शनिवार, जनवरी 07, 2017

रवि कथा — ममता कालिया (भाग १)


Tribute to Ravindra Kalia by Mamta Kalia - Part 1

रवीन्द्र कालिया पर लिखा ममता कालिया का संस्मरण

रवि कथा — भाग १

इन दिनों वक्त मेरे लिए गड्डमड्ड हो रहा है। एक साथ मैं तीन समय में चल निकल रही हूं। आज बारह सितंबर सन् 2016 है, पिछले साल बारह सितंबर को रवि मेरे पास थे। लो यह सन् 2011 का बारह सितंबर कहां से आ गया। हम दोनों अपोलो हॉस्पिटल में डॉ. सुभाष गुप्ता के कमरे में हैं। वे स्क्रीन पर रवि की सी.टी. स्कैन और पैट स्कैन की अनगिनत छवियों का निरीक्षण कर रहे हैं। डॉक्टर ने मायूसी में सिर हिलाया है— ‘‘मित्र कालिया आपके पास बस छह महीने का वक्त बचा है। अपने हिसाब किताब संभाल लें। आपके जिगर में तीन सेंटीमीटर का फोड़ा है।’’


मैं तड़प जाती हूं।

रवि रुआंसे चेहरे से हंस रहे हैं, ‘‘डॉक्टर इस छह महीने में आज का दिन शामिल है या नहीं?’’

डॉक्टर नहीं हंसते।

मैं कहती हूं, ‘‘डॉक्टर मेरा जिगर दुरुस्त है। आप मेरा आधा जिगर इनके लगा दें।’’

डॉक्टर फिर सिर हिला देता है, ‘‘वह चरण ये पार कर चुके हैं। अब प्रत्यारोपण नहीं हो सकेगा।’’

डॉक्टर की सलाह है कि रवि को फौरन हॉस्पिटल में दाखिल हो जाना चाहिए।



रवि के सामने अठारह सितंबर को होने वाले ज्ञानपीठ पुरस्कार का दायित्व है। उन्नीस सितंबर को अगले ज्ञानपीठ की प्रवर समिति के चयन हेतु बैठक है। वे छुट्टी कैसे ले सकते हैं। रवि डॉक्टर से वादा करते हैं, ‘‘बीस सितंबर की सुबह मैं आकर दाखिल हो जाऊंगा।’’

रवींद्र कालिया की जीवनशैली को जिगर ने हरा दिया था पर उनके जज्बे को हरा नहीं पाया। उन्नीस सितंबर तक वे ऐसी रफ्तार से कामों में लगे रहे कि किसी को पता ही नहीं चला कि उनकी सेहत ठीक नहीं। कौल के पक्के रवि बीस सितंबर को अपोलो में दाखिल हो गए। दफ्तर से फोन आए जा रहे थे। रवि को हर फोन का खुद जवाब देना था। एक बांह में कई ड्रिप लटकाने के लिए कलाई में सुई लगाकर टेप चिपका दिया गया। रवि दूसरे हाथ से फोन सुनते रहे। थोड़ी देर में सिस्टर ने दूसरी बांह भी कब्जे में ले ली। उनके दोनों फोन बंदकर दराज में रख दिए। अगले पांच दिन बेहद जांच पड़ताल, निरीक्षण परीक्षण, फिर फिर परीक्षण और अंत में एक समानांतर डमी शल्यक्रिया। इतने सब से केवल पुष्टि की गई कि असली इलाज में रुग्ण स्थल तक कैसे पहुंचा जाएगा। ओरल कैमोथेरेपी की एक दवा जो शहर में बहुत मुश्किल से उपलब्ध हुई, रवि ने दो गोली खाने के बाद, इनकार कर दिया। अन्य बहुत सी दवाओं के अंबार लेकर हम घर लौटे।

रवि फिर दफ्तर जाने लगे। संकट में दफ्तर भी शरणस्थल बन जाता है। उनके दिमाग में ‘नया ज्ञानोदय’ और ज्ञानपीठ के प्रकाशनों के विषय में बेशुमार योजनाएं थीं।

