शरीर के अंदर वह क्या है जो खुद को 'मैं' कहता है? : मूजी



हमारा दुश्मन यह दुनिया नहीं, बल्कि हमारा अपना मन है।

न मन मारें, न मन सुधारें: मूजी


एक ही समय में हम बहुत-कुछ कर रहे हैं - पूजा से लेकर परपंच तक...साहित्य से लेकर क्रिकेट मैच तक...दूसरों को और कुछ दें न दें ज्ञान हम ज़रूर दे रहे हैं. नाराज़ न होइए, दरअसल एक निवेदन है आपसे - सन्डे नवभारत टाइम्स के संपादक राजेश मित्तल द्वारा लिए गए इस इंटरव्यू को पढ़ने का... निवेदन है अस्वीकार न कीजिये।

भरत तिवारी

Rajesh Mittal's Interview of Spiritual Saint Mooji


मूजी जाने-माने आध्यात्मिक गुरु हैं। मूल रूप से जमैका (वेस्ट इंडीज) से हैं। भारतीय दर्शन अद्वैत की शिक्षा देते हैं। अद्वैत यानी ब्रह्म और जीव दो नहीं, एक हैं। मूजी रमण महर्षि के शिष्य हरिलाल पूंजा (पापा जी) के शिष्य हैं। 63 साल के मूजी का असल नाम ऐंथनी पॉल मू-यंग है। मू नाम के साथ सम्मान से जी लगाने के कारण मूजी नाम पड़ गया। कई साल लंदन में रहे। आजकल पुर्तगाल में अपने आश्रम में रह रहे हैं। वह दुनिया भर के देशों में घूम-घूमकर सत्संग करते हैं। भारत में भी कई बरसों से सत्संग कर रहे हैं। इन दिनों ऋषिकेश में हैं। राजेश मित्तल ने उनसे अध्यात्म के विभिन्न पहलुओं पर लंबी बातचीत की। पेश हैं इस बातचीत के खास हिस्सेः


भारत में बहुत सारे लोग आपसे वाकिफ नहीं हैं। क्या आप सिर्फ 5 पॉइंट में अपनी शिक्षाओं का सार दे सकते हैं?


  1. साधना चाहे किसी धर्म विशेष में रहकर की जाए या किसी आध्यात्मिक गुरु के पास जाकर, आत्म साक्षात्कार या आत्मज्ञान बाहर कहीं नहीं, इंसान के भीतर ही होता है। यह अद्वैत दर्शन है। साधना का सबसे सीधा और आसान रास्ता।

  2. आत्मज्ञान में कुछ पाना नहीं है। कुछ करने की भी जरूरत नहीं। कुछ भी बदलना नहीं है। आप पहले से ही परफेक्ट में हो - बस इस सचाई को समझने की और उसकी अनुभूति करने की जरूरत है

  3. खोज इस बात की करो कि मैं कौन हूं। यह रास्ता खुद की खोज का है। जो हम सोचते हैं, हम वह हैं नहीं। खोज करो कि असल में हम कौन हैं। हमने अपनी पहचान शरीर और मन के साथ जोड़ रखी है - यह गलत है। असल में हम समंदर हैं लेकिन हमने खुद को लहरों के साथ जोड़ लिया है।

  4. हमें अपनी कंडिशनिंग से, अपने संस्कारों से खुद को खाली करना है।

  5. रोज कुछ देर के लिए ध्यान में बैठें। मन में कुछ भी उमड़े, उसे पकड़ना नहीं। उसमें उलझना नहीं। अब इस खालीपन को महसूस करें। जब हम खाली हो जाते हैं तो हमारे अंदर कोई दूसरी ही ताकत काम करती है।


आपने अभी कहा कि असल बात भीतर खोज करना है। इसे कैसे किया जाए?

सबसे अच्छा तो यही रहेगा कि किसी ऐसी गुरु की खोज की जाए जो आत्म साक्षात्कार कर चुका हो, जो शरीर और मन से जुड़ाव की वजह से पैदा हुए भ्रम को दूर कर चुका हो।


लेकिन अगर गुरु होगा तो शोषण के भी आसार होंगे। क्या गुरु के बिना काम नहीं चल सकता?

