इसे समाजवाद मत कहिए पार्टनर, यह हमारी सोच का पटरी हो जाना है — प्रेम भारद्वाज



What About Revolutionist 

— Prem Bhardwaj

The most important kind of freedom is to be what you really are. You trade in your reality for a role. You trade in your sense for an act. You give up your ability to feel, and in exchange, put on a mask. There can't be any large-scale revolution until there's a personal revolution, on an individual level. It's got to happen inside first. — Jim Morrison

रॉक संगीत के सबसे प्रतिष्ठित और प्रभावशाली गायक, कवि जिम मोरिसन ने कहा है —
"सबसे महत्वपूर्ण आज़ादी वह होती है जिसमें आप वास्तव में आप हों। आप एक भूमिका भर के लिए ख़ुद की वास्तविकता बेच देते हैं। आप एक नाटक के लिए ख़ुद की भावनाएं बेच देते हैं। आप महसूसने के सामर्थ्य को भुला देते हैं और उसकी जगह एक मुखौटा पहन लेते हैं। कोई भी बड़ा-विद्रोह तब तक नहीं हो सकता जबतक आपके स्तर पर ख़ुद का निजिविद्रोह नहीं होता। हर बड़ी बात पहले आप के भीतर होनी ज़रूरी है। "

प्रेम भारद्वाज के लेखन और निजिविद्रोही से मुझे अप्रतिम लगाव है।  पिछले माह उनका लिखा जाने क्यों अप्रभावित किये जा रहा था, अच्छी बात यह रही कि निराश नहीं कर पा रहा था... मैंने अपने इस निजि-दुःख को प्रेमजी (भाई) से कह के, कम किया था। बहरहाल वह दुःख भी क्षणिक रहा – उसे मार गया – उनका इस माह का लेखन। मुझे विश्वास है कि इस-सम्पादकीय को लिखने के बाद उनका विद्रोही कुछ-संतुष्ट ज़रूर होगा क्योकि पूरी संतुष्टि विद्रोही को मिल नहीं सकती। 

लेखन में बिनसोचे चमत्कार करने की शक्ति होती है, प्रेम भारदवाज के पास ख़ूब है ये। उन्होंने यार्ड में पड़े डब्बे को उठाकर हमारे सामने रख दिया है और बता भी दिया है कि समाज लीक से अलग चलने वाले के साथ क्या व्यवहार करता है (सनद रहे आप ही समाज हैं) वो लिखते हैं - “पटरी से उतरने का अर्थ है बगावत, जिसे कोई पसंद नहीं करता। उसका जन्म ही नापसंदगी की कोख से होता है। बगावत सत्ता, समाज, परिवार और प्रेम के प्रति कहीं भी सही नहीं मानी जाती है। हमेशा ही इसे सबक सिखाने की कोशिश की जाती है”। 

बस अब मैं और कुछ नहीं कहूँगा क्योंकि विद्रोहीप्रेम का लिखा, समझना ज़रूरी है... 

सप्रेम 
भरत तिवारी 
संपादक  



साहित्य में इन दिनों प्रपंच-प्रसार की बुलेट ट्रेन चल रही है। डिब्बे बढ़ गए हैं। वे यार्ड में खड़े तन्हा डिब्बे की गत देखकर प्रपंच-प्रसार की सवारी करने में ही अपनी समझदारी मान रहे हैं...

यार्ड का वह तन्हा डिब्बा

प्रेम भारद्वाज 



  सुरक्षा के मोह में ही सबसे पहले मरता है 
  आदमी अपने शरीर के इर्द-गिर्द 
  दीवारें ऊपर उठाता हुआ
  मिट्टी के भिक्षापात्र आगे और आगे बढ़ाता हुआ गेहूं
  और हथियारबंद हवाई जहाजों के लिए
  केवल मोहविहीन होकर ही जब कि नंगा भूखा बीमार
  आदमी सुरक्षित होता है 
                               राजकमल चौधरी