मैं लगातार चिंतित रहती मगर चमत्कृत भी होती। रवि की प्रखरता में कोई अंतर नहीं आया। उनके अंदर रचनात्मक ऊर्जा का अजस्त्र श्रोत था। भूख लगनी बंद हो गई थी। पूरा दिन केवल साबूदाने और दलिए पर गुजार देते मगर फोन पर कोई बात करे, वे बड़े जोश से बोलते, ‘‘मैं ठीक हूं, अपनी सुनाओ।’’ फोन पर लंबी बातचीत करना, सुडोकू खेलना और इंटरनेट पर पढ़ना उनके प्रिय काम थे। उन्होंने अपनी बीमारी की बाबत इंटरनेट पर इतनी जानकारी हासिल कर ली थी कि मेरा और मित्रों का यह कहना कि ‘तुम चिंता न करो, एकदम ठीक हो जाओगे’ सीमित अर्थ रखता था। Portal Veins अवरुद्ध होने का तात्पर्य, उपचार की प्रक्रिया, विकिरण के दूरगामी प्रभाव, सब तो उन्होंने पढ़ जान लिया था। मयनोशी तो अगस्त 2011 से ही छूट गई थी जब पेटदर्द रहने लगा था। अब उनकी शामें होमियोपैथी चिकित्सा के अध्ययन में डूबी रहतीं। कमाल की बात यह कि उन्होंने हर ऐलोपैथिक दवा का होमियोपैथिक विकल्प ढूंढ़ लिया था। होमियोपैथी और ज्योतिषशास्त्र में उनकी पुरानी दिलचस्पी थी। होमियोपैथिक दवाओं की अनिवार्यता हमारे जीवन में हमेशा खड़ी रही। पहले जब बच्चे छोटे थे, उन्हें भरसक होमियो दवाएं देते रहे। बाद में पंजाब से माताजी हमारे पास रहने आ गईं। उन्हें सांस, खांसी, जोड़ों का दर्द आदि असाध्य बीमारियां थीं जो अंग्रेजी दवाओं से ज्यादा उलझ जातीं। डॉक्टर एक बीमारी ठीक करते तो दूसरी उभर आती। तब रवि ने उनके इलाज के लिए इलाहाबाद नगर के मशहूर होमियोपैथ चिकित्सकों से मशविरा किया और स्वयं भी होमियोपैथी के समस्त ग्रंथ खरीद लाए। हैनमैन, कैंट वगैरह की पुस्तकें वे हेमिंग्वे और कामू जैसी तल्लीनता से पढ़ते। रवि की देखरेख में माताजी लंबी उम्र पाकर पीड़ारहित प्रयाण कर सकीं।

दो नवंबर से ग्यारह नवंबर सन् 2011 में जब उनकी YYY 90 रेडियो सर्जरी हुई तब भी होमियोपैथिक दवाओं का डब्बा और किताब उनके साथ अपोलो हॉस्पिटल गई। होश आने पर वहां की नर्सों और वार्ड बॉय आदि से उनके मर्ज पूछ करके मीठी गोलियां देना रवि का सबसे प्रिय काम था। बड़ा बेटा अनिरुद्ध कहता, ‘‘पापा अपनी आंखों को आराम दीजिए, ये सब अस्पताल के लोग हैं इन्हें अच्छे से अच्छा इलाज मिल जाता होगा।’’

रवि कहते, ‘‘मेरी दवा से इनकी बीमारी जड़ से मिट जाएगी यह तो सोच।’’

ग्यारह नवंबर 2011 को अपोलो हॉस्पिटल से छुट्टी मिली। रवि की ठसक यह कि अवशेष बिल का भुगतान मैं खुद जाकर करूंगा। मेरे और अन्नू के कहने का कोई असर नहीं पड़ा। लाचार, उनकी पहिया कुर्सी भुगतान काउंटर पर ले जाई गई। अपना वीजा कार्ड निकालकर उन्होंने बिल चुकाया। वापसी के लिए कार में बैठते ही बोले, ‘‘आज मेरी सालगिरह है। आज मैं पूरे दिन काम करूंगा। मुझे दफ्तर छोड़ दो।’’

