गुरुवार, दिसंबर 08, 2016

विवेक मिश्र के दर्द की पहचान है 'और गिलहरियाँ.. '



रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार 2016 सम्मानित कथाकार विवेक मिश्रा (फ़ोटो © भरत तिवारी) 



बेशक हिंदी साहित्य की दुनिया में कुछ न कुछ ऐसा चल रहा है, जिसके कारण गुटबंदी में लगातार बढ़ोतरी होती दिख रही है। पहले जहाँ ये गुट बहुत कुछ साहित्यिक प्रतिस्पर्धा के चलते बन रहे होते थे, वहीँ अब वर्तमान परिवेश और उसके चलते हो रहे ध्रुवीकरण ने इन खेमबाजियों के फलक को बढ़ा दिया है। ‘रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार’ हिंदी साहित्य में अपनी चुनी हुई कहानी की गुणवत्ता और विश्वनीयता के कारण एक विशेष स्थान रखता है और इस ध्रुवीकरण के बीच 6 दिसम्बर की शाम 'गाँधी शांति प्रतिष्ठान' में हुए इस कार्यक्रम में साहित्यकारों की उपस्थिती और संवाद के स्तर से एक आस्वस्ति का अनुभव हुआ।

दिनेश खन्ना (फ़ोटो © भरत तिवारी) 

सम्मानित कथाकार विवेक मिश्र ने अपने वक्तव्य को पढ़ते हुए जब कहा “हम साहित्य विरोधी समाज में जी रहे हैं फिर भी ऐसे आयोजन लेखक के लिए ऑक्सीजन का काम करते हैं” मुझे उस समय इसी ध्रुवीकरण की आहट सुनायी दे रही थी। सम्मानित कहानी ‘और गिलहरियां बैठ गईं’ के विषय में विवेक मिश्र ने कहा “इस कहानी को पढ़ा जाना मेरे दर्द को पहचान लिया जाना भी है। मेरा बनना बिगड़ना ही इस कहानी का बनना बिगड़ना है।" 


विश्वनाथ त्रिपाठी (फ़ोटो © भरत तिवारी)

रमाकांत जी को याद करते हुए, वरिष्ठ आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी ने बताया “रमाकान्त ने कभी किसी से अपनी पुस्तक की समीक्षा की सिफ़ारिश की हो यह नहीं हो सकता, यदि कोई ऐसा कहे तो मैं उसे झूठ मानूँगा”। रमाकान्त के मित्र त्रिपाठीजी अपनी यादों को साया करते हुए भावुक होते रहे। रमाकान्त जी को उनके जीवनकाल में उचित सम्मान न मिल पाने पर वो बोले “रमाकान्त तो चले गए, मैं बचा रह गया”। 


विश्वनाथ त्रिपाठी व मैत्रेयी पुष्पा (फ़ोटो © भरत तिवारी)

वरिष्ठ कथाकार संजीव ने विवेक मिश्र के लेखन पर बोलते हुए कहा, “जादुई यथार्थवाद के मुहावरे को पकड़ने के लिए विवेक को कहीं दूर जाने की जरूरत नहीं पड़ी, वह अपने समय की नब्ज को कहानी में जहां तहां टटोल रहे हैं।"


रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार: बाएं से - महेश दर्पण ,सुशील सिद्धार्थ, विवेक मिश्रा, संजय सहाय, विष्णुचंद्र शर्मा, संजीव, विश्वनाथ त्रिपाठी, मैत्रेयी पुष्पा व दिनेश खन्ना (फ़ोटो © भरत तिवारी)


मंच से बोलने वालों में विष्णुचंद शर्मा, संजय सहाय, दिनेश खन्ना, सुशील सिद्धार्थ, मैत्रेयी पुष्पा शामिल थे कार्यक्रम का सञ्चालन पुरस्कार-संयोजक महेश दर्पण ने किया। 

भरत तिवारी


विष्णुचंद्र शर्मा (फ़ोटो © भरत तिवारी)



विवेक मिश्र का पूरा आत्मकथ्य

‘और गिलहरियाँ बैठ गईं...’ को पढ़ा जाना मेरे दर्द को पहचान लिया जाना भी है...