मैंने एक लफ्ज लिखा— रेल। और मैं रेल हो गया। सफर। मंजिल। पड़ाव। रफ्तार। जिंदगी हो गया। आगे बढ़ते हम। पीछे छूटते लोग। रूमानियत की धुंध। यादों के हिचकोले। एक रेल, एक ही पथ, एक ही डिब्बे में किसी का जाना। किसी का लौटना। जाने की जुंबिशें और लौटने के जादू के बीच वक्त की सुरंग और उम्मीदों के पुल से गुजरती रेल। दिन को खेतों-मेड़ों पर बैठी पंख फड़फड़ाती धोबिन चिड़िया जिसे आप नीलकंठ भी कह सकते हैं। रात को खिड़की के बाहर आसमान में पतंग की तरह अटका चांद सारी रात साथ चलता है। सुख-दुख, जीवन-मृत्यु, बाएं-दाएं, प्रेम-हिंसा की दो पटरियों पर चलती रेल। मतलब जिंदगी। बीच का कोई रास्ता नहीं। फांक है। अब इसका क्या किया जाए कि जिंदगी के पत्थर इस फांक में ही फंसे पड़े हैं।
पटरी से उतरना दुख के यार्ड में अकेला पड़ जाना है। 
जिंदगी रेल है। रेल जिंदगी। रेल के पहले भी जिंदगी थी। रेल के बाद भी रहेगी। फिर भी अगर आपको कोई एतराज न हो तो जिंदगी और उसके सिर पर तने जमाने के शामियाने को रेल से ही देखने-समझने की कोशिश की जाए। क्यों न बिन टिकट एक रेल की सवारी कर ली जाए।

खुद की जिंदगी को कथाकार रमेश बक्षी ने 1965 में अपने उपन्यास ‘अठारह सूरज के पौधे’ के जरिए समझने की कोशिश की है। कथा नायक पठानकोट से कल्याण तक की यात्रा में अपने जीवन को फिर से जीता है। स्मृतियों के स्टेशन आते हैं। जिंदगी के प्रमुख पड़ाव। इस उपन्यास को यह पाँचवीं बार पढ़ना था। उपन्यास में जिंदगी और रेल के बारे में कही बाते हैं-- मैं रेल हो गया हूं। यार्ड का खाली डिब्बा। उसमें कुछ भी नहीं है। बिजली, पंखे, सीट कुछ भी नहीं। अपनों से बिछड़ा डिब्बा कभी यह पटरी से उतर गया था, इसलिए इसकी यह हालत है। पटरी से उतरना दुख के यार्ड में अकेला पड़ जाना है। आपकी बात आप जानें, मगर मैं जब भी राजधानी, शताब्दी या किसी सुपर फास्ट ट्रेन में सफर करता हूं तो यार्ड का वह तन्हा डिब्बा हमेशा मेरे साथ चलता है। जब मैं ट्रेन से उतरकर बिस्तर पर अकेलेपन की चादर में लेटा करवटें बदलता हूं तो वह तन्हा डिब्बा जैसे मुझे अपने आगोश में ले लेता है।

रमेश बक्षी ने जब यार्ड के तन्हा डिब्बे के बारे में लिखा होगा तो शायद ही उन्हें इस बात का इल्म हो कि एक दिन वह खुद ही यार्ड के तन्हा डिब्बे में तब्दील कर दिए जाएंगे। हमेशा जो घटित होता है, उसी पर नहीं लिखा जाता। कई बार ऐसा भी होता है कि जो लिखा जाता है, वही कुछ समय बाद घटित भी हो जाता है। हिंदी साहित्य में यार्ड में पड़े तन्हा डिब्बों की एक लंबी परंपरा है। मगर तन्हा डिब्बों से पहले पटरियों पर दौड़ती-भागती रेल की बातें वाया जिंदगी—

