मंगलवार, मार्च 14, 2017

मेरा अज्ञात तुम्हें बुलाता है — स्नोवा बार्नो की अद्भुत प्रेम कहानी



मेरा अज्ञात तुम्हें बुलाता है

स्नोवा बार्नो

क्या वह हिंदी साहित्य-जगत का स्टिंग आॅपरेशन था? : अखबार, पत्रिकाएं और टीवी चैनल चिल्ला रहे थे : ‘‘इतनी अनोखी कहानियां और उपन्यास लिखने वाली स्नोवा बाॅर्नो कौन है और कहां है?’’

हिंदी साहित्य के प्रमुख समीक्षक नामवरसिंह, परमानंद श्रीवास्तव, सूरज पालीवाल और भारत भारद्वाज तक सारे समीक्षक रहस्यमयी लेखिका की कहानियों को अभूतपूर्व बता रहे थे। सूरज पालीवाल ने स्नोवा की कहानी ‘मुझे घर तक छोड़ आइए’ को रेणु की ‘तीसरी कसम’ और गुलेरी की ‘उसने कहा था’ कहानियों की बराबरी में रखा। इस स्थापना को नामवरसिंह ने मुहर लगाई। नामवरसिंह ने कहा कि उन्होंने आज तक ऐसी स्तब्धकारक कहानी किसी भाषा में नहीं पढ़ी और इस कहानी को गहराई से समझने की जरूरत है और भविष्य में इस कहानी के नए-नए अर्थ सामने आएंगे।

हिंदी की अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी चकित, विस्मित, मुग्ध और स्तब्ध थी!

क्षुब्ध होने वालों की अपनी जमात थी।

राजधानियों में जड़ें जमा कर बैठे शातिर माफि़या और उनके पालतू उचक्के लेखक भौचक्के थे।

(हम स्वयं चकित थे कि 'हंगामा क्यों है बरपा? हमने तो अपना सहज कर्म किया था। सदा की तरह ख़ूबसूरत और ख़तरनाक!)
कथा-संग्रह 'मुझे घर तक छोड़ आइए' की भूमिका का एक अंश 
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तो साहब हमने सोचा शायद आपने स्नोवा बार्नो का नाम न सुना हो और उनकी लिखी कहानी नहीं पढ़ी हो—लगा कि हिंदी साहित्य के पाठक के साथ ऐसा अन्याय नहीं होना चाहिएइसलिए  स्नोवा बार्नो की अद्भुत प्रेम कहानी 'मेरा अज्ञात तुम्हें बुलाता है' शब्दांकन पर प्रकाशित हो रही है। आपके स्नेह से शब्दांकन सदा गदगद रहती है इसे यों ही सदैव बनाये रखिये।

भरत तिवारी



स्नोवा बार्नो की अद्भुत प्रेम कहानी



भारत के हिमालय में जन्मे मेरे जिस्म पर फ़िनलैंड में जन्मी मेरी माँ की नैसर्गिक दृष्टि! उसने मुझे आज नई नज़रों से देखा, देर तक, नख से शिख तक! गुलाबी तौलिए में लिपटी मैं शॉवर के लिए जा रही थी, उसके प्यारे इशारे पर मैं ठिठक गई। फिर उसकी बेधती नज़रों से असहज हो उठी।

पता नहीं, क्या होने को है। वह महीने भर के लिए लंबी घुमक्कड़ी पर लद्दाख जा रही है। अब उसके और मेरे बीच कोई संपर्क नहीं रह जाएगा। वह न तो घर में फ़ोन रखती है, न जेब में। कहती है, वास्तविक संदेश नहीं रुकते। उसने मुझे जो सेलफ़ोन लेकर दिया है, उस पर भी उसके लिए बहुत कम संदेश आते हैं। उसे पत्र लिखकर नि¯श्चत रहने की आदत है।

माँ के एक यात्रा संस्मरण में मैंने पढ़ा था “मेरी घुमक्कड़ी और लेखन का रिश्ता सिर्फ़ चिट्ठियों से है या उन लोगों से जो मुझे सफ़र के दौरान मिलते हैं और संबंधों को फैलाने की बजाए गुडबाय कहना जानते हैं। सफ़र के ख़ास साथियों में भी हज़ार में कोई एक इस लायक होता है कि हमें उसकी तरफ़ से मिली चिट्ठी का जवाब देना अच्छा लगे या उससे दोबारा मिलना। जीना अभी इतना मुश्किल नहीं हुआ है कि कोई आपसे अचानक आकर या पत्र के माध्यम से नहीं मिल सके। यदि मुश्किल होती है तो यह मुश्किल ही कसौटी रहनी चाहिए। उसी मिलने में कहीं जीवन भी नया होकर मिलता है।“ माँ ने मेरी आँखों में अपनी आँखें डालीं और अपनी मुस्कान पर सहसा गंभीरता पहन ली। मैं अपने अधढके सीने पर खुल रहे तौलिए को कसने लगी। उसने कुछ क्षण के लिए मेरे माथे से लेकर पाँव तक के गठन और गुलाबी रंगत को देखा। फिर मेरे सीने के कसे हुए उभारों पर अपनी नज़रें डालीं। उसके होंठों पर दोबारा वह हल्की मुस्कान तैर आई।

मुझे पता था कि कोई फैसला होने को है। फैसला भी ऐसा, जहाँ मुझ पर कुछ नहीं थोपा जाएगा। सिर्फ दर्शन नहीं, माँ ने मनोविज्ञान को भी किताबों और ज़िंदगी में खूब पढ़ा है। हालाँकि इन चीज़ों को वह सिर पर सवार नहीं होने देती।

बहुत अजीब माँ है यह। मैं आज तक नहीं जान सकी कि कब माँ ने मेरे पिता को पति के आसन से हटाकर एक अच्छे दोस्त में तब्दील कर लिया। विदेश से उसके नाम डैड के जो खत आते हैं उनमें ऐसा कुछ भी नहीं होता, जिनमें रिश्तों की कोई शिकन, सलवट या दरार हो। हाँ, मैं उन दोनों की चिट्ठियों में एक अहम किरदार बनी रहती हूँ। डैड पिछली बार जब दो साल के बाद यहाँ आए थे तो हम तीनों में एक नई पहचान बनी थी। डैड ने अपनी एक नई दोस्त के बारे में भी हमें बताया और अगली बार उससे मिलवाने का वादा भी किया था।

माँ ने पता नहीं क्या उगलवाने या जानने के लिए डैड से कह दिया था “विली, मेरी तरह की बेफिक्री से जीना तुम्हारे वश में नहीं है। तुम शादी क्यों नहीं कर लेते? दो-एक बच्चे तो अभी भी जन सकते हो। उसी में तुम्हारी नैया पार लगेगी, वरना मेरे पास लौटने के बहाने खोजने में उम्र जाएगी तुम्हारी।

डैड ने मेरे सामने माँ को पहली बार ऐसा जवाब दिया था कि मैं चहक उठी थी “क्या तुम अपने को इस लायक नहीं मानती हो कि कोई सिरफिरा उम्र भर दूर- दूर रहकर तुम्हारे पीछे पड़ा रहे और कुछ हाथ नहीं लगने के बावजूद मस्त भी रहे?

डैड ने अकेले में मुझे बताया था कि वे मेरी लेखक माँ के लिखे हुए एक-एक शब्द को पढ़ते हैं और उसकी कितनी ही बातों के अर्थ नहीं जान पाते फिर भी उसका आदर करते हैं “बल्कि मैं उसका सम्मान शायद इसीलिए करता हूँ कि वह अबूझ हैं।

मुझे माँ की कही एक बात याद हो आई। मैंने वह डैड को सुनाई “जिस खूबसूरती को तुम जीवन में नहीं उतार पाते, जिसके लिए तड़पते रह जाते हो...उस बेबूझ के लिए स्वयं भी अबूझ हो जाते हो।

डैड काफी देर ख़ामोश रहे, फिर बोले “दैट्स व्हाय आय रियली लव योर वंडरफुल, इंपासिबल एण्ड मिस्टिक मदर...बट आय कांट अंडरस्टैंड हर, दैट्स ऑल।

एक दिन माँ ने मुझे अकेले बैठा कर कहा था “देख, मेरी घुमक्कड़ी मेरी आखिरी साँस तक चलेगी। किसी भी दिन तुझे ख़बर मिल सकती है कि अपनी दोस्त पेनीलोपे चैटवुड की तरह मैं भी बर्फ में दफ़्न हो गई। मेरे लिए तो हिमानी घुमक्कड़ी मेरा आनंद है, पर दूसरों के लिए तो यह पागलपन या मूर्खता ही है...तेरे डैड के लिए भी। पर मेरे नहीं रहने को वह सहन नहीं कर पाएगा। उस दिन उसे तेरी बहुत ज़रूरत पड़ेगी...।

धीरे-धीरे मैं जानने लगी थी कि जो लोग अपने लिए अलग तरह या अनिश्चित तरह के रास्ते बनाते हैं, वे रिश्तों को भी अछूते ढंग से जीते हैं। शायद यही होते हैं अनाम रास्तों पर अनाम रिश्ते...

