गुरुवार, फ़रवरी 09, 2017

इरा टाक की कहानी — चाँद पास है | Era Tak ki Kahani


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ऐसे तो शहर में कई दोस्त थे पर उसका हर किसी से घुलने मिलने का मन नहीं करता था और रोज़ रोज़ कब तक साथ के लिए भागो, अपने अकेलेपन से तो अकेले ही लड़ना होता है...

चाँद पास है

इरा टाक

 जब से विक्रम सऊदी अरब जॉब करने गया था, उसकी पत्नी सुनैना बहुत अकेली पड़ गयी थी। वो दिल्ली में इंटीरियर डिज़ाइनर का काम कर रही थी। विक्रम सिविल इंजिनियर था, एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में उनकी मुलाकात हुई और फिर साथ काम करते करते एक दूसरे में प्रेम में पड़ गए। विक्रम के घर वाले तो राजी हो गए पर सुनैना के घर वालों ने साफ़ मना कर दिया। सुनैना विक्रम के बिना अब खुद को सोच नहीं सकती थी तो उसने घर वालों की मर्ज़ी के खिलाफ शादी कर ली। शौर्य के हो जाने के बाद खर्चा बढ़ने लगा, ऐसे में विक्रम ने कुछ सालों के लिए सऊदी जाने का फैसला किया ताकि वो लोग अपना घर खरीद सकें और शौर्य को अच्छी परवरिश दे सकें।

दिनभर ऑफिस और घर काम बच्चे की देखभाल के बाद भी नींद सुनैना की आँखों से कोसों दूर रहती, हर रात वो तड़पते हुए काटती थी। व्हात्सअप्प, स्काइप पर विक्रम से दिन में दो तीन बार बात हो जाती, पर मन का खालीपन मिटता नहीं था। बहुत चिडचिढ़ी होती जा रही थी। हर दूसरे तीसरे दिन विक्रम से लड़ पड़ती-

“यूँ अलग अलग ही रहना था तो शादी ही नहीं करते, मैंने पैसे को कभी अहमियत नहीं दी, वरना किसी भी बड़े घर में मेरी शादी हो जाती। पापा तो चाहते ही नहीं थे कि मेरी शादी तुमसे हो!”

ऐसे तो शहर में कई दोस्त थे पर उसका हर किसी से घुलने मिलने का मन नहीं करता था और रोज़ रोज़ कब तक साथ के लिए भागो, अपने अकेलेपन से तो अकेले ही लड़ना होता है।

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सुनैना की करीबी दोस्त रमैया भी नौकरी और गृहस्थी में फंस कर दूर हो गई थी। कभी कभार फ़ोन पर उनकी बातें हो जाती थी। वो अक्सर सोचा करती –“जो भी थोडा सा मेरे मन के करीब होता है वो दूर चला जाता है !”

 अपने अकेलेपन से बचने के लिए वो देर रात सोशल साईट पर बैठी रहती। उसने हाल ही में ब्लॉग लिखना शुरू किया था, जिस वजह से उसके प्रशंसक बड़ी तेजी से बढ़ रहे थे। ऐसे ही प्रशांत रंगरेज़ उसे फेसबुक पर मिल गया था , प्रशांत बहुत फेमस पेंटर था और देखने में बहुत ही आकर्षक था। वो उसकी हर पोस्ट और तस्वीर को लाइक करता। सुनैना को भी उसकी हर पेंटिंग अच्छी लगती थी। उसके मन में प्रशांत से बात करने की इच्छा होती पर वो संकोचवश नहीं करती थी और न ही प्रशांत ने कभी पहल की।

एक रात मन बहुत उदास था। आज फिर विक्रम से थोड़ी कहा- सुनी हो गयी थी, काफी रो लेने के बाद मन जब थोडा हल्का हुआ तो उसने लैपटॉप ऑन किया। प्रशांत ऑनलाइन था तो पता नहीं उसके मन में क्या आया, उसने प्रशांत को “हाई” लिख कर मैसेज कर दिया।

प्रशांत ने तुरंत जवाब दिया ...

