शुक्रवार, फ़रवरी 17, 2017

सुन्दर मौसम तो बस यादों में ही रह जाते हैं — स्मिता सिन्हा




स्मिता सिन्हा

       की कवितायेँ 


आदत 

आकाश के आमंत्रण पर
अब भी घिर आते हैं
काले काले बादल
और बरसती हैं बूंदें
उन नन्ही बूंदों को
अपनी पलकों पर सहेजे
मैं अक्सर आ बैठता हूँ
उसी सुनी मुंडेर पर
जहां जाने कितने आकाश
उतर आते थे उन दिनों
हमारी आँखों में
तुम्हें याद है
उस दिन
एक उड़ते कबूतर के
पंख टूटने पर
कितनी आहत हुई थी तुम
रोती रही बेहिसाब
और मैं सोखता रहा
तुम्हारे उन आँसूओं को
अपनी हथेलियों में
ये हथेलियां अब भी नम हैं
सोंधी सी महक है इसमें तुम्हारी
मैं अब अक्सर अपने चेहरे को
इन हथेलियों में छुपा लेता हूँ
इन हथेलियों को आदत थी
तुम्हारी उँगलियों की

कितने सलीके से उलझती थीं
ये तुम्हारी उँगलियों से
कभी नहीं छूटने के लिये
ये आदतें भी कमाल होती हैं न
हमें थी एक दूसरे की आदत
एक दूसरे के साथ हँसने की आदत
हँसते हँसते रो देने की आदत
हम कभी नहीं पूछते थे
एक दूसरे से यूँ रोने की वज़ह
शायद हमें शुरु से ही अंत का पता था
पता था कहाँ और किस मोड़ पर
रुकना है हमें
होना है अलग
फ़िर कभी नहीं मिलने के लिये
उन रास्तों पर अब कोई नहीं जाता
पर मैं अब भी निकल आता हूँ अक्सर
वहीं उन्हीं रास्तों पर
उसी मोड़ तक
अब अक्सर ही लिखता हूँ मैं
प्रेम कवितायें
लिखता हूँ एक अनजान शहर
कुछ अनजाने रास्ते
और बेतकल्लुफी में गुज़रते
दो अजनबी
कुछ अनजानी तारीखें
और इन तारीखों में सिमटी
तमाम जानी पहचानी यादें
मैं कभी नहीं लिखता
उदास वक़्त के उदास शब्द
उदास सा मुंडेर
उदास सी हंसी
उदास आँखें
मैं चाहता हूँ
कि मुझे आदत हो
खुश रहने की
मुझे आदत हो
खुद जीने की
मैं अब मुक्त होना चाहता हूँ
इस प्रारब्ध से
जहां सब कुछ होते हुए भी
अक्सर प्रेम ही चूक जाता है
मेरे जीवन में...........



'विदा'

सिगरेट के लम्बे गहरे कश के साथ
मैं हर रोज़ उतरता हूँ
अँधेरे की गंध में डूबे उस तहखाने में
जिसके प्रस्तरों पर
अब भी बिखरे से पड़े हैं
जाने कितने मखमली ख्वाब
जो कभी साझे थे हमारे
बंद आँखों को मैं
और कसकर बंद करता हूँ
ताकि बचा सकूं कुछ स्मृतियों को
बिखरने से पहले
सहेज सकूं उनके कुछ अवशेष !

वह झरोखा तो अब भी वहीं है
तो शायद अब भी होगा
वह एक टूकड़ा चाँद वहीं कहीं
उसी दरख्त के पीछे
पर नहीं
कुछ झरोखे गर्द सीलन से भरी हवा लाते हैं
जो घोंटतीं हैं सांसे
मैं चुपचाप चलता जाता हूँ
सन्नाटे में डूबे गलियारों में
तुम्हारे निशानियों को टटोलते हुए
कि दे सकूं तुम्हें
तुम्हारे पसंद के गुलमोहर के कुछ फूल
कि सुन्दर मौसम तो बस यादों में ही रह जाते हैं !