आज मैं अपनी अधनंगी देह पर फिसलती माँ की आँखों और उनमें जगी हुई चमक में से किसी बेहतर नतीजे के आने की आहट पा रही थी।

वीनू, तू मॉडलिंग और फिल्मों में जाना चाहती है न?“ उसने पूछा। मैं चुपचाप खड़ी रही। पर उसके सवाल पर मैं भीतर कहीं चहक उठी। कल ही तो मैं ‘समर क्वीन’ चुनी गई हूँ। प्रतियोगिता में ग्यारह देशों की लड़कियों ने हिस्सा लिया था। इनमें अधिकांश लड़कियाँ विदेशी और भारतीय पर्यटक थीं, जो प्रतियोगिता में अचानक शामिल हो गई थीं। इनमें कितनी ही तो हनीमून मनाने आई नवविवाहिताएं थीं, कुल सैंतीस लड़कियों में हम आठ ही स्थानीय थीं, मेरी फ्रैंड डोरा ने सारी पार्टिसिपेंट्स को देखने के बाद सरेआम शर्त लगाकर पहले ही मेरे पक्ष में नतीजा सुना दिया था।

माँ ने मेरा हाथ पकड़ा और सोफे की तरफ बढ़ी। बैठते ही उसने मुझे अपनी गोद में खींच लिया।

मैं जानती थी कि जाने से पहले उसे मुझ पर प्यार लुटाना ही है, पर आज न जाने क्यों मेरे जिस्म में चिंगारियाँ-सी उठीं! “बहुत सुंदर निकली है तू...डोरा कह रही थी कि तेरे लिए दुनिया भर के कैमरों की आँखें ललचाएंगी। नाम भर की वीनस नहीं है तू।“ डोरा मुझसे भी कह चुकी है “कई देशों के रक्तों से आया हुआ तुम्हारा यह जिस्म तुम्हारे खानाबदोश खानदान में खिला हुआ सबसे खूबसूरत फूल है।

मुझे लगा, मम्मी एक देह-पारखी की तरह मुझे देख रही है। उसने मुझे जगह-जगह से चूमा तो मैं उसके सीने की मखमल में छुप गई। आज पहली बार लगा कि माँ के लंबे, गोरे और चुस्त जिस्म में बला का मैजिक है। यह मैजिक मुझे भी मिलेगा एक दिन।

अचानक ध्यान आया कि माँ के जाने के बाद मुझे सीधे परम के पास पहुँचना था। वह मेरे फोन या मेरे पहुँचने की प्रतीक्षा कर रहा होगा। परम, डोरा और मैं भारत के हिमालय में जन्मे हैं। ऐसी संतानें, जिन्हें लोग न तो भारतीय के रूप में मान्यता देते हैं, न हमारे मूल देश से हमें जोड़ते हैं। हमारे लिए उनके पास एक शब्द है, ‘फॉरेनर’! दूर के नर? एक और आसान शब्द है: ‘अंगे्रज़’। बहुत-सी कुर्सियों के बीच की इकलौती मेज? अक्सर हमें भारत के पुराने हुक्मरानों का वंशज भी समझ लिया जाता है। यदि हम अंगे्रज़ हों भी, तो हमने तो अंगे्रजी तक यहीं पढ़ी है। अब इस गोरे रंग का क्या करें कि उतरता ही नहीं हरामी! काश, हम इसे गोरेपन के लिए बेचैन भारतीय कन्याओं को दे पाते।

हम तीनों के माँ और बाप विभिन्न देशों के हैं। कई बार लगता है कि हमारे पास अपना कुछ भी नहीं है। हम अपने माँ-बाप से उनकी निजी आदतों के अलावा उनके यहाँ की कोई भी विरासत नहीं ले सकते। दार्शनिक क़िस्म की हमारी एक स्थानीय दोस्त, मृदुला कहती है “घबराओ मत। यहाँ सबका यही हाल होने जा रहा है। जब से हमारा परिवार पर्यटन व्यवसाय में खप गया है, हम दुनिया भर से आए हुए लोगों के बारे में ही ज़्यादा जानते हैं, अपने लोगों के बारे में नहीं। हाँ, सिर्फ़ अपने यानी स्वयं के बारे में जानने लग जाएं तो कहीं कोई बेगानापन नहीं है। सब या तो अपने हैं, या अजनबी हैं।“ माँ के नए स्पर्शों ने परम से मेरा ध्यान हटा दिया।

सर्दियों में मेरी एक फ़िल्मकार दोस्त प्रदीप्ति अपनी यूनिट के साथ यहाँ आएगी। पिछली बार उससे मैंने तुम्हारी बात की थी। अभी तुम यहाँ के विंटर फेस्टिवल वाले कॉम्पिटिशन के लिए तैयारी करो...देखना, छा जाओगी तुम।“ कहकर माँ ने पहले मेरे माथे को चूमा, फिर मेरे सीने के उभारों को।

मैं आजकल एक उपन्यास लिख रही हूँ। पता नहीं कैसे तुम उसमें चली आई हो...मुझसे बगावत करती हुई...मेरी घुमक्कड़ी और मेरे लेखन की दुनिया को ठेंगा दिखाती हुई तुम...

बस !“ मैंने माँ के होंठों पर उंगली रखकर कहा “मुझे मालूम है तुम अपने लिखे हुए की भनक छपने से पहले किसी को नहीं लगने देतीं...मुझे बता भी दोगी तो बाद में निकलेगा कुछ और ही।

हम देर तक सोफे पर पड़ी रहीं। आज मैंने अपना मोबाइल फोन बंद कर रखा था, ताकि माँ के घर पर रहने तक कोई बाधा न आए।

सच-सच बताओ, मॉम...क्या तुम यही नहीं चाहती थीं कि मैं भी लेखिका, जर्नलिस्ट या कलाकार बनकर अपना बनाया एक जीवन बिताऊँ? सीमोन द बोउवार, पेनालोपे की तरह...तुम्हारी तरह...?

हाँ, कुछ ऐसा ही, जिसमें दूसरों पर बहुत कम निर्भरता हो...जहाँ बाजार कम, रचनाकार ज्यादा तय करता हो। तुम में वो है। विरासत में भी है। हम यहाँ प्रकृति के अधिक निकट हैं, जहाँ कई तरह से आज़ादी और क्रिएशन से भरा जीवन जिया जा सकता है। अपने लैपटॉप के साथ तू किसी भी पर्वत की चोटी पर बैठकर दुनिया भर के अनोखे लोगों के लिए कुछ भी रच सकती है...पर तू जो चाहती है, उस रुझान के लिए भी आज बहुत से स्वतंत्र मार्ग खुल गए हैं...बर्फ, झरनों और नदियों के अंग-संग ई-मेल के खेल से।

माँ की निराली बातें सुनकर मैं विस्मित हो उठी। माँ भी क्या चीज़ होती है; वह जब देखती है कि उसकी नहीं चलने वाली तो वह औलाद की इच्छाओं में बड़ी संभावनाएँ देखने लगती है।

लेकिन तुझे अभी हम उम्र साथियों के साथ अपने अनुभव लेने हैं। जीवन और साहित्य की ललक ठिठकी पड़ी है तेरे भीतर...सोच ले। एक बात और...हम औरतों को मर्दों के दिमाग से आने वाली चालाक दुनिया में अपनी हार्दिकता को बचाना है और अपने शौक पूरे करते हुए लगातार बहुत अलर्ट रहना है। जिस्म को बचाना भी है और जिस्म के जादू को जगाना भी है। जिस्म हमारा सिर्फ़ औज़ार नहीं है, बहुत गहरा और आनंददायक सच भी है। इसे सजाते और बचाते जाना ही हमारी आत्मा का विकास है। करीने से करिश्मे का जीवन जीने वाली साहसी स्त्री को पैसा नहीं कमाना पड़ता। पैसा उसके पीछे पड़ जाता है।