‘और गिलहरियाँ बैठ गईं...’ को लिख पाना, उसका ‘हंस’ में छपना और पाठकों से होते हुए ‘रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार’ तक आना, मेरे लिए मेरे भीतर के एक अनकहे दर्द के पहचाने जाने जैसा है. क्योंकि यह वो कहानी है जो शायद मैं कभी लिखना नहीं चाहता था और जानता था कि यही वो कहानी है जिसे लिखे बिना मैं रह नहीं पाऊंगा. यह कहानी तब से ज़हन में थी जब कहानियाँ लिखना तो क्या उन्हें ठीक-ठीक पढना और समझना भी नहीं सीख पाया था. पर जब कहानियाँ लिखना शुरू किया तो इसका लिखना लगातार स्थगित होता गया. और वो इसलिए कि इस कहानी के भीतर की चुप्पी को काग़ज़ पर उतार सकनेवाली भाषा मेरे पास नहीं थी. इसमें घर-परिवार और शहर के साथ इतनी परछाइयाँ घुली-मिली थीं कि जब भी मैं उन्हें बिलगाने बैठता, तो मैं ख़ुद ही उनमें उलझ जाता. इसलिए शायद अपनी हर कहानी लिखते हुए मैं ‘और गिलहरियाँ..’ लिखने के लिए थोड़ा-थोड़ा तैयार हो रहा था. जिन लोगों ने मेरी और कहानियाँ पढ़ी हैं तो वे इसे ‘गुब्बारा’ और ‘दोपहर’ की अगली कड़ी के रूप में भी देख सकते हैं.

स कहानी पर बात करने के लिए मुझे आपको बीते समय में लगभग तीस-पैंतीस साल पीछे और स्थान में दिल्ली से झाँसी ले चलना होगा... तभी आप समझ पाएंगे कि कैसे मेरा बनना-बिगड़ना ही इस कहानी का बनना बिगड़ना भी है…

…झाँसी में क़िले की दीवार से सटी खड़ी है पुरानी कोतवाली जिसके सामने से नीचे उतरती ढलान को टकसाल कहते हैं। राजे-रजवाड़ों के समय में यहाँ किसी इमारत में सिक्के बनते थे। यह ढलान अपने दोनो ओर बीसियों सँकरी गलियों में बंटकर पुराना शहर बनाती है। एक ऐसा शहर जो सालों से पुरानी दीवारों और बड़े-बड़े फाटकों से घिरा है। पिता जी बताते थे हमारा पुराना घर इसी ढलान पर कहीं था। पर किसी बुरे समय में टकसाल से दूर वह शहर के पूर्बी फाटक के पास वाली गली के कई सालों से बन्द रहे आए एक पुराने ढब के मकान में रहने चले आए थे। ये गली, ये मोहल्ला जैसे शहर के आम और ख़ास के बीच की लकीर था। मैं, सन सत्तर में यहीं, इसी लकीर पर पैदा हुआ।

एक जगह जो कसबे जैसी थी पर शहर कहलाती थी और पिताजी जो खेती करना चाहते थे पर रेलवे में नौकर हो गए थे के मिलेजुले असर से हम जो अपनी भाषा और साहित्य पढ़ना चाहते थे, आने वाले समय से डरे हुए, विज्ञान पढ़ते हुए बड़े होने लगे थे। वहाँ लिखने-पढ़ने का वातावरण लगभग न के बराबर था पर किस्से-कहानियाँ जैसे वहाँ की आबोहवा में घुले थे। हर तीज-त्यौहार, हर उत्सव-अवसाद, बल्कि कहें कि जीवन के हर मौसम, हर मौके के लिए एक कहानी थी। हम गली के एक चबूतरे से दूसरे पर यही गाते हुए कूदते थे, 'आमौती-दामौती रानी, सुनो-सुनाएं बात सुहानी, जगत बोध की एक कहानी, हूंका देओ तो कथा कहें, न देओ तौ चुप्प रहैं।'

