उषाकिरण खान की कहानी 'गाँव को गाँव ही रहने दो'


Gaanv Ko Gaanv Hi Rahne Do

Usha Kiran Khan Ki Kahani

राजेन्द्र बाबू के पास खड़े होते ही नीरो देवी ने धरती पर तीन बार माथा टेका, धीमें स्वर में कहा — ‘‘गोर लागऽतानी भइया’’
वरिष्ठ कथाकार उषाकिरण खान कहानी 'गाँव को गाँव ही रहने दो' 

उषाकिरण खान की कहानी 'गाँव को गाँव ही रहने दो' Usha Kiran Khan Ki Kahani


गाँव को गाँव ही रहने दो: एक अतीन्द्रिय कहानी 

— उषाकिरण खान


चाँदनी छिटकी है चहुँ ओर दो दिनों से मेघ उमड़—घुमड़ रहा है पर जेठ की पूनो तिमिर का सीना चाक कर अपनी उपस्थिति दर्ज कर रही थी। उमा बहू लाठी टेकती तालाब के मुहाने पर पहुँच गई थी। नीरो देवी एक अपेक्षाकृत जवान स्त्री के कंधों पर हाथ रखे चली आ रही थी। उमा बहू ने स्मित हास्य से उन्हें देखा। चाँदनी इतनी शफ्फाक है कि उनकी सफेद झुर्रियों की एक एक रेखा साफ दीख रही है। मुस्कुराहट से खिले ओठ और पोपले मुख के भीतर छटपटाती जीभ तक साफ दीखती। तालाब की पक्की सीढ़ी तक पहुँच कर लाठी हौले से रखा और साड़ी समेट कर बैठ गई। घूंघट पहले ही सरका लिया था अब पूरा कपाल अनावृत्त था। नीरो देवी और रीता भी पास आकर बैठ गई थी। दोनों वृद्धाओं की हॅंफनी कम हुई।

‘‘आज नहीं लगता था कि हम मिल पायेंगे।’’ — नीरो देवी ने कहा।

‘‘मेघ तो आकाश को घुड़दौड़ का मैदान बनाकर अभी भी दौड़ रहे हैं।

देखो। ‘‘—उमा बहू ने कहा।

‘‘हाँ ठकुराइन, कब बरस पड़े कौन जाने। अगली पूनो को मिल न पायें रास्ते सारे डूबे जायेंगे। तो लीजिये, हम अपना शौक पूरा करें।’’ — नीरो देवी ने कुरती की जेब से माचिस और ढोलक छाप बीड़ी का बन्डल निकाला। काले छींट की कुरती और सफेद छींटदार साड़ी पहन रखी थी नीरो देवी ने। रीता ने सलवार समीज पहना था। वह भी काले छींट का था। नीरो जीरादेई की बेटी है। चौदह बरस की बाली उमर में उसकी शादी हुई थी। दूल्हा सत्रह साल का था। छपरा हाई स्कूल में पढ़ता था। बाइसी रोग में चल बसा। एक बार ससुराल गई थी नीरो। अभी दोड़ा नहीं हुआ था। बाल विधवा हो गई। गरीब कायस्थ की बेटी थी पिता राजेन्द्र बाबू के घर में एक प्रकार से मुंशी थे। हिसाब किताब रखते थे। नीरो भी उनके ही घर में रहती थी। उन दिनों अधिकतर स्त्रियाँ गांव में थीं, नीरो उन्हीं के घर में लिपटी रहती। सिलाई कढ़ाई और अन्य घरेलू कार्यो में मदद देती। उमाकान्त सिंह के शहीद होने के बाद जो जनसमुह नरेन्द्रपुर में उमड़ा था उसके साथ नीरो भी थी। अपनी पीड़ा से दुःखी नीरो उमा बहू के पास चली आई। वे बार-बार बेहोश हो जा रही थी, एक तो पन्द्रह साल की छोटी उम्र में माँ बनना दूसरे यह वज्राघात। उन्हें अपने पति के जाने को उत्सव समझ में नहीं आ रहा था — ‘‘जब तक सूरज चाँद रहेगा, उमाकान्त तेरा नाम रहेगा।’’



वे एक सामान्य विधवा नहीं थीं जिसकी चूड़ियाँ, तोड़ी जा रही थी, सिन्दूर मिटाये जा रहे थे। यह तो होता ही था, नीरो सब की गवाह थी, वह इस प्रक्रिया से गुजर चुकी थी। लेकिन जीरादेई की होने के नाते उसे पता था कि उसके पति की मृत्यु और शहीद हो जाने में बड़ा फर्क है। उमा बहू के प्रति आकर्षण था जो प्रतिदिन नीरो भागी-भागी आ जाती। धीरे-धीरे सहेलियापा बढ़ गया। वही सहेलियापा बरकरार है आजतक।