सिगरेट की हर कश के साथ
मैं भटकता हूँ
खूब भटकता हूँ
खुद को खो देने की हद तक
और फ़िर सोचता हूँ
क्या ये मुनासिब नहीं होता कि
एक झूठी सी गफलत ही सही
बाकी रहती हम में कहीं
कि ये जो कुछ कच्चा पक्का सा है
हमारे रिश्ते में
अब भी कायम है और यूँ ही रहेगी सदा
तुम्हें पता है
सिगरेट के हर कश के साथ
मैं उलझता हूँ
अटकता हूँ हर बार
वहीं उसी लम्हे में
कि आखिर क्यों कहा तुमने मुझसे
हमारे बीच का वो आखिरी शब्द 'विदा '॥


कहानी 

इस कहानी में अक्सर
मैं होती हूँ
तुम होते हो
और होते हैं
उलझते ख़त्म होते से संवाद !

इस कहानी में
अक्सर ही रह जाते हैं
असंख्य असहज से शब्द
कुलबुलाते बुदबुदाते
तिलिस्म के अंधेरे में
शब्दों से टकराते शब्द
और पीछे छूटता
एक अनकहा सा सन्नाटा
उस अनकहे में भी
जाने कितना कुछ
कह जाते हैं हम
एक दूसरे से
पर कभी समझना नहीं चाहते
उस कहे को !

इस कहानी में
अक्सर ही मैं सजाती हूँ
वह एक खुद का कोना
और रख आती हूं वहां
अपना मन बड़े सलीके से
कि कभी तुम आओ तो
साझा करूं उस मन को
तुम्हारे साथ !

यूँ देखा जाये तो
और क्या चाहिये हमें
इस एक कहानी में
बस यही न कि
हो एक टूकड़ा आसमां
और छोटी
बेहद छोटी सी उड़ान
ताकि लौट सकें वापस
एक दूसरे के पास
वक़्त के रहते
चुटकी भर पीली चटकीली धूप
और ओस की बूँदों में नहाई
हरी कोमल पत्तियाँ
हमारे नाजुक सपनों की तरह
मुठ्ठी भर छलकती हंसी
और ढेर सारी तसल्ली व दिलासा
कि होगी बेहतर
और बेहतर ज़िंदगी !

वैसे इस कहानी में
अगर कभी पुछ पाऊँ
तो इतना ज़रूर पूछना चाहूंगी तुमसे
कि कहीं ज़िंदगी जीने की कोशिश में
हम हर दिन ,हर एक दिन
खुद को ,एक दूसरे को
खोते तो नहीं जा रहे हैं.......


विभ्रम की स्थिति

अब इसका निर्णय
कौन लेगा
कि तुम सही हो
या गलत
इस विभ्रम की स्थिति में
जब तुम ही प्रेक्षक हो
इस कालचक्र के
जहाँ वक़्त जकड़ा हुआ है
तुम्हारे ही तर्कों में
उस एक वक़्त में जब
तुम्हारा ही एक तर्क
तुम्हें सही साबित करता है
और दूसरा गलत
जब तुम स्तब्ध होते हो
होते हो आशंकित
विवर्तों में घिरे
और
इस निर्लिप्त
संवादहीनता की स्थिति में
जब तर्कों की लड़ाई जारी है
एक संयमित स्पष्ट मौन ही
तुमसे अपेक्षित है
क्योंकि इसके आगे भी
हर परिणाम में तुम ही होगे
जीत में भी तुम
हार में भी तुम..........


परिकल्पित सच

दरअसल ये सिर्फ तुम्हारी सोच थी
कि ये लड़ाई उनके बीच की है
और तुम हो निर्णायक भूमिका में
देखा तुमने
कैसे खड़े थे वे आमने सामने
अपने अपने परिकल्पित सच को लेकर
तमाम संदर्भित विमर्शो के साथ
ऐसा सच
जिसके तलुवों से लहू रिस रहा था
और जो लगातार बना रहे थे
सदियों तक अमिट रहने वाले
सैकड़ों रक्तरंजित पदचिन्ह
तुम्हारी नज़रों के सामने
 टूट टूटकर बिखरता रहा सच
और तुम बस खामोश देखते रह गये

आज जब वक़्त बेचैन है
और बेबस भी
तुम यूँ नेपथ्य में नहीं रह सकते
क्योंकि शुरू से अंत तक
सिर्फ़ तुम ही अभिमंचित रहे हो
इस कथानक में............