प्रशांत : मैं आपका ब्लॉग रोज़ पढता हूँ, गज़ब का राइटिंग स्टाइल है

सुनैना : शुक्रिया, मुझे भी आपकी पेंटिंग्स बहुत पसंद हैं

प्रशांत :इतनी जल्दी चुका भी दिया ? :)

सुनैना : जी ? मतलब ?

प्रशांत : हाहा ..अरे मेरा मतलब है कि मैंने आपकी तारीफ की और आपने मेरी कर दी , हिसाब चुकता किया

सुनैना : ओह ...अरे नहीं मैं सीरियस थी...ब्यूटीफुल पेंटिंग्स !

प्रशांत : वैसे हमारे प्रोफेशन मिलते हैं ..आप इंटीरियर डिज़ाइनर हैं और मैं पेंटर!

सुनैना :जी :)

प्रशांत :मई में दिल्ली में त्रिवेणी में मेरा सोलो शो है, आप ज़रूर आइयेगा

मैं इनविटेशन मेल करूँगा

सुनैना :बेस्ट विशेस ..अभी तो दो महीने हैं , मैं ज़रूर आउंगी ..गुड नाईट

प्रशांत से बात करके सुनैना को बहुत अच्छी फीलिंग हुई और नींद भी अच्छी आई।

सुबह उसने देखा मैसेंजर पर प्रशांत का मैसेज था-

“गुड मोर्निंग सुनैना“

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वो रोज़ चैटिंग करने लगे, हालाँकि वो पिछले दो साल से फेसबुक पर जुड़े थे पर कभी बात नहीं हुई थी पर अब ऐसा लगता था मानो वो बरसों से दोस्त हों!प्रशांत से चैट करते हुए वो खूब हँसती थी, अब उसे विक्रम की कमी कम खलती थी। जब उसे कोई सलाह चाहिए होती वो प्रशांत से ले लेती थी। कुछ दिनों बाद प्रशांत ने उसका नंबर माँगा, नंबर देते ही प्रशांत का फ़ोन आ गया, उसकी आवाज़ में खनक थी, सुनैना को समझ नहीं आ रहा था कि क्या बात करे। वो सिर्फ हाँ- हूँ में जवाब देती रही और जल्दी ही कॉल निपटा दिया।

 प्रशांत ने उसे मैसेज किया-

“तुम इतना कम क्यों बोलती हो? फेसबुक पर तो बहुत हँसती हँसाती हो..वैसे तुम्हारी आवाज़ में बहुत कशिश है”

उसने जवाब में सिर्फ एक स्माइली बना कर भेज दिया।

 अब हर सुबह उसे प्रशांत के मैसेज का इंतज़ार रहता और हर रात उसे गुड नाईट बोले बिना उसे नींद नहीं आती। वो फ़ोन पर कम ही बात करते थे पर रोज़ चैटिंग होती थी। सुनैना प्रशांत से घर की, विक्रम की , शौर्य की , ऑफिस की और धीरे-धीरे अपने मन की बातें भी शेयर करने लगी। प्रशांत पैंतीस का हो चुका था, फिलहाल वो सिंगल था कुछ दिनों पहले ही उसका ब्रेकअप हुआ था। मनमौला बंजारा टाइप आदमी था। वो बस अपने सपनों के बारे में बात करता था या जब पेंटिंग का कोई नया आईडिया आता तो वो सबसे पहले सुनैना से शेयर करता। दिन में जब तक उनकी घंटा -दो घंटा बात नहीं हो जाती दोनों बैचैन रहते। विक्रम के लिए सुनैना के मन में तड़प कम होती जा रही थी। उसे लगने लगा था कि वो प्रशांत से बात किये बिना नहीं जी पायेगी, कई बार उसका मन करने लगता कि प्रशांत से अपने दिल का हाल कह दे पर फिर संकोचवश हिम्मत नहीं जुटा पाती। यही हाल प्रशांत का भी था, उसका अकेलापन सुनैना से भरने लगा था। उसकी रुक गयी क्रिएटिविटी फिर से बरस रही थी, सुनैना उसके लिए म्यूस बना गयी थी।

एक दिन प्रशांत ने उसे वीडियो कॉल किया। सुनैना शौर्य को खाना खिला रही थी, वीडियो कॉल देख उसे छोड़ वो जल्दी से बेडरूम में आ गयी और कमरा अन्दर से बंद कर लिया। जब भी प्रशांत से बात या चैट होती एड्रेनालाईन का प्रवाह उसके शरीर में अचानक से बढ़ जाता।

