शुक्रवार, जनवरी 27, 2017

निंदा में प्रवीण हिंदीप्रतिष्ठान के लोग — मृणाल पाण्डे | जयपुर साहित्य महोत्सव #jlf2017 | Politics of Language


मृणाल पाण्डे | जयपुर साहित्य महोत्सव #jlf2017

अंग्रेज़ी के साथ बनते बिगड़ते रिश्ते

मृणाल पाण्डे

 

हिंदुस्तान के आम आदमी के मन में खास आदमी की भाषा अंग्रेज़ी को लेकर खिंचाव और अलगाव का एक अजीब मिला जुला सा रिश्ता है । यह नई बात नहीं । तीनेक हज़ार बरसों से भारत पर देश के गिने चुने दो तीन फीसदी लोगों का राज रहा है । और...
 हर समय में अखिल भारतीय रोबदाब रखनेवाला ताकतवर वर्ग संस्कृत, फारसी या अंग्रेज़ी, जो भी बोलता रहा वह राजकाज की मुख्य भाषा बन गई, भले ही ज़्यादातर लोग उससे अनजान हों । 
अंग्रेज़ी बोलनेवालों और हिंदी भाषियों के बीच आज जैसी लाग-डाँट चलती है, कभी वैसी ही फारसी और हिंदवी बोलने वालों, और उससे भी पहले चले अपभ्रंश और संस्कृत बोलनेवालों के बीच भी कायम थी । आज यह ठंडे दिमाग से सोचने की बात है कि...
मज़बूत सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक हैसियत वालों के खिलाफ़ नाखुशी दर्ज कराने के लिये सक्षम अंग्रेज़ी भाषा का सिरे से विरोध करना सयानापन नहीं । 
वैसे भी अधिकतर आम नागरिक उसकी विश्व बाज़ार और उच्च शिक्षा में ज़रूरत देखते हुए अपने बाल बच्चों को अंग्रेज़ी सिखाने के लिये पेट काट कर पैसा बचा रहे हैं, और किसी भारतीय मूल के लेखक को नोबेल या बुकर सरीखा विश्व पुरस्कार मिले तो क्या हम सब गर्व महसूस नहीं करते ?

अभी हाल में जयपुर में आयोजित साहित्य उत्सव में कई बार यह सवाल मन में उठा । दुनिया के कई देशों से आये साहित्यकारों और समीक्षकों के इस जमावड़े में इस बार भारतीय भाषाओं खासकर हिंदी को अच्छा प्रतिनिधित्व देने को लेकर आयोजकों ने सजगता बरती थी । इस लिये सिर्फ हिंदी साहित्य ही नहीं, बल्कि हिंदी के ब्लॉग लेखन, भारतीय भाषाओं के बीच हिंदी अनुवाद के बनते पुल, फिल्मों और विज्ञापन जगत में उभरते हिंदी के नित नये स्वरूपों, और दलित लेखन पर भी अलग-अलग सत्रों में खुली और अच्छी बहस हुई ।
अगर फिर भी कुछ लोगों की राय में भारतीय भाषाओं या जनता का सही प्रतिनिधित्व यहाँ (Jaipur Literature Festival) नहीं था, तो यह लोग क्यों नहीं खुद भारतीय भाषाओं के साहित्य के लिये ऐसा या इससे भी बेहतर समारोह आयोजित करने का बीड़ा उठाते ? 
निंदा में प्रवीण हिंदीप्रतिष्ठान के लोग, हिंदी विभागों और अधिकारियों की विशाल फौज के बावजूद कोई देसी विकल्प क्यों आगे नहीं बनाया गया ? दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी भाषा हिंदी के सोना उगलते बड़े अखबारों, प्रकाशन संस्थानों, फिल्मों और उपभोक्ता उत्पाद निर्माता कंपनियों के बीच खोजने पर उसे क्या अपने लिये भी प्रायोजक नहीं मिलेंगे ? यह शिकायत पिटी पिटाई है कि अंग्रेज़ी साम्राज्यवादी पूँजीपति धड़े की भाषा है और इसके तमाम लेखक प्रायोजक शोषकवर्ग के प्रतिनिधि हैं । इसी समारोह में एक सत्र का विषय था साम्राज्यवादी अंग्रेज़ी (इंपीरियल इंगलिश) । कुछ साल पहले जयपुर आये द. अफ्रीकी मूल के नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक केट्ज़ी ने बताया था कि उनकी भी पहली भाषा अंग्रेज़ी नहीं अफ़्रीकन थी, लेकिन अगर कोई लेखक अंग्रेज़ी की मार्फत अपने समाज के मूक वर्गों की आवाज़ की सटीक अभिव्यक्ति कर सके तो उसे अंग्रेज़ी में भी लिखने से कोई संकोच क्यों हो ? उन्होंने रूसी मूल के लेखकों सौल बैलो और व्लादीमीर नोबोकोव का भी ज़िक्र किया जिनकी मातृभाषा रूसी होते हुए भी पराये देशों में बसे इन लेखकों ने अंग्रेज़ी में लिखा और बहुत खूब लिखा । सो ...
सवाल यह नहीं कि लेखक किस भाषा में लिखता है, बल्कि यह है कि वह कैसा लिखता है ? यदि साहित्य की कसौटी पर वह लेखन बेहतरीन है, तो फिर तकलीफ क्या है ? 

