सोमवार, फ़रवरी 27, 2017

गुरमेहर कौर और संसार के समस्त नौजवानों के नाम खुला खत : शुऐब शाहिद


 Open letter to Gurmehar Kour Shoeb Shahid

संसार का इतिहास साक्षी है कि आज तक सबसे अधिक मानव रक्त राष्ट्र के नाम पर बहा है। 

कोई भी राष्ट्र किसी मनुष्य की पहचान हो सकता है, लेकिन जब यही राष्ट्र घमण्ड करने का कारण बन जाए, इससे अधिक घिनौना कुछ हो नहीं सकता।

कुछ सोचने-समझने-कहने के पहले विडियो देख लीजिये


पूरे संसार के मनुष्य एक बिरादरी हैं। ये बात 'आस्तिक' लोग इस आधार पर भी कह सकते हैं कि पूरी मानवजाति और ब्रह्माण्ड की रचना एक ही ईश्वर ने की है। मानव के 'एक' बिरादरी होने पर 'नास्तिक' भी इंकार नहीं करते। भले ही इसका आधार वो कुछ भी मानते हों। 

इस पूरे संसार का दुर्भाग्य ये है कि हम 'विश्व बंधुत्व' की बात तो करते हैं लेकिन एक दूसरे पर खुद को प्राथमिकता देते हैं। खुद पर घमण्ड करते हैं। और दूसरों को अपने से तुच्छ समझते हैं। 'विश्व बंधुत्व' तो दूर की बात है, घमण्ड की बुनियाद पर तो एक परिवार को भी इकट्ठा नहीं किया जा सकता।

राष्ट्रवाद की बहुत सी परिभाषाएँ दी जाती रही हैं। मैं इसको इस तरह समझा हूँ -
''किसी विशेष क्षेत्र में बसने वाले लोग, जो अपनी भाषा, संस्कृति या रंग-रूप के कारण से बाकी इंसानों से भिन्न हों, एक 'राष्ट्र' कहलाते हैं। ये राष्ट्र एक पहचान है लेकिन जब किसी राष्ट्र के लोग 'पहचान' से आगे बढ़ कर खुद पर इसलिए घमण्ड करने लगें की वह उक्त राष्ट्र से सम्बन्ध रखते हैं, यही राष्ट्रवाद (नेशनलिज़्म) है।''

मानव मस्तिष्क का स्वभाव है की जब वो स्वयं पर घमण्ड करता है तो अपने आप दूसरे मनुष्यों को तुच्छ समझने लगता है। यही कारण है कि ''सँभार के समस्त देश सदैव से खुद को महान मानकर दूसरों पर अपनी महानता को थोपते आये हैं'' यही तो 'साम्राज्यवाद' है। 20वीं शताब्दी के मध्य तक भी यह घमण्ड करने की विचारधारा अनौपचारिक थी, परन्तु दुर्भाग्य की बात है कि इतनी बड़ी बुराई को न केवल पूरे विश्व ने स्वीकार कर लिया, बल्कि औपचारिक रूप से इसे मान्यता प्रदान की। 'संयुक्त राष्ट्र' दरअसल इसी राष्ट्रवाद की स्थापना थी। समाज को 'राज्य' से अनुशासित किया जा सकता है, लेकिन इसी 'राज्य' को 'नेशन स्टेट' बनाना ही मज़ाक था। संसार के प्रत्येक क्षेत्र ने दावा किया की फलां क्षेत्र 'हमारा' है, हमारे पूर्वजों का है, हमारा गौरवशाली इतिहास का सवाल है, हमें हमारा देश दे दो। उन्हें दे दिया गया।


इस आधार मुख्यतः तीन प्रकार के झगड़ों ने जन्म लिया -
1. एक विशेष राष्ट्र के द्वारा स्थापित 'राज्य' में किसी अन्य व्यक्ति के लिए कोई स्थान नहीं। किसी अन्य व्यक्ति की संतान को भी कोई इंसान नहीं राष्ट्र की बहुसंख्यक सदैव ही ये दावा करते रहेंगे कि यह देश उनका है जबकि अल्पसंख्यक प्रजाति उनकी तरह 'महान' नहीं हो सकती, क्योंकि वह उनमें से नहीं है। उदाहरण के विश्व के सभी देश हैं लेकिन भारत में मुसलमान, पाकिस्तान में मुहाज़िर, अमरीका में ग़ैर अमरीकी और सऊदी अरब में ग़ैरअरबी को मुख्य रूप से गिना जा सकता है।