मेरा मानना है कि अगर कोई शख्स अध्यात्म के रास्ते पर किसी गुरु की मदद के बिना चलता है, चाहे बेहतरीन किताबों का सहारा ले, उसका कामयाब होना बेहद मुश्किल है। असल में हमारा दिमाग बेहद शातिर है। उसकी चालाकियों से निबटने के लिए गुरु का होना जरूरी है। ऐसा गुरु जो मन की बदमाशियों से वाकिफ है और उसी हिसाब से वह साधक को रास्ता दिखाता है। वह देख सकता है कि साधक अटक या भटक गया है और साधक नहीं जानता कि वह अटका हुआ है। गुरु उसे बताता है और उसकी मदद करता है। अगर मैं कहता हूं कि गुरु की जरूरत नहीं तो मन को तो अच्छा लगेगा, लेकिन साधक का नुकसान हो सकता है। सही गुरु की मदद से एक दिन या एक सेशन में भी आत्मज्ञान संभव है।



आपने कहा कि गुरु अनिवार्य है लेकिन सही गुरु कैसे पहचानें? इन दिनों बहुत सारे लोग गुरु होने का दावा करते हैं और दावे बड़े बड़े करते हैं।

सही-गलत गुरु का मिलना आपकी समझ पर निर्भर करता है। जैसी आपकी समझ होगी, आपको वैसा ही गुरु मिलेगा। हो सकता है कि आपको गुरु गलत मिल जाए लेकिन एक मायने में अच्छा ही है क्योंकि उसके जरिए आपको अपने खोखलेपन का एहसास होगा। बहुत सारे लोग आते हैं और कहते हैं कि मुझे बेहतरीन पत्नी या बेहतरीन पति मिलना चाहिए था लेकिन मेरा कहना है कि आपका खुद का लेवल वैसा नहीं है कि आपको बेहतरीन मिले। आपको जो तथाकथित गलत जीवनसाथी मिला है, आप उसी के लायक हो। आप खुद तो अपने भीतर बड़ी-बड़ी कमियों को लेकर फिर रहे हो और जीवनसाथी आप दुनिया भर में बेहतरीन चाहते हो। आपको लगता है कि आप उसके लायक हो लेकिन आपमें जो बुरी आदतें हैं, उनके चलते वैसा जीवनसाथी आपके साथ ज्यादा देर तक टिक नहीं सकता, बल्कि वैसा जीवनसाथी आपके पास फटकेगा तक नहीं। जिंदगी में आप वही पाते हो, जैसी आपकी वाइब्रेशंस हैं, जैसे आप भीतर से हैं। बाहरी मन की पकड़ से परे ताकतें तय करती है कि जिंदगी में किस-किससे हम मिलेंगे, वे हम पर क्या असर डालेंगे। जिंदगी हमें वही देती है जिसे सीखने की हमें जरूरत होती है और कभी-कभी यह सीखना दुख के जरिए होता है। तो सही गुरु खोजने के बजाय ज्यादा वक्त और ताकत हम अपने भीतर की सफाई में लगाएं।


लेकिन ऐसे भी लोग हैं जो ताउम्र गलत गुरु के जाल में फंसे रह जाते हैं?

ऐसे लोग खुद गलत होंगे। आजकल बनावटी साधक भी बड़ी तादाद में दिखते हैं। उन्हें गुरु की खोज तो होती है लेकिन गलत वजहों से। उन्हें आत्मज्ञान नहीं, कुछ और ही चाहिए होता है। उन्हें ऐसे गुरु की तलाश होती है जो अपने आशीर्वाद या चमत्कार या संपर्कों से दौलत, शोहरत या ओहदा दिला दे। ऐसे लोगों को इसी के मुताबिक गुरु मिल भी जाते हैं। यह कुदरत बड़ी समझदार है। यहां गलती नहीं होती। सच्चे गुरु की पहचान के मापदंड देना बेहद मुश्किल है लेकिन मैं आपको एक नुक्ता देता हूं। अगर आप किसी गुरु से मिलो और उसकी मौजूदगी में मन अपने आप शांत हो जाए, मन में उसके लिए इज्जत उमड़े तो वह सही गुरु है। हो सकता है, जो वह कह रहा हो, वो आपके ऊपर से निकल रहा हो, पर आपको भीतर से कुछ अच्छा महसूस हो। आपका मन करे कि उसके साथ मैं ज्यादा वक्त गुजारूं। यह भी बहुत संभव है कि आप सही गुरु से मिलें और उसकी मौजूदगी में अच्छा महसूस ना करें। वह आपके अहंकार को चोट पहुंचाए और आपका वहां से भाग जाने का मन करें लेकिन भीतर कुछ ऐसा है जो आपको वहीं रहने के लिए कहे। ऐसा गुरु आपके लिए सही है। अगर आप गलत कारणों से गुरु की खोज नहीं कर रहे तो आपको सही गुरु देर-सवेर मिल ही जाएगा।


आपने गुरु चुनने के बारे में बताया, आप शिष्य कैसे चुनते हैं?