यूँ ही खेलते-कूदते कई कहानियाँ मन में घर करती जा रही थीं। पर इन ऐतिहासिक और पारम्परिक किस्सों से अलग मेरे कान में पड़ी
पहली सच्ची कहानी वह कन बत्तू थी, जो मैंने झाँसी से पचास मील दूर अपनी ननिहाल, तालबेहट में खेतों में खेलते हुए, नाना के यहाँ बटिया मजदूर की बेटी हनियां से सुनी थी। वह गजब की किस्सागो थी। 
वह कहती थी कि जब में रात में किस्सा सुनाती हूँ तो आदमी तो क्या पेड़-पौधे तक हुंकारा भरने लगते हैं। एक शाम उसने मुझे कान में फुसफुसाते हुए बताया था, ‘जानते हो! जब तुम दिन भर खेल कर साँझ ढले अपने पक्के मकान में लौट जाते हो, तब इस खेत में आसमान से एक जिन्न उतरता है और उस समय मैं खरारी खाट पर, अपने बापू के साथ लेटी हुई, उसे आसमान से उतरते हुए देखती हूँ। जब मेरा बापू बीमार होता है और देर रात तक ज़ोर-ज़ोर से खांसता है, तब वह जिन्न जल्दी-जल्दी खेतों में काम करता है। वह गेहूँ की बालियों को छूकर उन्हें बड़ा कर देता है। फिर वह अपनी काली चादर हिला कर मुझे और मेरे बापू को पंखा झलता है, जिससे बापू की खांसी शान्त हो जाती है और वह सो जाता है, फिर मैं उस जिन्न की पीठ पर बैठ इन खेतों पर उड़ती हूँ, जो रात को मेरे होते हैं, सिर्फ मेरे, पर सुबह होते ही यह तुम्हारे हो जाते हैं और वह जिन्न गायब हो जाता है और मैं रह जाती हूँ, हनियां, कन्नू माते की बिटिया, जो खजूर के पत्तों से पंखा और डलिया बनाती है, छेओले के पत्तों से दोने-पत्तलें बनाती है, जिसे छू लेने भर से तुम अपवित्र हो जाते हो और तुम्हारी नानी तुम पर घड़ों पानी उड़ेल कर तुम्हें स्नान कराती हैं और तुम्हारी नज़र उतारती हैं।’ उसकी बातों ने हमारे आसपास खड़ी उन दीवारों के बारे में बताया जो उस समय हमें दिखाई नहीं देती थीं।

बड़े होने पर वे दीवारें साफ़ दिखने लगीँ


तब सोचा भी नहीं था कि एक दिन बुन्देलखण्ड के गाँव, कसबों और शहरों के किस्सों में भटकती ये ज़िन्दगी उस महानगर में जाकर टिकेगी, जो देश की राजधानी भी है। वे नब्बे के दशक की शुरुआत में, मुफ़लिसी और बेरोजग़ारी के दिन थे जब काम की तलाश में, मैं झाँसी से दिल्ली आया था। तब बड़े ज़ोरों से कहा जा रहा था कि उदारीकरण से बाज़ार के नए रास्ते खुल रहे हैं। इससे बेरोज़ग़ारी दूर होगी, मंहगाई पर नियन्त्रण होगा, सबको रोज़ग़ार के बराबर अवसर होंगे। देश पूरी तरह बदल जाएगा। पर इन सब बातों की तनिक-सी भी रोशनी हमारे घर-गली या गाँव तक नहीं आ रही थी। हमने वाणिज्य, अर्थशास्त्र या सूचना प्रोद्योगिकी जैसे विषयों की पढ़ाई नहीं की थी। उस समय जितना, जो कुछ पढ़ा था, धनाभाव और तगडी पैरवी के बिना, उससे अपना काम शुरु करना या कोई नौकरी हासिल करना, आसान नहीं था। संगी-साथियों में जो सयाने थे और जिन्होंने समय की नज़ाक़त भाँप ली थी वे बीजा-पासपोर्ट की जुगाड़कर विदेश भागे जा रहे थे। तभी हमने एक बात और जानी थी कि जाने-अनजाने बचपन के किसी क्षण में, हमें हमारी भाषा और मिटटी के मोह ने जकड़ लिया था। हम किसी भी तरह उससे मुक्त नहीं हो पाए थे। हमें इसी देश में अपनी इसी भाषा में ही कुछ करना था और साथ ही एक संकट और था और वो ये कि ऐसे समय में जब सब कहीँ भागे जा रहे थे और कोई किसी की नहीं सुन रहा था हमें सपने देखने और किस्से सुनाने की लत लग चुकी थी पर इन किस्सों से जुड़ा एक दूसरा पहलू भी था और वो ये कि जब सारी योजनाएं यथार्थ की ठोकर खाकर, मुँह के बल गिर रही थीं, संभावनाओं के बीज अंकुरित होने से पहले ही पाँव सिकोड़ने लगे थे, उस समय में ये किस्से हमारे जीवन में संजीवनी का काम कर रहे थे। यूँ कहें कि हमारे
 सपनो की ज़मीन को बचाए रखने में किस्से ही हमारा एकमात्र सहारा थे।