2. दूसरा सबसे बड़ा बिगाड़ ये हुआ कि खुद को 'महान' समझने वाला राष्ट्र सदैव ही इस प्रयास में रहता है कि ''चूंकि वह 'महान राष्ट्र' है और इसलिए सम्पूर्ण संसार पर शासन करना उसका जन्म सिद्ध अधिकार है। इसलिए वह अपने से कमज़ोर राष्ट्र पर इसी तरह उत्पीड़न करके अपने कब्ज़े में ले लेता है जिस प्रकार दौलत के घमण्ड में चूर कोई साहूकार किसी निर्धन के घर पर कब्ज़ा कर लेता है। उदाहरण के इंग्लैंड से लेकर अमरीका तक दुनिया पड़ी है।

3. राष्ट्रवादी राज्यों के गठन का एक बड़ा दुष्परिणाम ये भी हुआ कि अब जब पूरी दुनिया एक दूसरे के लिए परायी हो गयी तो अब सवाल अपनी अपनी शक्ति के प्रदर्शन का था। इंसानों की धरती को चिड़ियाघर बनाया गया। पिंजरे बनाये गए। आने जाने पर पारपत्र (Passport) लगाए गए। लाइने खींची गईं। और उन लाइनों पर सेनाओं को बैठाया गया। और इन सैनिकों का काम ये है कि ये सब बस इसलिए अपनी जान दे दें कि इनके लड़ने-मरने से राजधानियों में बैठे चंद नेताओं की मूँछें ऊंची होती है। राष्ट्र के घमंड में चार चाँद लगते हैं।

इन तमाम फसादों के बाद दुनिया का नारा है कि 'विश्व बंधुत्व' होना चाहिए। जिस मोहल्ले में हर घर से एक दूसरे घरों पर राइफलें तनी हों, क्या वहाँ आपसी भाईचारे की बात की जा सकती है। कमाल ये भी है कि हर एक घर वाले अपने पड़ोसी को कच्चा चबा जाना चाहते है, और दावा ये कर रहे हैं कि वह इसलिए लड़ रहे हैं ताकि मोहल्ले में शान्ति स्थापित की जा सके।

इन हालात के परिणाम आपके सामने हैं, 2002 में मोदी का गुजरात हो या 2017 में ट्रम्प का अमरीका।
नारा एक ही है ''ये मेरा देश है, तुम्हें यहाँ जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं।''

'विश्व बंधुत्व' मोहब्बत से कायम हो सकता है, नफरतों की बुनियाद पर नहीं। नफरतों की बुनियाद पर सिर्फ खून बहा करता है। तबाहियाँ हुआ करती हैं। घर लुटा करते हैं, कभी बसा नहीं करते।


ऐ दुनिया भर के अमन पसन्द नौजवानों,
मैं जानता हूँ कि मेरी आवाज़ तुम तक ज़रूर पहुंचेगी। मैं दुनिया के उन तमाम शातिर नेताओं से कोई उम्मीद नहीं रखता जो सिर्फ इस धरती पर नफरत बोना जानते हैं। जो नई नस्ल को सरहदों का चारा बनाना जानते हैं। ऐसे लोग सिर्फ अपने घमण्ड और अकड़ को स्थापित करना चाहते हैं। वो चाहते हैं कि हम उनके ढंग से सोचें। जिससे वो नफरत करने को कहें उससे हम नफ़रत करें।

लेकिन बता दो उन्हें कि हम उनके हाथों की कठपुतली नहीं हैं। हम नफरत करने वाले और आपस में लड़ने वाले जानवर नहीं हैं। हम इंसान हैं। हमारे सीनों में एक ज़िंदा दिल है जो इंसानों की मोहब्बत में धड़कता है। जो हर हाल में हमें एक दूसरे के करीब करता है।

याद रखो, ये वही ज़मीन है जिस पर मोहम्मद (सल्ल०), ईसा मसीह (अलै०), मूसा (अलै०), महात्मा बुद्ध और गुरु गोविन्द सिंह जैसे पवित्र इंसानों ने मोहब्बत का पैगाम सुनाया है। ये वेदों और भगवत गीता की धरती है जिसने हमें सिखाया है कि ''मनुष्य जन्म से नहीं, कर्म से महान होता है।''

अन्त में सलाम करता हूँ छोटी बहन गुरमेहर कौर को, जिसने हम नौजवानों के भावों को शब्द दिए। धमकियों से घबराने या परेशान होने की आवश्यकता नहीं है तुम्हें, इस देश के ही नहीं बल्कि संसार के तमाम हक़ पसन्द नौजवान तुम्हारे साथ हैं।

- क्रान्तिकारी अभिवादन सहित
शुऐब शाहिद


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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