जमाने की धरती पर वक्त की बिछी पटरियां। उन पर दौड़ती जिंदगी की रेल। सबके अपने-अपने गंतव्य। अपने-अपने स्टेशन। कहीं चढ़ना है। कहीं उतरना है। तेरी सीट। मेरी सीट। सीट को बर्थ मान लीजिए। जब तक सफर है। आपकी बर्थ है। आप उसके मालिक हैं। स्टेशन पर उतरते ही वह सीट फिर और किसी की। लेकिन जब तक है। तब तक मिल्कियत का घन-घमंड। जिंदगी के तिलिस्म एक फलसफा। एक सवाल भी है रेल। सफर एक है—एक दिशा की ओर है। मगर सबकी सफर की अपनी-अपनी सहूलियतें हैं। सुविधाएं हैं। तकदीर का मामला बिल्कुल नहीं है। आपकी सामर्थ्य तय करती है सहूलियतें, सुविधाओं का दर्जा। प्रथम श्रेणी। स्लीपर, वातानुकूलित और सफर करने के नाम पर जरनल बोगी में भेड़-बकरियों की तरह ठूंसे गए गरीब लोग। सफर है तो हमसफर भी। हमसफर का मिलना इत्तफाक है। वो अच्छे हैं। बुरे भी। कुछ न अच्छे होते हैं, न बुरे। उनका होना भी, होने की तरह नहीं होता। ऐसा रेल में ही नहीं जीवन में भी होता है।

जिंदगी की रेल और लोहे की रेल में सबसे बड़ा यही अंतर होता है। लोहे की रेल में हमें मालूम है कि कहां और किस स्टेशन पर चढ़ना-उतरना है। जिंदगी की रेल का यह सबसे बड़ा रहस्य है। हम बस सफर में होते हैं। कब और कहां उतरना है, यह मालूम नहीं होता। सबका सफर एक जैसा होता भी नहीं। अपनी-अपनी सामर्थ्य, अपनी-अपनी सुविधाएं। किसी के लिए खुशियों और रोमांच की धार तो किसी के लिए दुख की तलवार। इधर हसीन मंजर तो उधर गमगीन खंजर। कोई किसी के साथ। कोई चांद-सूरज की मानिंद बेहद तन्हा। इस सफर में भी धांधली है। कोई पैसा देकर अपनी सीट मैनेज कर लेता है, कुछ बिना टिकट सफर करने का जोखिम लेते हैं। कोई खा-खाकर गैंडा हुआ है, उसी के बगल में सफर कर रहे छात्र को दस रुपए निकालने से पहले गरीब उदास मां-बाप का आर्थिक खूंटी पर किसी फटे कोट-सा टंगा चेहरा याद आता है। वह मन मार लेता है। दस रुपए की चाय नहीं पीता। पानी पीकर खुद को ताजा करता है। यह भी सफर है।

रेल में होना ही सफर में होना नहीं है। जो रेल में नहीं हैं, वे प्लेटफार्म पर हैं। वे भी सफर में है। अपनी-अपनी ट्रेन का इंतजार करते। सबको अपनी रेल का इंतजार है। किसी की रेल सही समय पर है। किसी की देरी से। इंतजार थकाता है। वह उम्मीद भी है। बेबसी भी। छटपटाहट भी। किसी की ट्रेन छूट जाती है। कभी कोई ट्रेन रद्द हो जाती है। सब जिंदगी का खेल है। सबसे बड़ा खेल सिग्नल का है। रेल चालक बस गति को नियंत्रित करता है, ब्रेक लगाता है। कब तेज चलेगा, कहां धीमे, कब रुक जाना है, कब चलना है, यह सिग्नल तय करता है। सिग्नल देने वाला सामने नहीं होता। नेपथ्य में होती है, उसकी निर्णायक मौजूदगी। सामने बस संकेत होता है। सिस्टम का सिग्नल मैन हुक्मरान है। जिंदगी की रेल का सिग्नल ईश्वर, सुपरपावर, शायद प्रकृति। कोई है जो हमें चलाता है। जो हमें सीधे नजर नहीं आता। हमारे हिस्से कुछ भी नहीं। हम सिर्फ सिग्नल का इंतजार भर कर सकते हैं। कभी-कभी मौसम की धुंध भी रफ्तार को थम जाने की हद तक धीमा कर देती है। जैसे-जैसे जिदंगी की रफ्तार में इजाफा हुआ है, रेलों की गति भी बढ़ी है।