मैं लोगों को नहीं, लोग मुझे चुनते हैं। मैं उन्हें सीधे नहीं चुनता। मेरे सत्संग में सिर्फ वही लोग आते हैं, जो मुझसे तादात्म्य महसूस करते हैं, जो मेरे शब्दों को यूट्यूब के जरिए महसूस कर चुके होते हैं। मैं इस मामले में खुशकिस्मत हूं कि यूट्यूब सत्संगों की मदद से छंटाई हो जाती है। नहीं तो मेरे पास ऐसे लोगों की भारी तादाद हो जाती जो गुरु से करोड़पति, अरबपति होने का आशीर्वाद चाहते हैं। तब उनको ऐसे यहां आने के बाद एहसास होता कि यह गुरु सही नहीं है। किसी और के पास चलते हैं। यह तो खुद को खाली करने की बात कर रहा है, आत्मज्ञान पर जोर दे रहा है।



आत्मज्ञान की घटना क्या अचानक घटती है, कोई फ्लैश आता है या धीरे-धीरे इस स्टेज पर पहुंचा जाता है?
आत्मज्ञान तो अचानक ही होता है और फ्लैश की तरह होता है। शर्त यही है कि ऐसी स्थिति की अनुभूति के लिए आपकी तैयारी भरपूर हो।

क्या यह मुमकिन है कि एक बार आत्म साक्षात्कार पा लेने के बाद इंसान फिर से पुरानी स्थिति में लौट आए, उस दर्जे को खो बैठे?

इंसान की फितरत पुराने अभ्यास के कारण ऐसी हो गई है कि वह शरीर और मन से अपनी पहचान गांठता है। उदाहरण के लिए आपका नाम राजेश है। एक बार आप राजेश नाम रख लो तो इसे भूल कर कोई दूसरा नाम धारण कर लेना बेहद मुश्किल हो जाता है। एक दूसरी मिसाल। मान लो, किसी देश में करंसी यूरो से बदलकर पौंड कर दी जाए। ऐसे में पुराने सिस्टम से नए में जाने में कुछ वक्त लगता है। कुछ दिनों तक आप दोनों तरह से सोचते हैं - पौंड के हिसाब से भी और यूरो के हिसाब से भी। नई करंसी की आदत डलने में कुछ वक्त लगता है। इस दौरान मन पुराने तरीके से ही बार-बार सोचता है लेकिन एक बार जब आप अज्ञान की बीमारी से पूरी तरह मुक्त हो जाते हो, एक बार जब आप सच्चे तौर पर जाग जाते हो तो आपका काम मुकम्मल हो जाता है। यह तकरीबन ऐसा है कि कोई मर गया और फिर उसका नया जन्म हो गया। तब वापस जाना मुमकिन नहीं होता। शुरू-शुरू में ऐसा होता है, ऐसा होना लाजमी है। धीरे-धीरे जागृत चेतना मजबूत होती जाती है और अज्ञान मिटता चला जाता है।

लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में मैं कैसे भूल सकता हूं कि मैं राजेश हूं जबकि रोजमर्रा की जिंदगी में मेरी यही तो पहचान है?

दरअसल बदलाव राजेश के स्तर पर नहीं, चेतना के गहरे स्तर पर होता है। वह जो जाग चुका है, उसके रोजमर्रा के कार्यकलाप बदस्तूर जारी रहते हैं। जरूरत सिर्फ मन के शिकंजे से मुक्त होने की है। हमारा दुश्मन यह दुनिया नहीं, बल्कि हमारा अपना मन है।


अगर मुझे पता ही नहीं है कि मैं अपने मन के कब्जे में हूं, मैं सोशल कंडिशनिंग का शिकार हूं, तो मैं उससे मुक्ति की कोशिश क्यों करूंगा?

