केजरीवाल चाहते तो दिल्ली को बेहतरीन सरकार दे सकते थे — अपूर्व जोशी


केजरीवाल चाहते तो दिल्ली को बेहतरीन सरकार दे सकते थे — अपूर्व जोशी

संकट के मूल में अति महत्वाकांक्षा

— अपूर्व जोशी

मैंने एक निजी बातचीत के दौरान अरविंद केजरीवाल को सलाह दी थी कि ‘आप’ को केवल दिल्ली की सरकार चलाने में अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। लोकसभा के चुनाव नहीं लड़ने चाहिए। मेरा तर्क था चूंकि पार्टी का संगठनात्मक ढांचा बेहद कमजोर है, इसलिए सही प्रत्याशियों का चयन करना संभव नहीं है  — अपूर्व जोशी



आम आदमी पार्टी इन दिनों गलत कारणों से सुर्खियों में है। पार्टी के सर्वोच्च नेता अरविंद केजरीवाल अपनी और अपनी पार्टी के खिलाफ उठने वाले हर छोटे-बड़े विवाद का ठीकरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग पर फोड़, खुद को असहाय और दयनीय प्रदर्शित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। इसमें कोई शक नहीं कि दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच चल रहे घमासान के चलते नुकसान दिल्ली की जनता का हो रहा है। मगर जैसे ताली एक हाथ से नहीं बजती, टकराव की स्थिति के लिए दोनों पक्ष जिम्मेदार है। मगर इस पर चर्चा फिर कभी। अभी उन दो मुद्दों पर कुछ कहना चाहता हूं जिनकी जिम्मेदारी केजरीवाल चाह कर भी प्रधानमंत्री मोदी अथवा उपराज्यपाल जंग के खाते में नहीं डाल सकते।

सूबेदार सुच्चा सिंह छोटेपुर

पहला मुद्दा है पार्टी की पंजाब इकाई के सूबेदार सुच्चा सिंह छोटेपुर के भ्रष्ट आचरण का। चूंकि पार्टी पंजाब में सत्ता की सशक्त दावेदार बन उभर रही है इसलिए वहां आगामी विधानसभा चुनावों के लिए टिकट चाहने वालों की तादाद बहुत है। एक स्टिंग ऑपरेशन के जरिए यह बात सामने आई कि पार्टी नेता छोटेपुर पार्टी टिकट के बदले पैसा मांग रहे हैं। सार्वजनिक जीवन में शुचिता, उच्च आदर्श और भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की बात करने वाली पार्टी के लिए निश्चित ही यह बेहद शर्मनाक है। ऐसे आरोपों की गूंज 2014 के दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान भी सुनने को मिली थी। पार्टी से निकाले गए पूर्व विधायक विनोद कुमार बिन्नी ने भी कुछ ऐसे ही संगीन आरोप तब पार्टी नेतृत्व पर लगाए थे। चूंकि उस समय केजरीवाल का जादू आम जनता के सिर चढ़ बोल रहा था, इसलिए उन आरोपों को महत्व नहीं दिया गया। पार्टी के दो प्रमुख नेताओं योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण ने जब प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया के पारदर्शी न होने का मुद्दा उठाया तो उन्हें इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी।

केजरीवाल से शुचिता की अपेक्षा थी इसीलिए मोदी लहर को नकारते हुए दिल्ली की जनता ने उन्हें चुना




