कहानी — ये अपने — समृद्धि शर्मा


युवा लेखिका समृद्धि शर्मा की पहली कहानी

पता है अभि लड़कियाँ नदियों की तरह होती है, जिसे छू कर हर कोई गुजर जाना चाहता है, अपनी गंदगी नदियों में धोना चाहता है, ठीक वैसे ही, बस लड़की हो… फिर खूबसूरत हो या बदसूरत कोई फर्क नही पड़ता है और यही लोग जब शादी करते है ना, तो लड़की ऐसी चाहिए वैसी चाहिए... 
समृद्धि शर्मा
जन्म: 21 मई 1995
एम .ए राजनीति शास्त्र
संपर्क
सतबिघी,
शेखपुरा — 811105
बिहार
samriddhi7777ss@gmail.com

स्वागत समृद्धि, आपका हिंदी कहानी संसार में स्वागत है। एक अच्छी कहानी से लेखन की शुरुआत पर आपको बधाई। हाल में ही कहीं पढ़ रहा था कि आज की युवा पीढ़ी, लिखते समय, अपने वरिष्ठों को नज़रंदाज़ करती है, सामाजिक सरोकारों से अलग हो कर कहानियाँ लिखती है; मगर आपकी कहानी पढ़ने के बाद लग रहा है, समस्त युवा लेखन ऐसा नहीं है। उम्मीद है आपकी कहानी पाठकों और वरिष्ठों को पसंद आएगी।
शुभकामनाओं के साथ.

भरत तिवारी


ये अपने — समृद्धि शर्मा


रावी अपने बदन को मानो और लोगो से बचाते हुए काफी तेज कदमों से आगे बढ़ रही थी साथ ही हर आने— जाने वालो को अपने करीब से गुजरते देखते हुए उसके चेहरे के भाव बदल जाते थे। रावी सोच रही थी यह फासला भी कितना बड़ा हो गया है जितनी तेजी से कदम बढ़ाती हूं फासले बढ़ते ही जा रहे है। तभी पीछे से उसे कोई स्पर्श करता हुआ आगे बढ़ गया।

रावी ने जल्दी से अपने आगे— पीछे देखा फिर अपने हमउम्र सी लड़की को देखकर उसे सुकून का अनुभव हुआ।

रावी के बढ़ते कदम अब काफी आहिस्ता हो गए थे। वो अपने पर्स में कुछ देखने लगी उफ़... कहां गयी चाबी गुस्से में बोली ओह... वो दरवाजा खोल कर अंदर चली गयी जब मन परेशान हो तो सामने रखी चीज भी नही मिलती है।

रावी बाथरूम में जाकर जमीन पर बैठ गयी और कुछ सोचने लगी फिर पानी से भरी बाल्टी अपने ऊपर डालने लगी बस उसका मन कर रहा था की खुद को जितना वो साफ़ कर सके, कर ले, रावी के दिमाग में एक अजीब सी कशमकश चल रही थी... रावी ही क्यों आज हर लड़की इस अनचाहे स्पर्श से परेशान है। जब हम किसी दूसरे के फेंकें हुए सामान को भी उसकी मर्जी के बिना स्पर्श नही करते है तो फिर कोई मुझ जैसी जीती— जागती इंसान को कैसे हमारी मर्जी के बिना स्पर्श कर सकता है शायद वो जानवर हमें इंसान ही नही समझते है।

तभी रावी— रावी... कहां हो... पुकारता हुआ अभिषेक ऑफिस से आया...

हां... हां... आ रही हूं रावी अपने गीले बालों से पानी की बूंदों से आजाद करते हुए बोली क्या है... क्यों शोर कर रहे हो... अभिषेक ने उसे देखते हुए कहा — कुछ नही... बस ये पूरा दिन काम करने के बाद मन में एक ही चाहत होती है...

क्या जरा मैं भी तो सुनूँ रावी सोफे पे बैठते हुए बोली... यही की बस अब अपनी रावी को देखूं...

अच्छा... क्यों आज बहुत काम था... हाँ काम तो था पर तुम्हें देखते ही... तुमसे बात करते ही सारी थकावट दूर हो जाती है। अभिषेक रावी के पास सोफे पर बैठते हुए बोला — सुनो इन गीले बालो में बहुत खूबसूरत लग रही हो...

सिर्फ गीले बालो में... अभिषेक मुस्कुराता हुआ बोला — नही हमेशा ही खूबसूरत लगती हो... मै मूवीज की दो टिकट लेकर आया हुआ हूं रेडी हो जाओ।

रावी एक ऑफिस के काम से और दूसरा 2 घंटे नहाने के कारण काफी थक चुकी थी। नही... अभि आज नही... आज मै भी काफी थकी हूं, तुम किसी दोस्त के साथ क्यों नही चले जाते हो और खाना भी बाहर ही खा लेना...

