हंस में प्रकाशित कहानी 'मकतल में रहम करना' — प्रेम भारद्वाज


भयावह, जानलेवा माहौल को शब्द में कहना बहुत मुश्किल होता है. मुझे याद आता है बचपन में कभी सुना था कि 'पोटेशियम साइनाइड' इतना तेज़ ज़हर होता है कि उसका स्वाद कोई बता नहीं पाया - यानि खाने के बाद इतना वक़्त ही नहीं ... 'मकतल में रहम करना' में प्रिय कहानीकार भाई प्रेम भारद्वाज ने 'साइनाइड' के स्वाद को शब्द दे दिए हैं.


भरत तिवारी


उस कमरे में इतनी भर ही रोशनी थी कि एक-दूसरे के चेहरे को देखा जा सके। इतनी भर ही जगह थी कि दस लोग बैठ सकें। कोने में रखी सुराही में उतना ही पानी था जिससे हलक को सूखने से बचाया जा सके। सांसें छोड़ी जा रही थी ताकि अगली सांस के लिए जगह बन सके। वहां मौजूद लोगों की पसलियों के भीतर कोई घाव बह रहा था...घाव का दर्द दवानल में तब्दील होने की प्रक्रिया दिखाई नहीं देती। दिल में आग है, आग में दिल। दिल ही आग है, आग ही दिल।

‘‘तो तुम्हे चांद चाहिए।’’ भारी-भरकम आवाज।



मकतल में रहम करना

प्रेम भारद्वाज

(आगे आप जो भी पढ़ने जा रहे हैं वह कहानी के नाम पर शायद एक खास किस्म की बकैती है जिसके बाबत इतना ही अर्ज करना है कि इसे पढ़ना आपकी पहले से मौजूद तकलीफ में इजाफा कर सकता है। आदतन आप इसमें कथा नायक, जाते, मजहब, देश और हर बात की डिटेलिंग ढूढेंगे। कहानी में बहुत कुछ की उम्मीद करने वाले पाठक इसे न पढ़ें तो ही अच्छा है - आपके साथ-साथ मेरे लिए भी क्योंकि पढ़ चुकने के बाद आपकी शिकायत से मैं बचूंगा और आपका भी न मूड खराब होगा और न ही बेशकीमती वक्त जाया होगा।)


वह रात और रातों की तरह नहीं थी। हवाओं में पल-दर-पल जहर घुलता जा रहा था। चांद तप रहा था। बहुत भारी रात थी जिसकी कोख से पैदा होने वाली सुबह उसके लिए खुशनुमा नहीं होगी यह तय है। एक वक्त में, एक ही दुनिया में बसर करते हुए सबकी दुनिया जुदा होती है- जैसे अपने-अपने हिस्से की रातें, अपनी-अपनी सुबहें।

वह खुदा से दुआ कर रहा था कि इस रात की सुबह कभी न हो... किसी सूरत में सूरज न निकलें... अब आगे की दुनिया अंतहीन रात में ढल जाए।

जब से यह दुनिया है.... रात के ठहर जाने की प्रार्थना अलग-अलग वक्त में अलग-लोगों ने अलग-अलग वजहों से की होगी। रात के ठहर जाने की कल्पना एक भरम है। भरम राहत देता है। वह भी कुछ पलों के लिए। उसे राहत नहीं जिंदगी चाहिए... एक मुक्कमल जिंदगी...और यह तभी मुमकिन है जब आज रात ठहर जाए। इस कायनात से सूरज का नामोनिशान मिट जाए। तारीखें बेमानी हो जाएं। सारे कैलेंडरों को कूड़ेदान में फेंक दिया जाए।

रात ग्यारह का वक्त। कोठरी के सन्नाटों में लिपटा अंधेरा। उसे सोने के लिए कहा गया है। आंखों में नींद की जगह खौफ है, बेचैनी है, दर्द है, इन सबको भिगोती नमी है।