“तुम्हारे लिए एक सरप्राइज है जान” -प्रशांत ने “जान” शब्द इतनी बेफिक्री से इस्तेमाल किया जैसे सुनैना उसकी बरसों की प्रेमिका हो।

“विक्रम तो आजकल मुझे जान या डार्लिंग कहना ही भूल गया है, बस घर की किश्तों और बड़ी गाडी खरीदने की ही बात करता रहता है। प्यार तो पुराने पड़ चुके स्वेटर जैसा हो गया कोई गर्माहट ही नहीं बची” -सोचते हुए सुनैना की भूरी आँखों में आंसू चमक उठे।

“अरे अभी तो मैंने सरप्राइज दिखाया भी नहीं और तुम रोने लगी ? ”

“क्या है दिखाओ न” –सुनैना ने दायें कंधे को थोडा उचका कर दायें गाल पर छलक आये आंसू को पोंछा

“मेरी सुनैना सिर्फ मेरे लिए”-कहते हुए प्रशांत ने अपने बेडरूम की दीवार पर लगी बड़ी सी पेंटिंग दिखाई।

“ओह माय गॉड..ये तो मैं हूँ”- सुनैना एकदम से उछल पड़ी।

“यस..माय लेडी ..दिस इस यू...माय म्यूस!”

शौर्य रोते हुए बेडरूम का दरवाज़ा खटखटा रहा था, तो सुनैना को फ़ोन काटना पड़ा। वो सारी रात प्रशांत और अपने पनप रहे रिश्ते के बारे में सोचती रही।

 सन्डे का दिन था। शौर्य कॉलोनी के गार्डन में खेलने गया था, सुनैना सफाई में लगी थी कई दिनों से उसने नयी नयी मुहब्बत के खुमार में घर को इग्नोर कर रखा था। तो आज सुबह से ही कमरकस कर तैयार थी, विमला जो कि उसके घर काम करती थी, को भी सुबह जल्दी बुला लिया था, सर्दियाँ जा चुकी थी तो गरम कपड़े धूप भी दिखा कर वापस रखने थे।

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शौर्य को दोपहर में खाना खिला कर सुलाया ही था कि विक्रम का फ़ोन आ गया -
“मैंने एक पार्सल भेजा है, तुम लोगों के लिए, मकान की किश्त भी जमा करा दी अब बस छह- सात महीनों में हमें अपने घर का पजेशन मिल जायेगा। ”

 “तुम्हारे पास और कोई बात नहीं क्या, घर पैसा और गाड़ी ...मशीन की तरह ज़िन्दगी हो गयी है मेरी ”-सुनैना की आवाज़ गुस्से और तकलीफ से भर्रा गयी।

“बस तीन महीने की बात और है मेरी जान ! फिर मैं लम्बी छुट्टी पर आ रहा हूँ, तब जी भर के प्यार करेंगे। ”

“रोज़ का खाना रोज़ ही चाहिए न...कई दिनों का खाना एक दिन तो नहीं खा सकते न !” सुनैना चिडचिढ़ाते हुए बोली।

“अरे यार ये क्या घुमा फिरा के बोलने लगी हो आजकल”-विक्रम की आवाज़ तेज हो गयी।

“जैसे तुम कुछ समझते नहीं और जब समझते ही नहीं तो बात ही क्यों करते हो”- सुनैना बिना बात ही गुस्सा किये जा रही थी।

विक्रम पिछले कई दिनों से उसकी ये चिडचिड़ाहट महसूस कर रहा था। उसका सपना बहुत अमीर बनने का था। सुनैना पैसे वाले घर से थी, जब वो उसके पापा से शादी की बात करने गया था, तो उन्होंने उसे बहुत जलील किया था, पर सुनैना उसे बहुत प्यार करती थी इसलिए सबकी मर्जी के खिलाफ भी उसके साथ रही और दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली। सुनैना ने कभी उससे किसी बात की मांग नहीं की। दोनों नौकरी करते थे, मिलजुल कर उनका गुज़र-बसर बढ़िया हो रहा था। शौर्य के होने पर सुनैना के घर वाले पिघल गए। बच्चे के पहले जन्मदिन पर उन्होंने शानदार दावत दी थी जैसे शादी का जश्न हो , पानी की तरह पैसा बहाया था। सुनैना के पिता की बातों और निगाहों से विक्रम को हमेशा ऐसा महसूस होता मानो वो उसे ताना मार रहे हों –

