रविवार, अक्तूबर 16, 2016

कह दो तुम — प्रेमा झा की कवितायेँ



प्रेमा झा की कवितायेँ | Poems of Prema Jha

कवितायेँ 

प्रेमा झा



कह दो तुम

तुम जो कह देते तो
चाँद तक अड़गनी टांग देती

दुपट्टा सितारों वाला डालकर उस पर
तुम्हें सपनों की कहानियां सुनाती
तुमको बताती राजा की बारात
रानी का महल
और
राजकुमारी के ख्वाब के किस्से
मैं तुमको गुनगुनाती सुबह की धुप में
तुमसे कहती आती जाड़े की खुशबुओं के एहसास
और चांदी वाली धूप की कवितायेँ
तुम जो कह देते
मैं पुराने महल की दीवार पर चित्रकारी खिंच देती
मैं उगा लेती लकड़ी का घोड़ा, पुरवइया के पर, रानी माँ के शौकिया हुक्के का धुंआ
मैं आकाश हूँ, चन्द्रमा और सूरज भी
तुम जो कह देते बन जाती पुराना किला, मस्जिद की मीनार और मकबरे की छत
मुहब्बत मेरी फ़िरोज़ शाह की मज़ार के बड़े पेड़ों-सी
परी और जिन्नातों के साये-सी
छूटता ही नहीं जो
इकतारे पर तानती हुई धुन जिसके
बंजारन गाती रहती है गलियों में
तुम जो कह दो तो
बन जाऊंगी मैं घण्टी, मेला, आग, सुनामी
या फिर
भटकती रह जाऊंगी बन कर आत्मा!






हर्फ़ प्यार के 

जिंदगी को बदलते हुए
देख रही हूँ
एक आदिम सच
और ज़ाया हो जाने की हकीकत से
बावस्ता होते हुए
जब धरती खत्म हो जाएगी
और
हवा असर करेगी सिर्फ
कोई एक नाम होगा
वो तुम्हारा ही होगा
क्योंकि जब
आंधियाँ चल रही थी
मैनें तुझे गुनगुना लिया था
सृष्टि की शुरुआत और अंत के मध्य
तुम और
तुम्हारा होना
कुछ हो जाने-सा
ऐसा उलझ गया है कि
अब बस आंधिया चलती हैं
और
शहर, मुल्क, सीमाएं
सृष्टि के विलीन हो जाने तक भी
एक स्लेट-सी कोशिश करती रहेंगी
उसे मिटाने की
उसे उगाने की....


जूही के फूल 

बवंडर है तुझमें खो जाना
एक जाल-सा
जो मेरे घर को उलझा दिए हुए है
तुझे किसने बुलाया था कि
आ भीतर दाखिल हो
तुमने कुंडियों के रिवाज़ को सीखा नहीं क्या?
अजीमुश्शान सन्नाटे के हो लगते बादशाह
तारिक़ सफ़क की रात
आ गए एक कुंवारी लड़की के घर
लो तेल डाल दिए हमने दीए में
देखूं तो कौन है तू राहगीर
जो मेरी रागिनी में
अकेला जलने लगा है
जलकर, बदनाम होना
है एक अलग तरह की कामयाबी
दीवानों की बस्ती में तुझे लोग
पुरअसरार जादूगर कह रहे हैं
क्यों चला आया है तू ?
ये जानते हुए भी कि
रातरानी की उम्र में
सुबह नहीं होती!


घर 

मैं चुप अपने घर को कागज़ में लपेटती हूँ
कुछ शब्द उकेरती हूँ
और रंग की पुड़िया में डूबो देती हूँ
घर को सूटकेस में रखती हूँ
आओ, तुमको एक थाली चाँद दूं
दूं कटोरा-भर धूप
एक शीशी ओस घर में मेरे
थोड़ा समंदर का खारापन अंजुरी में
थोड़ा मेरी आँखों में!
मैं एक टुण्ड्रा बर्फ हूँ
हूँ थोड़ा-सा चेरापूंजी मौसम
मैं एक घर ख्याल हूँ
एक ज़िन्दगी सच हूँ।
प्रेमा झा 
००००००००००००००००

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