आंखों की उस नमी में तैरती डोंगी। अलग-अलग दृश्यों की डोंगी...इन्हीं डोगियों पर सवार होकर वह जिंदगी के इस खौफनाक मुकाम तक पहुंचा है। उसकी पसंदगी के सलीब पर टंगी थी जिंदगी। उसे हमेशा ही उतनी भर जमीन बेमानी लगती जहां उसके पैर टिके होते थे। वह अक्सर आसमान को देखा करता था। उसके घर से समंदर दूर था मगर उसके सपनों में समंदर आता था क्योंकि वह अथाह था- बेहद था। उसे विचारों की चटाई कभी पसंद नहीं आई, वह हमेशा विस्तार की सोचा करता था। जब बचपन में उसने होश संभाला तो टूटती मंडई को अपना नसीब मानकर दुःखी हुआ- एक गलत आगाज का उसे बेहद अफसोस था।

उसकी अब तक की जिंदगी और वक्त की भयावहता को क्या विस्तार से नहीं जाना-समझा जा सकता है? जिंदगी कुछ दृश्यों का कोलाज होती है। उसकी जिंदगी के कुछ दृश्य जो इस वक्त उसको बेहद याद आ रहे हैं। जिंदगी एक अधूरी फिल्म है जो पूरी नहीं होती कभी।

एक छोटा बच्चा पिता के कंधों पर सवार होकर मेला घूमने गया है। मेले के मायावी माहौल में बच्चा मचल उठता है। ‘‘अब्बा मुझे ये सारे गुब्बारे चाहिए।’’

‘‘कोई एक ले लो।’’

‘‘नहीं, सारे... एक मुझे पसंद नहीं...अकेला मुझे अच्छा नहीं लगता...अकेला जल्दी खत्म हो जाता है।’’

‘‘सूरज और चांद अकेले ही हैं, करोड़ों सालों के बाद भी खत्म नहीं हुए।’’

पिता के तर्क ने बच्चे को निरुत्तर कर दिया। बच्चे ने जिद्द नहीं छोड़ी उसने गुब्बारे नहीं लिए। वह जलेबी पर भी नहीं माना। मौका पाकर भाग गया। गुम हो गया मेले की भीड़ में। पिता परेशान। वे उसे ढूंढ़ते रहे इधर से उधर। शाम को बड़ी मुश्किल से मिला तो उसके हाथ में ढेर सारे गुब्बारे थे। कैसे? न पिता ने पूछा और न ही बच्चे ने बताना मुनासिब समझा।

समय के समंदर की उठती-मिटती लहरों पर हिचखोले खाती एक दूसरी डोंगी। वह भी एक रात ही थी। उसे अपेंडिक्स का दर्द उठा। दर्द उसे जरा भी बर्दाश्त नहीं होता। इस बात को मां जानने से ज्यादा समझती थी। मां यह भी जानती थी कि ऐसे में उसको दवा से ज्यादा मां की गोद की जरूरत होती है। उस रात दर्द होने पर दवा नहीं ली उसने। मां को याद किया। सोचा थोड़ी देर बाद आवाज देगा। बिना पुकार सुने मां कमरे में आ गई। उसके माथे को सहलाया, ‘क्या हुआ मेरे बेटे को।’

‘‘पेट में दर्द हो रहा है, बहुत-बहुत ज्यादा’’

‘‘दवा लाती हूं।’’

‘‘नहीं’’, उसने मां का हाथ पकड़कर रोक लिया’’ ‘‘तुम यहीं बैठी रहो मेरे पास। कहीं मत जाओ। दवा नहीं, तुम्हारी गोद चाहिए।’’

उसने मां की गोद में अपना सिर रख दिया। मां उसके माथे को सहलाने लगी। ऐसा करते हुए मां और बेटे, दोनों को राहत मिल रही थी।

डोंगी बदलता है। वह जवान हो गया। जिंदगी की डोंगी मोहब्बत के दरिया में हिचखोले खा रही है। किसी की जुल्फों के साए में शाम ही नहीं, जिंदगी गुजार देने की दिली तमन्ना। उसे चांद बहुत पसंद है। मगर चांद का दूर आसमान में टंगा होना उसे गवारा नहीं। खूबसूरत चीजों का पहुंच से बाहर होना उसे जज्बाती के साथ-साथ हिंसक भी बना देता है। मां ने कई बार समझाया-ऐसी चाहत ठीक नहीं। लेकिन यह उसकी फितरत बनती गई जिसे लेकर मां बेहद चिंतित रहती। मां का चिंतित होना उसको अक्सर परेशान कर जाता, मगर लेकिन फिलहाल तो माशूका महजबी की बात परेशान कर गई।