‘‘लाओ, सुलगाओ, महीने में एक दिन हम शौक पूरा करती हैं। घर में तो हुक्का चलता है।’’ — उमा बहू ने कहा।

‘‘हुक्का ? अभी भी चलता है ?’’ — यह रीता थी जो पहली बार कुहुकी। रीता नीरो के भाई की बेटी है। नीरो के छोटे भाई बब्बन की छः बेटियों में सबसे छोटी। पांच बहनों की जैसे तैसे शादी कर दी थी बब्बन ने, रीता की न कर सके। रीता ने बी.ए. तक पढ़ लिया था, गांव के सरकारी स्कूल में शिक्षिका हो गई थी। एक दुर्घटना में बब्बन और उसकी पत्नी गुजर गये। तब से नीरो और रीता एक दूसरे के सहारे है।

‘‘अरे नहीं रे, चलता था, हम छुपा के बीड़ी मंगाते और पीते। एक बार सासु मां ने देख लिया तब पूरा बन्द। छौ-महीने तक पेट फूल जाता फिर धीरे-धीरे सब ठीक हो गया। रीता ने माचिस जलाकर दो बीड़ियाँ सुलगाकर दोनों वृद्धाओं को थमा दिया।

‘‘सिगरेट का जमाना है चाची, ई बीड़ी काहे पीती हो ?’’

‘‘तुम तो दोनों में से कुछ नहीं पीती हो, तुम्हें क्या पता कि किसका स्वाद कैसा होता है, बीड़ी में सोंधी सुगंध होती है।’’ — नीरो देवी ने कहा। रीता हॅंस पड़ी।

‘‘ऐ छोकरी, ठहाके न लगा गांव के लोग सुनेंगे तो ? रात निसबद्द है दूर तक आवाज जायेगी। चुप बैठ।’’

‘‘क्या होगा, समझेंगे कोई चुड़ैल है।’’ — दोनों वृद्धा में इतमीनान से बीड़ी के कश लेकर धुँआ उड़ाने लगी। रीता चाँदनी में बौराई सी इधर-उधर फिरने लगी। एक छोटे से ढेले को उठाकर पानी में फेंका ‘छपाक’ — बॅूंदे उछली रूपहली होती हुई, पुनः समतल में विलीन हो गई, लहरें उठीं, जुम्बिश खाकर सतर हो गई। दोनों बूढ़ी रीता को कभी तालाब को देखती बीड़ी का आखिरी कश लेने लगीं।

‘‘ठकुराइन, अन्दर से सब कुछ खोखला सा लगता है, हौलाफ कब टपक जाउॅं नहीं पता। इस रिरिया का का होगा ? सोचती हूँ।’’

‘‘अपनी उमिर वैसी ही है मुंशियाइन, का करें।’’

‘‘मेरी छोड़ो दादी, अब जरा बैठो संभल के पश्चिम कोने से बाबूजी और नटवर काका चले आ रहे हैं।’’ — रीता ने धीमें से कहा। दोनों वृद्धायें संभलकर बैठ गई। मुंशियाइन ने आँचल कपाल तक खींच लिया, उमा ठाकुराइन ने लगभग घूंघट ही निकाल लिया। सामने पश्चिम कोने से सफेद बुर्राक धोती गोलगंजी में बाबूजी और सफेद पैन्ट शर्ट में नटवरलाल चले आ रहे हैं। रीता के शरीर में सिहरन व्याप गई, रोम रोम कंटकित हो उठा।

