने जोड़ तोड़ करके तो हासिल नहीं किया। काशी हिन्दू वि.वि. में भी मैं पद ले आया था और फिर मैं उस पद पर नियुक्त होने की योग्यता रखता था। मैं फर्स्ट क्लास फर्स्ट था। फिर भी कुछ ऐसा है कि मेरा कोई भी काम बिना बाधाओं के होता ही नहीं। मैं उन बाधाओं का जिक्र करना चाहता हूं।

बी.एच.यू. में जब मैं लेक्चरर हुआ, तब कहा जाता था कि मैं आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का शिष्य हूं और उनके निकट हूं। इससे हुआ यह कि जो द्विवेदी जी के विरोधी थे, मेरे विरोधी हो गये। पहले वे मुझे स्नेह प्यार करते थे। स्नेह का मतलब यह कि दया की दृष्टि से देखते थे। लेकिन दया तब अदया में बदल गयी जब मुझको द्विवेदी जी का स्नेह मिलने लगा। दूसरी तरफ कुछ ऐसे लोग भी थे जो द्विवेदी जी का बहुत आदर करते थे, वे भी मुझे अपना दुश्मन मानने लगे कि द्विवेदी जी इसी को क्यों इतना मान रहे हैं। ऐसे ही जले भुने लोगों में शिव प्रसाद जी थे। आज वह नहीं रहे, इस बात का मुझे दुख है लेकिन वह अंत समय तक न जाने किस जलन में मुझसे पीड़ित रहे। बहरहाल इन्हीं स्थितियों में मैं पढ़ाने लगा था।

कुछ लोग सुपारी देने वाले होते हैं, कुछ सुपारी लेकर किसी का वध करते हैं। बनारस में रुद्र काशिकेय जी थे। भंगड़ आदमी। अच्छे कथाकार। उनमें बड़ी प्रतिभा थी लेकिन उन्हें लोगों ने भड़का कर कहा कि तू खिलाफ लिख। वह एक अखबार में भूतनाथ की डायरी लिखने लगे। मेरे चरित्र हनन की मनगढ़ंत ऐय्यारी उपन्यासों जैसी शृंखला शुरू हो गयी। उद्देश्य था कि किसी भी तरह इस आदमी को यहां से हटा देना है। अंततः वे लोग कामयाब हुए। मैं कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा था 1959 में, हार गया। तो उन लोगों को एक बहाना मिल गया। यह कम्युनिस्ट तो है ही, परमानेन्ट भी नहीं हुआ है। इसी मौके पर इसे निकाल दो। और वे सफल भी हुए।....

क्रमशः...
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