‘‘तुम समझ में नहीं आते’’

‘‘क्या समझना चाहती हो’’

‘‘यही कि तुम आग हो या पानी, सूरज, चांद आगाज-अंजाम...क्या हो तुम, मुहब्बत या नफरत’’

‘‘इस दुविधा की वजह।’’

‘‘कभी इस छोर पर होते हो अगले पल दूसरे छोर पर जाकर हैरत में डाल देते हो...एक सेकेंड के सौंवे भाग में यकीन की चिंदिया बिखर जाती हैं।’’

‘‘क्या जरूरी है मुझे समझा ही जाए। या तो मुझसे प्यार करो या मत करो। मैं कोई किताब, पहेली नहीं जिसे समझा जाए।’’

‘‘तुम गणित के सबसे कठिन सवाल हो।’’

‘‘और तुम सबसे हसीन गजल’’

‘‘उपर आसमान में देखो, आज चांद बहुत खूबसूरत है?’’

‘‘मुझे चांद को देखकर बहुत गुस्सा आता है।’’

‘‘क्यों’’

‘‘वह मेरी मुट्ठी में नहीं आता।’’

‘‘अगर आ गया तो क्या करोगे’’

‘‘चांद को किसी नींबू की तरह निचोड़ कर चाय में मिलाऊंगा और फिर बड़े सुकून के साथ उसे पीते हुए पसंदीदा गजल सुनूंगा।’’

महबूबा डर गई। डरकर उसके सीने से नहीं लगी। उसने मारे खौफ के डोंगी से छलांग लगा दी लहरों के आगोश में। वह लड़की को समंदर में डूबते हुए देखता रहा। उसको कुछ भी डूबता हुआ देखना बेहद पसंद है- डूबता सूरज, डूबती नाव, डूबते लोग और बेशक डूबता चांद  भी अगर वह डूबता है तो?

बदलाव ही जिंदगी के जिंदा होने का सबूत है। होने के लिए बने रहना जरूरी है। बने रहना भी किस-किस तरह का होता है उसकी बानगी ये नई डोंगी दे जाती है।

उस कमरे में इतनी भर ही रोशनी थी कि एक-दूसरे के चेहरे को देखा जा सके। इतनी भर ही जगह थी कि दस लोग बैठ सकें। कोने में रखी सुराही में उतना ही पानी था जिससे हलक को सूखने से बचाया जा सके। सांसें छोड़ी जा रही थी ताकि अगली सांस के लिए जगह बन सके। वहां मौजूद लोगों की पसलियों के भीतर कोई घाव बह रहा था...घाव का दर्द दवानल में तब्दील होने की प्रक्रिया दिखाई नहीं देती। दिल में आग है, आग में दिल। दिल ही आग है, आग ही दिल।

‘‘तो तुम्हे चांद चाहिए।’’ भारी-भरकम आवाज।

‘‘यकीनन’’

‘‘मुमकिन है, अगर तुम चाहो’’

‘‘समझो मैंने चाह लिया’’

‘‘तो समझो तुम्हें मिल गया।’’

‘‘फिर मेरी हथेली पर रख दीजिए’’

‘‘उसके पहले तुम्हारी हथेली पर हम यह रख देते हैं। यह चांद को तुम्हारी मुट्ठी में कर देगा ताकि, उसे नींबू की तरह निचोड़ सको।’’

‘‘आपको मेरे बारे में इतना कुछ कैसे मालूम।’’

‘‘इसलिए कि तुम हमारे ही वजूद के जरूरी हिस्से हो। तुम हम हो, लो।’’

एक बुजुर्ग ने उस युवक की हथेली पर ‘कुछ’ रख दिया। वह चीज इतनी गर्म थी कि उसकी हथेलियां जल उठीं। वह चीज भारी भी थी। उस नाकाबिले-बर्दाश्त जलन को उसने बर्दाश्त दिया। अपनी ताकत की हद से बाहर जाकर भारी चीज को उठाया भी। क्योंकि उसे चांद चाहिए था। चांद तक पहुंचने का रास्ता किसी रॉकेट से गुजरता है, मगर उसे पाने की राह यहीं से होकर जाती है, ऐसा उसे बताया गया था।