समझिए कि इन्हीं की दम पर हम दिल्ली में आ टिके। टिके तो सही, पर रमे नहीं। झाँसी छूटा तो घर भी पीछे छूट गया। रह गया तो बस घर का सपना। बचपन की शरारतें, दोस्तों के ठहाके धीरे-धीरे गुम होते गए। अस्तित्व की, रोज़गार की लड़ाई दिनो-दिन तेज़ होती गई। भीतर की ख़ामोशी बाहर के शोर से संतुलन बैठाती रही। इस बीच लिखना नहीं हुआ, पर उसके लिए ज़मीन तैयार होने लगी थी। इस समय में कुछ छोटे-मोटे लेख लिखे। अपने ही टूटने-जुड़ने की कुछ कविताएं लिखीं। सात-आठ साल ऐसे ही दिल्ली में डूबता-उतराता रहा। कई वृत्तचित्रों के निर्माण में शामिल हुआ। नाटक लिखा, संवाद लिखे और कुछ गीत और ग़ज़लें भी। कुछ मन से लिखा, कुछ बेमन से।

इसी बीच पिताजी चल बसे


उनकी मृत्यू के बाद घर से जुड़ी डोर जैसे टूट-सी गई। एक खालीपन जो बचपन से मेरे भीतर घर किए बैठा था उसने जैसे बाहर निकलकर मेरे व्यक्तित्व को ढक लिया।

उधर अस्थाई नौकरी, छोटी तनख़्वा, फ्रीलॉन्स राइटिंग के बीच, ज़िन्दगी के रास्तों पर हवाएं उल्टी ही चलती रहीं। बाहर उनसे जूझता रहा और भीतर सच्चाई और कल्पना में संतुलन बैठाता हुआ किताबों की दुनिया में कभी उनके भीतर और कभी उनके बाहर भटकता रहा। कहीं सच्चाई जीती, तो कहीं कल्पना, पर इस कशमकश ने पहली कहानी लिखवा ही ली। और वो थी, पिता की मौत पर लिखी गई कहनी ‘गुब्बारा’। वहीं, उसी समय लगा कि कभी ये कहानी भी होकर रहेगी लेकिन उसका नाम क्या होगा.., वह कैसी बनेगी, तब यह नहीं सोचा था.

शब्दों के इस समुंदर में उतरते हुए डर भी लगा क्योंकि किश्ती में पहले से ही कई छेद थे, विज्ञान का विद्यार्थी था, व्याकरण की, वर्तनी की बीसियों गलतियाँ करता था, पर लेखन से दूर, किनारे पर बैठ कर भी कोई खास चैन नहीं था, सो चल ही पड़े। लगा इससे भीतर की बेचैनी थोड़ी कम होगी, पर जब अपने घर, गली, गाँव, नहर और आस-पास के ताल-तलैयों को, अपनी माटी की लोक कथाओं को मन में लिए इस राह पर चलना शुरु कर रहा था तो नहीं जानता था कि बचपन से किलों, महलों और परकोटों के शहर में रह कर भी मेरे मन में जो कहानियाँ बस रही थीं, वे इन सबसे अलग किसी भयावह सन्नाटे की अनकही कहानियाँ थीं, जो अपने समय में पूरी नाटकीयता के साथ घटित होने के बाद भी, कहीं दर्ज़ नहीं हुई थीं। उस समय की उस बेचैनी ने ‘हनिया’ लिखवा ली. लगा कि भाषा, शिल्प जैसा भी हो पर समाज का ये सच जिस रूप में मैं इसे जानता हूँ, इसे ऐसा ही लिखा जाना चाहिए.

