शुक्रवार, मई 19, 2017

चतुर्भुज स्थान की सबसे सुंदर और महंगी बाई आई है


चतुर्भुज स्थान की सबसे सुंदर और महंगी बाई आई है

शहर छूटा, लेकिन वो गलियां नहीं!

— गीताश्री

आखिर बाईजी का नाच शुरु हुआ। घर की औरतों को ऐसा नाच देखने की मनाही तो होती है, लेकिन  घर की औरतें छुप-छुप कर  देख ही लेती हैं। उस रात भी यही हुआ।


वेश्याओं को समाज यानी हम किस दृष्टि से देखते हैं यह हमारी गालियों से उजागर होता है। 'रंडी' कहकर हम किसी भी स्त्री की इज्जत पर सीधा हमला बोलते हैं। ऐसे समाज में एक स्त्री का वेश्याओं के प्रति सहानुभूति रखना, उनकी समस्याओं को कागजी तौर पर नहीं बल्कि ज़हनी तौर पर समझना और उसे समाज तक पहुंचाना― वेश्याओं की जिंदगी का वह पहलू दिखाना जो मानवीय है। मुझे नहीं लगता हिंदी में पत्रकार गीताश्री के अलावा कोई और हिंदुस्तानी पत्रकार साहित्यकार ऐसा होगा, जिसने वेश्याओं के जीवन पर इतना गहन, ज़मीनी, मानवीय काम किया है। 'औरत की बोली' 2011 में प्रकाशित हुई थी और सबको पढ़नी चाहिए ताकि उनके द्वारा किया गया यह काम सारथ हो सके। उन्होंने बचपन की यादों से जुड़े चतुर्भुज स्थान से लेकर देश विदेश के तमाम रेड लाइट एरियों में जा जाकर ,जो हिम्मत भरा काम किया है― वह ऐतिहासिक है।

राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त पुस्तक 'औरत की बोली' की प्रस्तुत भूमिका ऐसे ब्योरों को चिन्हित करती है, जो
इस विषय पर आगे काम करना चाहने वाले
छात्रों, शोधार्थियों, लेखकों व पत्रकारों को मार्गदर्शन दे सकते हैं।
― भरत तिवारी

भूमिका: औरत की बोली


घर से ज्यादा बाहर शोर था—"चतुर्भुज स्थान की सबसे सुंदर और महंगी बाई आई है।" बारात के साथ में आई थी बाई, लेकिन बाई को लेकर लोगों में जो उत्सुकता थी, वो बारात आने के उत्साह से कहीं ज्यादा थी। जिधर देखो एक ही चर्चा-"बाबा की पोती की शादी में चतुर्भुज स्थान की सबसे सुंदर और महंगी बाई आई है। रात को मजमा लगेगा।" एक किस्म के गर्व से घर के बड़े-बूढ़ों का सीना चौड़ा हो गया था। लड़के वालों ने महंगी बाई लाकर खानदान की इज्जत जो रख ली थी। बारात का स्वागत जोर-शोर से हुआ और उससे भी ज्यादा फिक्र रात के मजमे को लेकर लोगों में थी। देर रात महफिल जमी। महफिल यानी बड़ा सा शामियाना, लेकिन चारों तरफ से ढंका हुआ। बरात और शरात पक्ष के लोग बैठे। एक तरफ से लोगों की आवाजाही और उस आवाजाही में अवांछित तत्वों को तलाशती बूढ़ों की आंखें, क्योंकि क्या पता इधर महफिल रंग लाए और उधर कोई बवाल शुरु कर दे। आखिर बाईजी का नाच शुरु हुआ।

हम क्यों नहीं देख सकते ये नाच। तभी पता चला कि चतुर्भुज स्थान की सबसे सुंदर और उस मंहगी बाई  का नाम है रानी बाई।