रेल की रफ्तार के बाद अब यार्ड में खड़े तन्हा डिब्बे की बातें। मेरी मुश्किल यह है कि वह डिब्बा मुझे बेजान नहीं लगता। इतिहास, सभ्यता और मौजूदा दौर का एक खास तबका, मेरा सबसे अजीज दोस्त, मुझ-सा ही लगता है। यार्ड में खड़ा डिब्बा या इस जैसे का मतलब जहां उम्मीद का आखिरी कतरा भी फना हो चुका है। जहां न कोई जुंबिश, न जज्बा। महज गलन और जंग, जंग मतलब युद्ध नहीं। मरण के पहले मृत्यु झेल रहे लोगों के दर्द की कोई दवा नहीं। इनकी उपस्थिति, अनुपस्थिति के दायरे में आती है। इनके होने का अर्थ, नहीं होना है। ये जगह घेरे हुए बेजान लाशें हैं। जिनके अंतिम संस्कार में देरी लाश की तौहीन करती है। बेकफन लाशें ज्यादा तकलीफ देती हैं।

ये सजायाफ्ता है- बिना कानून। संविधान से इनको मिली हैं सजाएं। इनका अपराध इनका लीक छोड़कर अपने लिए सबसे अलग राह तलाशना है। चौंकिए मत, सच तो यही है। अपनी अलग राह बनाने वाले कुछ ही मुकाम तक पहुंच पाते हैं। बाकी बेलीक या डिरेल होने पर यार्ड के कोने के ताउम्र सड़ने-गलने के लिए पहुंचा दिए जाते हैं।

देखने में सिर्फ दो ही दिखाई देती है पटरियां। मगर इन दो पटरियों में कई पटरियां मिली होती हैं। जीने का परंपरागत कौशल पटरी पर चलते रहने का है- न सूत भर इधर, न सूत भर उधर। दुनियावी, मतलब, स्वार्थ, पाखंड, बेईमानी, झूठ, इत्यादि की है ये पटरियां। जो पहले से तय है कि उसी पर चलना है। यही यात्रा का लक्ष्य। जीवन का मकसद। एक व्यवस्था भी है। हमें अपना दिमाग नहीं लगाना है। मन को भटकने नहीं देना है। रास्ते में चाहे समंदर, खेत-खलिहान, पोखर, कुछ भी आए। सीधे आगे की ओर पटरी पर दौड़ते रहना है।

पटरी से उतरने का अर्थ है बगावत, जिसे कोई पसंद नहीं करता। उसका जन्म ही नापसंदगी की कोख से होता है। बगावत सत्ता, समाज, परिवार और प्रेम के प्रति कहीं भी सही नहीं मानी जाती है। हमेशा ही इसे सबक सीखने की कोशिश की जाती है बगावत नाग का फन है— फन यानी जहरीला मगर सच। सच के फन और उसका जहर बेईमान दुनिया लिए खतरनाक माना जाता है। जिनको इसके जहर से खतरा है, वे जमाने के लिए खतरा बने हुए हैं।

यह एक समझदारी भरा फैसला है कि हम पटरी पर चलते रहें और अपनी मंजिल तक पहुंच जाएं। पटरी परंपरा है। चलन है। भीड़ है। इस दुनिया में सारे के सारे समझदार नहीं होते। कुछ सिरफिरे भी होते हैं। वे परंपरा को, पूर्वजों को पूरा सम्मान देते हुए अलग राह पर चलना चाहते हैं। इसमें एक जिद है। जिद का संबंध जीवटता से है। क्यों पटरी पर ही चला जाए? क्यों मंजिल? क्यों पड़ाव, क्यों परंपरा, क्यों सुविधा, क्यों पहुंचना, क्यों अपनी अलग राह नहीं? क्यों हमेशा पाना-पाना, पहुंचना-पहुंचना। क्यों वही पाठशाला, क्यों वहीं पाठ, क्यों वही पटरी? मालगाडी से लेकर राजधानी, रामलाल से लेकर मंत्री, मुख्यमंत्री, हत्यारे, मूर्ख, ज्ञानी सब एक ही पटरी पर चले जा रहे हैं। इसे समाजवाद मत कहिए पार्टनर, यह हमारी सोच का पटरी हो जाना है।