इन कहानियों से जूझते हुए बार-बार रीतता, फिर-फिर भर आता। जान नहीं पाता कि रीतने के लिए लिखता हूँ, या रिक्त हूँ इसलिए कहानियाँ बे रोक-टोक बही आती हैं। पर एक बार जब ये कहानियाँ भीतर प्रवेश करती हैं तो लगता है कि यह सब मेरे अपने ही जीवन की कहानियाँ हैं। शायद मन के गहरे कुंए के भीतर ही कहीं कुछ ऐसा है जिससे कोई घटना, कोई व्यक्ति, कोई परिस्थिति ऐसे पकड़ लेती है कि उससे छूट पाना मुश्किल हो जाता है। लगता है उससे कोई पुराना रिश्ता है। दिल-दिमाग़ उसके भीतर से कुछ ढूँढकर शायद अपने ही अधूरेपन को पूरा करने की कोशिश करने लगता है।

……और यह आज से नहीं है, ऐसा तब से है जब मैं नहीं जानता था कि मैं कभी कहानियाँ भी लिखूंगा। मैं बचपन में मीलों-मील फैले निचाट ऊसर मैदानों में, जहाँ इंसान और पेड़-पौधे तो क्या उनके साबुत कंकाल तक नहीं होते थे, अकेले छूट जाने के सपने देखता था। उस मैदान का भयावह सन्नाटा और उससे उपजा भय अभी भी मेरे भीतर बैठा है। उस सपने से बाहर निकलने के लिए मैं बहुत ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाता था। बहुत देर बाद, मेरी गुहार सुनकर जवाब में जो आवाज़ आती थी, वह एक स्त्री की आवाज़ थी। बहुत साधारण-सी। उसमें तनिक भी सपने जैसी भव्यता नहीं थी। वह बिलकुल रियल लगाती थी. कहती थी, 'तुम जल्दी ही इस स्वप्न से मुक्त हो जाओगे। जब तुम इस मैदान को पार कर लोगे, तो मैं तुम्हें सामने खड़ी मिलूंगी, फिर मैं तुम्हें इस भयावह स्वप्न में जहाँ तुम नितान्त अकेले होते हो, वापस नहीं जाने दूंगी।' फिर मैं बेतहाशा भागते हुए उस मैदान को पार करने की कोशिश करता था। न वह मैदान कभी ख़त्म हुआ, न मेरी उसे पार करने की कोशिश।

हाँ, अब उस स्त्री की आवाज़ सुनाई नहीं देती। मैं अक्सर लोगों की भीड़ में उस आवाज़ को ढूँढता हूँ। हर आवाज़ को उसी आवाज़ से मिलाकर देखता हूँ। कई बार लगता है, 'हाँ, यह वही है' पर फिर भरम टूट जाता है।