यही तो इस सारे खेल की खूबसूरती है। इस खेल का यह नियम है कि अगर आप आत्मज्ञानी नहीं हो तो आप अक्सर दुख में रहोगे और यह दुख आपमें मन से मुक्ति की तड़प पैदा करेगा।

तो आध्यात्मिक तरक्की के लिए क्या दुख का होना अनिवार्य है?

चंद लोग ही लगातार दुख भोगे बिना आत्मज्ञानी बन पाते हैं। ज्यादातर लोगों के लिए दुख का होना अनिवार्य है।


वह शख्स जो आत्मज्ञान पा चुका है, शरीर-मन की पहचान में नहीं फंसा है, क्या वह भी गुस्से का शिकार होता है?

आत्मज्ञान होने के बाद भी हर किस्म की भावना मन में आती है लेकिन उससे कोई जुड़ाव नहीं होता। गुस्सा आता है और जल्द ही चला भी जाता है। उसकी कोई याद भीतर जमा भी नहीं होती।


कंडिशंड मन से मुक्ति पाना, मन को किसी भी तरह की कंडिशनिंग (संस्कारों) से मुक्त करना यानी मन को खाली करना कोई आसान काम नहीं है?

हां, यह मुश्किल है और इसमें काफी लंबा वक्त भी लग सकता है। तब, जब साधक अपनी खुद की इमेज और कंडिशनिंग से संघर्ष करता है। लेकिन यह सही रास्ता नहीं है। सबसे पहले तो हमें यह समझना होगा कि वह असल में है क्या, जो कंडिशंड (संस्कारित) होता है। सचाई यही है कि हमारा मन कंडिशंड होता है। इस बात को समझने की जरूरत है।

सार रूप में कहें तो हर इंसान विशुद्ध आत्मा है लेकिन ज्यादातर लोग खुद को एक इंसान के तौर पर देखते हैं। इंसान इस सीमित सोच के साथ पूरी जिंदगी बिता देता है कि मैं पुरुष हूं, 42 साल का हूं, हिंदू या मुस्लिम या ईसाई हूं, मैंने साइंस पढ़ी है। कोई भी उससे यह नहीं पूछता, भाई, तुम तो यह बता रहे हो कि तुमने क्या किया है, तुम क्या मानते हो लेकिन यह तो बताओ कि तुम असल में हो कौन। दरअसल रोजमर्रा की जिंदगी गुजारते हुए हमारे मन में ख्याल ही नहीं आता कि हम अपने भीतर गहरे उतरें, अपनी असल पहचान से रूबरू हों। ख्याल तब आता है जब दुख के हालात से हमारा सामना होता है। तब ऐसे आसार बनते हैं कि हम अपनी कंडिशनिंग से परे जाकर खुद के आत्म स्वरूप का कुछ एहसास कर सकें।


यह तो ठीक है कि दुख हमें हमारे असल स्वरूप की याद दिला देता है लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में इसे लगातार याद रखना मुश्किल लगता है। गाड़ी बार-बार पटरी से उतर जाती है।

सबसे पहले यह समझें कि यह जो हमारा मन है, कंडिशनिंग का शिकार होता है और इसी मन से हम अपनी पहचान गांठ लेते हैं
। मैं इस बात पर जोर नहीं डालता कि आपको जरूर कोशिश करके मन को बदलना है। मैं उस लेवल पर किसी के साथ काम करने पर यकीन नहीं करता, क्योंकि ऐसे में मैं एक ऐसी पहचान को मजबूत करूंगा जो सच नहीं है और आप देखेंगे कि यह सच नहीं है। मैं बस यह कहता हूं कि आप यह देखो कि मैं असल में कौन हूं? वह कौन है जिसकी कुछ आदतें हैं, कुछ मान्यताएं हैं, कुछ प्रवृत्तियां हैं? वह कौन है जो कंडिशनिंग का शिकार हुआ है? अब तक की जिंदगी के सफर में हमारी सोच पहले कुछ और थी, अब उससे बिलकुल अलग है। आदतें बदलीं, मान्यताएं बदलीं और हमें इस बदलाव का एहसास है। वह जो इन सब बदलावों के प्रति जागरूक है, क्या वह भी बदल रहा है? इस सवाल पर चिंतन किए जाने की जरूरत है और इसका जवाब खोजने की भी।

मैं शरीर नहीं हूं , मन भी नहीं। मैं आत्मा हूं। इस तरह के मंत्र का जाप कुछ लोग करते हैं। क्या इसका कुछ फायदा होता है?

