सोमवार, सितंबर 19, 2016

कहानी — 'परिवर्तन' — अकु श्रीवास्तव — Aaku Srivastava


अवश्य पढ़िए ... लगभग चार दशक पहले लिखी गयी, वरिष्ठ पत्रकार अकु श्रीवास्तव की छोटी कहानी 'परिवर्तन' में, कही गयी 'बात' और कहानी की महत्ता इस बात से साबित होती है कि कहानी का सच आज भी वैसा ही खड़ा है जैसा चार दशक पहले रहा होगा. 
- भरत तिवारी





परिवर्तन

— अकु श्रीवास्तव

पिताजी धार्मिक प्रवृत्ति के थे। ‘वर्मा आर्किटेक्चर’ से उन्होंने थोड़ा बहुत कमा लिया था। लगभग सत्तर वर्ष की अवस्था में उन्होंने अपने इकलौते पुत्र अर्थात मुझसे व्यापार छोड़ने की इच्छा प्रकट की। मेरी एक बहन जो मुझसे दस वर्ष बड़ी थीं, उनकी शादी उन्होंने कर दी थी। जीजा जी इंजीनियर थे।

पिताजी ने कुछ गरीबों के लिए चौदह कमरे बनवा दिए थे। इन कमरों में अधिकतर रिक्शेवाले या ठेलेवाले अपने परिवार सहित या अकेले रहा करते थे। इन लोगों से पिताजी मात्र दस रुपया मासिक किराया भवन के रखरखाव व टैक्स आदि के लिए लिया करते थे। पिताजी को पता नहीं क्यों इस वर्ग से इतना प्रेम हो गया था कि वे इनके अलावा किसी और को कमरा नहीं देते थे। पिताजी की इच्छा अब हरिद्वार जाकर राम नाम जपने की थी। मां का देहांत मेरे बचपन में ही हो गया था। हरिद्वार जाने से पूर्व उन्होंने कुछ पैसा धर्मशालाओं में दान कर दिया था और कुछ पैसा मंदिर-मस्जिद में।



वह मुझे सौंप गए थे, एक मकान तथा कमरों (जिसे मैं ‘धर्मशाला’ कहता था) की देख-रेख का काम। मैं आर्किटेक्ट तो न बन पाया, हां, एक बैंक में क्लर्क अवश्य बन गया था।

मेरा स्थानांतरण लखनऊ से बरेली हो गया था। प्रत्येक माह किराया लेने लखनऊ जाना असंभव सा रहता, इसलिए अब मैं तीन चार माह का किराया एक साथ लेने पहुंच जाता था। लखनऊ वाला अपना मकान बहन के देवर ने रहने के लिए ले लिया था। घर की देख रेख भी रहेगी, इसलिए मैंने उन्हें घर दे दिया था। कभी-कभी लखनऊ आने पर मैं वहीं पर रहता था परिवार समेत।

पिछली बार इसी मार्च में लखनऊ आया हुआ था, अपने परिवार को भी होली के अवसर पर लखनऊ ले आया था। इस बार ‘धर्मशाला’ में थोड़ा मरम्मत का काम कराना था, इसलिए तीन चार दिन की अतिरिक्त छुट्टी भी ले ली थी। धर्मशाला में कुछ लोगों से किराया लेने के बाद रामदेव रिक्शावाले के यहां किराया लेने पहुंचा था, उसने बहुत आनाकानी के बाद किराया दिया। अब मुझे केवल गंगाराम से किराया लेना था। मैने गंगू के कमरे में पहुंचकर उसको आवाज दी।

‘गंगू - क्या हाल हैं?’ मैंने पूछा।

‘बस बाबूजी ऊपर वाले की किरपा है।’

‘वो - किराया लेना है।’ मैने गंगू से कहा।

‘हां बाबूजी, आप संझा का ले लियो - हम जरूर दे दईया।’ गंगू ने उत्तर दिया।

मैं शाम को किराया लेने के लिए पुन गंगू के कमरे मे पहुंचा। उसका तीन माह का किराया बाकी हैं।

‘भई गंगू, मैं रमेश, आया हूं।’ मैंने कहा।

‘अरे बाबू जी आप - कब आये।’ गंगू की पत्नी ने मुझे देखा और कहा।

‘हां वो किराया लेने आया था...। तीस रुपए- तीन महीने के।’ मैंने कहा।

‘वो तो अभी तक रिक्शा लेई कर नहीं आए - आवत होईएं- आप इंतजार कर लो।’ गंगू की पत्नी बोली।