“क्या दे पाए तुम मेरी बेटी और नाती को। “

एक दिन अचानक ऑफिस से लौट कर उसने सऊदी अरब जाने की घोषणा कर दी थी। सुनैना चौंक गयी थी, कितना समझाया था उसने –

“हम जैसे भी हैं खुश हैं, तुम कहीं मत जाओ, धीरे -धीरे पैसा जुट जायेगा तब हम अपनी खुद की कंपनी खोल लेंगे। ”

“मैं इतना इंतज़ार नहीं कर सकता, मुझे पैसा कमाना है ताकि तुम्हारे घरवाले मुझे ताना न दे सकें। ”

”उन्होंने कब ताना दिया? अगर फिर भी तुम्हें ऐसा लगता है तो मैं उनसे मिलना छोड़ दूंगी, पर तुम सऊदी जाने की मत सोचो..कैसे रहेंगे हम? शौर्य अभी दो साल का भी नहीं हुआ। ”

“इसलिए तो मैं जाना चाहता हूँ ताकि उसको बढ़िया स्कूल में पढ़ा सकूँ! उसे अपनी इच्छाएं नहीं मारनी पड़े। तुम समझने की कोशिश करो न यार, मेरा दोस्त राहुल दो साल पहले सऊदी गया था, अब क्या नहीं उसके पास... अपना घर, बड़ी गाड़ी, बच्चे शहर के सबसे महंगे स्कूल में पढ़ रहे हैं। ”

विक्रम जाने का फैसला कर ही चुका था। सुनैना को उसने किसी तरह समझा बुझा कर राजी कर लिया था। उसे गए तीन साल होने को आये थे, साल में केवल दो बार ही इंडिया आ पाता, तो दोनों के जीवन में खालीपन भरना स्वाभाविक था। सुनैना के ऊपर शौर्य की भी ज़िम्मेदारी थी , अब वो स्कूल जाने लगा था। घर में एक फुल टाइम मेड थी और कभी कभी वो अपने नाना नानी के पास चला जाता था। बच्चा, नौकरी और घर की जिम्मेदारियां बस यही सुनैना की दिनचर्या हो कर रह गयी थी। घर महंगे विदेशी सामनों से भरने लगा था पर सुनैना का मन खाली होता जा रहा था। ऐसे में प्रशांत ने आकर उसके जीवन में नए रंग भरने चालू किये, उसका मन एक लड़की की तरह कुलांचे भरने लगा था। उससे बात करते हुए ये भूल जाती कि वो शादीशुदा है, एक बच्चे की माँ है। शौर्य पर भी अब उसका ध्यान कम ही रहता।

 वहां विक्रम पूरे दिन ऑफिस में रहता, उसका मन भी सुनैना और शौर्य के लिए तड़पता था पर वो इस मजबूरी को समझता था। उसे अपने सपने बहुत प्यारे थे जिनके लिए वो कोई भी क़ुरबानी उठाने को तैयार था। पैसे कमाने का जुनून सा भर गया था उसमे। वो पिछले कई दिनों से महसूस कर रहा था कि पैसा भले ही आ रहा हो पर बहुत कुछ बेशकीमती उसके हाथों से छूट रहा था। वो सुनैना में आते बदलाव को लेकर चिंतित भी हो रहा था। उसने बहुत सोचा और रिश्ते में पुराना प्यार और रोमांस वापस लाने की कोशिश में लग गया।

“घर से दूर कौन रहना चाहता है मेरी जान...मैं अगले साल मार्च में हमेशा के लिए वापस आ जाऊंगा”-विक्रम ने स्काइप पर बड़े रोमांटिक होते हुए बोला।