कुछ  नहीं   बदलता 

उस रोज़ देखा मैंने
तुम्हें खुद को धोते ,
पोंछते ,चमकाते
करीने से सजाते हुए
कितने व्यस्त थे तुम
खुद को बचाने में
जबकि तुम्हें बचाना था
अपने वक़्त कि
कई कई नस्लों को
कुछ नहीं बदलता
गर तुम रहने देते
अपनी कमीज़ पर
काले गहराते खून के धब्बे
और सहेजते बाकी बचे
खून को बहने से
लेकिन कलफ लगी
झक्क सफ़ेद कमीज़ पहनना
ज़रूरी लगा तुम्हें
कुछ नहीं बदलता
गर तुम रुकते थोड़ी देर
और सिखाते उन कदमों को
चलने कि तमीज
लेकिन जूतों का नाप लेना
ज्यादा ज़रूरी था तुम्हारे लिये

तुम्हें पता है
जब तुम कर रहे थे
अपनी अपनी शक्लों की लीपापोती
ठीक उसी वक़्त
गहरे तक खरोंची जा रही थी
कहीँ इंसानियत
हैवानियत उफान पर था
देखो तो जरा
खून में लिपटे
उन ठंडी पड़ी गोश्त के टुकड़े
तुम्हारे नाखूनों में तो
फँसे नहीं पड़े हैं
जाओ धो डालो इन्हें भी
समय रहते ही
बेहद ताजे व जिंदा सबूत हैं
ये तुम्हारे खिलाफ़
बोल उठेंगे कभी भी.................


विश्वास

उस दिन कितने विश्वास से
पूछा था तुमने
"माँ ,तुम सबसे ज्यादा मज़बूत हो न !
तुम तो कभी नहीं रो सकती ।"
और
मैं बस मुस्कुरा कर रह गई
तुम्हें पता है
उस दिन
उसी वक़्त
मैंने छुपाई थीं
कुछ बूँदें
जो आँखों की कोर से
छलक पड़े थे
हो तो ये भी सकता था
कि मैं रोती तुम्हारे सामने
फूटफूटकर
समझाती तुम्हें कि
रोने का मतलब
कमज़ोर होना नहीं
पर मैं चुप रही
तुम्हारा विश्वास बचाना
ज़रूरी लगा था मुझे
उस दिन.............


हस्तक्षेप 

ज़रुरी होता है चलते चलते
रुककर ठहरकर
अपने आस पास देखना
क्योंकि अक्सर ही छूट जाते हैं
हम जैसे लोग इस भीड़ में अकेले
रह जाते हैं शेष
कुछ साझे रास्तों पर
कुछ साझे क़दमों में !

हाँ ज़रुरी होता है
सच और सपनों के
बीच के फ़र्क को जानना
पहचानना परछाईयों को
अंधेरों में गुम होने से पहले
क्योंकि अक्सर ही
मुखौटों के पीछे पाये जाते हैं
स्वांग भरते कुछ किरदार
हमारे करीब के दृश्यों में ,
रंगो में ,रौशनी में !

और हाँ
यह भी ज़रुरी होता है कि
हम हों बेहद शांत, सुव्यवस्थित
उस विरुद्ध प्रश्नकाल में भी
और धीरे धीरे निगलते जायें
उन सभी शब्दों को
जो चाहते हों चीखना
हमें नये सिरे से परखना
क्योंकि आज नहीं तो कल
यही शब्द उठेंगे हमारे खिलाफ
और करेंगे हस्तक्षेप हमारे होने पर भी........



स्मिता सिन्हा

स्वतंत्र पत्रकार, फिलहाल रचनात्मक लेखन में सक्रिय
शिक्षा : एम ए (एकनॉमिक्स ),पटना, पत्रकारिता (भारतीय जनसंचार संस्थान ), बी एड (कुरुक्षेत्र विश्विद्यालय )
विभिन्न मीडिया हाउस के साथ 15 से ज्यादा वर्षों का कार्यानुभव, एम बी ए फेकल्टी के तौर पर विश्वविद्यालय स्तर पर कार्यानुभव
प्रकाशित काव्य संग्रह : हिन्दी युग्म द्वारा प्रकाशित "सौ क़दम", 'कथादेश 'आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित
मोबाईल : 9310652053
ईमेलsmita_anup@yahoo.com



(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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