घर की औरतों को ऐसा नाच देखने की मनाही तो होती है, लेकिन  घर की औरतें छुप-छुप कर  देख ही लेती हैं। उस रात भी यही हुआ। नाच शुरु हुआ। उसके पहले साजिंदो ने माहौल संगीतमय कर दिया था। संगीत के प्रति मेरी दीवानगी बार-बार शामियाने में मुझे खींच रही थी। मगर अंदर जाने की किसी को इजाजत नहीं थी। मैं आस-पास मंडरा रही थी कि किसी तरह एक बार उन्हें करीब से देख सकूं। मेरे लिए वे कलाकार थीं, नाचने और गाना गाने वाली। उधर मंडप पर दीदी की शादी के रस्म पूरे हो रहे थे और इधर शामियाने के अंदर की दुनिया को करीब से देखने का मोह मुझे छोड़ नहीं रही थी। मैंने घर के तमाम बच्चों को साथ लेकर, पीछे से शामियाने की सीवन उघेड़ कर आंख भर जगह बनाई और सब दिखने लगा। वो बेहद सुंदर थी। गोरी चिट्टी, सजी धजी, हीरोइन जैसी, लहंगे चोली में।  बारी-बारी से सब देखते। मुझे गुस्सा आ रहा था कि हमें क्यों नहीं बैठने दे रहे। हम क्यों नहीं देख सकते ये नाच। तभी पता चला कि चतुर्भुज स्थान की सबसे सुंदर और उस मंहगी बाई  का नाम है रानी बाई।

दुनिया की नजर में वे चाहे जो हों, बुरी, अछूत, गंदी, लेकिन मेरी नजर में वे दैहिक श्रमिक हैं। उनके सामने दुनिया ने जब कोई रास्ता नहीं छोड़ा और सड़क या कोठे पर ला खड़ा किया तो वे क्या करती। 'ईजी मनी' कमाने की राह पर चलने वाली लड़कियां इनमें शामिल नहीं है। वो अलग मामला है। मेरी सहानुभूति उनसे है जो किसी मजबूरी में, अपनी मर्जी के खिलाफ इस धंधे में उतर गई हैं या उतार दी गई हैं।


खैर...रानी बाई ने नाचना गाना शुरु किया..."चाल में ठुमका, कान में झुमका...कमर पे चोटी लटके...हो गया दिल का पुरजा पुरजा"। लगे पचासो झटके। शामियाने में जोर से सिसकारियां गूंजी। कोने से कोई उठा गाता हुआ...वो तेरा रंग है नशीला...अंग अंग है नशीला...पैसे फेंके जाने लगे, बलैया ली जाने लगीं। रानी बाई के साथ और भी लड़कियां थीं, वो भी ठुमक रही थीं, फिर देखा, रानी बाई किसी रसूखदार से दिखने वाले बंदे के पास गईं और अपने घूंघट से दोनों का चेहरा ढंक लिया। जब लौटी तो पैसो की बरसात होने लगी। शामियाने में हर कोई पैसे लुटा रहा था। साजिंदे और सहयोगी लड़कियां पैसे चुने और ठुमके लगाएं। विचित्र सा था सब कुछ। जीवन में पहली बार ये सब देख रही थे। गाना, बजाना, नाच और वो बाई! वो जितनी अच्छी लग रही थी, उतना ही बुरा लग रहा था शामियाने में जमघट लगाए बैठे लोगों का व्यवहार।

