रूमानी कहानी — आदि संगीत — श्री श्री — Rumani Kahani by Poonam Arora



आदि संगीत

— पूनम अरोड़ा


चाहे सारी दुनिया हमारे आसपास ही क्यों न हो। खूबसूरत महीन धागों में बुनी हुई। अपनी तरह की हमारे अपने लिए और अपनी ही तरह की दूसरों के लिए। चाहे उस दुनिया में कितने ही लोग हों, कितनी ही संवेदनाएं हों, कितने ही धर्म और आस्थायें हों। इन सबकी एक ही तो सूत्रधार है.....प्रकृति। कितनी सुकून भरी है यह बात कि प्रकृति सदा ही निष्पक्ष रहती है। किसी के साथ भेदभाव करना प्रकृति का स्वभाव नहीं। पेड़-पौधों, लताओं की हरियाली, अंबर-धरा के बीच में फैला असीम-अनन्त क्षितिज और नदियों-सागर का गहरा पानी कितना रहस्य समेटे हुए हैं स्वयं में, अपने भीतर में, अपने अंतस में। मानव प्रकृति की सबसे खूबसूरत कृति और इस कृति में भी तो कितने रहस्य हैं। पंचतत्वों से बना मानव शरीर किसी आश्चर्य से कम नहीं। प्रकृति में जो भी अस्तित्व रखता है उन सबका अपना एक अर्थ होता है और हर अर्थ एक ही उत्तर में समाहित हो जाता है। इस तरह एक से अनेक और अनेक से एक बन जाता है। वह ‘एक’ हर एक में विद्यमान है। वह भाषा है, ज्ञान है, विचार है, संस्कार है, जड़ है, चेतन है और सहस्त्रधार चक्र से संबंधित है। वह प्रकाश, वह ऊर्जा, ‘मैं’ में भी है और उस ‘वह’ में भी है, यही संबंध है मानव और आस्थाओं का जहाँ विश्वास जन्म लेता है। हर किसी का अपना अस्तित्व तथा स्वभाव होता है और एक विकसित दायरा। हम हर दायरे में प्रवेश नहीं कर सकते।

पूनम अरोड़ा (श्री श्री)


हरियाणा साहित्य अकादमी से कहानी के लिए युवा लेखन पुरस्कार.
जन्म - 26 नवम्बर
एम ए - इतिहास, मास कम्यूनिकेशन और अब हिंदी में
कहानियाँ, कवितायें - कथाक्रम, सम्बोधन, राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका मधुमती, हरियाणा साहित्य अकादमी की पत्रिका हरिगन्धा, भोपाल और कुछ दिल्ली की महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में प्रकाशित
हरियाणा साहित्य अकादमी से ही एक कहानी और पुरस्कृत.
सम्पर्क - shreekaya@gmail.com

देवयानी के आसपास भी यही दुनिया थी लेकिन एक और दुनिया उसके भीतर अपना संसार रच रही थी। वहाँ.. .जहाँ जीवन अपने आकार को साकार करता है। उसने वह दुनिया तब महसूस की थी जब पहली बार डाक्टरी परीक्षण के दौरान उसने एक नन्हे शिशु को अपनी कोख में खेलते हुए देखा। सृजन अपनी प्रक्रिया चक्र में था। हिलोरें भरती हवाएँ प्रकृति संग झूम-झूम कर अपने सुरीले कंठ से कोई मीठा सा राग बिखेर रही थी। समूचा ब्रह्मांड तन्मयता से सृजन की उस पवित्र प्रक्रिया के समक्ष नतमस्तक था। उसे यकीन ही नहीं हुआ कि यह जो हल्की-हल्की, कोमल सी हलचल हो रही है उसी के गर्भ में हो रही है।

यूँ तो सारी दुनिया थी उसके आस-पास लेकिन वह तो बस अपने गर्भ की भीतरी दीवारों में हो रही रचना को बिना पलकें झपकाये देखते ही रहना चाहती थी। इस सारी दुनिया, जो उसके आसपास थी से उसका कोई लेना-देना नहीं था। हाँ-हाँ वह इसी दुनिया की थी। इसी दुनिया में ही रहती थी लेकिन वह अपनी दुनिया से बहुत दूर जा चुकी थी। यह जो नयी अनुभूति का ठंडा सुख उसने पाया वह अविश्वसनीय रूप से अद्भुत तथा अलौकिक था जैसे लाखों कमल-पुष्पों का गुलाबी रंग का बादल फट पड़ा हो उस पर, उसके समूचेपन पर। एक लंबी नदी तत्पर हो रही थी उसके हृदय की पसलियों के ऊपर चढ़े मास में से बहने के लिए।

अपने संपूर्ण जीवन काल में उसे एक मात्र यही घटना स्वयं के साथ घटित हुई प्रतीत हुई थी। बाकी का पिछला सारा जीवन जिसे अतीत कहते हैं वह किसी मजबूत बक्से में बंद कर उसे हज़ारों फीट गहने समुद्र में छिपा आयी। बक्से को समुद्र तल तक ले जाने और उतनी ही दूरी से तल से ऊपर आने में उसकी साँसें कई बार उखड़ी लेकिन अब जबकि उस तल से वह बाहर निकल आयी थी तो भी मौत का एक डरावना अहसास उसकी रूह की सहमी आवाज़ के दर्द में था। वर्षों से वह खामोशी की गीली चादर में लिपटी पड़ी थी। दिन-रात, रात-दिन। उसे नहीं जान पड़ता था कि कब चिलचिलाती धूप उस चादर का गीलापन सुखाती और कब रात की ठंडी चाँदनी फिर उसे बिन बताये गीला कर जाती, न थमने वाला यह अजीब सा खेल चलता ही रहता, चलता ही रहता।