क्यों? क्या हुआ काम तो हर दिन होता है प्लीज बेबी! रावी अभिषेक का दिल तोड़ना नही चाहती थी

ओके... ठीक है चलते है... पर रावी के चेहरे पे थकावट साफ़— साफ़ दिख रहा था अभिषेक ने उसे समझते हुए कहा — नही तुम आराम करो! ! तुम गुस्सा हो गए अभि...




नही... बिलकुल नही! तुम थकी हो मैं देख सकता हूं... और सच कहूं... तुम बहुत परेशान भी हो... कहो क्या बात है... कुछ नही! ! अभिषेक रावी के हाथ को अपने हाथों में लेते हुए बोला — कहो... क्या हुआ! तुम मुझसे कुछ भी बोल सकती हो आखिरकार हम जीवनसाथी हैं, रावी अभिषेक के हाथों को और मजबूती से पकड़ते हुए बोली— वो आज ऑफिस से आते वक्त किसी ने जानबूझ कर मुझे इस तरह स्पर्श किया, वो स्पर्श इतना गन्दा था कि अभि मै तुम्हें बता नही सकती हूं। मुझे उस जानवर से नही अपने शरीर से घृणा हो रही है।

बोलते-बोलते रावी एकदम से बेचैन हो गयी। अभिषेक ने रावी को गले से लगा लिया... मत करो जॉब मैं तुम्हें हर ख़ुशी दूंगा, छोड़ दो जॉब, तुम्हें जॉब करने की कोई जरूरत नही है, अभिषेक इतनी बातें एक ही सांस में बोल गया।

तुम कैसी बातें कर रहे हो ? लड़कियां इन जानवरों के कारण घर से बाहर ना निकले मैं इन के कारण घर में बंद हो जाऊँ? नही! बिलकुल नही! मैं ये जॉब नही छोड़ने वाली इनके कारण कोई भी लड़की अब घर में बंद नही रह सकती है रावी काफी आत्मविश्वास भरे लहजे में बोल रही थी।

अभिषेक ने मौके की नजाकत को देखते हुए कहा — हां... मैं तुम्हारी बात से सहमत हूं, पर मैं क्या करूं ? जब तुम्हारे साथ ऐसा होता है, मैं टीपीकल हस्बैंड वाली बात कर देता हूं। क्योंकि कोई तुम्हारे साथ ऐसी हरकत करे, मैं बर्दाश्त नही कर सकता, सच में ये लोग इंसान कहलाने के काबिल नही है।

हां तुम मुझसे प्यार करते हो तो तुम्हें तकलीफ तो होगी न। रावी तुम आराम करो, मैं बाहर से आता हूं, अभिषेक बोलता हुआ बाहर चला गया। रावी को कब नींद आ गयी पता भी नही चला उसे। अभिषेक ने रावी को बेहद प्यार से जगाया रावी नींद में बोली— कितने लेट से आये हो कहां थे...

अभिषेक ने रावी को बाँहों में उठा लिया और छत पर ले गया। क्या कर रहे हो उफ़... रावी ने मुस्कराते हुए कहा छत का नज़ारा देख कर रावी दंग रह गयी और उफ़... के आगे कुछ बोल न सकी। नजारा बेहद खूबसूरत था, शीशे की मेज पर बिछी गुलाब की पंखुड़ियों और गुलाब के दो बेहद खूबसूरत फूल, इस तरह रखे गये थे जैसे अभि—रावी की कहानी को बयाँ कर रहे हो, कैंडल, रावी की पसंदीदा जूस और बेहतरीन डिश... साथ ही आसमान में लाखों सितारे और हंसी चाँद शमा को बेहद खूबसूरत बना रहे थे... ठंडी-ठंडी हवा बह रही थी, जिससे रावी के बाल उसके चेहरे को छू रहे थे, रावी चेहरे से अपने बालों को हटाते हुए बोली — सच में यहां बहुत अच्छा फील हो रहा है, ऐसा लग रहा है जैसे ये दुनिया की सबसे खूबसूरत जगह है और सबसे खूबसूरत पल भी...

दोनों ने अपनी पुरानी यादों को ताजा किया जूस पीते हुए रावी बोली— पता है अभि लड़कियाँ नदियों की तरह होती है, जिसे छू कर हर कोई गुजर जाना चाहता है, अपनी गंदगी नदियों में धोना चाहता है, ठीक वैसे ही, बस लड़की हो… फिर खूबसूरत हो या बदसूरत कोई फर्क नही पड़ता है और यही लोग जब शादी करते है ना, तो लड़की ऐसी चाहिए वैसी चाहिए...