कॉलबेल बजी। मैं ओट में चली गई। माँ बाहर गई। लौटी तो उसके हाथ में आज की डाक थी। वही डाक जिसमें माँ के नाम दुनिया भर से अनोखे पत्र, कई तरह के समारोहों व गोष्ठियों के लिए निमंत्रण और प्रकाशकों-संपादकों के यहाँ से चेक आते हैं। कल से अब महीना भर यह डाक मेरे भरोसे रहेगी। माँ चाहती है कि जब कहीं से कोई ख़ास किताब आती है तो मुझे उसे देखने-पढ़ने की कोशिश कर लेनी चाहिए, मैंने पिछली बार आई हुई एक किताब पूरी पढ़ ली थी। उसमें ग्लैमर की दुनिया की सेलीब्रिटीज के बारे में रंगीन चित्रों के साथ अनोखी जानकारियाँ थीं। माँ ने मुझे उसमें डूबे देखकर दो सेकंड के भीतर जो कुछ कहा था, वह मुझे भूलता ही नहीं...आग थी उसमें...कि लपट थी...कि अवेयरनेस की इंतहा...? सोचा, पढ़ा और कहा हुआ नहीं...भोगा, देखा और सहा हुआ...फिलॉसॉफ़ी नहीं, दर्शन था वो

जो उथला और उधार का होता है, वही हमारी आँखों, हाथों और मन में जल्दी आता है। जो गहरा है...अनदेखा और अनछुआ है...उसे अपने में से और दुनिया में से खोज निकालना ही मस्त फकीरी है। उसी फकीरी की अमीरी में मौत का किस्सा भी जीवन का हिस्सा बन जाता है...वरना दूसरों की ज़िंदगी जीते हुए अचानक अपनी मौत तक पहुँचते हैं हम...भौचक्के“। सबकुछ देखना तुम...मगर ख़ुद को देखते हुए ही... “

माँ ने डाक में आई अधिकांश चीज़ों को कूड़े में डाला और कुछ को अपने तैयार पड़े थैले में रख लिया। एक चेक था, जिसे मेरे हवाले कर दिया।

मॉम...“ मैंने कहा “एक बात मैंने तुमसे छुपा रखी है...
मेरी बस का वक़्त होने को है...छुपाने लायक है तो छुपाए रखो...मैं भी छुपाती थी अपनी माँ से बहुत कुछ...
वह...परम...

माँ सहसा अपनी वास्तविक हिंदी पर उतरकर मुझे अपने दर्शन से निष्णात कर गई “देखो, परम हो या परमहंस, किसी को घर में न घुसने देना। बाहर खुले में मिलो और वहीं से विदा लो। या बन जाओ मेरी सहयात्री। तुम मेरी बेटी हो...जानती हो कि किससे कितना और क्यों मिलना है। अपने तन और मन के ज्वर को बहुत फुरसत में देखो-जानो...हमारी आत्मा का दुर्ग है यह। समझ सको तो सुनो, देह और उसका सजग भोग यदि दिव्य नहीं है तो अन्य सभी कुछ छल- प्रपंच है।

फिर उसने मुझे सुवर्चला, भामती, सत्यवती, मीरा, लल्लन, सीमोन, मिलेना और ईज़ा आदि की कथाएं और जीवनियाँ पढ़ने को उकसाया। आजकल मैं ऐसी बहुत-सी किताबें उलटने-पलटने लगी थी। “मॉम...तुम्हारे बाद परम ही मेरा सबसे भरोसे का दोस्त है...मैं एक महीना डोरा के साथ नहीं बिता सकती। उसके घर में तरह-तरह के लोग हैं...पता नहीं क्या-क्या पूछते रहते हैं हम लोगों के बारे में...

ठीक है...मैं तुम्हें अपने सफ़र के दौरान फोन करती रहूँगी। अब जो तुम्हारा मक़सद बने, उसी में डूब जाओ। प्रदीप्ति को तुम्हारा नंबर बता दिया है। संयुक्ता लद्दाख में मिली तो उससे भी बात चलाऊँगी। तुम्हें याद होगा, पिछले साल वह लेह जाते हुए यहाँ रुकी थी। बहुत सोर्स हैं उसके...“ फिर उसने मुझे याद दिलाया, “अपनी पी-एच.डी. की तैयारी को भूलना नहीं...चाहो तो डैड के पास हो आओ...जो भी निर्णय करना चाहो, मन की चालाकियों पर नज़र रखकर ही करना...

उसने मेरी मदद लिए बिना अपनी पीठ पर लम्बा और भारी थैला कसा और फिर मुझे अपनी बाँहों में ले लिया। मेरे कानों के करीब बोली “परम अच्छा लड़का है। वह तुममें कई गहरी चीज़ें उभारेगा। मगर उसे शह देकर मनमानियों में हिस्सेदारी न करना, अच्छे व्यक्ति के साथ बँट जाना ठीक रहता है, लुट जाना नहीं। परम के साथ साहित्य को लेकर तुम्हारी संगति अच्छी जमेगी।

माँ के जाने के बाद गुसलखाने में पहुँचने से पहले मैं ड्रेसिंगरूम में आईने के सामने जा पहुँची। एक झटके में तौलिए को देह से खींचकर उछाल दिया। ओह, मॉम! थैक्स...तुमने आज मुझे मेरे होने के कितने करीब ला दिया! मैंने थिरकते हुए अपने हर अंग को सहला कर आईने में देखा, गर्दन पर झूलते सुनहरे बालों को नचाया, फिर आईने पर अपने जिस्म को हर जगह से चूमना चाहा, पर होंठों पर होंठ रखकर रह गई।

अचानक दरवाज़े पर दस्तक हुई। परम ही होगा। बहुत इंतज़ार किया होगा उसने! हड़बड़ी में तौलिया लपेटकर दरवाज़े पर पहुँची और पूछा, “हू इज़ देयर?“ “नोबडी इज़ हेयर...“ बाहर से परम की शिकायत भरी आवाज़ आई, “इधर से गुजरा था, सोचा सलाम करता चलूँ, जा रहा हूँ...फिर मिलेंगे।

मैंने चट से दरवाज़ा खोला, उसकी बाँह पकड़ कर उसे भीतर खींचा और दरवाज़ा बंद कर लिया। उसके हक्के-बक्के चेहरे को एक नज़र देखा और उसकी नज़रों से बचते हुए उसे सोफे पर धकेला “अभी नहाकर आती हूँ।“ कहकर सीने पर तौलिए को सहेजती बाथरूम की ओर भागी।

शॉवर के नीचे बदन पर फिसलते मेरे हाथ मुझे आज अपने नहीं लग रहे थे। रह-रहकर लगता कि परम मुझे छू रहा है। माँ ने आज जाने क्या-क्या कोंपलें चटखा दीं मेरे भीतर! अभी परम मेरी देह से आ लगे तो क्या कर लूँगी मैं उसमें सिमट जाने के अलावा? बचपन से निकटता रही है हम दोनों में। बीच के दो साल मुझे माँ के साथ लेह में रहना पड़ा। जब हम लौटे तो परम मेरे विकसित जिस्म को अचानक देखकर संकोच में पड़ गया था। मैंने ही उसे पास आने को उकसाया और उससे देर तक अकेले मिलने का उपाय किया। उसने उठते हुए कहा “मैं कुछ ज़रूरी चीज़ें लेने बाजार जा रहा हूँ...तुम्हें कुछ मँगाना है क्या?

मैंने जल्दी से एक चिट पर उसे कुछ चीज़ें लिख कर दीं तो उसने पूछा “ये क्या चीज़ें हैं?

तुम्हारी दोस्त बड़ी हो गई है...उसे भी ज़रूरी चीज़ों की ज़रूरत पड़ती है। तुम स्त्रियों की चीजें बेचने वाली किसी सुंदर दुकान में चले जाना।

जब उसने लौटकर मुझे मेरी चीज़ें दीं तो उसकी झिझक देखकर मैंने हँसकर कहा “ख़ूब शर्माओ...पर याद है? कई बार हम एक साथ नहाते थे?