मैंने प्रतिवाद किया, ‘‘कमजोर हो गए हो, घर चलकर आराम करो।’’

रवि अड़ गए, ‘‘मेरे काम में अड़ंगा मत डालो, अपनी मर्जी से जीने दो मुझे।’’

अन्नू ने कहा, ‘‘जैसी आपकी मर्जी। आप पहले कुछ फल खा लीजिए।’’

रवि ने कुछ नहीं खाया। दफ्तर पहुंचकर ही उनके चेहरे पर रौनक लौटी।

पिछले साल की सितंबर के इन्हीं दिनों अखिलेश ने रवि से कहा कि वे इलाहाबाद पर संस्मरण लिख दें। यह उनका मनमाफिक काम था। खुश हुए। शुरू किया। मुझसे बोले, ‘‘मैं इलाहाबाद पर पूरी किताब लिखना चाहता हूं पर कुछ जगहों के नाम धुंधले याद पड़ रहे हैं। हमने कब छोड़ा था इलाहाबाद?’’

‘‘सन्, 2003 में। बारह साल हो गए।’’

‘‘एक बार जाना पड़ेगा इलाहाबाद।’’

‘‘तो चलेंगे न। तुम जब कहो, चलें।’’

रवि ने हामी नहीं भरी। अपने तकिए के नीचे कागज कलम रख लिया। रातों में आड़े तिरछे कुछ शब्द, कुछ वाकये लिख लेते। नींद की गोली के बावजूद उन्हें नींद कम आती। कभी मेरी नींद खुल जाती तो मैं रोकती, ‘‘अभी तक सोये नहीं।’’ वे चुपचाप कागज तकिए के नीचे रख देते। जैसे ही मेरी आंख लगती, वे फिर कागज निकालकर लिखने लगते।

तभी तो उनके जाने के बाद उनके सिरहाने से एक उपन्यास के पच्चीस पन्ने, एक संस्मरण के टुकड़े। एक अधूरी कहानी और आधे सवाए जुमलों का खजाना मिला है। कभी किसी रचना के छपने की उन्हें जल्दी नहीं थी। खरामा खरामा लिखते। अगर रचना पूरी हो जाती तो कोई लघु पत्रिका ढूंढ़ते जिसे रचना दी जाय। शायद यही वजह थी कि एक बार स्कूल में अन्नू से पूछा गया कि उसके माता पिता क्या करते हैं तो उसने जवाब दिया, मेरे पिता साहित्यकार हैं, मेरी मां व्यावसायिक लेखन करती हैं। इस विश्लेषण से रवि का खासा मनोरंजन हुआ। मैंने नाराज होकर अन्नू से इसकी वजह पूछी तो उसने कहा, ‘‘आप रंगबिरंगी पत्रिकाओं में लिखती हैं। पापा गंभीर पत्रिकाओं में लिखते हैं।’’ आठवीं में पढ़ने वाले अन्नू को मैं क्या समझाती कि कड़की के दिनों में यही पत्रिकाएं हमारी राहत रूह थीं। जितने नियम से वहां से मानदेय के चेक मिलते उतने नियम से तो मुझे कॉलेज से वेतन भी न मिलता।

कुछ दिन पहले टी.वी. पर सुने एक समाचार ने मुझे रुला दिया। समाचार वाचक ने एक चैनल पर कहा— ‘‘भारत देश में गरीब होना एक अपराध है। इसके साथ जो दृश्य दिखाया गया उसमें उड़ीसा का एक आदमी दाना मांझी अपनी पत्नी की बेजान देह को अकेले उठाकर दस मील पैदल चला। रास्ते में लोग खड़े देखते रहे। कोई दौड़कर कंधा देने नहीं आया।