उसके दिन छोटे और रातें लंबी होती थीं....हमेशा। माँ बनने का अहसास गर्व से भरा था। गर्भ ठहरने पर ऊंची एड़ी के चप्पल-सैंडल पहनना छोड़ देने पर उसका पाँच फुट दो इंच का कद छोटा नहीं हुआ था बल्कि कुछ नई ऊंचाइयाँ उसने अपने मन में ही पार कर ली थी। ‘‘मैं माँ बनने वाली हूँ।’’ किसी के पूछने पर वह यह बात कुछ इस तरह से बताती, जैसे मुस्कराते सूरजमुखी के फूल सूर्य की आभा देख कर खिलते हैं और उसी दिशा की ओर खु़द को समर्पित कर देते हैं, जिस दिशा की ओर सूर्य जाता है। इस प्रेम में न तो हठ है न ही स्थिति। ठीक ऐसे ही वह भी अपनी कोख  में होने वाली सुखद हलचलों से चहकती थी और जब वह कहती कि मैं माँ बनने वाली हूँ तो नदियाँ उछल-उछल पड़ती, दरख्तों  पर बैठे पंछियों के मधुर कलरव सुनाई पड़ते, आकाश गंगायें मुस्कुरा उठतीं। ऐसे-ऐसे दृश्य उसकी सुन्दर आंखों में तैरने लगते। प्रत्येक स्त्री एक दिन माँ बनती है तो उसके साथ ऐसा क्या नया हो गया है? यह प्रश्न भी अपनी जगह वाजिब था लेकिन इसका उत्तर तो वह खुद भी नहीं जानती थी शायद.... या हो सकता है जानती थी। तभी होठ आधा इंच मुस्कुराहट के साथ ज़रा खिल जाते। यह गुलाबी रंग जो उसके होंठों पर चढ़ आया था, ऐसा लगता था जैसे अभी-अभी चुकुन्दर का टुकड़ा खा कर आयी हो और आँखों का यह गीलापन बिल्कुल कंचे सम, वह कैसे आया? कितनी शान्ति, कितनी सौम्यता है उसके स्वभाव में और जैसे एक नदी रहस्यमयी चुप्पी को स्वयं में समाहित करके बड़ी शान से चलती है। हल्की-हल्की नीली लहरों के साथ मद्धम, मीठी आवाज किनारों से टकरा कर, छोटे-छोटे घुंघरुओं के गिरने से निकलने वाली मधुर संगीत लहरियां रास्ते भर छोड़ते हुए।

देवयानी के ठीक सामने वाले घर यानी मिसेज जोन्स के घर में अभी कुछ ही दिनों पहले प्रो.अनिरुद्ध किराये पर रहने के लिए आए। उनका रौबदार व्यक्तित्व उनकी छवि को कुछ अड़ियल बनाता था। लेकिन उनका अड़ियलपन बिल्कुल वैसा ही था जैसे छोटे बच्चों का होता है। पहली बार उन्होंने देवयानी को देखा तो देखते ही रह गये जैसे उनका खोया वजूद देवयानी के पास हो। जिसे वे पुकार लेना चाहते हों। लेकिन देवयानी ने कुछ नहीं देखा, प्रो अनिरुद्ध  को भी नहीं। कभी नहीं। एक नज़र नहीं भी अपनी खामोशी में जीने वाले वाला इंसान कहीं नहीं देखता शायद न अपनी ओर, न किसी दूसरे की ओर। उसकी नजरें एक शून्य को ताकने की हिमाकत के सिवा कोई और जुर्रत भी तो कहाँ कर पाती हैं। कर पाती है क्या? उन्होंने कई बार देवयानी को देखा, देवयानी की खामोशी को महसूस किया। कई बार उन्होंने उसकी खामोशी को बगीचे में रखी कुर्सी पर बैठे देखा, कभी चलते-चलते फूलों पर हाथ फहराते हुए तो कभी उसे आँखें बंद कर ध्यान मुद्रा में लीन देखा। एक बार उन्होंने देखा कि देवयानी अपने बगीचे में बैठी कागज़ पर पेन्सिल से कुछ लकीरें उकेर रही हैं और अपने उभरे उदर पर नज़र भी डाल रही है। वैसी ही नज़र जो केवल माँ की होती है। केवल माँ की। क्या लिख रही होगी वो? प्रो. अनिरुद्ध ने उसे देखते हुए सोचा। शायद अपने होने वाले बच्चे की तस्वीर बनाने की कोशिश कर रही होगी या फिर उसके लिए कोई कविता लिख रही होगी। या फिर.... पता नहीं....। वे सोच नहीं पाये और देवयानी से कुछ पूछने या जानने की कोई वह भी नहीं थी। वैसे उनके घरों के मध्य केवल एक सड़क ही थी।

प्रो. अनिरुद्ध का हृदय कई बार पिघला देवयानी के माँ होने की मूरत पर लेकिन उन्हें लगता था कि उसके आने-जाने, चलने फिरने में कोई रहस्य है। एक बार उन्होंने देखा कि देवयानी ने अपने बगीचे में एक छतनार चौकोर चबूतरे पर स्थापित शिवलिंग पर जल-पुष्प अर्पित किए और बचे जल के लोटे को अपने हाथों से ऊपर की ओर ले गयी और उसे अपने चेहरे पर धीरे-धीरे गिराने लगी फिर उसी मुद्रा में आँखें बंद कर वह कुछ देर खड़ी रही। रहस्यमयी स्याही में डूबे कई प्रश्न प्रो. के घर की बालकनी में उड़ कर आ रहे थे। आखिर देवयानी की गहरी आँखों में ऐसा क्या है, जो आज तक उन्होंने किसी की भी आँखों में नहीं देखा। उसकी आँखें ऐसी थी जैसे खोया-खोया चाँद आसमान में अकेला रहता है, संतुष्टि से पूरी तरह भरी मुस्कुराहट के साथ। क्या देवयानी भी चाँद तक सीढ़ियाँ लगा कर उससे उसकी खामोश संतुष्टि ले आयी थी?

मिसेज जोन्स, प्रो. अनिरुद्ध को कभी-कभी अपने साथ चाय पीने के लिए बुला लिया करती थी, खासतौर पर उस समय जब वह बिना अंडों का केक बनाती थी। उस समय प्रो. देवयानी को लेकर कोई बात मिसेज जोन्स से करने की कोशिश करते तो वो उसमें दिलचस्पी नहीं लेती थी। वे ज्यादा कुछ नहीं जान सके देवयानी के बारे में सिवाय इसके कि वह पहली बार मातृत्व सुख पाने जा रही है। लेकिन प्रो. क्यों जानना चाहते थे देवयानी को? उसके अछूते संसार को? वह तो किसी भी ओर नज़र भर भी नहीं उठाती थी तो फिर क्यों रहस्यों से भरे रूई के फाहे उनके घर की ओर उड़ कर चले आते थे, जो उन्हें बेचैनी और उत्सुकता दे जाते थे और वे उन्हें उठाये बिना रह भी नहीं पाते थे।