ओह... रावी तुम कितनी मुश्किल बातें करने लगी हो जाने दो... भूल जाओ... हां... हां... बहुत मुश्किल बातें करने लगी हूं, मुश्किलें भी तो है पर इन मुश्किलों के बीच एक जगह ऐसी भी है जहां सिर्फ और सिर्फ सुकून है अभिषेक रावी के पास आते हुए बोला — अच्छा ऐसी कौन सी जगह है रावी अभि के गले लगते हुए बोली — तुम्हारे पास यहां जहां सिर्फ मुझे सुकून ही सुकून मिलता है... अभि ने भी मुस्कुराते हुए उसे अपनी बाँहों में भर लिया और दोनों एक— दूसरे में खो गए जहां उनकी मोहब्बत को हंसी चाँद भी अपनी चांदनी के साथ निहार रहा था...

रावी दूसरे दिन किचन के कामों में लगी थी तभी अभि आया— रावी... रावी कहां हो... रावी बाहर आते हुए बोली — क्या है थोडा बाहर तो आओ... बाहर आकर रावी ने आश्चर्य से कहा — स्कूटी किसके लिए ? रावी तुम कितने सवाल करती हो तुम्हारे लिए है अभि ने उसे स्कूटी की चाबी देते हुए कहा, दोनों सैर पे गए, स्कूटी ड्राइव करते वक़्त रावी खुद को दुनिया की सबसे लकी लड़की समझ रही थी, हो भी क्यों ना उसे अभि जैसा ख्याल रखने वाला पति मिला था जो उसकी जरूरतों को उससे पहले समझ जाता था। अभि ने उसे समझाते हुए कहा — अब तुम्हे जब भी घर से जाना हो स्कूटी से ही जाना... रावी और अभि का प्यार दिन ब दिन बढ़ता ही जा रहा था।

ऐसे ही वक़्त बीत रहे थे रावी अपनी ज़िन्दगी से बेहद खुश थी और अभि के कहे अनुसार वो स्कूटी से ही ऑफिस जाती थी।

ऐसे ही एक दिन रावी ऑफिस जा रही थी, तभी घर से दस कदम जाते ही स्कूटी खराब हो गयी। उफ़... इसे भी अभी ही खराब होना था टाइम भी नही है उसने जल्दी से स्कूटी को घर में वापस रखा और बस स्टैंड गयी बस खुलने ही वाली थी पर रावी ने किसी तरह दौड़ते हुए बस को पकड़ा बस में भी काफी भीड़ थी। थोड़े ही देर में रावी का बस स्टैंड आ गया। जून- जुलाई की 9-10 बजे की धूप भी बहुत होती है और उसपर रावी के तेज कदम। ओह... आज कितनी धूप है यह कहते हुए उसने अपना सर दुप्पटे से ढक लिया।

रावी काफी तेज कदमों से चल रही थी और बस स्टैंड में काफी भीड़ थी तभी उसे पीछे से, बेहद बुरे तरीके से, भीड़ का फायदा उठाते हुए एक इंसान स्पर्श करता हुआ आगे बढ़ गया।

सम्हल कर नही चल सकते रावी ने चिल्लाते हुए कहा, वो आगे बढता हुआ बोला — मैडम तुम सम्हल कर चलो ना। कुत्ते-कमीने तुम क्या समझते हो तुम्हें कोई कुछ नही कहेगा रावी बोलते हुए उसके आगे जा कर खड़ी हो गयी तुम सब...

... रावी ने जैसे ही चेहरे को देखा, वो अवाक रह गयी, साथ ही रावी से नज़रें मिलते ही अभिषेक के होश उड़ गए! ! वो अनमना सा कभी इधर — कभी उधर देखने लगा...

रावी खामोश हो गयी, उसके कदम पीछे की ओर बढ़ने लगे और वो अपनी दोनों आंखें बंद करते हुए वो आगे की ओर मुड़ी और आहिस्ता-आहिस्ता कदमों से आगे बढ़ने लगी अभिषेक उससे बात करने तक की हिम्मत नही जुटा सका।

रावी ऑफिस के रास्ते में पड़ने वाली मंदिर की सीढियों पर जा बैठी। उस दिन वो ऑफिस न जा सकी। मन में बहुत सारे सवाल उठ रहे थे। जिन लोगों को वो जानवर समझ रही थी... उसने कभी ये क्यों नही सोचा कि हमारे इर्दगिर्द रहने वाले लोग... हमारे घर के लोग भी जानवर हो सकते है। ये लोग किसी दूसरी दुनिया के तो नही होते है, हमारे घरों से ही होते है। हां... ये हमारे अपने ही होते है, रावी अपने आंसुओं को पोंछते हुए इतना ही बोली सकी — ये अपने...