उसकी झिझक खुली “अब ज़रा आईने में खु़द को अच्छी तरह देखना...खुद भी शरमा जाओगी, कयामत हो तुम। “ फिर जब मैं कुछ महीनों के लिए डैड के पास जाकर पोलैंड से लौटी तो मेरे भरपूर यौवन से वह रोमांचित था। मैंने उससे कहा “तुम क्या सोचते हो कि तुम अभी बच्चे हो? पूरे हीरो लगते हो। बस, ज़रा स्मार्ट रहा करो।

अब हमारे चोरी-छिपे मिलने के दिन थे। फिर वह शिमला जाकर पढ़ने लगा। वह अक्सर घर आता और पहले मुझे ही ढूँढ़ता।

एक दिन उसने मुझे अचंभित कर डाला। बोला “याद है, जब तुम लेह से आई थीं, तुमने कहा था कि तुम बड़ी हो गई हो और मुझसे अपने काम की कुछ चीज़ें बाजार से मंगाई थी। अब हम दोनों बड़े हो गए हैं। मैं ऐसी चीज़ लाया हूँ जो हम दोनों को चाहिए।“ उसने जेब में से निकालकर उस चीज़ का एक रंगीन पैकेट मेरे हाथ में रख दिया। मैंने पैकेट उस पर दे मारा और वहाँ से चली गई। फिर कई दिन उससे नहीं मिली। पता नहीं, यह मेरा भारतीय रुख था या स्वाभाविक?

कई दिन सोचती रही कि हम दोनों को पारंपरिक भारतीय युवाओं की भाँति विवाह होने तक अपने बीच दीवार बनाए रखनी है या सजगता से देह की तृप्तियों में सहभागी हो जाना है? हम जैसे लोगों का विवाह होने या नहीं होने का कोई अर्थ भी है क्या? मैं उन दिनों तय नहीं कर पाती थी कि ऐसी बातें माँ से करनी चाहिए या नहीं। उसका मानना था कि दुनिया का चुना हुआ साहित्य हमें अपने जीवन के अहम फैसले करने की ज़्यादा शक्ति दे सकता है। लेकिन साहित्यकारों के बारे में उसकी राय बहुत अच्छी नहीं थी।

एक बार माँ के नाम एक बहुत बड़े साहित्य-सम्मेलन का निमंत्रण पहुँचा। वह बहुत अनिच्छा से गई। जब लौटी तो बोली “अगर मैं ना जाती तो एक नए अनुभव से चूक ही जाती। देश भर के साहित्यकार आए थे। बड़ी-बड़ी लेखिकाएँ थीं। एक मेले का माहौल था। वहाँ के मुख्यमंत्री, उसके खुशामदी साहित्यकार और उसके कार्यकर्ताओं ने अजब बावली भीड़ जमा कर दी थी। जो लेखक लोग ग़रीबों के लिए रोते रहते हैं। वे सब उन्हीं ग़रीबों की जेब से उड़ाए गए पैसों से ऐश कर रहे थे। शराब की एक गाड़ी अलग से पहुँच गई थी।

मैं समझ गई। पूछा “आपने वहाँ क्या कहा?

जब बारी आई, कुछ भी अविवादित कह दिया। सरकार या सेठों या मूर्खों के मंच पर ऐसा कुछ नया कहने को नहीं होता जो ये लोग पहले से नहीं जानते। मैं तो यह देखती रही कि साहित्य से बेख़बर लोगों के पैसे से हम जैसे लोगों का सैर-सपाटे कराने और इस सब में अपना दो कौड़ी का काम बनाने में कुछ लोगों को क्या-क्या कुकर्म करने पड़ते हैं। एक बार पूरा ही देख आई और मुक्ति मिली। अच्छा यह लगा कि मेरी तरह से सोचने वाले कुछ और लेखक-लेखिकाएँ भी वहाँ थे।

फिर सहसा माँ ने मुझे याद दिलाया “इससे यह न समझ लेना कि साहित्य की दुनिया अच्छी जगह नहीं है। रचना का अपना स्थान और आनंद है। वहाँ हम किसी पर निर्भर नहीं हैं। क्योंकि उसका रिश्ता सीधे जीवन से है।

परम ने इस बार नए शब्दों में पुकारा “वीनस जी, कृपया दर्शन दीजिए, आपने विलंब करने की समूची सीमा लांघ दी है। नहाने गई हैं या तीर्थ करने?

परम हमेशा साफ हिंदी बोलने का प्रयत्न करता है। उसके माँ-बाप शुरू से ही वेदाँत परंपरा के प्रभाव में थे। उसी के प्रभाव में कहीं उसे ‘परम’ नाम मिला और बाद में संस्कृत में एम.ए. की डिग्री हाथ लगी। हमारी हिंदी में जहाँ आज के लड़के-लड़कियों के बहुभाषी शब्द समाए रहते, परम की हिंदी संस्कृतनिष्ठ मिलती। अंगरेजी बोलते वक्त वह सहज व्यक्ति लगता था और किसी भी देश के आदमी के सामने उसकी धाक जम जाती। हाँ, हिंदी दिवस या संस्कृत दिवस पर उसे सरकारी समारोहों में खू़ब वाहवाही मिलती। दिखावटी गर्व भी घोषित होता “देखो, विदेशी लोग भारतीय संस्कृति के दीवाने हो रहे हैं।

परम के माँ-बाप ने बरसों से एक बड़ा होटल सेब के एक खुले बाग के साथ लीज़ पर ले रखा था। उनका सारा काम अक्सर उनके कर्मचारी ही संभाल लेते थे। परम सर्दियों में गोवा या दक्षिण भारत के समुद्र तटों पर निकल जाता, जहाँ भारत और विदेश के लोगों में बराबर उसका स्वागत होता। लेकिन उसकी बातों से लगता कि वहाँ जाकर वह पहले किसी बड़ी लाइब्रेरी की ही ख़ाक छानता है। माँ को यदि वह कहीं अच्छा लगता है तो उसकी साहित्य प्रियता के कारण ही।

वाइना...“ उसने अब थके हुए स्वर में पुकारा।

मेरे कितने ही नाम है: वीनस, वीना, वीनू और वाइना, लेकिन परम ने पहली बार मुझे वाइना नाम से पुकारा था। पहले उसे इस नाम में एक नापसंद गंध महसूस होती थी। वह तो वीना की जगह भी ‘वीणा’ को तरज़ीह देता था। डोरा ने एक दिन मुझे ‘बीना’ कह दिया तो वह उससे उलझ पड़ा। डोरा ने उसे पराजित करते हुए कहा “संस्कृत ही पढ़ते रह गए हो, उर्दू में बीना उसे कहते हैं, जिसकी दृष्टि सही हो। आज से अपनी बीनाई सही कर लो।“ उस दिन से वह मेरे नामों की शोध में लग गया।

एक दिन उसने मुझे मेरे मूल नाम के अर्थ बताते हुए कहा “प्रेम की देवी है वीनस। शुक्र से आई हो तुम। मालूम है वीनस या शुक्र से बनी नारी किन चीजों से आती हैं?

ये तो मार्स से आया पुरुष ही बता सकता है कि मैं कहाँ से आती हूँ...“ मैंने उसे चौंकाते हुए कहा था “कोई नहीं जानता, हम कहाँ से आते हैं और कहाँ चले जाते हैं। अभी हम जहाँ हैं, जैसे हैं, उसकी ही भनक मिल जाए तो बहुत है। तुम अपनी बात पूरी कर लो...वीनस-नारी किन चीजों से आती है?

यौन-संपन्न प्रेम, उर्वरता, संगीत और सौभाग्य की देवी है वीनस।

तभी तो जा रही हूँ उसी खूबसूरत दुनिया में।

वह कुछ कहना चाहता था, पर चुप रहा, मानो कह रहा हो, “मैं निसर्ग और जीवंतता की बात कर रहा हूँ, तुम नकली दुनिया की।

मैंने उसे बताया “कितने दिन? कुछ ऐसा करो कि ज़्यादा नहीं तो दस साल के बाद भी लोग तुमसे मिल सकें। जिसे झलक पाना या मचल जाना कहते हैं, उसे सच्चे रूप में जी लो, तमाशाई भीड़ को जाने दो भाड़ में, जो हमारे पास है, क्यों न हम वही पहले जिएँ...अभी से...यहीं से...पूरे सच्चे होकर?

मैं उससे सटते हुए कब उसकी बाँहों में चली गई, पता नहीं चला।

क्या मैं भी बाथरूम में आ जाऊँ? वहीं रह लेंगे...