एक सांझ देवयानी अपने घर में कहीं नजर नहीं आ रही थी, न ही उसके बड़े से घर के गेट के दो तरफ बने ‘पिलर्स’ पर ‘लाइटें’ जली, न ही उसके बगीचे में शाम की रोशनी फैली। कहीं वह बीमार तो नहीं हो गयी, प्रो. अनिरुद्ध के मन में हल्की सी जो आशंका उठी उसका संबंध उसी से निकला। दरवाजे पर दस्तक हुई, मिसेज जोन्स थीं। बिना अंडों का केक पसन्द करने वाली उनकी चिड़चिड़ी मकान मालकिन (जो थोड़ी मोटी होती जा रही थी) ने बताया कि देवयानी की तबीयत ठीक नहीं है। क्या वे उसे अपनी गाड़ी में बैठाकर अस्पताल ले जा सकते हैं? ‘न’ कहने का तो प्रश्न ही नहीं था।

गाड़ी में देवयानी प्रो. अनिरुद्ध की बगल की सीट पर बैठ गयी। चेहरे का उड़ा रंग, बिखरे-उलझे बाल, ढीला लबादा पहने वह असहनीय पीड़ा में थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उसे साँस लेने में दिक्कत हो रही है। हालांकि दर्द की घुटन भरी लकीरें उसके सारे शरीर पर फैली पड़ी थी तो भी वह बहुत खूबसूरत लग रही थी। प्रो. अनिरुद्ध की नज़रों मे तो यही दिख रहा था। अचानक उनकी खोई नज़रों को एक झटका सा लगा जब देवयानी की दर्द भरी आह निकली। उन्होंने गाड़ी चलाई मगर अस्पताल पन्द्रह किलोमीटर की दूरी पर था। अभी मुश्किल से तीन किलोमीटर ही चले होंगे कि गाड़ी की सीट पानी से भर गयी और देवयानी बुरी तरह मचलने लगी। ‘‘गाड़ी तेज चलाओ अनिरुद्ध। इसकी तबीयत बिगड़ रही है।’’ मिसेज जोन्स बोली.... । प्रो. अनिरुद्ध के हाथ काँपने लगे कि तभी एक काली बिल्ली उनका रास्ता काट गयी। प्रो. ने ब्रेक लगायी तो मिसेज जोन्स झल्लाकर बोलीं....

‘‘अरे गाड़ी चलाओ अनिरुद्ध! यह तुम क्या कर रहे हो, अगर वक्त पर अस्पताल न पहुँचे तो कुछ भी हो सकता है और बिल्ली के रास्ता काटने से कोई अपशकुन नहीं होता।’’

यह बात तो शायद बिल्ली भी नहीं जानती होगी कि दुनिया उसे कैसे और क्यों अपशकुन जैसी बे-सिर पैर की बातों से जोड़ देती है।

वे तीनों अस्पताल पहुँचे। देवयानी को तुरन्त व्हील चेयर पर बैठाकर अंदर ले जाया गया। डा. ने चेकअप किया तो पाया कि दो उंगली बहाव हो रहा है और पानी काफी निकल चुका है। उसे एडमिट कर लिया गया। प्रो. अनिरुद्ध मिसेज जोन्स के साथ अस्पताल मे बैठे-बैठे देवयानी के प्रति अपने इस आकर्षण को समझने की कोशिश कर रहे थे लेकिन कोई संतुष्टि भरा उत्तर न खोज पाने की स्थिति में एक गुमशुदा फकीर की तरह ख्यालों में चलते जा रहे थे। लगभग दस घंटों के बाद जब रात जा चुकी थी। नई भोर का आगमन हो चुका था और प्रकृति अनन्त सौन्दर्य में थी तब नर्स ने आकर उन दोनों को बताया कि देवयानी को बेटा हुआ है। सुनकर वे दोनों बहुत खुश हुए। वास्तव में वह सुबह अन्य सुबहों से भिन्न थी। देवयानी ने नया-नया मातृत्व पाया और इस मीठे अहसास की रिमझिम फुहारों से प्रो. का मन भी भीग गया। देवयानी के प्रति उनके आकर्षण के साथ सम्मान भी जुड़ गया। उन्होंने मिसेज जोन्स से थोड़ी हिचक से पूछा कि उसका परिवार कहाँ है? इस वक्त उसे अपनों की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है। मिसेज जोन्स कुछ नहीं बोलीं जैसा कि वे हमेशा करती थी, जब भी प्रो. अनिरुद्ध देवयानी से संबंधित कोई भी बात पूछते।

प्रो. अनिरुद्ध का जिज्ञासा पूर्ण प्रश्न अनुत्तरित ही रह गया क्योंकि उन्हीं दिनों उनका तबादला हो गया था। नौकरी में रहते तबादले की ही समस्या हर समय घिरी रहती है। इंसान बंजारा हो जाता है। इस बंजारेपन को प्रो. अनिरुद्ध में भी जब तब झेलना ही पड़ता था। नई नौकरी, नई जगह, नया माहौल। फिर नई नौकरी, नई जगह, नया माहौल। बार-बार। बड़ी कोफ्त होने लगती है इससे मगर क्या करें, हम ऐसा होने देते हैं और न होने देने का हमारे पास कोई आवश्यक कारण भी तो नहीं होता। नई जगह, नये माहौल में भी प्रो. अनिरुद्ध ने देवयानी के बारे में सोचा। बहुत बार। जिसके पीछे एक खूबसूरत वजह भी थी। प्रो. अनिरुद्ध प्यार में थे। देवयानी के प्यार में। बेइन्तिहां। एक बार उन्होंने देवयानी की खामोशी की गीली चादर में खुद को उसके साथ लपेटा था। यह जानने के लिए कि खामोशी का गीला अहसास आखिर होता कैसा है। उन्हीं पलों में देवयानी की उनींदी आँखों की पलकें प्रो. अनिरुद्ध के सीने पर नींद छोड़ रही थी तब उनके होठ देवयानी के चमकते सफेद उभारों से होते उसकी गहरी नाभि तक आ पहुँचे। उन्होंने देखा देवयानी के सपाट पेट पर नाभि के ठीक दाहिनी ओर एक काला तिल है। उसी गीली चादर मे उन्होंने देवयानी के तिल की गरमाहट को अपने होंठों से छू लिया था और खुद को तृप्त किया था। वे अक्सर देवयानी को अपने पास बुलाते, उसकी देह सहलाते, उसके तिल की गरमाहट को छूते और तृप्त हो जाते। तब देवयानी, देवयानी नहीं रह जाती थी। वह लाल रंग की हो जाती थी।