‘‘रीता, तुम्हारे बाबा नहीं आये इनके साथ।’’ उमा ठकुराइन का उदास स्वर सुनाई दिया।

‘‘मैं यहाँ आपसे पहले से आकर बैठा हूँ दुल्हिन।’’ — ठाकुर साहब की धीमी गंभीर आवाज सुन तीनों जनी इधर उधर देखने लगीं। ठाकुर साहब हौले से हॅंस पड़े। हॅंसी की आवाज का अनुसरण करने पर देखा कि इनसे थोड़ी दूर पर ठाकुर उमाकान्त सिंह आलती पालती मार कर बैठे हैं। उन्होंने सफेद कमीज और पाजामा पहन रखा था। उनके सर पर पगड़ी थी और गले में पड़ी शिवगेंदा की ताजा माला। वही माला जिसे आज ही डॉ. राजेन्द्र प्रसाद माध्यमिक विद्यालय के बच्चों ने पहनाया था। प्रत्येक ग्यारह अगस्त को स्कूली बच्चे तथा शिक्षक आते, कुछ भाषण इत्यादि होते और मालायें पहनाकर मानों शहीदों को याद करने की ड्यूटी पूरी करते। कुछ मालायें मनबढ़ू बच्चे उतारकर पहन लेते, एक जरूर छोड़ देते। वही माला सूखकर झरने तक इनके गले की शोभा बढ़ाती। ग्यारह अगस्त के बाद पन्द्रह अगस्त को भी भूले बिसरे नागरिक चले आते हैं। मुखिया सरपंच या ब्लॉक के अधिकारी माला पहनाने का अपना कर्तव्य पूरा कर जाते हैं। तब संगमर्मर की उनकी मूर्ति धो धाकर साफ शफ्फाक कर ली जाती है। घेरे में लगी फूलों की क्यारियाँ साफ कर दी जाती। क्यारियों में सदाबहार शिवगेंदा और तिउड़ा फूल लगा होता है जिसे हर साल लगाने की जरूरत भी नहीं होती। स्वयं उसके बीज झड़कर पुनर्जीवन प्राप्त कर लेते। घेरे में लगे अमलतास को गाय भैंस बाहर से चरने की कोशिश करता पर वह बढ़ता और फैलता ही रहा। अमल्तास की उपस्थिति जोरदार है। जब वह फूलता है तब मुर्तिवत् उमाकान्त सिंह को लगता है वे ही दूल्हा बन बैठे हैं। फूल की पीली लड़ियाँ बेहद कोमल सेहरा है जिसके स्पर्श को वे तरसते होते हैं। पत्थर की मूरत न हिल पाते न डोल।

राजेन्द्र बाबू के पास खड़े होते ही नीरो देवी ने धरती पर तीन बार माथा टेका, धीमें स्वर में कहा — ‘‘गोर लागऽतानी भइया’’

’’सभे ठीक बा नू?’’ — भइया ने आशीष दिया।

‘‘अपने के असीस बनल रहे, का कहें सब समझते ही हैं।’’ — नीरो देवी ने कहा। आजकल जीरादेई के घर की देखभाल सरकार कर रही है। सरकार में बहुतै महकमा है तो बिल्डिंग बचाने वाली महकमा ही देखभाल कर रही है। एक महकमा फूलपत्ती भी देखता है। कुल ठीके बा। नीरो सोचती है, बाबू भैया समझ जाते हैं।

‘‘तुम क्या चाहती हो नीरो, हम सब देख समझ रहे हैं, तुम लोगों की उदासी, तुम्हारी विपदा पर कुछ कर नहीं सकते हैं। जब किसी के मन को नहीं बदल सकते तो तन की कौन कहे।’’

‘‘बाबूजी आप चाहे तो जरूर बदल सकता है।’’ — नटवर लाल ने कहा

‘‘कैसे?’’ — बाबू जी थे।

‘‘हृदय में बसकर।’’

‘‘रहने दो नटवर, मेरे रहते तुमने स्थान को कलंकित किया, मैंने क्या कर लिया क्या तुम्हारे हृदय में थोड़ी देर के लिए भी मेरा ख्याल आया अब क्या कहते हो?’’ — बाबूजी ने गहरी, साँस ली।

‘‘बाबूजी, यह हमारा दुर्भाग्य कि बदल न सके या कि अपनी अक्ल का दुरूपयोग करते रहे।’’ — नटवर का स्वर डूब गया।

‘‘आपलोगों की बातें सुन मैं बुत एक बारगी घायल हो जाता हूँ। ऐसा क्या था कि बाबूजी के आह्वान पर हम शहीद हो गये आप कुचाल न छोड़ सके।’’ — उमाकान्त सिंह ने कहा

‘‘फितरत उमा, फितरत! नहीं बदलती। नटवर कहते हैं कि वे बड़े भावुक हैं। किसी की बेटी की शादी अटक रही हो, किसी का जनाजा उठ रहा हो इनसे देखा न जा रहा था क्या करते बैंक लूट लाते। तुम से कहा जाता तो तुम अपनी जमीन या दुलहिन का गहना रेहन रख देते, मैं अपनी कमाई दे देता या बेटी की ससुराल को समझा आता यह नहीं कर पाये। भावुक हैं।’’