थोड़ा और ठहरो...“ मैंने अधखुले रोशनदान की ओर ऊँची आवाज़ दी। शायद वह बाथरूम के दरवाजे पर ही था। सिर्फ हमारी मित्र-मंडली के सामने ही परम की विद्वता बगलें झाँकती, क्योंकि हमारी चर्चाओं में सदा एक ज़िंदा और वर्तमान रंगीन दुनिया रहती। कईयों पर मैं उसे ‘परम बुद्धू’ ही कहती। लेकिन वही एक होता जो मेरे वास्तविक सरोकारों के लिए पूरा वक़्त निकालता और मेरे एकांत में मेरे मन में समाया रहता। एक दिन हमारी साथिन लड़कियों तक परम के कुछ दोस्तों की यह ‘खबर’ पहुँची कि परम ‘नपुंसक’ है। वरना वाइना जैसी लड़की...! ज़रूर इससे परम को चुनौती मिली होगी। वह ‘प्रमाण’ देने को तैयार था।

जिस दिन उसे मेरे मॉडलिंग और फिल्मों में जाने की इच्छा का पता चला, वह घबरा ही गया। पहले तो उसने इसके विरोध में तर्क दिए, फिर जब वह समझ गया कि मैं अब पीछे हटने वाली नहीं हूँ तो वह संस्कृत साहित्य में से ऐसी-ऐसी प्रतिभा-संपन्न नारियों का उल्लेख करने लगा, जो नाट्य, अभिनय और सौंदर्य के जगत में अनुपम रहीं। वह खजुराहो की प्रतिमाओं के लिए मॉडलिंग करने वाली समर्पित नवयौवनाओं तक आ पहुँचा। जब उसने हिमाचल प्रदेश की प्रीति और कंगना की फिल्मी कामयाबी के हवाले दिए तो मुझे लगा कि अब मेरा रास्ता साफ है, हालाँकि मुझे कंगना-वंगना तो क़तई नहीं बनना है।

फिर उसने चेताया “ध्यान-योग साधे बिना आज किसी भी क्षेत्र में निश्चिंत होकर सफल होना संभव नहीं है। गहरी समझ हो तो उथली जीवन-शैली के प्रपंच भी झेले जा सकते हैं।

वह तुमसे सीख लूँगी।“ उसकी बात की गहराई समझकर भी मैंने बेफिक्री से कह दिया।

अंततः वह बोला “वाइना, तुम सृजन की जिस वास्तविक दुनिया के लिए बनी हो, हो सके तो उसे जानो और उथले आकर्षण से बचो...

ऐसा लगा, बाहर कोई संगीत बज रहा है। मैंने शॉवर रोक कर दरवाज़े से कान लगए। गीत चल रहा था “न जाने क्या हुआ, किसी ने छू लिया, खिला गुलाब की तरह मेरा बदन...“ तो परम ने मेरे संगीत-सिस्टम पर वही गीत छेड़ दिया है जो मैं अक्सर गुनगुनाती हूँ।

एक दिन माँ ने मुझे चौंकाया था

वीनू, तू बहुत खुशक़िस्मत है। तू भारत के संगीत से संस्कृत हो लेती हैं। तुझमें यहाँ के गीत सिहरन पैदा करते हैं। क्योंकि तुझे शुरू से ही यहाँ की हवा नसीब हुई है। मैं तो अपने अतीत के भूले-बिसरे गीतों को याद करके रह जाती हूँ और उनकी तड़प और भावना को किसी से नहीं बाँट पाती, तेरे डैड भी मेरे देश के नहीं हैं न...

और मैंने देखा, अचानक माँ की आँखों से एक आँसू ढुलक गया है। मैंने उस आँसू को अपना गाल छुआया। अचानक माँ के जज़्बात मेरे होंठों पर आ गए

हम भटकते हैं, क्यूँ भटकते हैं दस्त-ओ-सहरा में? ऐसा लगता है मौज प्यासी है अपने दरया में...ज़िंदगी जैसे खोई-खोई है, हैरां-हैरां है...ऐ दिले नादां...आरजू क्या है...जुस्तजू क्या है...?

उस दिन मैंने शिद्दत से महसूस किया था कि घूमना और लिखना माँ के लिए उसकी ज़िंदगी ही है। उसके घोर अजनबी अकेलेपन की साथी है उसकी यायावरी।

दरवाज़े पर धमाका-सा हुआ। परम के सब्र का बाँध टूट गया था। आज पता नहीं क्या करेगा वह?

एक दिन वह मेरे कमरे में था। मुझे उसके इरादे ठीक नहीं लग रहे थे। मुझे बांहों में लेकर वह मेरे होंठों पर झुका तो मैंने उसके कान में कहा “परम, मुझे अच्छा लग रहा है...बस, आगे मत बढ़ना...अच्छे बने रहना।

मुझे माँ की नसीहत के अलावा अपनी चेतना भी चेता रही थी कि यदि पुरुष से गहराई में मिलना है तो जल्दबाजी हर तरह से घातक है। हमारी देह को पुरुष देह जिस तल पर चाहिए, उस तल से पहले यदि आक्रमण हो जाए तो हम सदा के लिए उस तल को खो बैठते हैं। कुछ स्त्रियाँ तो नारीत्व की संवेदनाएँ ही खो बैठती हैं, जबकि देह के सहज सेतु के माध्यम से हमें उस पार की यात्रा पर निकलना होता है।

मैंने उसकी गर्दन में हाथ बाँध लिए। अचानक वह मेरे गालों को काटने लगा। मेरी एक नहीं चली। तंग आकर मैंने उसके निचले होंठ को अपने दाँतों में पकड़ लिया। वह छटपटाने लगा।

अचानक उसने बुरी तरह मुझे गुदगुदा दिया। मैं चीख पड़ी। मेरे दाँतों से होंठ छूटते ही उसके दाँत उच्छृंखल हो उठे। “अब बोलो!“ उसने अपना मुँह मेरे सीने में धँसाते हुए कहा

सॉरी...“ मैंने किसी तरह उसे हटाया और उसकी ठोड़ी को अपने होंठों पर लेकर कहा, “मैं थक गई हूँ...क्यों नहीं समझते कि मुझे तुम्हारे प्यारे स्पर्श चाहिए, हिँसा नहीं। मैं तुम्हारे प्रेम में अपने ज़िस्म और प्राणों की तरंगों को देखना चाहती हूँ और तुम हो कि...

नारी-देह के साथ पुरुष हज़ारों खेल करके भी नहीं थकता होगा। मादा पक्षियों को रिझाने वाले नर पंछी तो अपनी कसरतों और हसरतों को निसर्ग के विकास-क्रम में मादा से अधिक सुंदर बना लेते हैं। कुछ दिनों से यह परम भी ऐसा ही बौराया पंछी हो रहा था।

उसने मुझे प्यार से सहलाना शुरू किया तो मैं आँखें बंद करके उसकी गोद में पड़ी रही। यह सिलसिला रोज़ चलने लगा। फिर एक दिन सहसा मुझे लगा कि मेरी देह उसकी देह में समाने को मचल रही है। मैं बहाना करके उसे थपकती हुई हट गई।

एक दिन लगा कि हम दोनों देह के किसी तप में लीन हैं। इन दिनों मैं ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ पढ़ रही थी। शिव की गोद में उनके होंठों की ओर उन्मुख देवी और उनका गहन संवाद “जब चरम पर पहुँचने लगी तो अपने अंगार पर ध्यान दो।“ बुलंदी पर डगमगाओगे तो तत्काल नीचे आ गिरोगे। लेकिन मनुष्य तो यौन-तनाव से मुक्त होने के लिए झपट कर भी गिरने को तत्पर है। व्यस्तता ने इस जल्दबाजी को बेतरह आक्रामक बना दिया है।

इसीलिए बलात्कार भी हैं और देह सुलभ होने के बावजूद घोर अतृप्तियाँ भी। लेकिन क्या समूची तृप्ति कहीं है भी इस मनचली देह के खेल में?

मैं ध्यान-योग से स्वयं को साधने लगी और बहाने बनाकर परम से दूर रहने लगी। जब माँ घर पर नहीं होती थी, मैं उससे बाहर ही मिलती और वहीं से विदा होती। लेकिन जब माँ ने लद्दाख जाने की तैयारी की तो पता नहीं कैसे मेरा तप डगमगा गया? मैं परम से मिलने को मचल उठी। हमें कहीं बाहर मिलना था, लेकिन मैंने ही उसे निमंत्रण दे दिया।

मैं दरवाजा तोड़ दूँगा...वाइना...“ परम की आवाज़ कुछ ऊँची हो गई। “रुको...आ गई...