लाल रोशनी
लाल रात
लाल लिबास
और
लाल अंगड़ाई

सब लाल बिस्तर पर बिखर जाता। उस प्यार का रंग लाल होता था। सुर्ख लाल। कितने समय से प्रो. अनिरुद्ध देवयानी को यूँ ही सपनों में अपने आगोश में ले रहे थे और दिन के उजाले में जब सपने सो जाते हैं और संसार जाग जाता तो वे देवयानी को बिस्तर पर सोने के लिए छोड़ जाते। एक तीव्र सैलाब उनकी शिराओं में बहने लगा था। वे अपने पौरुष से देवयानी को जीतना चाहते थे। प्रो. अनिरुद्ध को देवयानी को देखकर न जाने ऐसा क्यों लगता था कि वह कुछ कहना चाहती है। उसके शब्द बिखर जाना चाहते हैं, ऐसे जैसे तूफान। देवयानी के आस-पास छाया सन्नाटा ऐसा था जैसे धुप्प अंधेरा किसी के होने का गाढ़ा अहसास लिए हो। वह अनभिज्ञ तो किसी से भी नहीं थी मगर शब्दों के खेल में नहीं पड़ना चाहती थी। शायद देवयानी ने जिन्दगियों को पार किया था हालांकि जिन्दगियों को पार करने के लिए वहाँ कोई हवाई पट्टी नहीं थी फिर भी वह दूसरी जिन्दगियों से दूरी पर थी क्योंकि उन्हें पार करने की कला वह जान गयी थी।

कुछ प्रयास किए थे प्रो. अनिरुद्ध ने, जिन्होंने काम किया। लगभग सात महीने बाद वे अपनी पुरानी नौकरी फिर से पा सके थे। वे बहुत खुश थे उस जगह पर वापस होने के लिए जहाँ वे होने चाहते थे। अपनी पुरानी नौकरी पाकर, मिसेज जोन्स से दोबारा मिलकर, उनके घर में दोबारा रहने पर। मिसेज जोन्स भी शायद उनके जाने से हुए अपने अकेलेपन को महसूस कर रहीं थीं। उनके और प्रो. अनिरुद्ध के मध्य एक आत्मीय संबंध भी स्थापित हो चुका था। जहाँ चाय के साथ बिना अंडों का केक भी था। उनके पति का स्वर्गवास हुए भी तो कई वर्ष गुज़र चुके थे। ऐसे में उनके स्वभाव में चिड़चिड़ापन आ जाना स्वाभाविक था लेकिन दूसरी ओर उनकी दूरदर्शिता तथा चीजों को बेहतरी से समझने का जो उनका गुण था वह परिस्थितियों जन्य नहीं था बल्कि उनकी भीतरी समझ की पहचान था और संभवतः परिस्थितियों ने उनके इस गुण को और निखार दिया हो। प्रो. अनिरुद्ध को अपने घर का ऊपरी हिस्सा किराये पर देकर वे इस बात से भी निश्चिंत हो गयी थी कि अब फिर से उनके पति की लाइब्रेरी में रखी असंख्य किताबें अपनी कहानियाँ कहने लगेंगी। फिर से वहाँ एक ऐसा इंसान बैठेगा जो पुस्तकों के मोल को समझता है। लेकिन प्रो. के वहाँ वापस लौटने की बेतहाशा खुशी का एक और कारण था जो शायद वास्तव में इकलौता कारण ही था। वह था देवयानी के आस-पास होने की खुशी। और उसके विषय में जानने की जिज्ञासा। यह मानव मन की मूल विशेषता है। दूसरों के निजी जीवन में आवश्यक या अनावश्यक हस्तक्षेप करना। जाने-अनजाने प्रो अनिरुद्ध जैसा पढ़ा-लिखा समझदार पुरुष भी ऐसा कर रहा था। वैसे इस तर्कहीन बात को समझने में इंसान की कोई दिलचस्पी भी नहीं होती।

घर सेट करने के बाद जब वे आराम करने के लिए हाथ में कॉफी मग थामें खिड़की पर बैठे, जो देवयानी के घर की ओर खुलती थी तो उन्होंने देखा कि देवयानी की मौन-मौजूदगी अभी भी उसके घर के सन्नाटे में पसरी हुई है। उन्होंने कॉफी का एक घूंट भरा..... ‘‘उफ कितना कसैला है। लगता है कॉफी ज़रा ज्यादा पड़ गयी। उस कसैले स्वाद में यकायक देवयानी के आने की गंध घुलने लगी। वे सतर्कता से उसे देखने लगे। देवयानी ने चाँदनी में भीगी सफेद कुर्ती के साथ सफेद सलवार पहना हुआ था और उसके हाथों में था उसी का प्रतिबिम्ब। उन्हें फुर्सत कहाँ थी दुनिया को देखने की। प्रो. ने महसूस किया कि देवयानी ने वह आसमान नहीं लिया जो उसे थमा दिया गया हो बल्कि यह आसमान तो उसका स्वर्निमता था। एकदम शांत तथा सौम्य लेकिन भव्य जो बरबस ही आकर्षण और उत्सुकता उत्पन्न कर रहा था। जिसमें प्रो. अनिरुद्ध खिचते चले आ रहे थे।

अचानक दरवाजे पर एक धीमी सी आहट हुई जिसने प्रो. को ख्यालों से निकाल दिया। मिसेज जोन्स कमरे में दाखिल हुई और साथ ही खिड़की पर बैठ गयी। प्रो. ने उनसे कॉफी का पूछा तो उन्होंने माथे पर बल डाल कर कहा..... ‘‘अऽहूंऽ, मैं अभी चाय पीकर आयी हूँ, अदरक वाली। कॉफी मुझे कड़वी लगती है। प्रो. मुस्कुरा दिये। उन्होंने कॉफी का एक और घूँट भरा। उफ्फ.... कितना कसैला था। फिर मग को एक ओर रख कर उन्होंने मिसेज जोन्स से पूछा. ... ‘‘आप मुझे कभी देवयानी के बारे में कुछ बताती नहीं। मैं जब भी उसके बारे में कुछ पूछता हूँ तो आप हमेशा चुप हो जाती हैं।’’