बचपन के उस सपने ने मेरे भीतर एक कभी न भरी जा सकने वाली रिक्तता पैदा कर दी। मुझे लगता है कि यह रिक्तता, यह अधूरापन किसी में कम, किसी में ज्यादा हम सभी में होता है।… और हम सारी ज़िन्दगी उसी को भरने की कोशिश में लगे रहते हैं। यह रिक्तता, यह खालीपन खासतौर से उस आदमी में जो इसे किसी पूर्व प्रस्तुत चीज से नहीं, बल्कि अपने ही रचे-सृजे, देखे-समझे, अनुभूत किए से भरना चाहता है, जो भौतिक धरातल पर खड़ा होकर, वर्तमान में अपनी आँख से इस दुनिया को जितना देख पाता है, उससे कहीं ज्यादा उसे देखना चाहता है- जो अभी तक अनदेखा है, अव्यक्त है. यह बात उसके इस सफ़र को और भी मुश्किल बना देती है। इसके लिए जहाँ-जहाँ वह सशरीर उपस्थित हो सकता है, वहाँ जाता है, भटकता है, स्पर्श करता है, अनुभव करता है, सोखता है, पर कई बार अपनी आँख, अपना स्पर्श, अपना अनुभव- उस रिक्तता को भरने के लिए कम पड़ जाता है। एक समय बाद ख़ुद की योग्यता तुच्छ जान पड़ती है। ख़ुद का साहस लघु दीखता है, तब दूसरों के मन के भीतर, उनके जीवन के भीतर झांकना होता है, उन्हें टटोलना, खंगालना होता है, पर जब उससे भी वह प्यास नहीं बुझती, वह रिक्तता नहीं मिटती, तब कल्पना में एक अलग जीवन गढ़ा जाने लगता है, पर कल्पना भी अथाह नहीं, अनन्त नहीं, वह भी एक सीमा के बाद चुकने, टूटने और खण्डित होने लगती है। ऐसी स्थिति ही एक रचनाकार के लिए सबसे कठिन और असह्य होती है। पहले मैं इसे अपनी कमजोरी समझता था पर बाद में असह्यता ने, इस बिखराव ने एक अलग भाषा दी, संशय की भाषा और इसी डर ने इससे निकलने का एक अजीबोगरीब रास्ता भी दिखाया, और वह ये कि- एक आदमी कोई एक जीवन जीते हुए, उसे देखते हुए, एक और जीवन जीने लगता है। जैसे एक धुरि हो और दूसरा उसके चारों ओर घूमता पहिया। हालाँकि यह आसान नहीं, पर एक रचनाकार के लिए मुश्किल भी नहीं। क्योंकि भीतर की रिक्तता को भरने की कचोट इतनी असहय है, जो उसे जीवन में किसी करवट चैन नहीं लेने देती। इस रिक्तता को भरने की सतत कोशिश से ही कोई नया अनुसंधान संभव हो सकता है, पर वह कुछ बना ही दे, ये आवश्यक नहीं, वह बना हुआ मिटा भी सकता है। अपने भीतर की इस रिक्तता को जानने-समझने-महसूस करने में, इस खाली जगह को भरने में मेरा जितना बना है, उससे ज्यादा मिटा है। कई बनी हुई धारणाएं टूटी हैं, कई मान्यताएं, स्थापनाएं ध्वस्त हुई हैं, कई रिश्तों का स्वरूप बदला है। शायद इसीलिए मेरी शुरु की कहानियाँ अपने और अपने आस-पास बीतते समय के अनुभव के गिर्द, यथार्थ को केन्द्र में रखकर लिखी गई कहानियाँ हैं। पर यथार्थ के इस आग्रह ने कई स्थानों पर, सच के भीतर के सच के ऊपर एक पर्दा डाल दिया था। तब उससे आगे की कहानियों में मैंने उस पर्दे के पार देखने के लिए, सच के भीतर के सच को जानने और उजागर करने के लिए, आँखें बंदकर ली हैं और मेरा यक़ीन मानिए अब मैं बिलकुल साफ़-साफ़ देख पा रहा हूँ। जो बहुत दूर दिखाई देता था, पहुँच से बाहर था, अब मेरी जद में है, पर अभी भी उसके सत्य होने, या न होने का संशय बना हुआ है। और इस संशय से बाहर आने का कोई रास्ता नहीं दिखता, बस समझिए कि इसी संशय की कहानियाँ लिख रहा हूँ। या कहूँ कि बचपन के उस सपने में दूर तक फैले मैदान को पार करने की कोशिश कर कर रहा हूँ।…और इन्हें लिख पाने के लिए जिस आन्तरिक मज़बूती और निर्भीकता की ज़रूरत है, उसको पाने के लिए मैं अपने भीतर और बाहर, रोज़ एक आधी-अधूरी, एक हारी हुई-सी कोशिश करता हूँ। मेरी कहानियों में वह कोशिश कितनी दिखती है, कह नहीं सकता। शायद अब जब आप ‘और गिलहरियाँ बैठ गईं...’ को फिर कभी पढ़ेंगे तो उअसमे कहीं उस कोशिश को देख सकेंगे।

‘रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार’ के निर्णायक श्री दिनेश खन्ना जी, सयोजक महेश दर्पण जी एवं रमाकांत जी के परिवार का मेरी कहानी को इस योग्य समझने और यह आयोजन करने के लिए ह्रदय से आभार. कोशिश करूंगा कि आप सबने मेरी रचनात्मकता में जो भरोसा किया है मैं आगे भी उसे बनाए रख सकूँ..


विवेक मिश्र
123-सी, पॉकेट-सी, मयूर विहार फेस-2, दिल्ली-91
मो:-09810853128


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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