वह बदलना चाहता था। आस-पास के माहौल और अपने से जुड़ी ज़िंदगियों को बदल देना चाहता था। उसकी जरूरतें लगातार हद से बेहद की ओर जा रही थी। वह ऐसी गाड़ी में बैठ गया जिसके न तो ब्रेक था, न ही स्टेयरिंग, उसे मुड़ना बिल्कुल पसंद नहीं था।

रात के गहराने के साथ ही उसकी बैचेनी बढ़ गई। वह अपनी कोठरी में है। पसलियों के भीतर ठक-ठक। बहुत जोर से कोई दस्तक दे रहा है उसके दिल के दरवाजे पर। बदहवासी में दे रहा था। कौन है? वह दरवाजा नहीं खोलना चाहता। किसी तरह यह रात ठहर जाए, सुबह न आए।

वह हमेशा असंभव की ही कल्पना करता है। उसे  अच्छा लगता है नामुमकिन को मुमकिन बनाने की जिद में जीना। चांद को नींबू की तरह मुट्ठी में निचोड़ने, रात के ठहर जाने की तमन्ना।

वह तमन्नाओं के तहखाने के बाहर नहीं आना चाहता। बाहर दुनिया है। उसकी  तमन्नाओं की दुनिया से जुदा एक दूसरी दुनिया, जिसमें लोग बाग हैं, नियम कानून है, अच्छा बुरा है, अपराध-दण्ड है, हमारा-तुम्हारा है। पाप-पुण्य है- साला, सब बकवास है।

तहखानों में छिपा जा सकता है, वहां जिया नहीं जा सकता। सबके अपने-अपने तहखाने होते हैं। जहां बहुत कुछ छिपा रहता है। आज की रात के तहखाने में कुछ छिपा है... कुछ छिपने जा रहा है, यह सिर्फ रात को मालूम होता है कि उसके सीने में क्या छिपा है? काश, रात ही अपने आगोश में उसे हमेशा-हमेशा के लिए छिपा ले। वह रात में है। रात उससे दूर है। अजीब बात है। रात कहां हैं, कहां है इसका ओर -छोर सिर्फ अंधेरा तो रात नहीं हो सकता। वह कौन सा स्विच है जिसको दबाने से रात का बल्ब हमेशा के लिए बुझ जाए।

रात जब नहीं कटती तो काटने लगती है। नहीं गुजरती तो रिसने लगती है, चीख से पहले के आंख में छलक आए कतरा-ए-अश्क की मांनिद। वह रो रहा था। सिसक रहा था।

उसने बहुत कोशिश की नींद आ जाए। वह इस खतरे से वाकिफ था कि नींद अपने साथ सुबह ले आती है। यही वह नहीं चाहता। बस। रात ठहर जाए। न नींद आए, न सुबह। रोने सिसकने, सोचने के बीच न जाने वह कौन सा क्षण था जब उसे नींद आ गई।

‘‘उठ जाओ’’

इस कर्कश आवाज को सुनते ही वह घबड़ाकर उठ गया। ओह.. । इसका मतलब सुबह हो गई। आखिरकार रात ढल ही गई। ले आई अपने साथ सुबह का सूरज। उसका दिल बहुत जोर से धड़का...और अब? सवाल के जवाब में सन्नाटे और आसमान की हथेली पर उगता सूरज।

यही वह नहीं चाहता था। लेकिन उसके या किसी के चाहने से क्या होता है। सुबह मतलब प्रारंभ। मगर हमेशा नहीं। इसके पहले उसे सुबह ने कभी इतना नहीं डराया।

हम जागते इसलिए हैं कि सो जाएं? सोते ही क्यों है?

सुबह होती है इसलिए कि रात आती है? रात आती ही क्यों है। सूरज डूबता ही क्यों है धरती-घूमती ही क्यों है?