इसके एक कदम आगे जाकर मैं कहूंगी भारत में बीमार होना ही अपराध और अभिशाप है। इस वर्ष जब चार जनवरी की सुबह रवि की तबियत बहुत खराब हो गई, उन्हें अस्पताल ले जाना जरूरी हो गया। कड़ाके की ठंड थी। रवि अर्द्धचेतन अवस्था में थे। कार की बजाय एंबुलेंस की जरूरत थी। पड़ोसी मित्र डी.एन. ठाकुर ने यशोदा अस्पताल का आपात फोन नंबर दिया। इंटरनेट से एक दो अन्य अस्पतालों के आपात नंबर लिए। यशोदा अस्पताल ने कहा, ‘‘एम्बुलेंस तो है पर डॉक्टर नहीं है। मरीज को भर्ती कर दीजिए। जब डॉक्टर आएंगे, देख लेंगे।’’ एक दूसरे अस्पताल ने कहा, ‘‘हमारे यहां डॉक्टर तो हैं पर एम्बुलेंस सब व्यस्त हैं, दोपहर बाद खाली होंगी।’’ दो अस्पतालों के आपात नंबरों पर घंटी जाती रही, किसी ने फोन नहीं उठाया।

अंत में किसी प्राइवेट एम्बुलेंस सर्विस का फोन नंबर मिला। उसने कहा, ‘‘दफ्तर जाने वालों का समय हो गया है। जगह जगह जाम मिलेगा।’’

अनिरुद्ध ने कहा, ‘‘एम्बुलेंस को तो रास्ता देंगे लोग।’’

ड्राइवर बोला, ‘‘यह दिल्ली है, यहां मरते को रास्ता न दें लोग।’’ बड़ी मिन्नतें करके ड्राइवर को घर आने के लिए राजी किया। यह मारुति ओम्नी में बनाई हुई एंबुलेंस थी जिसमें ऑक्सीजन सिलिंडर और मास्क तो था किंतु सीट की लंबाई कम थी। रवि की टांगें उसमें समा नहीं रही थीं। मैं रास्ते भर उनके घुटने पकड़कर उन्हें गिरने से संभालती रही और उनके साथ अपने को भी दिलासा देती रही, ‘‘अभी अस्पताल पहुंचकर सब ठीक हो जाएगा रवि। थोड़ी हिम्मत और करो।’’

नोएडा की सड़कें वाहनों से खचाखच भरी थीं। एंबुलेंस के हूटर का उन पर कोई असर नहीं पड़ा। हूटर बजता रहा, हम जाम में फंसे रहे। अन्नू ने उतर उतरकर लोगों से प्रार्थना की, ‘‘मेरे पापा की हालत गंभीर है, एंबुलेंस को आगे निकलने दो।’’ किसी ने ध्यान नहीं दिया।

हमें सर गंगाराम अस्पताल पहुंचने में दो घंटे लग गए। बाधाएं अभी खत्म नहीं हुई थीं।

आपातकक्ष में केवल उन रोगियों का उपचार किया जाता है जिनके बचने की आशा हो। ‘बिस्तर खाली नहीं है’ कहकर शेष रोगियों को वापस कर दिया जाता है।

संकट की इस घड़ी में डॉ. अर्चना कौल सिन्हा वरदान बनकर आगे आईं। उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पर रवि को उपचार दिलवाया। उन्हें तत्काल वेंटीलेटर और अन्य जीवन रक्षक उपकरणों पर रखा गया। आपात कक्ष में केवल एक संबंधी रोगी के पास जा सकता है। दोनों बेटे अनिरुद्ध और प्रबुद्ध अंदर बाहर खड़े खड़े डॉक्टरों की आवाजाही और परीक्षण देखते रहे। मैं एक बार अंदर जाती, वहां से बौखलाकर बाहर आती और पेड़ के नीचे बैठ जाती। ऐसे कातर समय सबसे पहले मेरी दोस्त चित्रा मुद्गल सपरिवार पहुंची। अभी अवध के चले जाने के दुख से संभली नहीं थी। गिरती पड़ती चल रही थी पर आद्या, अनद्या का हाथ थाम मुझ तक आई। उसकी पुत्रवधू शैली दूर कैंटीन से हमारे लिए चाय लेकर आई। मेरे लिए समय जैसे थिर खड़ा था। घड़ी की सुई न जाने कहां अटकी थी?