उनके जवाब की प्रतीक्षा में वे पूरे आठ मिनट चुपचाप बैठे रहे और मिसेज जोन्स लगातार एकटक लगाये देवयानी को खिड़की पर बैठे-बैठे निहारती रहीं। उनके सामान्य भाव अब उनके चेहरे से जाने लगे। आँखों के आस-पास की चमड़ी सिकुड़ने लगी। नहीं..... यह बुढ़ापे की सिकुड़न नहीं थी। एक गंभीर चिंता उनकी आँखों के उथले पानी में तैरने लगी। प्रो. अनिरुद्ध की नज़रों में देवयानी के प्रति जो तड़प जल रही थी उसे मिसेज जोन्स ने देख लिया था लेकिन वो उनकी छटपटाहट को तूल नहीं देना चाहती थी। वे अपने हिस्से की ईमानदारी पर कायम थीं। एक गहरी साँस उन्होंने अपने फेफड़ों में भरी और प्रो. से गंभीरता से बोलीं... ‘‘देखो! क्या वहाँ तुम्हें रोशनी बहती नज़र नहीं आ रही, वो देखो, वह बाहर अपने बगीचे में अपने बच्चे को लेकर चली आ रही है। जरा उस बच्चे को देखो, गौर से देखो।’’

प्रो. ने उन दोनों को बहुत ध्यान से देखने की कोशिश की। वे दोनों एक-दूसरे की आँखों में ऐसे झांक रहे थे जैसे कोई गहराती रात धरती के एक हिस्से को एक समय में सुला देती है और धरती का दूसरा हिस्सा उस नींद के दायरे से बाहर होता है। एक-दूसरे के दायरे में प्रवेश वर्जित होता है। उस बच्चे की आँखें एकदम गौतम बुद्ध की तरह थी। बादाम के आकार की, ज्ञान से भरीं। ज़रूर उसकी आँखों का इस ब्राह्मण से कोई संबंध था। वे काली-भूरी होने पर भी खूबसूरत थीं। वैसे आँखों की सुन्दरता के पैमाने में तो केवल नीली, हरी और स्लेटी रंग की आँखें ही आती हैं। लेकिन उस बच्चे की आनन्दमयी काली-भूरी आँखें नीली, हरी और स्लेटी रंग की आँखों के दर्प को इस खूबसूरती से शर्मिंदा कर रही थीं कि हर पैमाना ही झुठला जाये।

‘‘इन्हें इस रोशनी में केवल एक-दूसरे के साथ रहने दो। इन्हें किसी की ज़रूरत नहीं। यह सब उसकी प्रार्थनाओं और आस्थाओं से संबंधित विषय है और किसी को भी किसी की आस्था पर प्रश्न करने का कोई अधिकार नहीं। ऐसा करके न केवल हम निजी भावनाओं को ठेस पहुँचाते हैं बल्कि इस अनैतिक हस्तक्षेप द्वारा स्वयं को निहायत गैर जिम्मेदार सामाजिक प्राणी के रूप में समाज में पेश भी करते हैं तो फिर यह निरर्थक प्रयास क्यों?’’ प्रो. मिसेज जोन्स की बात चुपचाप सुनते रहे। कुछ कहने की गुंजाइश ही कहाँ थी। शायद देवयानी ने अपनी तनहाई में जीना सीख लिया था। कभी वह अपने घर की दीवारों को तनहाई से सजाती तो कभी फर्श को तनहाई से घिस कर चमकदार बना देती। देखिए तो उसने अपने खूबसूरत बगीचे को भी तो तनहाई के खाद-पानी से सींचा है और कितने सुन्दर फूल खिले हैं वहाँ....।

अचानक प्रो. अनिरुद्ध को आँखों में कुछ चुभता हुआ सा प्रतीत हुआ। उन्होंने देखा देवयानी का घर रोशनी में तैर रहा है जैसे किसी ने रोशनी का फव्वारा खोल दिया हो और वह धीरे-धीरे अपने आकार में बढ़ने लगा। बढ़ते-बढ़ते वह रोशनी उस खिड़की की ओर आने लगी, जहाँ से प्रो. मिसेज जोन्स के साथ देवयानी को देख रहे थे। उनकी रूह थर्रा उठी। यह क्या है? उन्हें कुछ समझ नहीं आया और झट से उन्होंने खिड़की बंद कर दी। अगली सुबह कुछ पीली सी थी। बीमारों जैसी.....।

देवयानी कोई साधारण स्त्री नहीं थी। यह रहस्य तो गहराता जा रहा था। उसने शायद अपने भीतर की दुनिया में भी अकेलापन महसूस कर लिया था। ऐसा अकेलापन जो कचोटता नहीं था न ही अकुलाहट भरा था वह अकेलापन तो ऐसा था जैसे नीले सफेद सागर पर हवा तीव्र गति से उसे पार कर लेना चाहती है लेकिन इस अकेलेपन की सत्य यात्रा का अंत कहाँ होगा, यह नहीं मालूम। यहाँ तक कि कभी-कभी वह हवा दूर देशों को भी पार कर जाती है। उत्तरी ध्रुव से लेकर वापस उत्तरी ध्रुव तक का चक्कर लेकिन वह खामोशी ओर अकेलापन वहीं बर्फ में जमीं किसी कब्र के भीतर ही समाया था। जिसकी रूह को वापस आना ही था।

यकीनन यह देवयानी का एक अलग ही संसार था और उस संसार को देखने का एक नया नज़रिया रात को प्रो अनिरुद्ध की आँखों में चुभन बर कर आया था। वहाँ उस संसार में किसी नज़र का कोई काम नहीं था। प्रेम केवल तभी पूर्णता को प्राप्त करता है जब वह जीवन संदर्भों से जुड़ा हो लेकिन जहाँ जीवन के संदर्भ लौकिकता को पार कर गये हों वहाँ प्रेम के संदर्भ और अर्थ दोनों ही बदल जाते हैं। वहाँ प्रेम की पूर्णता नहीं ढूंढी जाती न ही उसे किसी अंतिम रूप में अख्तियार करने की कवायद होती है।

प्रो. अनिरुद्ध के भीतर का ज्वालामुखी आखिरकार एक दिन फट पड़ा और उन्होंने तय किया कि वे देवयानी से मिलने के लिए उसके घर जायेंगे। प्रेम की हल्की-हल्की कंपन उनके समूचे अस्तित्व को देवयानी पर न्यौछावर कर देना चाहती थी। बहुत कुछ देखने के बाद भी वे अपने उसी पक्ष में वैसे ही खड़े थे।