उसने महसूस किया, उसके भीतर कुछ फैल रहा है- कोई सन्नाटा, कोई सिहरन, कोई खौफ...। आहटें शुरू हो गई थीं। लोग जाग रहे थे। मस्जिद से अजान और मंदिरों की घंटियां उसे एक साथ सुनाई दीं तो न जाने क्यों थोड़ी राहत लगी।



‘‘नहाने का समय हो गया है’’

अजीब मेहमानखाना है। पहले उसे जगाया गया। अब नहाने को कहा जा रहा है। समझ तो वह रहा था। समझ तो आप भी रहे हैं। मगर वह समझकर भी कुछ समझना नहीं चाहता था।

बिस्तर को समेटा। एक छोटे से बक्शे से लाल रंग का गमछा निकाला। बनियान को बक्शे में डाला... फिर निकाल लिया। कुछ देर तक खुले बक्शे में रखी चीजों को गौर से देखता रहा... क्या हमारी दुनिया ऐसी ही होती है जो छोटे से बक्शे में बंद हो जाए। हर बंद संदूक में भी तो एक दुनिया होती है जो अपने प्रकटीकरण की प्रतीक्षा में रहती है।

वह एक झटके से उठा। गुसलखाने की ओर चल दिया। पीछे-पीछे वह व्यक्ति भी जिसने उसे नहाने के लिए कहा था। वह व्यक्ति दुबला-पतला होने के बावजूद बेहद रहस्यमयी लग रहा था। दरवाजा बंद कर जैसे ही उसने पानी का पहला मग डाला...चिपचिपाहट ने उसके भीतर जुगुप्सा का भाव भर दिया। आंखें उसकी बंद थी। लेकिन उसे साफ तौर लग रहा था कि बाल्टी में पानी की जगह खून उसके पूरे बदन पर फैल रहा है। वह खून को खून से साफ करने लगा। लेकिन शरीर पर खून लगातार गाढ़ा होता जा रहा है, वह घबड़ा गया। इस रक्त- स्नान का मतलब। किसका खून है यह? उसने बीच में नहाना छोड़ गमछा लपेटा और बाहर आ गया।

गुसलखाने से बाहर आते ही हाथ में उसके कपड़ा लिए वह व्यक्ति खामोश खड़ा था। धीरे से उसने कपड़े वाला हाथ उसकी ओर बढ़ा दिया।

वह चुपचाप नया कपड़ा पहने लगा। सफेद कुर्ता, सफेद पैजामा, बनियान सफेद। कपड़ों को पहनते हुए उसने कोशिश की उसे श्वेत फूल याद आएं मगर उसकी नजरों के सामने कफन में लिपटी रक्त-रंजित लाशें ही ठहर गईं।


प्रेम भारद्वाज

‘कुछ खा भी लो’

उसने नाश्ते की थाली को आगे कर दी जिसमें उसके पंसद का नाश्ता था। साथ में अदरक वाली चाय भी। और दिन होता तो वह बड़े चाव के साथ नाश्ता करता। आज इच्छा नहीं हुई।

सहसा उसकी आंखे आसमान की ओर गईं। वहां लालिमा फैल रही थी। सुबह होने का संकेत। जिस्म की हड्डियों में कंपकपी महसूस हुई...लगा कि अभी दिल का दौरा पड़ेगा और वह इसी क्षण मर जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ ही नहीं। शायद दिल मजबूत है। उसका।

ऐसे में चाय पी लेनी चाहिए उसने सोचा। सच तो यह है कि उसके दिमाग ने तकनीकी रूप से सोचना बंद कर दिया। बेशक चाय पीने की इच्छा दिल में जन्मी।

वह चुपचाप चाय पीने लगा। चाय पीने के बाद सिगरेट पीने की इच्छा बुरी मगर पुरानी आदत है। उसने सिगरेट सुलगा ली।

माहौल में धुंआ फैलने लगा अचानक बहुत ज्यादा धुंआ भर गया। कई चिताओं से उठता धुआं। मकान और शमशान का मिटता फर्क। बढ़ते हुए धुएं में उसका दम घुटने  लगा।... उसने जल्दी से सिगरेट बुझा दी। लेकिन धुआं कम नहीं हुआ वह उससे लड़ने लगा...

‘इसे पढ़ लो’

यह जानते हुए भी कि पढ़ने में उसकी कोई रुचि नहीं थी। एक धार्मिक टाइप के व्यक्ति ने उसे एक पुस्तक थमा दी। वह किसी चीज की मुखालत करने की स्थिति में नहीं था। याद आया मां ने पहली बार पुस्तक उसके हाथ में थमाते हुए उसके माथे को चूम लिया था। उसके बाद उसने बहुत सी किताबें पढ़ी। अफसोस कि किताब वहां नहीं ले गई जहां उसे जाना चाहिए था। किताबों का चयन गलत था या किताबों का पाठ गलत था, यह वह तय नहीं कर पाया।

