पूर्वांचल से निकलने में ही भलाई है!! — शेखर गुप्ता



शेखर की दीवार 

हमें यह स्वीकार करना होगा कि पूर्वोत्तर भारत देश का एक ऐसा हिस्सा है जिसे सबने भुला दिया है

पूर्वांचल से निकलने में ही भलाई है!! — शेखर गुप्ता



अमेरिकी प्रभाव से अवगत लोग बैडलैंड शब्द से अवश्य परिचित होंगे। इसका अर्थ होता है सूखा और बंजर इलाका। उत्तर प्रदेश के कई इलाके भी इस परिभाषा पर सही बैठते हैं। खासतौर पर बुंदेलखंड में यमुना और चंबल के आसपास बंजर इलाके और घाटियां तथा इटावा का इलाका इस पर सटीक बैठता है। 
मोदी ने इस क्षेत्र के आर्थिक वजहों से हो रहे विस्थापन का जिक्र किया। ऐसी गलती राहुल गांधी को 2012 के विधानसभा चुनाव में करते देख चुके हैं। 

पूर्व की ओर रुख करें तो परिदृश्य बदल जाता है और वहां हरियाली है, नदियां हैं और उनके उर्वर किनारे भी हैं। लेकिन वहां भी कानून व्यवस्था में गिरावट जीवन स्तर में गिरावट से होड़ लेती है। खुली और अपनी हद से परे जाकर बहतीं नालियां और सीवर, नंगे तार, हवा में स्थायी बदबू, सड़कों पर गड्ढों, अतिक्रमण, अल्पपोषित बच्चे, सूखे गालों वाले वयस्क, हर साल जापानी बुखार जैसी बीमारियों से सैकड़ों लोगों की मौत। कहीं से भी गुजरते हुए गंदगी का ढेर नजर आता ही है। उसमें बोतलों, प्लेट, बैग आदि की शक्ल में प्लास्टिक की मिलावट इस कचरे को स्थायी बना देती है। गोरखपुर और उसके आसपास के अपेक्षाकृत पॉश इलाके में जहां नए शॉपिंग मॉल, रेस्तरां और स्पा आदि खुल आए हैं वहां जरूर साफ सफाई नजर आती है। गोरखपुर को नाउमीदी का गढ़ बन चुके पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजधानी माना जा सकता है।

कोई फिल्मकार 6 करोड़ भारतीयों की इस भुला दी गई जमीन पर उड़ता पूर्वांचल जैसी फिल्म नहीं बनाएगा।
उत्तर में इसकी सीमा नेपाल से लगी हुई है। पूर्वी जिले बिहार की सीमा से सटे हुए हैं। वहीं दक्षिण में देवरिया, आजमगढ़, बलिया, जौनपुर आदि हैं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि पूर्वोत्तर भारत देश का एक ऐसा हिस्सा है जिसे सबने भुला दिया है लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश, खासकर गोरखपुर का अनुभव भी इससे अलग नहीं है।