बहरहाल, बात पार्टी नेताओं पर लग रहे आर्थिक भ्रष्टाचार की है। केजरीवाल सरकार के एक मंत्री ऐसे ही आरोप के चलते कुछ अरसा पहले बरखास्त किए गए थे। सुच्चा सिंह छोटेपुर पर आरोप लगने की देर थी कि पूरा विपक्ष मानो एक हो गया। सभी ने आप पर हमला बोल दिया। हमलावरों ने यह भी ध्यान में नहीं रखा कि उनके दामन के दाग कहीं ज्यादा गहरे हैं। पर उन्हें जरूरत भी कहां है। उनसे शुचिता की अपेक्षा आमजन को भी अब कहां रही है। केजरीवाल से शुचिता की अपेक्षा थी इसीलिए मोदी लहर को नकारते हुए दिल्ली की जनता ने उन्हें चुना। प्रचंड बहुमत दिया। वह एक ऐसे विकल्प के तौर पर उभरे जिसकी तलाश हमें जोरों से थी। जाहिर है कि ऐसे में यदि उनके दामन में हल्का-सा छींटा भी लगता है तो वह बाकियों के गहरे दाग से कहीं ज्यादा खटकेगा। ‘आप’ संग यही हो रहा है। 2014 के लोकसभा चुनावों की तैयारियां जब चल रही थीं तब मैंने एक निजी बातचीत के दौरान अरविंद केजरीवाल को सलाह दी थी कि ‘आप’ को केवल दिल्ली की सरकार चलाने में अपना ध्यान केंद्रित करना चाहिए। लोकसभा के चुनाव नहीं लड़ने चाहिए। मेरा तर्क था चूंकि पार्टी का संगठनात्मक ढांचा बेहद कमजोर है, इसलिए सही प्रत्याशियों का चयन करना संभव नहीं है। आम आदमी पार्टी से उन दिनों सभी को जबरदस्त उम्मीद थी। लगता था कि जिस राजनीतिक विकल्प की तलाश देश को है आप उसमें खरी उतरेगी। मैं भावनात्मक रूप से टीम अरविंद के साथ था। उत्तराखण्ड का लोकायुक्त बनाते समय थोड़ी-बहुत भूमिका मेरी भी रही थी, इसके चलते केजरीवाल मेरी सलाह सुन लेते थे। मुझे याद है मैं उन दिनों रानीखेत में था। रात करीबन ग्यारह बजे अरविंद का फोन आया। उन्होंने कहा कि पार्टी चुनाव लड़ने का मन बना चुकी है। पूरे देश भर से स्वच्छ छवि के प्रत्याशी तलाशने के लिए एक कमेटी बनाई जा रही है। उन्होंने जानना चाहा कि क्या मैं उस कमेटी का हिस्सा बनना चाहूंगा। मैंने सोचने के लिए समय मांगा। मैं पूरी तरह आश्वस्त था कि यह व्यावहारिक निर्णय नहीं है। 27 जनवरी 2014 को दिल्ली वापस लौट मैंने अरविंद केजरीवाल को पत्र लिख अपनी आशंकाओं से उन्हें अवगत कराते हुए इस कमेटी का हिस्सा बनने में अपनी असमर्थता व्यक्त की। मैंने लिखा —