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“तुम्हारी मर्ज़ी ...जब आओ ...गए भी तो तुम अपनी मर्ज़ी से ही थे”- सुनैना की आवाज़ से वो मिठास गुम थी जो विक्रम को दीवाना बनाये रखती थी।

“इस बार हम अपनी एनिवेर्सरी धूमधाम से मनाएंगे”- विक्रम ने उसकी नाराजगी को नज़रंदाज़ करते हुए कहा।

“सब दिन एक से ही तो होते हैं , मुझे तो कोई खास बात नहीं लगती। मुझे ऑफिस को लेट हो रहा है –बाय”- सुनैना ने बिना उसका जवाब जाने लैपटॉप बंद कर दिया।

जब दूरियां पनपने लगती हैं तो मीठे शब्द भी फीके से मालूम होते हैं। विक्रम गुस्से झुझलाहट से भर गया। क्या नहीं कर रहा वो अपने परिवार के लिए पर ये सुनैना क्यों उससे दूर होती जा रही है? जो रात दिन उसको “विक्रम आई लव यू” बोलते बोलते नहीं थकती थी, आजकल उसके कहने पर भी जवाब में “आई लव यू टू” नहीं कहती।

 सुनैना की धड़कनें बढ़ रही थी, मई चालू हो चुका था। बारह तारिख को प्रशांत दिल्ली पहुँच रहा था।

 “क्या पहनूंगी, क्या गिफ्ट दूंगी, क्या बातें करुँगी ? ”- कई कई बार प्लानिंग करती फिर चेंज कर देती।

कई बार उसके मन में विक्रम का ख्याल आ जाता-

“ क्या मैं सही कर रही हूँ ? गलत भी क्या कर रही हूँ ..प्रशांत से थोड़ी बात करके जिंदा ही तो रख रही हूँ खुद को, वरना अकेलेपन से घुट घुट कर मर रही थी। ”

बेसब्री से इंतज़ार करते करते आखिर बारह तारीख़ आ ही गयी, प्रशांत शहर में आ चुका था। उस रात सुनैना को नींद नहीं आई। प्रशांत भी व्यस्तता के चलते उससे ज्यादा बात नहीं कर पाया। तेरह को वो ऑफिस से सीधे ही प्रशांत के शो में पहुंची। शाम पांच बजे उद्घाटन था, गेस्ट धीरे धीरे आ रहे थे। शहर के कई बड़े लोगों को वहां देख कर सुनैना को प्रशांत के नाम और रुतबे का अंदाज़ा हुआ। प्रशांत की नज़र जैसे ही सुनैना पर पड़ी वो सब को छोड़ उसके स्वागत के लिए लपका।

“अरे तुम तो जैसे आकाश लपेट कर आई हों..कमाल लग रही हो साड़ी में। ”

 एक पल के लिए जैसे सुनैना की धड़कनें रुक गयीं। प्रशांत भी आसमानी रंग का कुरता पहने हुआ था।

“लोग सोचेंगे... हम दोनों ने प्लानिंग करके एक सा रंग पहना होगा..”-सुनैना मन ही मन सकुचाई।

“सेम पिंच...जब दिल मिले होते हैं तो ऐसा ही होता है”-प्रशांत ने जैसे उसके मन की बात सुन ली हो।

 सुनैना ने देखा प्रशांत ने कंधे तक लम्बे घुंघराले बाल पोनीटेल में बांध रखे थे।

“वाकई बहुत बहुत हैंडसम है”- सुनैना ने मन ही मन आह भरी।

 केवल दो महीने की पहचान थी और लग रहा था कि बरसों से मिलने को बेताब हैं। प्रशांत भीड़ के बीच ज्यादा बातें नहीं कर पाया। उद्घाटन के बाद पेन्टिंग्स देखी गयीं, तस्वीरें खींची, चाय नाश्ता हुआ। प्रशांत की महिला प्रशंसकों ने उसे घेर रखा था, प्रशांत को उनके बीच हँसता खिलखिलाता देख उसे जलन महसूस हुई। सुनैना वहां से जल्दी ही निकल आई थी।

 देर रात प्रशांत ने सुनैना को फ़ोन किया।

“मिल गयी फुर्सत? ”-सुनैना ने थोडा बेरुखी से बोला।
“सॉरी बेबी, आज मैं तुम्हे टाइम नहीं दे पाया। कल मेरे साथ डिनर पर चलोगी? प्लीज ..प्लीज ”