आप क्यों कह रहे हो कि मैं शरीर नहीं हूं? इसलिए कि आपका विश्वास है कि आप शरीर हो। ऐसा कहना 'मैं शरीर नहीं हूं' भी अपने को समझाने की तरह है कि आप वह नहीं हो, जो आप सोच रहे हो। यह फायदेमंद नहीं है क्योंकि अब भी एक 'आप' है जो कह रहा है, 'मैं यह नहीं हूं'।

क्या ध्यान के सचमुच उतने फायदे होते हैं, जितने गिनाए जाते हैं?

पहली बात तो आप जानें कि ध्यान करता कौन है। ध्यान का मकसद ऐसे मुकाम पर पहुंचना होता है जहां पर इंसान सब कुछ देख रहा है, पर खुद वह बिना किसी विचार के है। जिस चेतना को आप ढूंढ रहे हैं, वह वही चेतना है जिसके द्वारा आप खोज कर रहे हैं। ध्यान मन को शुद्ध करने में मददगार है, लेकिन ध्यान के साथ-साथ जो असल में सहायक है, वह है आत्म-विचार। आत्म-विचार बेहद कारगर है क्योंकि यह दर्पण का काम करता है। इसकी मदद से आप यह देख पाते हैं कि आप क्या-क्या नहीं हो। पर वह सचाई जो आपके भीतर है, उसे आप देख नहीं सकते, सिर्फ हो सकते हो।

इस आत्म-विचार वाले ध्यान में क्या-क्या सवाल पूछे जाने चाहिए?

शुरुआत कुछ बुनियादी तथ्यों से करनी चाहिए। यह सच है ना कि आप अपने विचारों को जान सकते हो, अपनी भावनाओं को, सुख-दुख को, वक्त के बीतने को — यह सब आप जान सकते हो। इनको जानते हो, तभी तो इनके बारे में बात करते हो लेकिन जो यह सब जान रहा है, क्या उसे जाना जा सकता है? वह जिसे ज्ञानेंद्रियां बाहरी दुनिया का हाल बताती हैं, क्या उसे देखा जा सकता है? क्या उसका कोई आकार है? क्या उसका कोई गुण है? वह कौन है जो यह सब अनुभूति कर रहा है? यह आपको खोजना ही पड़ेगा! जो कुछ भी मैं देखता हूं, वह मैं नहीं हो सकता — यह तो एकदम साफ बात है। यह ऐसा कुछ है जो सिर्फ मेरी चेतना के क्षेत्र में उजागर हो रहा है और जो अपने आप से साक्षी हो रहा है। इसका आना, कुछ समय के लिए रहना और फिर चले जाना — इस सबको देखा जाता है। मैं उनमें से कुछ भी नहीं हो सकता क्योंकि मैं इसके होने और इसके न होने, दोनों का साक्षी हूं। तो फिर मैं कौन हूं? इस शरीर के अंदर वह क्या है जो खुद को 'मैं' कहता है? क्या इसे पहचाना जा सकता है? अगर इसे जाना जा सकता है तो किसके द्वारा? ये बहुत गहरे और अहम सवाल हैं। इन सवालों में मन रूपी समूचे बरगद को उखाड़ फेंकने का माद्दा है।

मन को यह सब बड़ा उलझाऊ लगता है।

यह उलझाऊ लग सकता है। वजह यह कि भीतर जाना और ऐसे सवाल पूछना हमारी आदत में शुमार नहीं है। सचाई को जानने के मामले में हमारा मन बेहद आलसी है। इंद्रियों और मन के जरिए बाहर देखते रहने की हमारी पुरानी आदत है। ध्यान अंदर की ओर ले जाने का कोशिश करेंगे तो शुरू में मन इससे भागेगा, बगावत करेगा। लेकिन जुटे रहने पर कामयाबी जरूर मिलती है।



खुद की पहचान कराने वाले इस ध्यान को करने का सही तरीका क्या है?