 ‘‘चुनाव 2014 को लेकर भी मुझे आशंका है कि कहीं ‘आम आदमी पार्टी बड़ी विफलता का शिकार न हो जाए। आप इस समय पूरे देश में पार्टी के विस्तार को लेकर आतुर हैं। आप ज्यादा से ज्यादा ईमानदार लोगों को संसद में भेजने की बात कर रहे हैं। पर इस बात की क्या गारंटी है कि आपके द्वारा चुने गए लोकसभा प्रत्याशी ईमानदार होंगे और आपकी पार्टी के घोषित उद्देश्यों के प्रति समर्पित रहेंगे? श्री बिन्नी का उदाहरण हमारे समक्ष है। बगैर मजबूत पार्टी संगठन के अच्छे प्रत्याशियों का चयन करना लगभग असंभव है। इस समय चूंकि आपकी ‘आंधी’ पूरे देश में चल रही है, इसलिए सभी स्वार्थी तत्व इस बहती ‘गंगा’ में हाथ धोने को आतुर हैं। उत्तराखण्ड का उदाहरण मेरे सामने है। जहां ‘अजीबोगरीब’ किस्म का पार्टी संगठन खड़ा हो गया है। पिछले दिनों ऋषिकेश में स्वयं श्री संजय सिंह इसका अनुभव कर चुके हैं। तब कैसे आप पूरे देश में अपनी पार्टी के लिए ईमानदार प्रत्याशियों का चयन कर पाएंगे? मुझे यह भी महसूस होता है कि आपने समविचार की शक्तियों के साथ गठजोड़ न करने का निर्णय भी जल्दबाजी में लिया है। देश भर में लाखों ऐसे संघर्षशील व्यक्ति, हजारों ऐसे जनसंगठन हैं जिन्हें भले ही आपके समान चुनावी सफलता नहीं मिली है लेकिन उनका जनसंघर्ष आपसे कहीं ज्यादा है। ऐसे सभी को आपने यह कहकर हाशिए में डालने का काम किया है कि आप इनके साथ कोई गठबंधन नहीं करेंगे बल्कि जो चाहे वह अपना विलय आम आदमी पार्टी में कर ले। यह अहंकार का बोध कराता है। क्योंकर आप ऐसी संघर्षशील शक्तियों का वजूद मिटाना चाहते हैं?...
अरविंद भाई ऐसे कई प्रश्न और भी हैं जिनको मैं लिखना उचित नहीं समझता। जब कभी आप अपने व्यस्त समय से कुछ क्षण मेरे लिए निकाल सके तो मैं व्यक्तिगत रूप से उन प्रश्नों को आपके समक्ष रखना चाहूंगा। मैं आपकी निज ईमानदारी और आपके संघर्ष का प्रशंसक हूं और आपको यकीन दिलाना चाहूंगा कि बगैर किसी व्यक्तिगत लाभ की आकांक्षा के मैं आपसे जुड़ा हूं। इसी कारण मैं समझता हूं कि मैं पार्टी के भीतर रह शायद स्वयं को संतुष्ट नहीं कर पाऊंगा और आपकी अपेक्षाओं पर भी खरा नहीं उतरूंगा। अतः कृपया लोकसभा चयन समिति के सदस्य के रूप में मेरा मनोनयन वापस ले किसी सक्षम व्यक्ति को चुनने की कृपा करें। मेरा जो भी अन्य उपयोग आपकी दृष्टि में हो उसके लिए मैं कृत संकल्प हूं।’’
जब पूरे समाज में भ्रष्टाचार की दीमक लग चुकी हो तब कैसे बगैर उचित प्रक्रिया तय किए सही व्यक्ति का चयन किया जा सकता है?

मेरी आशंका सही साबित हुई। पार्टी दिल्ली तक में एक भी सीट न जीत सकी। मेरा तर्क था कि कैसे बगैर संगठन हम सही प्रत्याशियों का चयन कर पाएंगे। स्थिति कमोबेश आज भी यही है। जब पूरे समाज में भ्रष्टाचार की दीमक लग चुकी हो तब कैसे बगैर उचित प्रक्रिया तय किए सही व्यक्ति का चयन किया जा सकता है? यही हुआ भी। ‘आप’ के विधायकों पर गंभीर आरोप लग रहे हैं। किसी पर आर्थिक तो किसी पर नैतिक भ्रष्टाचार के। पंजाब में लोकसभा चुनाव जीते सांसदों में से दो को पार्टी से बाहर किया जा चुका है। सुच्चा सिंह छोटेपुर या अन्य नेताओं पर जो आर्थिक भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं, मैं उनसे जरा भी चकित नहीं हूं। ऐसा होना ही था। आम आदमी पार्टी नेतृत्व की उल्टे प्रशंसा की जानी चाहिए कि ऐसे आरोपों के सामने आते ही कठोर निर्णय लेने से वह पीछे नहीं हटता अन्यथा भाजपा-कांग्रेस समेत सभी स्थापित राजनीतिक दलों में तो भ्रष्टाचार ने शिष्टाचार का रूप ले लिया है।