कितने दिनों तक रावी- अभिषेक के दरमियान बाते नही हुई। अभि ने उससे माफ़ी भी मांगी और ऐसा फिर ना करने का वादा किया। रावी ने उसे माफ़ कर आगे बढ़ने की कोशिश भी की लेकिन उस फरिश्ते के लिए उसकी मोहब्बत खत्म हो चुकी थी...

सब कुछ साथ-साथ चला... नए रिश्तों का जन्म और पुराने रिश्तों का टूटना और इनके बिखरे कांचो का असर, नए रिश्तों पर तो पड़ना ही था। रिश्ते तो टूट जाते है पर उनकी निशानी सदा साथ रह जाती है। रूहानी आखिरकार अभि की निशनी थी, इस सच से रावी इनकार नही कर सकती थी।

रावी कुछ काम में लगी थी, तभी रूहानी की रोने की आवाज सुनकर दौड़ी हुई आई— क्या हुआ बेबी... हो... हो... मोम यहीं पर हैं... रूहानी अपने नन्हे हाथों से रावी के गालों को छू रही थी, दीदी जरा गर्म पानी लाना... रावी ने रूहानी के लिए दिन में एक नौकरानी को रख लिया था पर रावी की नींद अधूरी ही रह जाती, रात में उसे रूहानी की जरूरतों के मुताबिक उठना होता था।

वो जब कभी अपनी माँ को अपने पास बुलाती तो उसके पिता और भाई 15 दिन में ही वापसी के लिए उसे परेशान कर देते, वो रावी की कदम को गलत ठहराते थे और माँ भी समझाती कम ताना ज्यादा देती। रूहानी के पहले जन्मदिन पर रावी ने अपने परिवार वालों को बुलाया तो था पर गुस्सा होने के कारण कोई भी नही आया था और दूसरे जन्मदिन पर सिर्फ माँ।

वक़्त खुशी के हो या गम का बीत ही जाता है... रावी और रूहानी की छोटी सी दुनिया का वक़्त भी ऐसे ही बीत रहा था। रावी अपनी दर्द को बोलती भी तो किससे और सच कहो तो वो अपना दुःख किसी को बोल भी नही पाती थी, घुटती रहती थी, रात के अँधेरे में वो अपने दर्द व खुशियों को शब्दों में ढाल रही थी... मेरी ज़िन्दगी का सबसे खूबसूरत दिन... हां... जब मेरी रूहानी ने मुझे पहली बार माँ कहा और वो भी जब रूहानी बिना किसी सहारे के अपने पैरों पे खड़ी हुई थी... इन गुजरते वक़्त के साथ अभिषेक ने कई बार मुझसे संपर्क करने की कोशिश की पर जब दिल ही राजी ना हो तो घरोंदा कैसे बसाया जाय...

रावी ने रूहानी की चौथी सालगिरह के लिए अपनी माँ को बुलाया था माँ जन्मदिन तक तो किसी तरह चुप रही उसके बाद वो मौके की ताक में थी।

रूहानी रावी के दुप्पटे के साथ खेल रही थी कभी उसे वो सर पर लेती तो कभी दुप्पटा उसके लिए साड़ी बन जाता। लड़कियों का ये स्वाभाविक गुण होता है उसने रावी के मेकअप किट को उठाया ही था की तभी रावी ने जल्दी से उसके हाथ से मेकअप किट ले लिया नही... नही... बेबी ये नही... तुम सब कुछ तोड़ देती हो लिपस्टिक,आईलाइनर नो... दो ना मोम... प्लीज... दो ना... रूहानी ऐसे देख रही थी जैसे किसी ने उससे उसकी सबसे कीमती चीज ले ली हो, रावी ने मेकअप किट को अलमारी में वहां रखा जहां से रूहानी ले न सके।

दो... ना मोम... प्लीज गॉड प्रोमिस इस बार मैं कुछ नही तोड़ने वाली, दो ना... मोम... प्लीज... रूहानी इतने प्यार से बोल रही थी रावी की ममता एक पल के लिए पिघल गयी फिर उसने खुद को सम्हालते हुए कहा— नो... बेबी आपकी इत्ती मीठी- मीठी बातें मैं खूब समझती हूं।

दे क्यों नही देती है जो मांग रही है रावी की माँ बोली।

कैसे?? तुम्हें नही पता... तभी रावी की माँ बीच में बोल उठी — अभी भी देर नही हुई है, अपना घर फिर से बसा ले मर्द तो ऐसे ही होते है, हम औरतों का काम उन्हें सही रास्ते पर लाना होता है, घर ऐसे नही बसते है, उन्हें बसाना पड़ता है, वो मर्द है वे कुछ भी कर सकते है, हमारा काम है उन्हें सही और गलत बताना...