सुनैना “न” कैसे कहती? वो तो प्रशांत का साथ पाने को बैचैन थी।

 शौर्य की छुट्टियाँ चालू हो चुकी थी तो उसे दादा दादी के घर भेज दिया। मेड को भी दोपहर का खाना बना कर जाने के लिए बोल दिया। कई बार तो मन किया कि प्रशांत को घर ही बुला ले पर फिर उसके दिमाग ने उसे सलाह दी, इतनी जल्दी किसी को घर बुलाना ठीक नहीं। और अगर किसी पडोसी ने देख लिया तो फालतू ही बातें बनेंगी, अकेले तो संभल के रहना होगा।

 ऑफिस से लौटने के बाद उसने अलमारी से निकाल-निकाल कर कई कपड़े ट्राई करे, आखिर में उसने गुलाबी रंग का लॉन्ग फ्रॉक जिस पर नीले रंग के छोटे छोटे फूल बिखरे हुए थे, पहन लिया। विक्रम ने ये ड्रेस उसे शादी की सालगिरह पर तोहफे में दी थी। खुद को देर तक शीशे में निहारती रही, अपने शरीर में उसे सरसराहट होती महसूस हुई। जब से प्रशांत मिला है उसका मन फ्रॉक पर बने इन फूलों की तरह ही खिला खिला रहने लगा है।

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प्रशांत को उसने कॉलोनी के बाहर ही रुकने को बोला था, प्रशांत का फ़ोन आने पर वो पैदल ही घर से निकल पड़ी, रात के साढ़े आठ बज रहे थे पर हवा में अभी भी सूरज की बिखेरी गर्माहट बरकरार थी। जब तक प्रशांत की कार तक पहुंची तब तक पसीने से तरबतर हो चुकी थी, पसीने के साथ मिल के उसका लगाया गुलाब इत्र और ज्यादा महकने लगा था। प्रशांत ने कार का एसी तेज़ किया और रुमाल निकाल कर उसके माथे पर चमक रही पसीने की बूंदों को बड़े एहतियात से पोंछा।

“बड़ी खूबसूरत लग रही हो ..”

सुनैना ऐसे शरमाई, जैसे कोई लड़की पहली बार डेट पर जा रही हो। उसने प्रशांत की तरफ देखा, वो ब्लू डेनिम की शर्ट और कार्बन ब्लू जीन्स पहना हुआ था, अपने घुंघराले बाल उसने खोले हुए थे। प्रशांत के चेहरे में एक जादू था। वो खुद को उसकी तरफ खिंचता हुआ महसूस कर रही थी। तभी विक्रम का फ़ोन आने लगा, सुनैना को घबराहट होने लगी। उसने फ़ोन उठाया।

“हेल्लो प्रशांत”- हडबडाहट में उसके मुंह से निकला

“प्रशांत ? कौन प्रशांत”-विक्रम ने आश्चर्य से पूछा

सुनैना को लगा उसे रंगे हाथों पकड़ लिया गया हो, प्रशांत ने उसकी तरफ पानी की बोतल बढ़ाते हुए शांत होने का इशारा किया।

“ अरे यार, फ़ोन बुक काम नहीं कर रही, बार बार हैंग हो जाता है। एक क्लाइंट का कॉल आने वाला था उसी का नाम प्रशांत है” सुनैना ने दिमाग दौड़ते हुए बात बनाई।

“ ओह ओके इस बार नया फ़ोन भेजता हूँ। कहाँ हो? कब से फ़ोन ट्राई कर रहा था ? ”- विक्रम ने चिंतित होते हुए कहा।

“वो वो मैं रमैया के साथ शौपिंग करने आई थी, फ़ोन पर्स में था इसलिए आवाज़ नहीं आई”-उसने हिचकिचाते हुए कहा सुनैना ने पहले कभी विक्रम से झूठ नहीं बोला था। और आज झूठ पर झूठ बोले जा रही थी। उसे अपराधबोध हो रहा था। वो सोच में डूब गयी।

“अगर विक्रम को पता चल गया तो, कहीं रमैया उसे फ़ोन न कर दे, कहीं...”