‘‘तभी तो आपके साथ याद किये जाते हैं।’’ — नटवरलाल ने कहा।

‘‘आपने देखा है आपका घर मिट्टी में मिल गया है, बिल्ली भी वहाँ रोने नहीं जाती। कोई आपका नाम भी नहीं लेता। शुक्र है कि आपकी बेटी लौट कर नहीं आई वरना आपका गुस्सा उसपर उतारते लोग। बात करते हैं। अरे परलोक गये अब तो सुधरिये। यहाँ आपसे मिलने नहीं आते हैं लोग, काहे बाबूजी से लटक के चले आते हैं ?’’ — रीता ने आक्रोश में भरकर कहा। तीनों चौंक गये। एक दिन अचानक चाँदनी रात को बाबूजी की आत्मा गाँव सिमान भ्रमण करने आई। साथ में न जाने क्यों नटवरलाल लग गये। भोले भाले सीधे सज्जन बाबूजी कुछ न बोले। मुर्ति से गुजरकर आ रहे थे सो उमाकान्त सिंह भी साथ हो लिये। बाबूजी की आत्मा गांव में ही रहती थी। उमाकान्त सिंह की तो नॉल ही गड़ी थी और नटरवरलाल पिछलगू हो अपना पाप धो रहा था। तीनों के सपने आने शुरू हो गये उमा बहू और नीरो को फिर तो सभी पूनों को मिलने का वादा सा हो गया।

‘‘दरअसल हम भूल गये कि किससे मिलने आये थे? बताओ बेटा रीता तुम जिस स्कूल में पढ़ाती हो वह ठीक चलता तो है?’’ — स्निग्ध स्वर में पूछा बाबूजी ने।

’’स्कूल की कक्षाओं में नियमानुसार, सिलेबस अनुसार पढ़ाई होती है। मुझसे पूछ रहे हैं तो मैं कहूँगी कि इस गांव को इस स्कूल को मॉडल बनाना चाहिए, आखिर भारतरत्न का गांव है।’’

‘‘भारतरत्न के गांव के खेतों में सरसों फूल रही है, आम के पेड़ मंजरों से भरे हैं, कोयल कूक रही है, चहुँओर हरियाली है मेरा मन राष्ट्रपति भवन की चारदीवारी में बेचैन था, बिहार विद्यापीठ में सुकून था अब गांव में विश्रान्ति है।’’ — बाबूजी ने कहा।

‘‘हमारे यहाँ जड़कन टूट रही है, परिवर्तन तो है। दुलहिन, आपने लम्बा जीवन जीया मेरे बगैर, सच बताइयेगा कैसा है इन दिनों ? क्या मेरी शहादत व्यर्थ गई ?’’ — उमाकान्त बाबू ने पूछा।

उमा बहू ने पहलू बदला, घूंघट को थोड़ा और नीचे सरकाया और सॅंभल कर बोलने लगी।

‘‘मालिक, मुझे तो किसी ने बुक्का फाड़कर रोने भी न दिया। गरभ से जो थी। बबुआ घुटरून चलने लगे तभी से फूलमाला, शंख टीका लगाने, झंडा फहराने लगे आजाद जो हो गये थे। इत्ता बड़ा शामिल घर था कि कहाँ फुरसत थी ? ऊब जी अब गया है, ले चलिये।’’ — वे द्रवित हो चलीं।

‘‘सबका समय आता है दुलहिन। इस त्रिकोण को रीता बेटी ही मॉडल बनायेगी, परिवर्तन का माद्दा है। गांव को गांव रहने देना इसे नगर न बनाना वरना यह खो जायेगा तो ढूँढें न मिलेगा।’’ — बाबूजी ने समझाया।

‘‘क्या अब हमें लौटना चाहिए?’’ — उमाकान्त सिंह ने कहा। सब कहीं अनायास लुप्त हो गये। रीता ने ठकुराइन को सहारा दिया, नीरो देवी को लाठी पकड़ाई और तालाब की सीढ़ियाँ उतरने लगीं हौले हौले। स्थिर जल में अपना चेहरा उन्हें साफ नजर आता फिर हौले से चुल्लू भरकर पानी चेहरे पर मारतीं तरो ताजा हो उठतीं। अपने अपने ठिकाने पर लौटतीं सबों के दिलो—दिमाग में एक ही आवाज गूँजती रही —

‘‘परिवर्तन हो पर गांव को गांव ही रहने देना।’’


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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