क्यों ??? क्यों माँ ??? मर्द तो हमसे ज्यादा समझदार होते है... फिर हमें उन्हें सही— गलत बताने की क्या जरूरत, हमने तो उन्हें भगवान का दर्जा दे रखा है...

देख अगर तुझमें इतनी अकड़ है, तो सारी उमर अकेले ही रहना। अरे तेरे पापा अगर किसी दूसरी औरत को घर में भी ले आये ना, तो भी मैं उन्हें न छोड़ सकती हूं। रावी ने चुप रहना बेहतर समझा।

रूहानी भी अपने पापा से मिलने की जिद करती, ये सब से मुश्किल वक़्त होता था रावी के लिए, अभिषेक से अलग होने के बाद रावी ने बहुत मुश्किलों को झेला था।

मोम... एक बात कहूं।

कोई बात नही... कहनी है तो दूध का गिलास खत्म करो पहले... पर तब तक रूहानी अपनी बात बोल चुकी थी। सबके पापा सबके साथ रहते है। मेरे पापा हमारे साथ क्यों नही रहते है... रावी कुछ सोचते हुए बोली — वो इसलिए की सबकी मोम आपकी मोम की तरह स्ट्रोंग नही है, रूहानी मुस्कुराने लगी, पता नहीं, उसे यह बात कितनी समझ में आयी।

रूहानी दूध का गिलास रखते हुए बोली — मोम अब मै पापा की तरह लग रही हूं ना पापा की तरह मुछे... हा... हा... रावी उसके होंठों को साफ़ करते हुए बोली — अब नही लग रही हो पापा जैसी... चलो जाओ बिस्तर पर, मै भी आती हूं।

रावी की तबियत ठीक ना होने के कारण उसने नौकरानी को रात में रुकने का आग्रह किया था रावी सोयी हुई थी, रूहानी ने चेयर लगा कर अपना पसंदीदा दुपट्टा और मेकअप किट निकालने लगी, तभी उसकी नज़र डायरी पर पड़ी। पता नही क्यों उसका मन डायरी की ओर चला गया उसने दुपट्टा और मेकअप किट कबड में ही रख दिया और डायरी के पन्ने पलटने लगी और उसे पढ़ने लगी।

... तभी रूहानी की आंसुओं की एक बूंद रावी के डायरी पे गिर गयी अपने माँ की तकलीफों के बारे में पढ़ कर, उसके हाथ एकाएक डायरी के पन्नो पर ही रुक गए पर आज उसे पहली बार अपने पिता से नफरत हुई आज के समय में इस तकलीफ से 5 साल की बच्ची भी दूर नही है, उन्हें भी कभी-ना- कभी इससे गुजरना ही होता है, कभी स्कूल में किसी पराये से तो कभी गोद लेने तो कभी प्यार-दुलार करने के बहाने ये अपने ही...

रूहानी ने डायरी को वही पर रख दिया जहां रावी ने रखा था और मेज पर रखी अभिषेक की तस्वीर को स्टोर रूम में रख दिया...

रूहानी रावी के पास गयी और रावी के माथे को चूमते हुए बोली... आय लव यू मोम... रावी मुस्कुराते हुए बोली — आय लव यू टू... मोम कल मैं स्कूल नही जाउंगी आपके साथ रहूंगी। नही... मै ठीक हूं। तुम स्कूल क्यों नही जाओगी... तुम बिलकुल अपने पापा पर गयी हो...

''नो मोम... मुझे पापा की तरह नही आपकी तरह बनना है और रावी के सीने से लग गयी... गुड नाईट मोम रावी ने भी उसे अपने सीने से लगा लिया रूम की लाइट ऑफ हो चुकी थी पर रूहानी की नींद... कोसों... दूर... थी...

(समृद्धि की यह पहली कहानी कैसी लगी बताइयेगा )

००००००००००००००००
यदि आप शब्दांकन की आर्थिक मदद करना चाहते हैं तो क्लिक कीजिये
loading...
Share on Google +
    Facebook Commment
    Blogger Comment

0 comments :

Post a Comment

osr5366