आत्मज्ञान बेहद आसान है। मैं आत्मा हूं — इसे झटपट महसूस किया जा सकता है। यह एक साधारण, पर असल में गहन प्रक्रिया है जिसके जरिए आप उस चेतना को पहचानना शुरू कर दोगे, जो आप हो। हर इंसान 'मैं' या 'मैं हूं' के एहसास में जीता है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि दुनिया में सभी इसी तरीके से खुद को पहचानते हैं। यह बिना सिखाया हुआ तरीका है जिसमें हम खुद-ब-खुद जानते हैं कि हम हैं। लेकिन यह एहसास सच्चे अर्थों में कोई विचार नहीं है। यह अपने होने की एक अवस्था है। अब अभ्यास के दौरान अपने इस होने को किसी विचार या भाव के साथ घालमेल न होने दें। कुछ करने की जरूरत नहीं। बस अपने होने को महसूस करना है। मन में कुछ भी उमड़े, उसे पकड़ना नहीं। उसमें उलझना नहीं। एक के बाद एक विचार आएंगे और खुद में उलझने को न्योता देंगे। फंसना नहीं है। तटस्थ बने रहना है। अब खालीपन का एहसास होगा, हल्कापन लगेगा। शांति और आनंद आने लगेगा। इसी अवस्था में बने रहें। मन इस अवस्था को कोई नाम देने की कोशिश करेगा, लेकिन इस झांसे में नहीं आना है। यही वह स्थिति है जब आप देह-मन की अवस्था से परे जाकर अपने होने में स्थित होते हो। यह आत्मज्ञान की दिशा में अहम कदम है। इस तरह का अभ्यास आप अगर रोज कुछ मिनट करोगे तो आप शांति, प्रेम और आनंद से भरने लगोगे। मोक्ष की ओर आपकी यात्रा शुरू हो जाएगी।


सेक्स पर सही नजरिया क्या होना चाहिए? मॉडर्न एक्सपर्ट कहते हैं कि सेक्स पर परहेज से दिमागी विकृतियां पैदा होती हैं जबकि भारतीय परंपरा में कहा गया है कि आत्म साक्षात्कार के लिए ब्रह्मचर्य का पालन अनिवार्य है।

ब्रह्मचर्य को बस शरीर से जोड़ कर देखना गलत है। इसका ताल्लुक विचारों की पवित्रता से है। लोगों में धारणा है कि ईश्वर में अपनी आस्था साबित करने के लिए उन्हें अपनी मूल प्रवृत्ति के खिलाफ जाना होगा। यह सच नहीं है। मूल प्रवृत्तियों को दबाने की जरूरत नहीं। यह तन-मन, दोनों के लिए हानिकारक है। दरअसल जोर इस बात पर दिया गया है कि आप इन प्रवृत्तियों के गुलाम न बनें। यह आपके अख्तियार में रहें। सचाई तो यह है कि जब हम किसी चीज को दबाने की कोशिश करते हैं तो वह उलटे हम पर हावी हो जाती है। सही तरीका यह है कि आप सेक्स की ऊर्जा से खुद को अलग कर लें। इस समझ के साथ कि हम आत्मा हैं जिसके भीतर तरह-तरह की संवेदनाएं, विचार और भावनाएं उमड़ती रहती हैं। ये स्थायी नहीं हैं। ये आती-जाती रहती हैं। हमें इनमें उलझना नहीं है। जब हम इस समझ के साथ वासना को देखते हैं तो बड़ी जल्दी उसकी जकड़न से छुटकारा मिल जाता है।

आतंकवाद की समस्या का क्या हल है?

दुनिया भर में फैली इस समस्या का कोई फौरी हल नहीं है। समस्या की जड़ क्या है? यह कि मैं शरीर हूं। यही सोच तमाम संघर्षों को जन्म देती है। खुद को शरीर मानने से इसकी शुरुआत होती है और फिर कंडिशनिंग के दूसरे रूप भी आ खड़े होते हैं। खुद की पहचान को शरीर से जोड़ना और खुद को करनेवाला मानना - ये दो शुरुआती वायरस हैं जो बाद में महामारी की वजह बनते हैं। अहम यानी अपनी असल पहचान को न जानना दुनिया में तमाम तकलीफों की बड़ी वजह है। यही पहला और असली आतंकवादी है।


राम का अनुकरण करें या कृष्ण का? 'रामायण' में राम लगभग हमेशा नैतिक काम करते हैं जबकि 'महाभारत' में निर्णायक मौकों पर कृष्ण ने अनैतिक तरीकों और झूठ का भी सहारा लिया?