अंग्रेज़ी के साम्राज्यवादी विगत को कोई नहीं नकारेगा । लेकिन त्रेतायुग में हमारे यहाँ वायुयान थे और हमारे लिच्छवि गणतंत्र में यह होता था वह होता था जैसी लचर अपुष्ट बातों को छोड़ कर मानना होगा कि प्रजातंत्र, संविधान बुनियादी अधिकार, सर्वोच्च न्यायालय, बंदी प्रत्यक्षीकरण, लोकसेवा आयोग, जैसी कई अवधारणायें अपनी वर्तमान शक्ल में हमारे यहाँ ब्रिटेन से, बरास्ते अंग्रेज़ी आई हैं । वैसे ही जैसे कि मौंटेसरी से लेकर सिविल इंजीनियरिंग, डाक्टरी या मैनेजमेंट प्रशिक्षण तक के कोर्स । लिहाज़ा हम चाहें या नहीं, पाश्चात्य संस्कृति आज हर आमोखास भारतवासी की ज़िंदगी में है । 1947 में हमारी 32 करोड़ की आबादी का नब्बे फीसदी भाग निरक्षर था । आज आबादी सवा अरब से अधिक है और 96 फीसदी से अधिक बच्चे स्कूलों में हैं जिनके अभिभावकों की सबसे बड़ी माँग अंग्रेज़ी पढाई की है । क्या अब भी हम ज्ञान को प्रादेशिक और रोज़गारविमुख बनाये रखने की ज़िद पाले रहें ? या कि अब हमारे सरकारी स्कूलों में अंग्रेज़ी और हिंदी को बहते पानी की तरह अपना सहज स्तर पा लेने दिया जाये ? ज्ञान के अंतर्राष्ट्रीयकरण के युग में अंग्रेज़ी सायास बाहर रखने से तो हमारे साक्षर युवा ही नये रोज़गारों से वंचित न होंगे, रोज़ी रोटी कमाने दूर दराज़ के अहिंदीभाषी क्षेत्रों में जा रहे भारतीय भी ज़रूरी बातचीत और कामकाजी रिश्ते कायम करने से रह जायेंगे ?

एक सक्षम भाषा की कड़ी बहुत मज़बूत होती है । विगत में मुट्ठीभर सवर्णों की भाषा कहलाने वाली संस्कृत ने पूरे देश को सांस्कृतिक रूप से बाँधे रखा था । और आज ...
अंग्रेज़ी को हम भले ही कुलीनों की भाषा मानें, क्या उसके बिना शेष दुनिया और अहिंदीभाषी भारतीयों से हमारा सार्थक संवाद संभव है ? 
रही साम्राज्यवादी तेवर की बात, सो हम क्या भुला सकते हैं कि तमिलनाडु से बंगाल तक यही विशेषण हिंदी के लिये भी इस्तेमाल किया जाता रहा है ? पूर्वग्रह भुलाकर अंग्रेज़ी और भारतीय भाषाओं के बीच सहज बराबरी का रिश्ता कायम करने से भारत की बहुधर्मी संस्कृति और अभिव्यक्ति की क्षमता और आज़ादी, मज़बूत ही होंगी ।


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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