जो चेतनशील और मौलिक होते हैं, वे अलग चलने की जिद करते हैं। पटरी को पसंद नहीं करते। वे डिरेल हो जाते हैं। हादसे के शिकार हो जाते हैं। उनको कुछ लोगों की तबाही और मौत का जवाबदेह भी माना जाता है। बगावत खुद के अलावा उनसे जुड़े लोगों को जख्मी करती है। अमुक ट्रेन के वे तीन डिब्बे पटरी से उतरे। दो मरे, पचास घायल। डिब्बे को इसकी सजा मिलती है। उसको किसी यार्ड में डाल दिया जाता है। उसकी सीटें निकाल दी जाती हैं। पंखे भी। तमाम अहम चीजें निकालकर उसको बेजान जिस्म बनाकर छोड़ दिया जाता है। बगावत की सजा को हर पल महसूसने के लिए। उनको मुख्यधारा से काटकर एक तरह से मरा मान लिया जाता है। सितम तो यह है कि ये लाशें सालों यूं ही गर्द में ढकी रहती हैं, न जाने किसके इंतजार में।

अरे नहीं जनाब, मैं यार्ड में पड़े तन्हा डिब्बा नहीं समाज के उन लोगों की बातें कर रहा हूं, जिनको पटरी पर चलना रास नहीं आया। आप जरा नजरें उठाकर देखिए अपने आस-पास पटरी से उतरे हुए लोग मिल जाएंगे। पटरी से बगावत करने वालों को न समाज बर्दाश्त करता है, न साहित्य। साहित्य में तो एक पूरी परंपरा है, पटरी से बगावत कर यार्ड के तन्हा डिब्बे में तब्दील हो जाने वालों की। कबीर, घनानंद, उग्र, भुवनेश्वर, निराला, मुक्तिबोध, मलयज, राजकमल चौधरी... पटरी पर चलने से इंकार कर डिरेल हो जाने वाले रचनाकार हैं। आज भी बहुत से रचनाकार, प्रचार-प्रसार, आत्ममुग्धता, अहंकार, स्वार्थ, छल, झूठ, बेईमानी की पटरी पर चलने से बगावत करने के कारण मुख्यधारा से हटाकर यार्ड एक कोने में डाल दिए गए हैं। साहित्य में इन दिनों प्रपंच-प्रसार की बुलेट ट्रेन चल रही है। डिब्बे बढ़ गए हैं। वे यार्ड में खड़े तन्हा डिब्बे की गत देखकर प्रपंच-प्रसार की सवारी करने में ही अपनी समझदारी मान रहे हैं।

समझदारों के लिए मैं मौला से थोड़ी-सी नादानी नहीं मांगूंगा, मगर आपसे जो इन पंक्तियों को पढ़ रहे हैं, इतनी भर इल्तिजा जरूर है कि पढ़ना खत्म करने के बाद अपने सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन के यार्ड में जाएं। वहां यार्ड में पड़े तन्हा डिब्बे को छू भर दें। इतने से ही उनमें जान आ जाएगी कि सालों बाद उससे मिलने तो कोई आया। सबसे तकलीफदेह होता है किसी की आंखों से उम्मीदों, सपनों और इंतजार को छीन लेना। इंतजार खत्म, सब खत्म। मैं अभी और इसी क्षण यह दुआ करता हूं कि पटरी से बगावत कर देश-दुनिया के तमाम डिब्बे डिरेल हो जाएं। जब बहुत से डिब्बे ही पटरी छोड़ देंगे तो यार्ड के तन्हा डिब्बे वाली स्थिति पटरी की हो जाएगी। पटरियां तरसेंगी कि कोई आए और उन पर चले। तब यह भी होगा कि पटरी से बगावत कर अपनी राह चलने वालों को यार्ड में उपेक्षा की गर्द नहीं झेलनी पड़ेगी, तब बगावत ही मुख्यधारा होगी...।

'पाखी' जुलाई-2016 अंक का संपादकीय
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