किताबों में उसका कभी मन नहीं लगा। मजबूरी में ही पढ़ना पड़ा। वह किताबों के लिए नहीं बना था। किताबें भी शायद उसके लिए नहीं बनी थीं। दोनों के दो जुदा रास्ते। आज  सालों बाद एक बार फिर उसे जबरन किताब थमा दी गई इस फरमान के साथ कि इसे पढ़ो।

मन मारकर उसने उस किताब के पन्ने पलटे? वह हैरान रह गया, जैसे-जैसे उसकी नजर पन्नों पर अंकित हर्फ-दर हर्फ पढ़ती जा रही थी, हर्फ एक भयानक विस्फोट के साथ मिटते जा रहे थे...। यह सब जादुई तरीके से हो रहा था। वह तेजी से पन्ने पलटने लगा। हर्फ भी उसकी रफ्तार के साथ मिटने लगा। इससे पहले कि एक बड़े विस्फोट के साथ किताब की चिंदिया बिखर जातीं, उसने किताब बंद कर पूरे सम्मान के साथ एक कोने में रखकर दुनिया बनाने वाले को याद किया।

वहां कोई ईश्वर, फरिश्ता या कोई जिन्न नहीं था मगर उसके चेहरे के भाव कुछ इसी अंदाज के थे, ‘अगर कुछ कहना चाहते हो तो वह वक्त आ गया है... लेकिन उसे इस तरह कहना जैसे इस धरती पर नष्ट होने के ठीक कुछ पल पहले यहां पर बचे हुए, अंतिम व्यक्ति ने कहा हो।’ शब्दशः उसने ऐसा नहीं कहा था, मगर उसे ऐसे ही कहना चाहिए था।

‘‘मुझे उससे मिलना है जिसे मैं आज तक नहीं मिला और जो मेरे ही वजूद का हिस्सा है... रोशनी। उसकी उम्र उतनी है जितने मेरे सितम के दिन’ रोशनी मेरे भीतर फैले अंधेरे की उम्र है।’’

‘‘रोशनी को यहां लाना मुमकिन नहीं’’

‘‘फिर पूछा ही क्यों?’’

‘‘आवाज सुन लो’’

‘‘उसे छूना चाहता हूं। गले लगाने की ख्वाहिश है।’’

ताकतवर आदमी ने कुछ कहने की बजाए एक नंबर मिलाया? रिंग होने पर उसको थमा दिया मोबाइल।

‘‘रोशनी’’

‘‘पापा’’ पूछना चाहती थी कि कैसे हो, लेकिन इस मूर्खतापूर्ण सवाल को पूछते-पूछते ठहर गई। लरजती आवाज में इतना ही कहा,’ ‘आप दुनिया के सबसे अच्छे पापा है, याद है एक दिन आपने ही मुझे कहा था, ‘बहुत कुछ खत्म होने के बाद भी सब कुछ खत्म नहीं होता।’... खत्म कुछ अब भी नहीं होगा। एक बात पूछनी थी आपसे। अभी और इसी वक्त।’’

‘‘पूछो।’’

‘‘मेरी उम्र अभी बीस साल है, आप चाहते तो मुझसे मिल सकते थे। मुझे देख सकते थे। लेकिन ऐसा क्यों नहीं किया। हमेशा फोन के जरिए ही हमारा मिलना हुआ...मेरे लिए एक खास आवाज का नाम पापा है और आपके लिए भी एक खास आवाज है जो बेटी है- मैं हूं।’’

‘‘अंधेरा कभी रोशनी से नहीं मिलता बेटी, अंधेरे को रोशनी का इंतजार होता है।’’

‘‘आज की खास बात।’’

‘‘आज रात आसमान में टंगा चांद देखना। दुआ करना उसे कोई घायल नहीं कर पाए। चांद का चांद बने रहना बहुत जरूरी है दुनिया के लिए, बस इतना है।’’

फोन चालू था। दोनों ही मौन हो गए। खामोशी सिसकियों में बदल गई। धनुष की प्रत्यंचा पर चढे़ उन पलों में दोनों तरफ से थरथराती-लरजती आवाज जो सिर्फ रोना था.. सिसकता था। शब्द खो गए भाव के प्रबल वेग में। भीतर हाहाकार था इधर भी और उधर भी। अथाह समंदर की प्रलयकारी लहरें वाया दिल आंखों में ऐसे ही समाती हैं।