जिस्म को सुखाते हुए मैंने आईने में अपनी गर्दन पर चिपक रहे बालों को उंगलियों से ऊपर उछाला और अपने चेहरे पर फिसलती बूंदों को देखा। मेरा मन हुआ परम से कहूँ कि मैं आईने के सामने अपनी आँखों के कैमरे से अपना फोटो- सेशन कर रही हूँ। अब मेरे डेरे सागरतटों पर लगने वाले हैं। हवाई उड़ानें मुझे ले जाने को उतावली हैं।

तौलिया लपेटकर मैं भागकर सीधे ड्रेसिंग रूम में पहुँचना चाहती थी। चट से दरवाज़ा खोला। वह तो दरवाज़े पर घात लगाए था। उसने मुझे बाँहों में भरा और बाथरूम में धकेल दिया। कुछ ही क्षण में हम पानी की फुहारी तले थे। पानी की लकीरों के नीचे तपते मेरे उभारों को जैसे वह तोड़कर खा लेना चाहता था।

स्त्री के उन्नत उरोज पुरुष के लिए इतने भयानक आकर्षण का केंद्र क्यों हैं? मैंने रवींद्रनाथ टैगोर की एक विदेशी प्रेमिका के संस्मरण पढ़े हैं। उसने लिखा है कि बहुत दिनों के बाद मिले तो टैगोर ने पहले उसके स्तनों को ही दबोचा। पुरुष ने ताजमहल जैसे स्मारकों और देवस्थलों के जितने भी गुंबदधारी शिखर बनाए हैं, वे सब कहीं नारी के उन्नत स्तनों की ही आकांक्षा तो नहीं हैं? खजुराहो क्या है? पुरुष हर कहीं दूध पीता बच्चा है? लेकिन क्या उसका यह स्वभाव सुडौल और गोल- मटोल रूपों के रसिया निसर्ग से ही नहीं आता? हमारे ही लिए? हमारे ये देह- नक्षत्र क्या इस दुनिया को खूबसूरत बनाने का पैशन नहीं देते आए हैं पुरुष को?

मेरा रोम-रोम कह रहा था कि यह मिलन मेरी नैसर्गिक नियति है...इसे जी लेना आत्म-साक्षात्कार है। सोचा आँखें बंद करके निश्चेष्ट हो जाऊँ। लेकिन उसमें तो एक बवंडर ही मचल उठा था। किसी तरह अपने को छुड़ाकर बाहर भागी।

माँ ठीक कहती थी कि परम हो या परमहँस, किसी को घर में न घुसने देना। लेकिन मैंने तो खुद ही आफत मोल ली थी। कौन जाने वह अपने को साबित करने या फिर मुझे मॉडलिंग में गुम हो जाने से पहले लूट लेने आया था। मैं ही कहाँ कम चिढ़ाती थी उसे ‘परम बुद्ध’ कहकर।

ड्रेसिंग रूम में जाकर मैंने कपड़े पहने और दरवाज़ा खोलकर बाहर निकली। ओफ्फ! आज क्या सोचकर आया है यह? खा जाएगा मुझे? दरवाजा खुलते ही उसने मुझे उठाया और अंदर आकर सोफे पर पहुँचा दिया। मेरा विरोध ही क्या उसे हिंसक नहीं बना रहा है? मेरी देह के रहस्यों को मेरी सहमति से समूचा महसूस कर लेना क्या उसका हक़ नहीं है? मैंने शांत रहकर सोचा, आज यह तमाशा देख ही लूँ।

माँ की कुछ ख़ास किताबों से मैंने पुरुष-स्वभाव को थोड़ा-बहुत जाना न होता तो बुरी तरह आतंकित हो जाती। उन अबोध लड़कियों का क्या होता होगा जो जाने-पहचाने, अच्छे भले दोस्त की जगह किसी अनजान दरिंदे के हाथों पड़ती होंगी। उनमें कितने ही तो कानूनन ‘पति’ होकर ही यह करते हैं। भद्र पुरुष भी क्या मिलते ही मनमानी करने को लाचार है? या कि स्त्री भी उसकी लाचारी को समझ नहीं पाती? यह विरोध है या पूरकता? क्या अलग-अलग हालात इस रिश्ते को अधिक सहज या अधिक असहज नहीं बना देते? सच्चे कलाकार और संतुलित पड़ाव पर पहुँचे नर-नारी ही शायद एक- दूसरे को पूरी निजता देकर पूरा जी पाते हैं...छूकर भी और अनछुए रहकर भी...या फिर सभ्यताओं से दूर अपने आदिम रूप में ही मनुष्य अपनी देह के साथ सहज है?

सोफे पर पड़े-पड़े मैंने अपने हृदयक्षेत्र पर विकसित रहस्य पर उसका मचलना और उसके सिर में उलझ रही अपनी उंगलियों का आदिम वात्सल्य देखा। अपने अनावृत्त हो रहे जिस्म पर व्याकुल नर-नर्तन की झंकार सुनी। उसके हाथों और होंठों की बिजली मेरी नसों में कौंधती रही। कहीं यह बिजली टूट न पड़े।

अब बहुत हुआ परम...मुझे छोड़ो...प्लीज़...“ लेकिन मेरे शब्द उसके होंठों के तूफ़ान में दब गए, वह मेरी लौ में जल ही जाना चाहता था। सीमांत पर मिट जाने को तैयार...लेकिन यहीं मैं उससे अजनबी होकर अपने पास लौटने को कसमसा उठी।

जब उसने मेरे बार-बार ठिठकने और मुड़ने को नहीं समझा तो मैंने पूरी ताकत से उसे धकेला और सोफ़े की ओट में जाकर चिल्लाई “यह रेप है...परम! बलात्कारी हो गए हो तुम! और कितना ख़त्म हो जाऊँ मैं तुममें? मेरा भी कुछ वजूद है कि नहीं? तुम मेरे दोस्त हो कि नहीं?

वह फीका पड़ गया “ओह, सच...सॉरी...वाइना...“ वह पराजित...अचंभित...लज्जित हो बाहर निकल गया।

पता नहीं कैसे मैं पीछे से कह सकी “थैंक्स...परम...देखो जाना नहीं...मैं आ रही हूँ....मुझे तुमसे कुछ कहना है।“ मैंने जाना कि पुरुष यदि स्त्री का सम्मान भी करता हो तो स्त्री की कड़ी असहमति उसे आक्रामक नहीं रहने देती। लेकिन यदि परम मेरा पति होता तो?

बाहर परम ने मेरी पसंद का एक और गीत बजा दिया था “मुरलिया समझकर मुझे तुम उठा लो, बस एक बार होंठों से अपने लगा लो न। कोई सुर तो जागे मेरी धड़कनों में...मैं सरगम से अपनी रूठी हुई हूँ...

सकुचाती हुई मैं बाहर पहुँची, फिर ठगी-सी रह गई। परम वहाँ नहीं था। गीत चल रहा था “तुम्हें छू के पल में बने धूप चंदन, तुम्हारी महक से महकने लगे तन...।

अचानक मेरी नज़र एक चिट पर पड़ी, परम ने उस पर लिखा था “सचमुच पापी हूँ मैं। फिर भी इस घटना को मॉडलिंग या फ़िल्मों में जाने की रिहर्सल जितना ही महत्व देना। गुड बॉय!

यह शर्मिंदगी थी या उससे बचाव करता एक जल्दबाज व्यंग्य? क्या चाहता है यह मुझसे? यही न कि मैं चकाचौंध की दुनिया से बची रहूँ? क्या मैं मर रही हूँ उस दुनिया के लिए? क्या इसी डर से वह आक्रामक नहीं हो रहा है कि मैं उसके हाथ से निकल जाऊँगी?

रात भर मैं कविताएं लिखने की कोशिश करती रही। माँ की कितनी ही प्रिय पुस्तकों को उलटती-पलटती रही। लगा, कोई बाँध टूटना चाहता है। एक फैसला लिया मैंने...अपने को अपने तरीके से रचूँगी मैं...परम शिमला से आया तो मैंने उसे घर पर बुलाया। वह बहुत अनिच्छा से आया। रात के भोजन तक वह अधिकतर खामोश रहा जाने लगा तो मैंने उसकी बाँह पकड़ ली। वह खड़ा रहा मैं सहसा उससे लिपट कर रो पड़ी। मेरे मुँह से निकला “मैं जानती हूँ मेरे होते हुए भी तुम कितने अकेले और अतृप्त हो। लो, मैं खुद को तुम्हें सौंपती हूँ...अभी और यहीं।

हम कुछ देर एक-दूसरे के निकट बैठे रहे। फिर अचानक वह उठा और बोला “हम एक दूसरे पर रहम कर रहे हैं। इसकी ज़रूरत नहीं है।

मैंने उसे अपनी ओर खींचना चाहा, पर वह चला गया।

उस दिन के बाद हम मिलते रहे, मगर बचते हुए। माँ के लौटने पर भी वह घर पर नहीं आया।

माँ इस बार इंग्लैंड की एक घुमक्कड़ छायाकार के साथ लंबी यात्रा पर निकल गई थी। मैंने हिम्मत करके परम को फोन किया “परम, मैं कहीं दूर जाना चाहती हूँ...मुझे ले चलो...माँ के लौटने तक। तुम्हें ज़रा भी परेशान नहीं करूँगी।

वह कुछ देर ख़ामोश रहा, फिर बोला “मैं अपने काम से कश्मीर जा रहा हूँ, तुम्हें अपने साथ कैसे रख सकता हूँ?