बगीचा पार कर प्रो. अनिरुद्ध ने डोर बैल बजायी। कुछ क्षणों बाद देवयानी ने दरवाजा खोला। वह क्षण जादू भरा था। लग रहा था जैसे दो रूहें उस क्षण के जादू से पिघलने लगीं है। पहली बार देवयानी ने प्रो. अनिरुद्ध से नज़रें मिलायी । एक प्रो. अनिरुद्ध में से दूसरे फिर तीसरे फिर चौथे, पांचवें, दसवें, पचासवें प्रो. अनिरुद्ध बाहर निकल कर हर ओर खड़े थे और एक देवयानी में से भी दूसरी, तीसरी, पाँचवीं, दसवीं, पचासवीं देवयानी निकल कर हर ओर खड़ी थी। सारी कायनात खंड़-खंड़ हो रही थी। देवयानी खंड़-खंड़ हो रही थी। प्रो. अनिरुद्ध खंड़-खंड़ हो रहे थे। नज़रें मिलने की चुप्पी इतनी पुरानी थी जैसे सदियों से इसी चौखट पर दोनों के कदम थम गये हों और न जाने अभी कितनी सदियां उन दोनों के बीच से गुजर जाने की प्रतीक्षा में खड़ी हों। अप्रत्याशित। अचम्भित। वह प्रो. अनिरुद्ध को जानती थी मिसेज जोन्स को जानती थी। साथ वाले जैन परिवार, सिंह परिवार उनके दो कुत्तों को भी जानती थी। मकान नं. 17/13 को भी जानती थी। देश में होने वाले घोटालों, हत्याओं, बलात्कारों के बारे में वह भी जानती थी। सत्ताईस कि.मी. लम्बी सुरंग में ब्राह्मण की उत्पत्ति के विषय में हो रही गणनाओं पर भी वह नज़र रखे हुए थी। आत्मा-परमात्मा के बीच के संबंध को भी वह जानती थी। प्रकृति की निष्पक्षता को भी जानती थी। वह यह सब जानती थी क्योंकि यह दुनिया उसके आस-पास थी। यह सारी दुनिया जो हमारे आस-पास होती है उसके भी इर्द-गिर्द थी लेकिन वह शब्दों के जाल में नहीं पड़ना चाहती थी। अनभिज्ञ तो वह किसी भी चीज से नहीं थी। वह चुपचाप दरवाजे के एक ओर हो गयी। ‘‘मैं प्रो. अनिरुद्ध हूँ। मिसेज जोन्स के घर, वो जो बिल्कुल आपके घर के सामने है में रहता हूँ।’’

‘‘जी!’’ उसने बड़ी धीमी आवाज़ में कहा।

‘‘आप ही मुझे अस्पताल ले कर गये थे न। देवयानी ने प्रो को बैठने के लिए कहते हुए कहा। उस वक्त मेरी मदद के लिए में आपका शुक्रिया अदा नहीं कर पायी थी।’’

प्रो. अनिरुद्ध ने बात को बीच में ही टोक दिया। ‘‘शुक्रिया कैसा? यह, तो इंसानी फर्ज था’’ इंसानी फर्ज की तस्वीर जो उसकी आंखों में औचक ही कौंधी तो उसने उसे फौरन झटक दिया और एक बेमानी सी फीकी सी मुस्कुराहट हवा में उछाल दी। जिसमें दर्द की लकीरें साफ दिखाई दे रही थी। प्रो. अनिरुद्ध ने सोफे में धसते हुए उसके घर पर नज़र दौड़ाई। उस संध्या बेला में उसके घर में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर कांच के बड़े-बड़े कटोरों में तिल का तेल भरा था और उनमें रूई की कई बत्तियां थीं। ऐसा पवित्र ओर अलौकिक नज़ारा जिसमें देवयानी नाम का एक-एक अक्षर डूबा हुआ था और हर अक्षर से फूटता प्रकाशपुंज अपनी सीमाएँ तोड़े जा रहा था। वह उस समय प्रो. अनिरुद्ध को शर्मसार भी कर रहा था। देवयानी उनके ख़्वाबों की प्रेयसी नहीं थी। बिल्कुल भी नहीं। वह इस प्रकाश घर में रहने वाली एक अद्भुत स्त्री थी। पता नहीं दुनियादारी के कितने चरणों को पार कर वह यहां पहुंची थी। अपनी शर्मसारी को छिपाने की कोशिश करते हुए उन्होंने देवयानी से उसके बच्चे के बारे में पूछा तो देवयानी ने बताया कि वह नींद में है। वे बेचैन हो उठे उस बच्चे की बादामी आँखों को देखने के लिए जिसे उन्होंने एक तय दूरी से देखा था।

‘‘ओह! अच्छा’’ उन्होंने सिर्फ यही कहा और चुपचाप बैठे रहे। देवयानी भी नज़रें झुकाए चुपचाप बैठी थी और प्रो. अनिरुद्ध भी। एक घर, एक कमरा, दो लोग, कुछ जान-पहचान, थोड़ा अजनबीपन, मौन की मृदंगना ....। एक गोल मेज जिसके एक तरफ प्रो. अनिरुद्ध तो दूसरी ओर देवयानी। प्रकाश लहरें, उड़ते ख्याल, एक घर, एक पूरी दुनिया और पूरी धरती, उसके चारों ओर चक्कर लगाते नीले, लाल, संतरी ग्रह। सब मौन में। सब। उस पल वे देवयानी की खामोशी की गीली चादर में जा चुके थे। लेकिन यह खामोशी उस खामोशी से कहीं ज़्यादा गीली लेकिन बरदाश्त करने वाली थी, जिसे वे अपने ख्वाबों में अब तक लपेटते आ रहे थे।