हम अपनी सीमित समझ के आधार पर फैसला सुना देते हैं। स्थितियां सीधे-सीधे नैतिक या अनैतिक नहीं होतीं। मैं आपको एक कहानी सुनाता हूं। —

एक आदमी सत्संग जाता था। उसे सत्संग जाना पसंद था लेकिन अपनी जिंदगी में बेहद बिजी था। एक दिन वह गुरुजी के पास गया। बोला: 'गुरुजी, आप जो कहते हो, मैं समझने की कोशिश तो करता हूं, पर समझ नहीं पाता। बड़ा बिजी रहता हूं। ढेर सारे कामों में फंसा रहता हूं। लंबी-चौड़ी साधना करने का वक्त मेरे पास नहीं है। क्या आप मुझे आसान तरीके से आत्मज्ञान नहीं दे सकते?' गुरुजी बोले: 'यहां आओ, मैं तुम्हारा हाथ देखता हूं।' गुरुजी ने उसका हाथ देखा और कहने लगे: 'हरे राम!' उसने कहा: 'गुरुजी, कुछ गड़बड़ है?' गुरुजी बोले: 'काश तुम्हारा हाथ पहले देखा होता। तुम्हारे हाथ की लकीरें बता रही हैं कि तुम्हारे पास जिंदा रहने के लिए सिर्फ एक हफ्ता बचा है।' यह सुनकर वह आदमी बुरी तरह टूट जाता है। हताश-निराश होकर घर पहुंचता है। उसकी पत्नी कहती है: 'आओ, खाना खाओ।' वह कहता है: 'कैसा खाना? मेरा कुछ खाने-वाने का मन नहीं। जिंदा रहने के लिए मेरे पास सिर्फ 7 दिन बचे हैं। मेहरबानी करके खाने के बारे में मुझसे मत कहो और मुझे अकेला छोड़ दो।' वह अपने कमरे में जाता है और कमरा अंदर से बंद कर लेता है। हर दिन उसके परिवार के लोग कुछ लेकर आते हैं लेकिन वह हर चीज को मना कर देता है। उसके बच्चे किसी संगीत कार्यक्रम में जा रहे होते हैं। कहते हैं: 'पापा, आप भी क्यों नहीं हमारे साथ चलते?' वह कहता है: 'मुझे माफ करो, मैं नहीं आ सकता। मेरे पास बस 5 दिन बचे हैं।' इस दौरान वह लगातार सोचता रहता है - 'मैं असल में हूं कौन? अभी तो मैं पूरी तरह से जिंदा हूं। फिर वह क्या है जो मर जाएगा? मरने का मतलब क्या होता है?' वह लगातार इसी पर विचार करता रहा। तब सिर्फ 1 दिन रह गया जिंदा रहने का। वह अपने कमरे में था। उसकी पत्नी दरवाजा खटखटाती है। कहती है: 'ऑफिस में आज तमाम डायरेक्टरों की मीटिंग है। आपको वहां होना चाहिए। आपकी लाखों-करोड़ों की पूजी का फैसला होना है।' वह कहता है: 'कोई बात नहीं। मुझे कहीं नहीं जाना। एक दिन बाद मेरे लिए सब स्वाहा हो जाना है। अब तुम्हीं इस सबका ध्यान रखो। अब यह सब तुम्हारा है।' वह अपना ध्यान जारी रखता है। आखिरी दिन भी आ जाता है। गुरुजी उसके घर आते हैं। उसकी पत्नी से पूछते हैं: 'वह कैसा है?' पत्नी बताती है: 'बुरी हालत है। वह 7 दिन से कमरे से बाहर नहीं आए।' गुरुजी उसके कमरे का दरवाजा खटखटाते हैं। वह दरवाजा खोलता है और बाहर आता है। उसके चेहरे पर नया तेज होता है। वह मुस्कुरा के कहता है: 'गुरुजी, आपने झूठ बोला ना। मैं जान गया हूं कि आपने मेरे साथ क्या चमत्कार किया है। आपने मुझे जिंदगी की दलदल से बाहर निकालने के लिए झूठ बोला। आप देख रहे थे कि मैं अपनी जिंदगी, अपना वक्त बेकार की चीजों में जाया कर रहा था। आप जहां कहते थे, वहां फोकस नहीं कर पा रहा था। इसीलिए आपने मुझे बताया कि तुम्हारे पास सिर्फ 7 दिन बचे हैं। आपकी एक इस बात ने चमत्कार कर दिया और मैंने फौरन दुनियावी चीजों में अपना वक्त बर्बाद करना बंद कर दिया। मैंने अपना ध्यान सिर्फ इस पर केंद्रित किया कि वह क्या है जो मरने जा रहा है। मैंने पाया है कि मरता कुछ और है, मैं नहीं।' 