यहां मसला केवल शिक्षा या रोजगार का नहीं बल्कि जीवन स्तर का भी है।

गोरखपुर को लेकर आप दो तरह से सोच सकते हैं। यह सोच इस बात पर निर्भर करता है कि आप चीजों को कहां से खड़े होकर देखते हैं। अगर आपके पैरों के नीचे धूल है तो आपके सामने, दाएं और बाएं इससे पलायन के तमाम साजो सामान भी हैं। एक चीज जो साफ नजर आती है वह यह कि निजी क्षेत्र की उच्च शिक्षा में जबरदस्त तेजी आई है। बीते 15 साल में यहां अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खूब बढ़ गए हैं और कोचिंग सेंटर भी। सन 1991 के सुधार के बाद देश के छोटे कस्बों में शिक्षा सबसे लोकप्रिय उत्पाद के रूप में सामने आई है। पूर्वी उत्तर प्रदेश अथवा पूर्वांचल में यह एकदम अलग स्तर पर पहुंच गया है। यहां के होर्डिंग कई बार सिनेमा के होर्डिंग को मात देते दिखते हैं। इनमें इस जगह से बाहर रोजगार दिलाने के वादे नजर आते हैं। सिविल लाइंस इलाके में देर रात घूमते हुए मैंने हर प्रकार के करीब 200 होर्डिंग गिने। इनमें से 170 का ताल्लुक शिक्षा, प्रशिक्षण, प्रतिस्पर्धी परीक्षा, स्पोकन इंग्लिश की कोचिंग आदि से था। एक विज्ञापन तो लगभग आपका मजाक उड़ाता हुआ कहता है: क्या आप समझते हैं आपको अंग्रेजी की आवश्यकता नहीं है? एक अन्य में डॉ. राहुल राय का पीएमटी कोचिंग का विज्ञापन है जिसके मुताबिक वह पहले ही 18 साल में पूर्वांचल में 1,012 चिकित्सक तैयार कर चुके हैं। विज्ञापन के मुताबिक उनकी कोचिंग पटना की मशहूर इंजीनियरिंग कोचिंग सुपर 30 के समान है। इस इलाके के युवा किसी अवसर की तलाश में हैं ताकि यहां से निकल सकें। उनमें से कुछ प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में सफल हो जाते हैं जबकि शेष बड़े शहरों में जाकर रिक्शा खींचते हैं, विनिर्माण मजदूर बन जाते हैं, ठेले पर फल और सब्जियां बेचते हैं, छोटीमोटी चाय की दुकान चलाते हैं और झुग्गियों में रहते हैं। कोई फिल्मकार 6 करोड़ भारतीयों की इस भुला दी गई जमीन पर उड़ता पूर्वांचल जैसी फिल्म नहीं बनाएगा। जबकि यहां के युवाओं की एकमात्र आकांक्षा है कि किसी तरह यहां से उड़ जाएं, बाहर निकल जाएं।

इस इलाके में कभी सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए। वह कहते हैं कि इसके लिए भय और निष्पक्ष शासन उत्तरदायी है। हम पूछते हैं कि किसका भय और भय क्यों? इस प्रश्न की अनदेखी कर दी जाती है।

प्रधानमंत्री शानदार वक्ता हैं लेकिन इतने भर से यह पता नहीं चलता कि वह अपने श्रोताओं को खुद से किस कदर जोड़ लेते हैं। उनको मालूम है कि लोग कब, किस टोन में क्या सुनना चाहते हैं? उनकी बोलने की टाइमिंग, ठहराव, देहभाषा, हाथों का हिलाना, कोई सही मुद्दा उठाकर ताली मारना आदि सबकुछ एकदम सही है। ऐसे में आपको यह जानकर आश्चर्य होता है कि गोरखपुर से करीब 60 किलोमीटर दूर उनके प्रचार अभियान की लगभग शानदार पटकथा में एक गलत शुरुआत कैसे हुई। विडंबना यह है कि अतीत के प्रचार अभियानों में हम समझ की ऐसी गलती राहुल गांधी को करते देख चुके हैं। वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में गांधी की तरह इस बार मोदी ने इस क्षेत्र के आर्थिक वजहों से हो रहे विस्थापन का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि क्या यहां के सभी युवा अपने जनपद में रोजगार नहीं चाहते? ताकि उनको बाहर न जाना पड़े? आखिर कौन युवा अपने बूढ़े मां बाप के आसपास नहीं रहना चाहता? उन्होंने ये प्रश्न पूछे और खामोश होकर प्रतिक्रिया का इंतजार करने लगे। लेकिन उनको इसके जवाब में एक गहरी खामोशी मिली।
यहां मसला केवल शिक्षा या रोजगार का नहीं बल्कि जीवन स्तर का भी है
(Photo : ThePrintIndia)


यहां मसला केवल शिक्षा या रोजगार का नहीं बल्कि जीवन स्तर का भी है। यहां जीवन परिस्थितियां अत्यंत दु:साध्य हैं। खुली नालियां मॉनसून में नाले की शक्ल ले लेती हैं। सड़क पर चलते हुए धूल फांकने का मुहावरा सच साबित होता है और अगर आप फोन पर बात करते हुए चल रहे हैं तो बहुत संभव है कि आप कुछ मच्छर निगल जाएं। प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश सरकार की वेबसाइट का एक हिस्सा भी पढ़कर सुनाया जिसमें माना गया था कि राज्य के कई हिस्से सामाजिक मानकों पर बहुत अधिक पिछड़े हुए हैं। इनमें पूर्वांचल के जिले शामिल हो सकते हैं। इस क्षेत्र की दिक्कतों के लिए इसका भूगोल भी काफी हद तक जिम्मेदार है। गोरखपुर दूरदराज इलाका है और यह देश के तमाम प्रमुख रेल मार्गों और राजमार्गों से दूर ही है। अभी कुछ अरसा पहले तक यह मीटर गेज वाला क्षेत्र था। यहां के लोग प्रतिभाशाली, मेहनती और विद्रोही तेवर के रहे। गोरखपुर और देवरिया के बीच में पड़ता है चौरी चौरा। यही वह जगह है जहां फरवरी 1922 में एक पुलिस स्टेशन में आग लगाकर 23 जवानों को जला दिया गया था। इसके बाद महात्मा गांधी को असहयोग आंदोलन वापस लेना पड़ा था। उन्होंने पश्चाताप में उपवास शुरू किया था। ब्रिटिश शासन ने मार्शल लॉ की घोषणा कर दी और आतंक और दमन का चक्र शुरू हो गया। विरोध करने आए नेहरू को यहां गिर तार कर लिया गया। आज 94 साल बाद भी आपको आश्चर्य होगा कि आखिर वह इतने दूरदराज इलाके में कैसे आए होंगे? गोरखपुर जेल में ही मशहूर क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल को फांसी दी गई थी।