‘‘आप हमेशा सफेद कपड़े पहनती हैं, क्या? आप किसी समुदाय विशेष की आस्थाओं का पालन करती हैं? आपके धर्मगुरु कौन हैं देवयानी जी।’’ देवयानी उनके प्रश्न पर सहजता से बोली.... ‘‘आस्थायें सदा निजी होती हैं, लेकिन मेरी, आपकी या किसी की भी आस्थायें एक-दूसरे से टकराव न रखती हों। अपनी आस्थाओं में जब हम जीने लगते हैं तो हम चाहते हैं कि कयामत के दिन तक हम उन्हीं में जियें। यह आत्मिक सुख देता है प्रो. अनिरुद्ध। रही बात सफेद रंग की तो इसमें तो सभी रंग हैं जो एकसार हो इसे ऐसा ईश्वरीय रंग बनाते हैं और ईश्वर की नजदीकी को अहसास में रखने का अर्थ आप समझते हैं क्या?’’ प्रो. अनिरुद्ध गंभीर और अचम्भित मुद्रा में देवयानी की चारों ओर का हल्का सुनहरी आभा-मंडल देखने लगे। नहीं देख सके और डर कर उठ गये।

‘‘मैं अब चलता हूँ, यूँ ही बस आपसे मिलने चला आया था, प्रो. अनिरुद्ध ने बात बदलते हुए कहा। आपके बगीचे में बहुत सुन्दर फूल खिले हैं। बहुत ध्यान रखती हैं आप अपने बगीचे का...’’ यह कहते हुए वे बाहर आ गये। देवयानी भी उनके पीछे-पीछे आने लगी। बिना कोई सवाल तलब किए।

रात के दो बज गये। प्रो. अनिरुद्ध की नींद न जाने कहाँ भाग गयी थी। वे अभी तक देवयानी के बारे में ही सोच रहे थे। देखा जाए तो उन्हें देवयानी की बात समझ आयी भी थी और नहीं भी। लेकिन प्रो. के मानव मन की जिज्ञासा ने एक ही रात में विकराल रूप ले लिया था। वे देवयानी के आस-पास को समझना चाहते थे। उसे देखकर उसके सामने बैठे हुए उत्पन्न हुए अपने मन के डर को समझना चाहते थे। वे समझना चाहते थे इस बात को कि आखिर देवयानी एक साधारण स्त्री है लेकिन उसमें और उसके आस-पास में साधारण सा कुछ भी नहीं है। क्या किसी की निजी आस्थायें उसे इस कदर अलग बना देती हैं। देवयानी से पहली बार की ही मुलाकात के बाद प्रो. के मन से सांसारिक प्रेम उबने लगा जैसे ऊपर से हरा-भरा दिखने वाला एक पेड़ अपनी खोखली हुई जड़ों के ढोंग से जूझ रहा हो और यकायक गिर पड़ने के दिन के बहुत करीब हो। लेकिन एक अजीब से हठ ने उनके मन में जगह ले ली थी। वह हठ था देवयानी को जानने का हठ। वह हठ था उसके चारों ओर का शक्तिशाली प्रकाश पुंज को जानने का हठ, जिसके सामने वे कुछ पल भी बैठ न सके। वह हठ था देवयानी के समूचे व्यक्तित्व पर छाये रहस्य को समझने का हठ। वह हठ था देवयानी की गीली खामोशी को समझने का हठ। वह हठ था उसकी आँखो में आयी संतुष्टि को जानने का हठ। लेकिन इन होंठों की बेमकसद धुन के गीत में प्रो. एक आवाज साफ सुन पा रहे थे। उनके दिल की धड़कने सीधे तौर पर देवयानी को कैद कर लेना चाहती थी। शिराओं में रक्त की जगह तड़प बहने लगी थी। मगर वे देवयानी के देवयानी होने से डरने लगे थे। उसके आस-पास से खौफ़ खाने लगे थे। वे अब देवयानी को अपने कमरे की खिड़की से बहुत देर तक देखा करते थे। वह वही सब किया करती थी जैसे फूलों को छूना, शिवलिंग पर जल-पुष्प अर्पित कर बाकी जल से खुद को भिगोना, ध्यान लगाना, बच्चे के साथ खेलना। उन्हें फुर्सत कहाँ थी किसी की भी और देखने की। नहीं, नहीं..... उन्हें जरूरत कहाँ थी, किसी और की अपने संसार में। यह तो देवयानी का स्वनिर्मित संसार था और उसने वह आसमान कदाचित नहीं लिया जिसे उसे थमाया गया होगा। कालेज में चल रहे सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सेमीनारों के कारण प्रो. को कई दिनों से वक्त की कमी थी लेकिन फिर भी सोने से पूर्व वे खिड़की खोल कर देवयानी के घर की ओर नज़र डाल ही लेते थे। वह दिखाई दे जाती तो प्रो. अनिरुद्ध अनुराग के पराग कण समान हो जाते जिसका शहद देवयानी की एक झलक ले उड़ती फिर वे रात के चारों पहर अपना शहद लुटाकर भी चैन की नींद में सोते और अगर वह न दिखाई दे तो रात में चारों पहर यूँ ही बेरंग बिस्तर पर करवट लेते बिता देते।

एक दिन जब मिसेज जोन्स आयीं तो उनका जाना-पहचाना चिड़चिड़ा चेहरा गंभीर झल्लाहट में तब्दील था। ‘‘तुम्हें ऐसा नहीं सोचना चाहिए अनिरुद्ध’’ मिसेज जोन्स किसी अनहोनी के डर को छुपाने की कोशिश करते हुए बोलीं।

‘‘कैसा नहीं सोचना चाहिए? मैं कुछ समझा नहीं, आप क्या कहना चाहती हैं?’’ अपनी झूठी असमर्थता जताते हुए प्रो. ने पूछा।

‘‘अवसर चाहे तुम्हारे सामने हो लेकिन वह तुम्हारा और तुम उसके तब तक नहीं हो सकते जब तक कि तुम उसके काबिल न सिद्ध हो जाओ और कुछ अवसर किसी के मोहताज नहीं होते। वे ग़ैर ठोस कारणों के जीवन का एक महत्वपूर्ण भाग किसी एक के लिए व्यर्थ नहीं करते। वे प्रतीक्षा करते हैं शाश्वत सत्य की। अंत तक....। तुम नाहक ही इन रास्तों पर आ गये हो। तुम्हें लौट जाना होगा अनिरुद्ध!’’