“पता है आज मेरी तीन पेंटिंग्स सेल हुईं, तुम मेरे लिए बहुत लकी हो सुनैना। ”

प्रशांत की आवाज़ ने उसके विचारों का क्रम रोका।

“ओह रियली! वाओ”

प्रशांत उसे शहर से दूर एक रिसोर्ट में ले गया, जहाँ उन दोनों को पहचाने जाने का डर न हो। खुली मखमली घास पर हल्की हल्की रोशनी बिखरी हुई थी, दूर-दूर रखी टेबल्स पर कुछ जोड़े नज़र आ रहे थे। वो पहली बार विक्रम के अलावा किसी और आदमी के साथ यूँ बाहर आई थी। उसका मन खुश भी था और डरा हुआ भी !

प्रशांत बहुत सहज था, वो बात बात में उसे छूता, कभी उसका हाथ थाम लेता। प्रशांत ने शैम्पेन मंगाई।

“ये हमारी पहली मुलाकात के नाम”- कहते उसने उसका ढक्कन हवा में उछाल दिया।

 शैम्पेन के छीटें सुनैना के चेहरे और फ्रॉक पर भी आ गिरे, दोनों ने एक दूसरे को एक एक घूंट पिलाया। धीमे धीमे सुरूर छाने लगा, प्रशांत की कही हर बात पर वो दिल खोल कर हँस रही थी। सुनैना जैसे बादलों पर उड़ने लगी, मन में बार बार आ रहे अपराधबोध को दरकिनार कर उसने उस शाम को खुल कर जीने का मन बनाया। प्रशांत ने उसे डांस करने को कहा तो वो सकुचा कर इधर उधर देखने लगी।

“ये हमारा पर्सनल स्पेस है डिअर और इतनी कम रोशनी में कोई क्या कर रहा है , कोई नहीं देख सकता सब अपने आप में डूबे हुए है ..जैसे मैं तुम्हारे में डूबा हूँ” -प्रशांत ने उसके करीब आते हुए कहा।

“सुनैना”

“हाँ... प्रशांत”

“आई लव यू”- प्रशांत ने हाथ उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा।

सुनैना उसका हाथ थाम कर खड़ी हो गयी। उसने मन ही मन सोचा-

“मैं कब से तुम्हारे मुँह से ये सुनना चाहती थी। ”

दोनों एक दूसरे को बाँहों में लिए रोमांटिक गाने पर थिरकने लगे, दोनों की धड़कने बज रहे संगीत से ज्यादा तेज़ हो चली थीं। एक दूसरे में घुल जाने को उनके जिस्म बेताब थे। पर संकोच उन्हें रोके हुए था।

“चलो खाना खा लें, ग्यारह बजने वाले हैं, मुझे घर भी तो जाना है”- सुनैना ने प्रशांत से दूर होते हुए कहा।

“आज जाने की जिद न करो”- कहते हुए प्रशांत ने उसकी गर्दन पर हौले से चूम लिया।

प्रशांत के शरीर से उठ रही खुशबू पहले से ही उसे मदहोश किये हुए थी। सुनैना मन ही मन तड़प उठी-

“कितना समय हो गया है ... विक्रम ने मुझे नहीं छुआ... कितनी ही शामें अकेलेपन के अंधेरों में डूब गयीं। ”

“प्रशांत प्लीज ! सब देख रहे है”- कहते हुए वो अपनी कुर्सी पर जा बैठी।

खाना खा तो रही थी पर उसे स्वाद नहीं आ रहा था। वो सुलग रही थी, मन सारी वर्जनाएं तोड़ कर प्रशांत का होना चाहता था। प्रशांत उसकी दुविधा समझ रहा था, औरतों के मामले में वो काफी अनुभवी था, इसलिए किसी तरह की जल्दबाजी नहीं करना चाहता था। सुनैना के अकेलेपन और प्यार पाने की चाहत को वो बखूबी समझता था। वो सच में सुनैना को चाहने लगा था। उसके मन में भरोसा था कि सुनैना आज नहीं तो कल उसकी हो ही जाएगी।