‘‘आओ चलें’’

वह चल पड़ा। उसके रुक जाने से कुछ रुकने वाला नहीं था। आगे की ओर उसके बढ़ते कदम पीछे बहुत कुछ पीछे छोड़ते जा रहे थे। कदम-दर-कदम। मेले में गुब्बारे की जिंद्द-मां की गोद, चांद को नींबू की तरह निचोड़ने की जिद।’

ठीक जिस क्षण वह रोशनी के बारे में सोच रहा था। उसके चेहरे को काले कपड़े से ढक दिया गया। कायदे से अब उसको कुछ दिखाई नहीं देना चाहिए। मगर वह जीवन और समय की दृश्यावालियों को साफ-साफ देख रहा था। सियासत...साजिश...देश...न्यायालय...फैसला, कानून, बिलखते बच्चे, रोती औरतें, टीवी पर लाशों को देखकर मनोरंजन करती देश इन दृश्यों के बीच रोशनी की कराहती पुकार, ‘‘तुम, दुनिया के सबसे अच्छे पापा हो...।’’

ताकतवर आदमी ने उसके गले में फंदा डालते हुए भावविहीन अंदाज में उसकी कानों में कहा ‘हम सब खिलौने हैं... मुझे माफ कर देना... ।’

और उसके बाद। न दिन, न रात, न आंसू, न कोई पुकार। वह हमेशा-हमेशा के लिए खामोश हो गया।

‘उपरांत’




कायदे से एक खास तरह के आदमी की खास कहानी यहीं खत्म हो गई। लेकिन इस कहानी में एक अहम बात छूट गई जो इस कहानी के पूरी होने के बाद पता चली। इस घटना के कुछ दिन बाद जल्लाद के जवान बेटे की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई। जल्लाद को यह लगने लगा कि यह उसकी एक गलती का सजा है। रात को जब भी सोता और नींद नहीं आती तो खुद ही से कहता है, उस दिन मैंने फांसी देते हुए एक गुनाह किया और कानून की नजरों में बच निकला। फांसी देने के ठीक एक रात पहले एक बूढ़ी औरत न जाने कैसे पता लगाकर उसके घर पहुंची। अकेले में मिलकर उसने उसकी मुट्ठी में कुछ हजार रुपए रखे और कागज में लिपटी कोई चीज देकर रोते हुए चली गई। उसकी आंखों से बहते आंसुओं ने उसको कुछ बोलने नहीं दिया। उसके जाने के बाद उसने कागज खोला तो उसमें मोम था, ‘कागज पर बिखरे मोटे अक्षरों में लिखा था, मेरे बेटे को दर्द बर्दाश्त नहीं होता है। तुमको अपने बेटे की कसम, मेरे बेटे की गर्दन में फांसी का फंदा डालने से पहले रस्सी में यह मोम जरूर लगा देना ताकि मरते वक्त उसकी तकलीफ में कुछ कमी आ जाए। यह एक बदनसीब मां की बेटे के लिए अंतिम फरियाद है। मैं यह फरियाद तुम्हें खुदा मानते हुए कर रही हूं।’ सालों बीत गए...अक्सर सपने में वह बूढ़ी मां हाथ में मोम लिए खड़ी रहती है। बोलती कुछ भी नहीं, उसकी आंखों में तैरती दर्द की नदी में दुनिया के मोम हो जाने की इच्छा भंवर में किसी नाव की तरह डोलती है। जल्लाद नहीं समझ पाता तो उसके समझ की हद है। वह इस मां को बूढ़ी औरत, मोम को वस्तु और फांसी को महज रस्सी का फंदा समझता है।


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4 comments :

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (21-09-2016) को "एक खत-मोदी जी के नाम" (चर्चा अंक-2472) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. मकतल में रहम करना ... बहुत अच्छी कहानी .. आँखे भिगो देने वाली. पढ़कर अभिभूत हूँ . प्रेम भाई बधाई

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  3. झकझोर देने वाली कहानी ....

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  4. प्रेम जी ,बहुत अच्छी कहानी |मर्मान्तक कहानी मन के साथ -साथ आँखें भी भिगो गई | बधाई और शुभकामना ----------

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