मिसेज जोन्स एक ही झटके में यह क्या कह गयीं। प्रो. काफी देर सोचते रहे।

लेकिन प्रो. अनिरुद्ध, जो देवयानी को अपने कमरे की खिड़की से कई घंटों देखा करते थे अब उसे पूरी तरह से पाना चाहते थे। उसकी देह की भीनी सुगंध में युगों की धरती-आसमान पार करना चाहते थे। हम शरीर हैं, हम आत्मा हैं, हम देवयांश हैं और ईश्वर एक शून्य, अक्षय प्रकाश और एक मौन है। यह शून्य समूचा ब्रह्माण्ड, समूची सृष्टि का आदि भी है और अंत भी। यह अक्षय प्रकाश मानव सभ्यताओं का जन्मदाता है। इस धरती, आकाश, पाताल को एक साथ देख भी सकता है और सुन भी सकता है और यह मौन संपूर्ण ब्रह्माण्ड का, मानव मन का, पुरुष मन का, स्त्री मन का महासंगीत है। उसे कुछ भी कह लो। वह इन परिभाषाओं के भीतर ही है।

लेकिन यह शरीर एक और इच्छा रखता है। यह प्रेम के नाम पर देह में समाना चाहता है और निष्क्रिय कर देना चाहता है उन सख्त हुई प्रबल तमन्नाओं को जो उसे संभोग की अग्नि में जला कर फिर से एक नया शरीर बना दे। जैसे एक जलती चिता में से दूसरा नया शरीर निकले फिर दोबारा जलने पर तीसरा और फिर जलने पर चीथा। इसी तरह से जलते रहना चाहता है शरीर। संभोग के नाम पर। प्रेम के नाम पर। प्रेम के संदर्भ में क्या यह बात सोई हुई चेतनागत अवस्था नहीं प्रतीत होती। क्या देह केवल देह की ही चाहना कर सकती है?

आखिरी मुलाकात में.... हाँ, वो शायद उनकी आखिरी मुलाकात ही थी, प्रो. ने देवयानी से अपने दिल की बात कह ही दी। वैसे ही जैसे एक प्रेमी प्रेम में मदहोश होकर अपनी प्रेमिका से अपने दिल की बात कहता है, उसे बताता है कि वो उसे मिलना चाहता है और उसे लेकर भविष्य की योजनाओं के बारे में वह क्या-क्या सोचता है। देवयानी हमेशा की तरह ही सहज थी। चुप थी। बहुत देर खामोश ही रही फिर अपनी जगह से उठी और प्रो. को अपने साथ बाहर आने का आग्रह कर उन्हें घर में मुख्य दरवाजे तक ले आयी। रात काफी हो चुकी थी.......

गीली सी रात, आसमान में भीगा सा चाँद, स्लेटी, काले बादलों में लुका-छिपी का खेल खेलता। कभी ऐसा लगता कि चाँद बादलों का पीछा कर रहा है तो कभी लगता बादल चाँद को पकड़ने के लिए दौड़ लगा रहे हैं। शरारती हवा के झौंके। पत्तों पर सोई हुई शबनम की बूंदें। हर दरवाजा ऊंघता हुआ, हर घर नींद में डूबा। हर गली में दो-चार कुत्ते भौंकते हुए। हर चौराहा, गली, नुक्कड़ सोये-सोये से। अभी कुछ देर पहले ही बारिश की बौछारों ने धरती की प्यास को थोड़ा शांत किया था। मार्च के महीने में एकाध बार ऐसा हो जाता है।

‘‘प्रो....! फरवरी-मार्च महीने की रातें कितनी संदली होती है। इस मौसम में सड़कों पर लाल-संतरी बड़े-बड़े फूल गिरे होते हैं। मुझे उनका नाम तो नहीं पता लेकिन वे बड़े खूबसूरत होते हैं। जहाँ-जहाँ उन फूलों के पेड़ लगे होते हैं, सड़क के उस हिस्से पर कुदरती लाल कालीन बिछा प्रतीत होता है लेकिन दोपहर तक वह कालीन, कालीन नहीं रह जाता। वहाँ से गुजरने वाली गाड़ियाँ उन फूलों को मसल-मसल कर लहू-लूहान कर देती हैं। तब सड़क का वह लाल कालीनी हिस्सा ऐसा लगता है जैसे उस पर खून बिखरा पड़ा हो। डरावना। एकदम डरावना। फिर वह खून अचानक हवा में बूंदों के रूप में उड़ने लगता है। फिर उसकी दर्दनाक चीखें सुनायी पड़ती हैं फिर वह गुस्से में सब पर गिरने लगता है। हर चीज लाल और भयानक हो जाती है फिर सब कुछ खून-खून करने के बाद धीरे-धीरे वो खून की बूंद शांत होकर वापस मसले फूलों पर आ जाती हैं और धीरे-धीरे उन्हीं फूलों के भीतर समाने लगती है फिर एक-एक कर सड़क पर गिरे सभी फूल वापस पेड़ की शाखाओं पर लग जाते हैं फिर वो शायद गिरने की चाह नहीं रखते होंगे। न धरा से मिलन की आस रखते होंगे।

‘‘मिलन.... हाँ अनुराग! मैं तो यहीं थी, तुम कहाँ थे? मैं तो तुम्हारा ही इंतज़ार कर रही थी’’ प्रो. हैरानी मिश्रित उलझन से देवयानी के पत्थर हुए चेहरे की ओर देखने लगे। देवयानी पता नहीं कहाँ देख रही थी।

‘‘कोई बार-बार खून से लथपथ थोड़े ही होना चाहता है।’’

यह कहती हुई देवयानी वापस घर की ओर मुड़ गयी। बगीचे में फैली रोशनी में प्रो. ने देखा कि देवयानी का सफेद कुरता लाल छींटो से पूरा भर गया है। गीली सी रात, भीगा सा चाँद हर दरवाजा ऊंघता हुआ, हर घर सोया हुआ। सब सोये-सोये से। अभी कुछ देर पहले ही बारिश की बौछारों ने धरती की प्यास को थोड़ा शांत किया था। मार्च के महीने में एकाध बार ऐसा हो जाता है।

प्रो. अनिरुद्ध को लगा जैसे वे कुछ कहना चाहते हैं लेकिन.... दरवाजा बंद हो चुका था। प्रेम, देह का समागम, सांसारिकता की दुविधा, काल चक्र, माया सब विस्मय से खड़े थे। आगमन से निर्वासन तक और निर्वासन से स्थापन तक लेकिन अनन्त के प्रलयकारी सत्य में सब देवदूत के इशारों पर नृत्य करने लगे और चेतना का आदि संगीत गूँज उठा...

आस्था-
प्रार्थना-
आत्मचिंतन-
सौंदर्य-आकर्षण-
सत्य -

सब मिलकर एक ही रूप में समा जाते हैं जिसे प्रेम कहते है।। यही सत्य है यही ॐ है....

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