अब इस कहानी में आप कहेंगे कि गुरुजी ने झूठ बोला लेकिन यह अच्छा मकसद के लिए था। कभी-कभार झूठ बोलना समाज के हित के लिए जरूरी हो जाता है। 'महाभारत' में कृष्ण जो कुछ कर रहे थे, वह अपने निजी फायदे के लिए नहीं था। वह समाज की भलाई के लिए था।



क्या नियमित रूप से सत्संग में भाग लेना जरूरी है?

मेरे ख्याल से जितना ज्यादा आप सत्संगों में भाग लेंगे, उतना ही ज्यादा अच्छा है।


आत्मज्ञान का क्या एक ही रास्ता है या कई हैं?

कई रास्ते हैं। सवाल यह है कि आपके पास वक्त कितना है। मैं कौन हूं - इस तरह के सवाल खुद से पूछना आत्मज्ञान का शायद सबसे सीधा रास्ता है।


क्या इंसान का नैतिक होना ही काफी नहीं?

नहीं, आपको नैतिकता के परे जाना होगा, इंसान की बुनियादी फितरत को पहचानना होगा और अपनी असल पहचान से वाकिफ होना होगा। अगर आप महज अच्छे इंसान हैं तो बहुत मुमकिन है कि आप इस दुनिया में दुखी रहें। लेकिन जब आदमी आत्मज्ञानी हो जाता है तो उसकी वाइब्रेशंस बदल जाती है, वह दुखों से परे हो जाता है। लोग उससे मिलते हैं तो वे उसकी एनर्जी को महसूस करते हैं। आत्मज्ञानी की संगत में बुरे लोग भी अच्छा बर्ताव करने लगते हैं।


अध्यात्म में क्या योग मददगार है?

इन दिनों योग का शारीरिक पक्ष ही चलन में है। यूरोप और अमेरिका में भी शरीर की लचक पर ही फोकस है। वे लोग योग का मतलब योगासन और योगा मैट से लेते हैं जबकि योग अपने आप में संपूर्ण पैकेज है। यह तन, मन और आत्मा - सभी के लिए कारगर है। इसमें इस शरीर पर ही नहीं, अज्ञान की स्थिति से मुक्त होने पर भी जोर दिया गया है। ऐसे योग को आपके देश में ज्ञान योग कहते हैं यानी आत्मज्ञान जिसके बारे में ज्यादातर पश्चिमी लोग नहीं जानते। ज्ञान योग योग का सर्वोच्च प्रकार है।


क्या कुंडलिनी जागरण वाकई मुमकिन है?

यह योग का ही एक हिस्सा है, पर मुझे इसके बारे में ज्यादा जानकारी नहीं।


योग सिखाने के लिए, आत्मज्ञान का जानकारी देने के लिए पैसा लेना क्या उचित है?

मेरा मानना है कि पैसा लेने में कोई बुराई नहीं। ठीकठाक बंदोबस्त करने के लिए पैसे की ज़रूरत रहती है। हम सत्संग के लिए कोई पैसा नहीं लेते। सत्संग दुनिया भर में फ्री में प्रसारित होता है। इन सब चीजों में खर्च होता है। जब भारी तादाद में लोग जमा हों, तो सरकार चाहती है कि लोग सुरक्षित रहें, वहां पानी-टॉयलेट आदि का इंतजाम हो। अगर आप दान कर सकते हैं, तो अच्छा है। अगर न कर पाए तो भी कोई बात नहीं।

आजकल आध्यात्मिक गुरु आलीशान आश्रमों में रहने लगे हैं?

स्पेन में हमारे आश्रम की इमारत बेहद सादी है, जंगल में बनी है। मैं खुद एक कुटिया में रहता हूं।




(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
००००००००००००००००


यदि आप शब्दांकन की आर्थिक मदद करना चाहते हैं तो क्लिक कीजिये
loading...
Share on Google +
    Facebook Commment
    Blogger Comment

0 comments :

Post a Comment

osr5366