आपको शायद अटपटा लगे, लेकिन मैं काफी हद तक आप के वरिष्ठ नेता आशुतोष से सहमत हूं 

दूसरा मुद्दा संदीप कुमार के सेक्स वीडियो का है। आपको शायद अटपटा लगे, लेकिन मैं काफी हद तक आप के वरिष्ठ नेता आशुतोष से सहमत हूं। हालांकि मैं केजरीवाल द्वारा संदीप कुमार को बरखास्त किए जाने से भी सहमत हूं क्योंकि संदीप कुमार के कृत्य ने पार्टी को शर्मसार किया है। आशुतोष की एक ब्लॉग पोस्ट से काफी शोरगुल मचा जिसमें उन्होंने संदीप कुमार का बचाव किया है। मेरा भी यही मानना है कि वीडियो में दो व्यक्ति एक पुरुष जो कि संदीप कुमार बताए जा रहे हैं तथा एक महिला काम-क्रीड़ा में रत नजर आ रहे हैं। किसी भी दृष्टि से यह नहीं लगता कि महिला संग जोर-जबरदस्ती की जा रही हो। आपसी रजामंदी से दो वयस्क एक स्वाभाविक क्रिया करते इसमें नजर आते हैं। तब इतना हो-हल्ला क्यों? आप कह सकते हैं कि वीडियो सार्वजनिक होने के बाद एक महिला ने बलात्कार का मुकदमा दर्ज कराया। यह सामाजिक दबाव में लिया कदम प्रतीत ज्यादा होता है। मेरी मंशा संदीप कुमार का डिफेंस लेने की कतई नहीं है। मैं सहमत हूं केजरीवाल के कथन से कि संदीप कुमार की हरकतों ने पार्टी की छवि और लक्ष्य को नुकसान पहुंचाया है। जाहिर है कि उनका चयन करते समय चयनकर्ताओं से भारी चूक हुई। संदीप कुमार की अलग-अलग महिलाओं संग तस्वीरें और वीडियो सामने आए हैं। कहा जा सकता है कि यह संदीप कुमार का नैतिक भ्रष्ट आचरण है। लेकिन क्या वाकई यह घटना इतने हो-हल्ले की हकदार है जितना पिछले दिनों हमें टीवी चैनलों के जरिए देखने को मिला? सच तो यह है कि हम पश्चिमी देशों के मुकाबले इस मामले में कहीं ज्यादा ब्रॉड-माइंडेड रहे हैं। कई बड़े नेताओं की रंगीनियों के किस्से हम सुनते आए हैं। लेकिन इससे उन नेताओं को हमने बलात्कारी नहीं कभी माना। सेक्स एक स्वाभाविक क्रिया है। इसे इसी दृष्टि से देखा जाना आवश्यक है। संभोग से समाधि तक पहुंचा जाता है। संभोग न केवल एक स्वाभाविक क्रिया है बल्कि आवश्यकता भी है। यह ठीक है कि सार्वजनिक जीवन जीने वालों से नैतिकता की अपेक्षा अधिक होती है। आम आदमी पार्टी के नेताओं से तो अन्य की तुलना में कहीं ज्यादा ऐसी उम्मीद जनता रखती है क्योंकि उन्हें ऐसी नैतिक अपेक्षाओं के दावे के चलते ही जनता ने चुना, लेकिन जितना हो-हल्ला इस पर मचा, मैं नहीं समझता उतना बड़ा यह अपराध है। हालांकि मैं आशुतोष से सहमत नहीं, जब वे अपनी पार्टी नेतृत्व के निर्णय पर प्रश्नचिन्ह लगाते हुए पूछते हैं कि किस अपराध में संदीप कुमार को दंडित किया गया। अरविंद केजरीवाल ने सही निर्णय लेते हुए संदीप कुमार को मंत्री पद से बरखास्त किया है। नैतिक रूप से भ्रष्ट संदीप कुमार का आप पार्टी में बने रहने उन सभी के लिए बड़ा आघात होता जिन्होंने एक स्वच्छ विकल्प के तौर पर इस पार्टी पर अपना भरोसा जताया।