बाद में क्रांतिकारियों की जगह माफिया ने ले ली। हरिशंकर तिवारी और वीरेंद्र प्रताप शाही के बीच चले खूनी संघर्ष और ब्राह्मण  राजपूत माफिया लड़ाई की कहानियां ही बची हैं। लेकिन अब भी तमाम छोटे मोटे गैंग हैं। दूरदराज शहरों में सुपारी देकर हत्या कराए जाने के बाद जांच की सुई इस इलाके की ओर भी घूमती है। विशाल भारद्वाज की फिल्म इश्किया में नसीरुद्दीन शाह और अरशद वारसी के बीच का एक संवाद भुलाया नहीं जा सकता है। जिसमें मामा भांजे बने दोनों अभिनेता भागते हुए गोरखपुर के आसपास छिपे हैं। अरशद कहते हैं  मामू यहां से निकलने में ही भलाई है। हमारे भोपाल में तो शिया और सुन्नी ही लड़ते हैं। यहां तो ब्राह्मण, ठाकुर, यादव, जाट सबकी सेनाएं हैं। इस प्रकार पूर्वांचल बैडलैंड यानी बुरी जगह की विशेषता भी पूरी करता है।

गोरखपुर में फिलहाल किसी सामंत या पारंपरिक माफिया का दबदबा नहीं है। बल्कि यहाँ हैं भगवाधारी और साफ साफ बात करने वाले योगी आदित्यनाथ। वह ताकतवर गोरखनाथ मठ के मुखिया हैं। गोरखपुर का नाम इसी मठ पर पड़ा है। वहां यहां से पांच बार सांसद चुने जा चुके है और माना जा रहा है कि इस चुनाव में भी पार्टी को यहां से ढेरों सीट दिलाएंगे। उनका साफ सुथरा मंदिर और मठ इस इलाके की पहचान है। उनसे हमारी मुलाकात एक हॉल में होती है जहां उनके पहले के महंतों की तस्वीरें लगी हैं। उनमें पूरा ब्योरा है कि कौन कौन किस देवता का स्वरूप था। पूछे जाने पर कि इस चुनाव में भाजपा ने कोई मुस्लिम उम्मीदवार क्यों नहीं उतारा, योगी कहते हैं कि केवल इस बात को तवज्जो दी गई है कि कौन जीत सकता है। वह यह भी कहते हैं कि भाजपा की सूची में कोई मुस्लिम प्रत्याशी नहीं है तो क्या हुआ? इस इलाके में कभी सांप्रदायिक दंगे नहीं हुए। वह कहते हैं कि इसके लिए भय और निष्पक्ष शासन उत्तरदायी है। हम पूछते हैं कि किसका भय और भय क्यों? इस प्रश्न की अनदेखी कर दी जाती है।

उत्तर प्रदेश को छोटे छोटे राज्यों में बांटने के सवाल पर उनकी आंखें चमक उठती हैं। इनमें एक राज्य पूर्वांचल भी होगा। वह कहते हैं कि यह चुनाव इस बात का वक्त नहीं है लेकिन यह भी स्पष्ट हो जाता है कि बाद में इसमें उनकी रुचि है और वह खुद को स्वाभाविक तौर पर मुख्यमंत्री के तौर पर देखते हैं। ऐसी इबारत साफ नजर आने पर भला ऐसा कौन होगा जो अरशद वारसी की सलाह नहीं मानेगा और यहां से निकल नहीं जाएगा?

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
(साभार : बिज़नस स्टैण्डर्ड)
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