रात तक रवि की हालत के लिए जो बयान जारी हुआ उसके मुताबिक उनकी स्थिति गंभीर मगर स्थिर थी। मन में आशा का संचार हुआ। अब समस्या दाखिले की थी। सैकड़ों बिस्तरों वाले अस्पताल में रवि के लिए एक अदद बिस्तर उपलब्ध नहीं था। अस्पताल ने ही इसका समाधान ढूंढ़ा और अपने सहयोगी सिटी हॉस्पिटल के गहन चिकित्सा कक्ष में रवि को पहुंचाया। अन्नू ने हॉस्पिटल के पास एक होटल में कमरा ले लिया यह सोचकर कि हम बारी बारी से आराम कर लेंगे। किसी का भी मन ICU से हटने का नहीं था। हम ICU के बाहर नंगे तख्त पर निःशब्द बैठे रहे। न जाने कहां से दोस्तों को रवि की बीमारी की खबर लग गई। इतनी ठंड में रात भर दोस्त आते रहे, प्रांजल धर, कुमार अनुपम, प्रदीप सौरभ, चंद, कानन, जितेंद्र श्रीवास्तव, संतोष भारतीय। आधी रात की उड़ान से आनंद कक्कड़ आ गए मुंबई से। पुत्रवधू प्रज्ञा और पौत्र केशव शाम को ही पहुंच गए। सुबह तक अखिलेश, मनोज पांडे, संजय कुशवाहा, और असंख्य अन्य मित्र आए। किसी को विश्वास नहीं हो रहा था कि रवि पर समय भारी है।

अगले दिन यही स्थिति रही। मित्रों के आने से थोड़ी दिलासा मिलती तो वह गहन चिकित्सा कक्ष में झांककर एक बार फिर टूटने लगती। मदन कश्यप, अनामिका, वंदना राग, पंकज राग, गीताश्री...सबने अपनी उपस्थिति से आसरा दिया। डॉ. स्कंद सिन्हा नियम से आते, हमारे पेट में भोजन पहुंचाते और डॉक्टरों से रवि का हाल जानते। डॉ. स्कंद और डॉ. अर्चना की वजह से सभी डॉक्टरों ने रवि पर बहुत ध्यान दिया।

6 जनवरी की सुबह एक आश्चर्य की तरह रवि को होश आ गया। डॉक्टर ने वेंटिलेटर हटा दिया, आंखों पर से टेप निकाला और रवि ने अपने चारों ओर का दृश्य निहारा। कमजोरी बहुत थी पर चैतन्य थे। अन्नू ने कहा, ‘‘पापा अपनी बाहों से सारी नलियां, सुइयां हटाने के लिए जिद कर रहे हैं।’’ ICU में आगंतुकों को जाने के लिए सुबह शाम केवल आधा घंटे का समय मिलता है और एक एक करके ही मरीज के पास आ सकते हैं। मैं गई। रवि ने पहचाना। हल्के से मुस्कराए। प्रज्ञा, केशव, अन्नू, मन्नू, अखिलेश, मनोज सब बारी बारी से गए। हम चिकित्सा जगत के चमत्कार के आगे विस्मित, विमुग्ध थे। शाम को विभूति नारायण राय और पद्मा आए। अंदर गए। उन्हें लगा पूरी चेतना लौटने में कुछ और वक्त लगेगा। अगले दिन वे फिर आए और उन्होंने कहा, ‘‘आज पहले से ज्यादा सुधार है।’’

डॉक्टर हमें कह रहे थे कि वे जल्द रवि को प्राइवेट बॉर्ड में भेज देंगे। डॉ. निर्मला जैन, लीलाधर मंडलोई, अजय तिवारी, भरत तिवारी, रविकांत, वाजदा ज्ञान, गोकर्ण सिंह, विज्ञान भूषण, शर्मा दंपति, हर एक का आगमन हमारे अंदर नई आशा ऊर्जा और आश्वासन पैदा करता रहा। 8 जनवरी की दोपहर तक रवि सचेत थे। सुबह मैंने रवि से कहा, ‘‘रवि तद्भव का अंक आने ही वाला है, अखिलेश ने बताया।’’

रवि ने धीरे से कहा, ‘‘च।’’

पास खड़ी नर्स ने कहा, ‘‘पापा चाय मांगता?’’