जैसे रखोगे, रहूँगी...मैं चलूँगी हर हाल में...क्या तुम नहीं समझते कि हमें कु़दरत की फु़र्सत में कहीं सहज होकर एक-दूसरे को समझना चाहिए?

देखो, वाइना...मैं तुमसे एक सच कहना चाहता हूँ...फोन पर नहीं...“ उसकी बात में संजीदगी थी।

मैं सन्न रह गई। ऐसा क्या सच वह बताना चाहता है?

मैं नेहरु पार्क वाले रेस्तराँ में तुम्हारा इंतज़ार करूँगा?“ उसने पूछा।

नहीं...तुम सीधे मेरे पास अभी घर चले आओ।“ मैंने अपने डूबते स्वर में कहा तो वह परेशान हो उठा “हाँ, आ रहा हूँ।

मैं कब बुख़ार से तप गई, पता ही नहीं चला। परम ने मेरी हालत देखी तो उलटे कदम दवा लेने भागा।

मुझे दवा देने और अपनी गोद के तकिए पर लेने के बाद उसने कहा “तुम ठीक हो जाओ...फिर गुलमर्ग़ चलते हैं।

तुम कुछ बताना चाहते थे मुझे...कोई सच...“ “ऐसा कुछ नहीं है...कश्मीर से लौटने पर बता दूँगा...प्लीज अब उसके बारे में बात न करना।

तीन दिन के बाद हम गुलमर्ग में थे।

परम ने मेरे ठहरने के लिए ऊपरी इलाके के एकांत भरे कॉटेज में व्यवस्था करा दी थी। करीब एक घंटा मेरे साथ रहने के बाद अचानक उसने बताया कि वह बहुत जरूरी काम से श्रीनगर जा रहा है और कल लौटेगा। साफ पता चल रहा था कि वह किसी परेशानी में हैं।

वह चला गया। मैं गुलमर्ग के अकेलेपन में अपनी लिखी हुई नई कविताओं से बातें करने लगी। अगले दिन उसका फोन आया कि वह तीन दिन के बाद मेरे पास लौट सकेगा। मेरी हैरानी अब परेशानी में बदल गई। मैं दिन भर गुलमर्ग की लंबी-अकेली पगडंडियों पर अपने मन के उफानों को बहलाने लगी।

सहसा मेरी नोटबुक पर अधूरी कविताओं के बीच एक कहानी उतरने लगी, ‘उसका सच’! दो ही दिन में मैं अपनी व्याकुलता को एक पूरी कहानी में व्यक्त कर दूँगी, यह मेरी कल्पना से परे था। लेकिन समूची कहानी मेरे सामने रची-बनी थी। मैंने उसे सीने से लगा लिया और बिलख उठी। मुझे अपनी ही भाषा अजनबी और चमत्कारी लग रही थी। एक गहरे सुकून की गोद में पड़ी थी मेरी खामोश तन्हाई। जैसे कहीं कोई गा रहा था, ‘मर्ग-ए-गुल पर चराग-सा क्या है...छू गया था उसे दहन मेरा...’ एक बेखबरी में थी मैं...मैं हवा हूँ, कहाँ वतन मेरा?’

उस शाम हवा-सी मैं दूर निकल गई थी। एक लंबी-सुंदर कश्मीरी लड़की ने मेरे पास आकर पूछा “मैम, डू यू वांट ए पेइंग गेस्टहाउस फॉर लौंग स्टे?

तुम कहाँ रहती हो?“ मैंने पूछा।

मेरे मुँह से हिंदी सुनकर वह चौंकी।

आय कैन अंडरस्टैंड हिंदी एंड उर्दू। मैं आजकल कुछ कहानियाँ लिखने यहाँ आई हूँ।“ मेरे यह बताने पर वह उत्साहित हो उठी। सामने के फूलों भरे टीले पर उसके परिवार के सदस्य पिकनिक मना रहे थे। वह मुझे उनके पास ले गई। उसके माँ-बाप और छोटे भाई-बहन मुझसे मिलकर खुश थे। उन्होंने मेरे साथ कुछ फोटो खिंचवाए और अपने गाँव का पता और फोन नंबर दिया। मैंने उन्हें कहा कि मैं ज़रूर कभी आऊँगी। उस लड़की के पिता ने कहा, “हम आपका एहतराम करते हैं।

तीन दिन बीते। परम लौटा। मैंने उसके हाथ में अपनी वह कहानी थमा दी।

वह हैरान था और खुश भी। उसने अकेले में बैठकर कहानी पढ़ी और मेरे करीब आकर मेरी तारीफ की। ऐसा लगा कि वह बहुत खुश है। लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब असमंजस आज भी था। “परम, अब कह दो वह सच। जैसा भी है, मैं झेल लूँगी।

वाइना...गोवा में पिछले साल मेरी दोस्ती एक अमरीकी लड़की रोमेना से हुई थी। अभी कुछ ही दिन पहले उसका फोन आया था कि वह कश्मीर पहुँच रही हैं। अभी कल ही हमने शादी करने का फैसला किया है। वह लोनली प्लेनेट पब्लिकेशंस के लिए भारत के पर्यटन स्थलों पर एक बड़ी किताब लिख रही है। मैं अक्सर उसके पास पहुँचता हूँ...उसके काम में मदद भी करता हूँ। आजकल वह यहीं है...डल झील की एक हाउसबोट पर।“ मैं चुपचाप उसे देखती रहीं।

वाइना...कल मैं तुम्हारी वापसी के लिए प्लेन की टिकट ले रहा हूँ...चाहता था कि तुम्हारे साथ जाऊँ, मगर...

कोई बात नहीं...

तुम रोमेना से मिलना चाहोगी?

मैं तो तुमसे मिलने आई थी न...फुर्सत जीने...तुम्हारे साथ...अब तो जो तुम चाहोगे, वहीं करूँगी...तुम मिलवाना चाहते हो तो ज़रूर मिलूँगी।“ मेरी आवाज़ डूबती जा रही थी।

परम ने मेरा माथा छुआ।

तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है...खुद को संभालो।

तुमने यह सच पहले ही बता दिया होता तो घर पर ही संभल जाती। ऐसा कौन-सा गंभीर सच है यह! ऐसे सच क्या कदम-कदम पर पड़े नहीं मिलते? मैंने ही तो ज़िद की थी कि मुझे ले चलो...मैं किसी भी हाल में रह लूँगी...हाँ, रह ही लूँगी न अब तो...

वाइना...मेरी समझ में नहीं आ रहा है...क्या करूँ?