‘हां’ मैंने सर हिला दिया। गंगू की पत्नी वही पर घूंघट डाले खड़ी थी।

‘वैसे - बाबू किराया मिलना मुश्किल हैं। वो आजकल जरा दारू ज्यादा पीअत हैं - सुनत हैं कि कुछ दिनों मे दारु बंद हो जाई इसलिए।’ गंगू की पत्नी ने शांति को तोड़ते हुए कहा।

‘हां- फिर भी मैं उसका इंतजार करना चाहूंगा।’ मैंने अपनी बात रखते हुए कहा। मैं कुछ देर इधर-उधर टहलने के बाद पुन: गंगू के कमरे की तरफ गया।

अबे साली, बोलती है कुछ खाने को नहीं हैं। मैं क्या करूं? अपने बाप के घर से क्यों नही लाई- सोचे रहो - यहां हराम की लगी - चल कल्लू, पैर दबा। कमरे से जोर जोर की आवाजें लगातार सुनाई पड़ रही थीं। यह आवाज गंगू की थी। शराबी से नशे में बात करना ठीक नही हैं, सो मैं वापस चला गया। कभी कभी पिताजी पर भी गुस्सा आता हैं, पता नहीं क्यों ऐसे शराबियों को पाल गए थे। इनको पिताजी की इच्छा समझ कर मैं निकालने में भी हिचकता था। दूसरे दिन भी गंगू नहीं दिखा, मुझे किराया नहीं मिल पाया। धर्मशाला में मरम्मत का काम कराकर मैं बरेली चला गया। जाते समय मैं गंगू कि पत्नी को यह बता गया था कि मैं जुलाई या अगस्त में फिर आऊंगा। अगर इस बार पूरा किराया न मिला तो मैं जरूर कुछ करूंगा। ऐसा मैंने गंगू कि पत्नी से विशेष तौर से कह दिया था।

बच्चों का दाखिला कराने आदि काम निबटाकर मैं फिर जुलाई में लखनऊ अकेला आया। थोड़ा-बहुत इधर-उधर के कार्य-कलाप करने के बाद रात में गया, कमरे का किराया वसूलने। इस बार मुझे कोई अधिक परेशानी न हुई। अब केवल गंगू से किराया लेना बाकी था। मैं गंगू के घर पहुंचा और बाहर से ही मैंने आवाज दी।

पाय लागू बाबू। गंगू ने आते हुए कहा।

गंगू इस समय बिल्कुल सफेद बनियान तथा पैजामा पहने खड़ा था।

कहीं जा रहे हो क्या? मैंने उसके कपड़ों की तरफ देखते हुए पूछा।

नहीं बाबू, कहीं नहीं गंगू का उत्तर था। वह मेरे लिए बाहर पलंग डालकर खुद अंदर चला गया।

वह मेरे आने का अभिप्राय समझ चुका था। मुझे उसमे कुछ शांत सा परिवर्तन नजर आ रहा था।

लेयो बाबू मीठा लेयो।

गंगू एक कटोरी में कुछ गुड़ के टुकड़े लिए खड़ा था।

उसने अपने लडक़े से पानी लाने को कहा।

कुछ हुआ क्या गंगू? मैने कटोरी से एक गुड़ का टुकड़ा लेते हुए कहा।

कुछ नहीं बाबू।

तभी गंगू की पत्नी भी साफ सुथरे कपड़े पहने सामने राम-राम कर खड़ी हो गई। वह पुन: अंदर जाकर बाहर आ गई थी।

यह लो बाबू। गंगू की पत्नी ने मुझे कुछ रुपये दिए। गिन कर देखे तो पूरे 80 थे। आठ माह का किराया। क्या बात है -भाई इस बार पैसे देने में किसी ने आनाकानी नहीं की। मैंने अपने मन में उठ रहा सवाल उन लोगों के सामने रख दिया।

गंगू कुछ बोलता इससे पहले उसकी पत्नी बोल उठी। ऊं बाबू! अब शराब बंद हुई गई हैं न। अब कोई का दारू तो मिलता नही हैं, सो रुपया....। भगवान उनका सौ साल जिनगी अउर दें जिनने ऊ दारू बंद करायी।

मैं मुस्कुरा उठा और अब मुझे सारी बात समझ में आ गई थी। मैं उठ खड़ा हुआ कटोरी से एक टुकड़ा बर्फी लिया और उठा कर पानी पिया। खुश रहो कहकर, मैं अपने काम के लिए चल पड़ा।


 - अकु श्रीवास्तव

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