शुक्रवार, अगस्त 26, 2016

गीत चतुर्वेदी — पाँच नई कविताएं #GeetChaturvedi Poems in Hindi


गीत चतुर्वेदी — पाँच नई कविताएं Geet Chaturvedi Poems in Hindi
Geet Chaturvedi (Photo: Anurag Vats)

क  वि  ता  एँ

गीत चतुर्वेदी


पेपरवेट 

कितनी तेज़ हवा चल रही थी उस समय.

अगर तुम्‍हारा एक आंसू
इस काग़ज़ पर न पड़ा होता
तो यह कब का उड़ चुका होता.





नाम 


अगर हर रोज़़ मैं एक अक्षर लिखूं
तो मुझे चौदह दिन लगेंगे अपना नाम लिखने में.
मैं सच में इतना ही धीमा लिखता हूं.

मेरे नाम में संगीत है और छंद है
और दोनों ही बिना रियाज़ के नहीं सधते

बचपन से लिख रहा हूं
फिर भी कभी-कभार अपने नाम की वर्तनी में ग़लती कर देता हूं.
मुझे ठीक से याद है वर्तनी
लेकिन टाइप करते समय मेरी उंगलियां
मेरे समय से ज़्यादा जल्‍दबाज़ हो जाती हैं.

बहुत सारे नाम मेरे भीतर दफ़न हैं.
उन्‍हें अपनी ज़बान पर नहीं आने देता.
मैं नामों का क़ब्रस्‍तान हूं.

एक नाम तुम्‍हारा है
जलपाखी की तरह
तैरता रहता है सतह पर
कभी-कभी मेरी देह के जल पर चोंच मारता है.

दुनिया के सबसे शांत तालाब में भी पड़ सकती है भंवर
उसके क़रीब जाकर कोई एक नाम पुकार के तो देखो.

अपनी कलाई की त्‍वचा को होंठों से लगाकर
मैंने कई बार पुकारा है तुम्‍हारा नाम, मेरा नाम
दोनों एक जैसे गूंजते हैं

भाषा में एक नया समास बनाएं
जब हमारे नाम साथ पुकारे जाएं.
बशर्ते तुम्‍हारे और मेरे नाम के बीच 'या' न हो,
हमेशा 'और' हो.





लकड़ी और पानी 


मैंने एक दरवाज़े पर दस्‍तक दी
भीतर वाले ने नहीं सुना
पर दरवाज़े ने सुन लिया.
मैं जब भी वहां दस्‍तक देता हूं
दरवाज़ा मेरा संगीत पहचान लेता है.

जब पहली बार मैंने एक नदी में पैर रखे
पाया कि पानी मेरी देह से नहा रहा है.
मेरे भीतर के पानी और बाहर के पानी में
बहाव का बंधुत्‍व है.

लकड़ी के पास मेरी दस्‍तक का स्‍पंदन है.
पानी के पास मेरे स्‍पर्श की सिहरन.


आलसी कवियों की स्‍तुति में


दिन में महज़ दो-चार मिनटों के लिए ही याद आता है कि हम पिता भी हैं.
दिन में महज़ दो-चार मिनटों के लिए ही हम कवि होते हैं.
अगली कविता लिखने तक हर कोई होता है भूतपूर्व कवि.
आलसी कवि, दूसरे कवियों से कहीं बेहतर होते हैं.
उनकी कविताओं में संपूर्णता के विरुद्ध कंपकंपाती एक हिचक होती है.
इस तरह वे अपना कवि होना देर तक बनाए रखते हैं.
इसलिए भी बेहतर होते हैं आलसी कवि
कि मारे आलस के
कुछ पंक्तियों के बाद ही वे अपनी कविता से ऊब जाते हैं.
‘ये कभी पूरी न हो सकेंगी’ इस नाउम्‍मीदी के साथ उन्‍हें मुक्‍त कर देते हैं.
इस तरह कुछ अच्‍छी कविताएं हमें पढ़ने को मिल जाती हैं साल-छिमासे.

आखि़री सांस 


जाते-जाते पलटकर देखा उसने
और रुकते-रुकते भी चमक कर पूछ लिया:
'क्‍यों मियां आशिक़ ! इतने बरस जी लिए, जि़ंदगी का क्‍या किया ?'

सबकी नज़रें बचाकर उससे नज़रें मिलाईं
और बिना रुके दमक कर बोल दिया:
'आधी रोटी कमाई, मिल-बांट कर खाई
और ख़ुश हूं
कि ग़ालिब का एक शेर आधा तो समझ लिया.'




1977 में मुंबई में जन्‍मे गीत चतुर्वेदी के खाते में छह लिखी हुई और कई अधूरी-अनलिखी किताबें दर्ज हैं. पहला कविता संग्रह ‘आलाप में गिरह’ 2010 में राजकमल प्रकाशन से आया और दूसरा संग्रह ‘न्‍यूनतम मैं’ भी जल्‍द ही वहीं से आने वाला है. गीत को कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार, गल्‍प के लिए कृष्‍ण प्रताप कथा सम्‍मान मिल चुके हैं. ‘इंडियन एक्‍सप्रेस’ सहित कई प्रकाशन संस्‍थानों ने गीत को भारत के दस सर्वश्रेष्‍ठ लेखकों में शुमार किया है.

संपर्क: geetchaturvedi@gmail.com

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2 टिप्‍पणियां:

  1. गीत धीमी गति से खूब सोच कर लिखने वाला कवि है. आजकल फेसबुक पर प्रचार पाने के लिए प्रतिदिन अधकचरी कवितायें परोसने वालों की बाढ़ आई हुई है. आँसू बहुत भारी होते हैं. शांत रहने वाला अपने अंदर तूफ़ान छुपाये हुए होता है. लकड़ी और पानी प्रेम की भाषा समझते हैं. अंत में बहुत कुछ अधूरा रह जाता है.

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  2. गीत की कई कविताओं में पुस्तक, कागज और लेखन सामग्री के बिम्ब मिलते हैं. दरवाजा आहटें सुनता और याद रखता है. मन अनेक स्मृतियों को अपने में समेटे रखता है.आँसू बहुत भारी होते हैं. शांत रहने वाला अपने अंदर तूफ़ान छुपाये हुए होता है. लकड़ी और पानी प्रेम की भाषा समझते हैं. अंत में बहुत कुछ अधूरा रह जाता है

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