आम आदमी पार्टी से जो उम्मीदें थी वह पूरी होती नजर नहीं आ रहीं

बहरहाल, आम आदमी पार्टी से जो उम्मीदें थी वह पूरी होती नजर नहीं आ रहीं। मेरा मानना है कि यदि केजरीवाल चाहते तो दिल्ली को बेहतरीन सरकार दे सकते थे। जितने थोड़े-बहुत अधिकार दिल्ली की चुनी सरकार के पास हैं उसी के भीतर काम करते हुए वह एक आदर्श सरकार की नजीर पेश कर सकते थे। लेकिन उन्होंने टकराव का मार्ग चुना। जानबूझकर चुना। इसके पीछे उनका अति महत्वाकांक्षी हो जाना है। वह स्वयं को नरेंद्र मोदी से कम नहीं आंकते। स्पष्ट रूप से उनका लक्ष्य 2019 में प्रधानमंत्री पद की दावेदारी करना है। इसका उनको पूरा हक भी है। लेकिन उनकी इस महत्वाकांक्षा ने दिल्लीवासियों के उन सपनों को धराशायी करने का काम किया है जिन्होंने उन्हें प्रचंड बहुमत देकर दोबारा दिल्ली को कमान सौंपी थी। यह भी तो एक तरह का नैतिक भ्रष्टाचार है अरविंद भाई!
— अपूर्व जोशी
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3 comments :

  1. अपूर्व जी , बहुत अच्छा लिखा आपने एक दम ईमानदारी भरी सटीकता से |अरविन्द केजरीवाल की सरकार को दिल्ली वालों ने बड़े स्नेह और सम्मान के साथ बहुमत दिया था , पर अरविन्द अपनी वाचालता और अपने सह्योगोयों के चाल -चलन की वजह से अपना रुतबा कायम रखने में नाकामयाब रहे |आप अच्छे हैं उसके लिए दूसरों को लगातार गलत साबित करने की कोशिश करना बहुत ही निम्न मानसिकता की निशानी है | अरविन्द भारतीय प्रशासनिक सेवा का अंग रह चुके हैं उन्हें नौकरशाही और सरकार दोनों कि अच्छी बुरी बातें मालूम हैं | अतः उन्हें तो दोनों के बीच सामजस्य बिठाने का काम करना चाहिए था वे अपने कम से खुद को साबित करते तो बाकि देश के लोग उम्हे खुद ही सिर आँखों पर बिठा लेते ,पर वे अपनी महत्वाकांक्षी फितरत ना तज सके और अपने आप को एक ऐसे जाल में उलझा लिया जिसकी आड़ में उनकी सरकार द्वारा किये गये अच्छे काम भी नज़र नहीं आते या फिर कहिये कि विपक्ष भी ऐसे मौके लपकने को तैयार बैठी है | अरविन्द को एक गहरे आत्म मंथन की जरूरत है ताकि वे अपना खोया भरोसा वापिस पा सकें |

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  2. अपूर्व जी , बहुत अच्छा लिखा आपने एक दम ईमानदारी भरी सटीकता से |अरविन्द केजरीवाल की सरकार को दिल्ली वालों ने बड़े स्नेह और सम्मान के साथ बहुमत दिया था , पर अरविन्द अपनी वाचालता और अपने सह्योगोयों के चाल -चलन की वजह से अपना रुतबा कायम रखने में नाकामयाब रहे |आप अच्छे हैं उसके लिए दूसरों को लगातार गलत साबित करने की कोशिश करना बहुत ही निम्न मानसिकता की निशानी है | अरविन्द भारतीय प्रशासनिक सेवा का अंग रह चुके हैं उन्हें नौकरशाही और सरकार दोनों कि अच्छी बुरी बातें मालूम हैं | अतः उन्हें तो दोनों के बीच सामजस्य बिठाने का काम करना चाहिए था वे अपने कम से खुद को साबित करते तो बाकि देश के लोग उम्हे खुद ही सिर आँखों पर बिठा लेते ,पर वे अपनी महत्वाकांक्षी फितरत ना तज सके और अपने आप को एक ऐसे जाल में उलझा लिया जिसकी आड़ में उनकी सरकार द्वारा किये गये अच्छे काम भी नज़र नहीं आते या फिर कहिये कि विपक्ष भी ऐसे मौके लपकने को तैयार बैठी है | अरविन्द को एक गहरे आत्म मंथन की जरूरत है ताकि वे अपना खोया भरोसा वापिस पा सकें |

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (11-09-2016) को "प्रयोग बढ़ा है हिंदी का, लेकिन..." (चर्चा अंक-2462) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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