रवि बोले, ‘‘चश्मा।’’

मैं समझ गई रवि तद्भव देखना चाहते हैं। उनका चश्मा और मोबाइल मेरे पर्स में मौजूद था लेकिन बिस्तर पर पड़ी नलियों, नारों के बीच चश्मा उनकी आंखों पर लगाना मुमकिन नहीं था। फिर तद्भव का नया अंक तब तक आया भी कहां था।

8 जनवरी की दोपहर डॉक्टर ने मुझे गहन चिकित्सा कक्ष में बुलाया। मैंने देखा रवि बिस्तर पर बैठे हांफ रहे हैं। डॉक्टर से पूछा। उन्होंने कहा वे अपने आप सांस नहीं ले पा रहें।’’

मेरा धैर्य टूट गया, ‘‘आप देख क्या रहे हैं। उन्हें जीवन रक्षक मशीन पर रखिए, वेंटिलेटर लगाइए।’’

एक बार फिर रवि को लिटाकर वही प्रक्रिया दोहराई गई जो 4 जनवरी को शुरू की गई थी। 8 की शाम, रात और 9 की सुबह ऐसी ही बीत गईं। 9 जनवरी की दोपहर डॉक्टरों ने ‘सॉरी’ बोल दिया।

तो क्या रवि सिर्फ हम सब से विदा लेने के लिए ढाई दिन होश में आए। हर एक को मुस्कराकर देखा, पहचाना। शाश्वत साहित्य में इसी को बुझने से पहले दीपक का आलोक कहा गया है। 10 जनवरी रवि को लोदी रोड के विद्युत शवदाह स्थल पर लाए। यह जगह कुछ ऐसी अवस्थित है कि मुख्य सड़क से कहीं भी जाओ, यह मार्ग में पड़ती है। अनेक बार ऐसा हुआ कि रवि के मुंह से निकला, ‘‘मेरा तो सारा काम यहीं कर देना।’’ मैंने हर बार बुरा माना। मैंने कहा, ‘‘कालिया नाम होने का यह मतलब नहीं कि तुम काले लतीफे सुनाते रहो।’’

रवि ने कहा, ‘‘यहां कर्मकांड का पाखंड नहीं है। इससे मुझे चिढ़ है।’’

सभी स्नेही स्वजन, जनवरी का पाला झेलते हुए आए उस अब रवि को विदा देने आए जिसके लिए दोस्त और दोस्ती, परिवार और गृहस्थी से भी ज्यादा प्रगाढ़ और प्रिय थी। राजीव कुमार ने मेरे हाथों में एक पत्रिका थमाई यह तद्भव की जनवरी 2016 की पहली प्रति थी जिसका पहला लेख था— ‘यह जो है इलाहाबाद’, रचनाकार रवींद्र कालिया। क्या ऐसा ही होता है रचनाकार का प्रयाण। लिखा, अधलिखा, छपा अनछपा सब अधबीच छूट जाता है, काल से होड़ में काल अपनी विकराल विजय घोषित कर देता है। संस्मरण के अंत में ‘क्रमशः’ लिखा हुआ काल को नहीं दिखा। ओफ यह मैं किसके बारे में क्या लिख रही हूं। दोस्तो मेरे अब तक के लिखे पर ‘डिलीट’ दबाओ। मुझे आपके साथ रवींद्र कालिया की तकलीफ भरी तिमाही का सफर करना है या उनके छैल छबीले बयालीस साल का...
क्रमशः
(तद्भव से साभार)

००००००००००००००००

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

गूगलानुसार शब्दांकन