तुम मुझे यहाँ अकेली छोड़कर चले जाओ...अभी...इसी वक़्त प्लीज़...“ मैंने कहा और लॉन से उठकर कमरे में चली गई। जब तक वह मुझे रोकता, मैंने भीतर से दरवाज़ा बंद कर लिया। इसी के साथ ही सेलफोन भी।

शाम को बाज़ार जाकर ए.टी.एम. से कुछ पैसे निकाले और डैड से संपर्क करके कहा कि वे मेरे प्रवास के लिए मेरे एकाउंट में कुछ पैसे भेज दें। जैसा कि होना था, अगले दिन मेरे लिए परम द्वारा कराई गई हवाई जहाज की बुकिंग के लिए रिसेप्शन पर फोन आया। मैंने बताया कि मैं कुल्लू नहीं, अपने डैड के पास पोलैंड जा रही हूँ।

शाम तक मैं उस कश्मीरी लड़की के पास उसके घर में थी। चिनारों से बहुत ऊपर देवदारों से घिरे सलोने और मखमली गाँव में। ऐसे प्यारे लोग और खुले आकाश मिलते रहें तो मेरे साथ अब जो भी घटे, मुझे मंजूर है। मैं लिखने और कुदरत में भटकने की आदी होती चली गई।

डैड और मॉम के फोन आए तो मैंने उन्हें यहाँ का फोन नंबर बताकर प्रार्थना की कि वे मेरा पता या नंबर किसी को न दें और मुझसे लगातार संपर्क रखें। माँ ने परम के बारे में पूछा तो मैंने कहा कि वह अब मेरे जीवन में कहीं नहीं है और मैं उसके बारे में कोई बात नहीं सुनना चाहती।

एक अरसे के बाद माँ और डैड मेरे पास पहुँचे। डैड के साथ उनकी मित्र भी मुझसे मिलने आई थी। मैंने माँ को अपने पहले उपन्यास का पहला ड्राफ्ट दिखाया। उसे पढ़कर वह विस्मिय “बच्ची, ये किस मुकाम पर आ गई तू?“ माँ ने मुझे देर तक छाती से लगाए रखकर कहा “तू जो लिख रही है, वहाँ तू इतनी जल्दी कैसे पहुँच गई? इतनी पीड़ा कहाँ कमा ली तूने...? और साथ में मुझे और अपने डैड को समझने की इतनी प्यारी कोशिश, ये किस मोड़ पर पहुँच गई तू? मुझे बताएगी क्या?

मैं चुप रह गई। बताना चाहती थी कि एक सच है जो मेरे साथ रहने लगा है, पर अपने को वो कह ही नहीं सकता किसी से...मुझसे भी नहीं...होते हैं ऐसे सच...हम में जीते हैं अजनबी होकर...माँ ने मेरे सिर और चेहरे पर अपने हाथ नाजुक पंखों की तरह घुमाए और बोली “एक दुनिया गुज़रती है हम में से...हर शख़्स का कुछ न कुछ छूट जाता है हमारे पास...अक्सर कुछ बहुत कीमती भी...हर चीज़ को रद्दी की टोकरी में नहीं फेंक सकते हम...पूरा लौटा भी नहीं सकते। कितना भी धो-पोंछ कर लौटा दो मिले हुए को...उस लौटे हुए के साथ खुद भी चले जाते हैं हम...अपना उजलापन लेकर...एक घने जंगल में होते हैं हम...एक अकेले घर में...एक अकेले बच्चे की भांति...निरुपाय...पर कोई रहता है सदा हमारे साथ...।

डैड दूर चुप खड़े थे। उनकी खामोशी में मैंने माँ की छटपटाहट को भी शामिल देखा। मुझसे नज़र मिली तो गर्दन हिलाकर बता दिया कि तुम्हारी माँ जो कहती है, ठीक कहती है।

माँ ने मुझे अपने सीने के करीब लाकर कहा “ठीक है, तू लिखती जा...और देख, इसमें डूब जा। जहाँ तक हो सके, हर संवाद, हर घटना के साथ कु़दरत के चेहरों को खूब बयान कर। जितना हो सके, सच्ची होकर लिख...अपने तन और मन के एक-एक स्पंदन को नई भाषा दे। जादू लग गया है तेरे हाथ...उसी से रचेगी तू अपनी नई दुनिया...देखना...

बर्फ़ आने को थी। एक सप्ताह के बाद वे लोग लौट गए।

मैंने माँ को अपनी लिखी हुई कुछ बेतरतीब चीजें पढ़ने को दी थीं। उसने जाते ही फोन किया था “अब मैं अकेली हूँ, जो कुछ भी तुम्हारा लिखा हुआ मैं लाई थी, मैंने पढ़ लिया है। तुम्हारे पास एक बहुत सुंदर भाषा और गहरी अनुभूति है...उसमें ज़्यादा लिखो। जहाँ भी तुम खुद को, सिर्फ खु़द को रखती हो, अद्भुत हो जाती हो। देखो, मेरे साथ पहेलियाँ न बुझाना, तुम रहस्यपूर्ण होने लगी हो...जो भी कहना चाहो, मुझसे पूरा कहो, मुझे लंबे पत्र लिखो...और कोई चिंता न पालना। तुम जो कहोगी, जैसे कहोगी, सब हो जाएगा...मज़े में रहना।


एक दिन आधी रात को फिर माँ का फोन आया “मैं सो नहीं पा रही हूँ। मुझे याद है...परम ने एक बार मुझसे कहा था कि जैसे भी हो, वीनस को मॉडलिंग या फिल्मों में जाने से रोको, क्योंकि उसमें एक बहुत बड़ी लेखिका छिपी हुई है। डोरा बता रही थी कि उसे लगता है कि तुम्हें चकाचौंध की दुनिया में जाने से रोकने के लिए परम ने बहुत बड़ा नाटक रचा था। वह बिल्कुल अकेला होकर कहीं अज्ञातवास में रह रहा है। यहाँ के कुछ लोगों ने उसे दूर के शहरों में दीवानों की तरह भटकते देखा है। उसके माँ-बाप ने उसे बहुत ढूँढ़ा, पर वह नहीं मिला।

मैं सन्नाटे में थी। ऐसा नहीं हो सकता! कोई ऐसा कर सकता है क्या? मेरी रातों की नींद उड़ गई। मुझे परम के साथ गुज़रा एक-एक पल याद आने लगा। मैं खुद से बातें करने लगी “वीनस! तुम्हारे लिए जीने-मरने वाला परम इस तरह कैसे तुमसे दूर जा सकता था?“ फिर मेरा ही जवाब होता “तभी तो मैं इस तरह टूटी...वरना स्वयं को साध लेने में क्या कमी थी मेरे पास...?

नहीं, वह तुझे तोड़ देने के लिए नहीं, तुझे तेरे भीतर की दुनिया से जोड़ देने के लिए यह सब कर गया। इसी के साथ शायद प्रायश्चित भी...“ मैं चौंकी “किस बात का प्रायश्चित? वह मेरे लिए पागल था, बस।

कैसी थी हमारी वो दीवानगी और कैसा था वो मेरा बुलाना और दामन बचाना...

एक दिन सपने में मिले हम और रोते ही रहे...”वहशत में कोई साथ हमारा न दे सका, दामन की फिक्र की तो गरेबां निकल गया...

परम! अब आ जाओ। तुम यदि कोई और भी हो गए हो तो भी चलेगा। हाँ- हाँ, मैं लिखने से तो अब क्या ही रुकने वाली हूँ...देखना...मुहब्बत बुरी चीज़ है...जानना...

एक दिन उसके माँ-बाप मेरे पास पहुँचे। चुपचाप मेरे सामने धरती पर बैठ गए। उन्हें उम्मीद थी कि उनके बेटे का सुराग मुझसे मिलेगा। बहुत पस्त और निराश थे वो। मैं अपना दुख भूलकर उनकी देखभाल में लग गई। उन्होंने मेरी ख़ामोशी और लाचारी को समझा। कुछ भी नहीं पूछा उन्होंने, मुझमें ही उसे पा लिया। फिर साथ लेकर ही लौटे मुझे। उसकी खोज में हमारे दिए हुए सारे विज्ञापन व्यर्थ हो गए। लोनली प्लेनेट पब्लिकेशंस से पूछताछ पर पता चला कि उनके साथ रोमेना नामक अमरीकी या किसी भी महिला का ऐसा कोई अनुबंध नहीं हुआ था। जहाँ से भी किसी विदेशी लगने वाली व्यक्ति की लावारिस लाश की ख़बर मिलती, हम दौड़ कर पहुँचते।

परम! अब आ भी जाओ...मेरा अज्ञात तुम्हें बुलाता है...एक मेरा सच...जिसे तुम भी शायद छू भर ही सको, यदि तुम्हारे साथ कोई लड़की रहती है तो उसे भी साथ लाओ। पागल! तुमसे या किसी से भी मुझे कोई शिकायत नहीं है। तुम मुझे जिस जगह देखना चाहते थे, सिर्फ वहीं मैं तुम्हारा इंतज़ार कर रही हूँ...बाकी जगहें गुमनाम हो चुकीं...बहुत बदल गई हूँ। सच यही है कि अब मैं तुम्हें भी नहीं जानती। बहुत अबूझ हो गए तुम। मुझे अब अबूझ बहुत प्यारी लगती है। यों भी ऐसे अबूझ हैं मेरी ज़िंदगी में...मेरी माँ...मेरे डैड...उनके जितना तो मेरे करीब रहो...परम...क्या कोई तुम्हारा पता देगा मुझे?


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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