वापस लौटते समय कार में चुप्पी छाई रही, एक जगह मोड़ आते ही प्रशांत ने कार रोक दी। स्ट्रीट लाइट्स जल नहीं रही थी। अँधेरे ने प्रशांत को थोड़ी हिम्मत दी।

“इतनी चुप क्यों हो ...कुछ बुरा लग गया क्या? ”

“नहीं तो”

“प्यार करती हो मुझसे ? ”

“पता नहीं”

प्रशांत ने उसके बालों में हाथ फेरा, उसका चेहरा अपनी तरफ घुमाया, मन में चल रही उथलपुथल सुनैना के चेहरे पर साफ़ नज़र आ रही थी। प्रशांत ने सीट बेल्ट खोलते हुए उसको बाँहों में भर लिया, सुनैना ने कोई विरोध नहीं किया। दोनों की पकड़ एक दूसरे पर कसती गयी। प्रशांत उसे बेतहाशा चूमने लगा। सुनैना ने खुद को पिघलने दिया। वो उन पलों में विक्रम को तलाश रही थी। सुनैना ने प्रशांत के होठों पर अपने होंठ रख दिए। दोनों पूरी तरह से बह रहे थे। प्रशांत सुनैना की कमर सहलाते हुए कहा -

“चलो न जान किसी होटल में चलते हैं, अब खुद को रोका नहीं जा रहा। ”

सुनैना को जैसे अचानक करंट सा लगा, वो प्रशांत के साथ है ...विक्रम के नहीं! उसने खुद को झटके से प्रशांत से अलग किया।

“प्लीज मुझे घर छोड़ दो..”

“लेकिन...”

“नहीं प्रशांत ये सब ठीक नहीं, मैं विक्रम को धोखा नहीं दे सकती”

“इसमें धोखा क्या है ? डार्लिंग हम एक दूसरे को चाहते हैं, प्यार कर रहे हैं”

“मुझे घर छोड़ दो..मैं तुमसे प्यार नहीं करती”

“विक्रम अगर तुम्हे प्यार करता तो इतनी खूबसूरत बीवी को छोड़ वहां पैसे के पीछे क्यों भागता”- प्रशांत ने सुनैना का हाथ थामने की कोशिश की।

“प्लीज प्रशांत...वो मुझे प्यार करे न करे पर मुझे अभी भी लगता है कि मैं इस तरह से सिर्फ उसे ही प्यार कर सकती हूँ”-सुनैना ने अपने हाथ छुड़ा लिए।

प्रशांत ने खुद को काबू किया, उसका ज्वार उतर चुका था। उसने गाड़ी स्टार्ट कर दौड़ा दी।

“तुम अकेले हो प्रशांत पर मेरे साथ मेरा परिवार है, पता नहीं ये सब कैसे हो गया मुझसे। ”

सुनैना का घर आते ही प्रशांत ने गाड़ी रोक दी।

“आई ऍम सॉरी प्रशांत...अब हम कभी नहीं मिलेंगे। ”

प्रशांत सुनैना के कठोर चेहरे को देख रहा था, उसने फीकी सी मुस्कान लिए सिर हिलाया और कार आगे बढ़ा दी। सुनैना थके हुए कदमों से घर में दाखिल हुई। उसे विक्रम की बहुत याद आने लगी। कपड़े बदल कर उसने अपने लिए कॉफ़ी बनाई, आज कई दिनों बाद उसने ब्लॉग पर लिखना चालू किया।

“दूरियाँ कभी भी न भरने वाली खाई में बदल सकती हैं। फिसलने में एक कदम लगता है और रास्ते पर वापस लौटने में मीलों भी चलो, तो कम पड़ जाता है। इसलिए क्या ज़रूरत ज़िन्दगी को निगल रही है ? ज़रूरत, लालसा ज़िन्दगी से ज्यादा कीमती तो नहीं हो गयी ? ये तय कर लेना बहुत ज़रूरी है। कई बार हम कमज़ोर............”

वो आधी रात तक रौ में बह कर लिखती गयी। विक्रम देर रात उसके ब्लॉग को पढ़ रहा था। उसकी आँखों में नमी उतरने लगी थी। वो ज़रूरत और ज़िन्दगी में फ़र्क समझने की कोशिश कर रहा था।


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