चुपके-चुपके हम लोग देख रहे थे वो सब। हमारे लिए वो सब बेहद नया था, लेकिन बड़ों की नजर में यही गुनाह था। कोई देखता तो हमारी पिटाई तय थी। मेरे साथ इस 'चोरी' में शामिल चचेरी बहनों ने कई बार कहा भी कि चल अब चलते हैं...और वो चली भी गईं। मैं अकेली नाच में डूबी सोचती रही कि अंदर लड़कियां नाच रही हैं तो हमें देखने से क्यों मना कर रहे हैं। तभी मुझे तलाशती हुई चाची आई। एक थप्पड़ जमाया और घसीटती हुई ले चलीं। वह बड़बड़ा रही थीं..."अगर चाचा ने देख लिया तो मार डालेंगे। चल अंदर शादी हो रही है, वहां बैठ...।" उस महाआंनद से वंचित होने से चिढ़ी हुई मैंने पूछ ही लिया..."क्यों, लड़कियां ही तो नाच रही हैं, मैं क्यों नहीं देख सकती?" " वे लड़कियां नहीं, रंडी हैं,रंडी...समझी। रंडी का नाच हमारे यहां औरतें नहीं देखती। ये पुरुषों की महफिल है, जहां इनका नाच होता है। देखा है किसी और को, है कोई औरत वहां...सारे मरद हैं—"चाची उत्तेजना से हांफ रही थी। मेरे दिल का पुरजा पुरजा हो गया था। मैं मंडप के पास बैठी सोचती रही। फिर अपने हमउम्र चचेरे भाई से जानकारी बटोरी तो पता चला वे मुजफ्फरपुर से आई हैं, जहां एक पूरा मोहल्ला उन्हीं का है। इनके कोठे होते हैं, वे शादियों में नाचती गाती है, यही उनका धंधा है...आदि आदि...।

ब मैं कालेज में पढ़ने मुजफ्फरपुर आ चुकी थी। रानी बाई की सूरत मेरी आंखों में अब तक नाच रही थी। वैसे ही...कौंधती रही थी तबसे। मैं भुला नहीं सकी थी। कैसे भूलती...कई बार अकेले में उसकी तरह नाचने का प्रयास किया था। भईया की डांट सुनी थी कि ये किसी नचनियां का घर नहीं है...। बहकी हुई लड़की का दरजा कई बार मिल चुका था। हमारे समाज में तब कई लड़कियां अपने घरों की कैदी थीं। मैं भी थी। कालेज ने थोड़ी सी आजादी दी। जिसका फायदा उठाना तो लाजिमी होता है हर लड़की के लिए। शहर की सबसे पहली गली जो मैंने पहले रिक्शे से नापी, बाद कई बार पैदल...वो थी, रानीबाई का मोहल्ला! मुजफ्फरपुर चतुर्भुज स्थान!


शहर में घर होते हुए भी होस्टल में रहने के कारण शहर को ज्य़ादा जानने का मौका नहीं मिल पा रहा था। मेरा मन एक ही गली की तलाश में था। मैं डे-स्कॉलर लड़कियों से उस गली के बारे में पूछती और अचंभे से भर जाती। मेरे लिए उस वक्त सर्वाधिक उत्सुकता का केंद्र वह गली थी। एक बार गुजरना था। मेरा बस चलता तो अंदर तक जाकर देखना चाहती थी। कम से कम शाम के वक्त रौनक गली की बहारें,जो उस वक्त की फिल्मों में यदा कदा दिख जाती थी। मन में विद्रोह भी होता था कि भले घर की लड़की होना, क्या इतना बड़ा गुनाह होता है कि आप उस गली का नाम भी बड़ों के सामने ना लें। जाने की बात सोचना तो दूर...।

खैर...कुलबुलाते कसमसाते दिन कटते रहे, और चाहत रंग लाई। पता चला कि उस गली के आखिरी छोर पर महाकवि जानकीवल्लभ शास्त्री का घर है। जहां हर साल निराला जयंती बड़ी धूम-धाम से मनाई जाती है। बस फिर क्या था? हम भी हो लिए। इस विकट योजना में कितने दोस्तों ने साथ दिया ये बताने का वक्त नहीं। मगर मैं उस शाम उधर से गुजरी और वहीं ठिठक गई। दोनों तरफ घने मकान। बाहर चबूतरे पर बैठी कई अटपटी सी दिखने वाली लड़कियां। हंसी, ठिठोली करती हुई। किसी घर से तबले की थाप, कहीं से घुंघरू की छनक। किसी एक घर में बारात के स्वागत सी तैयारी दिखी। पता चला कि आज किसी की 'नथ उतराई' समारोह है। भव्य भोज भी होगा! किसी ने दबी जुबान में समझाया था—" कोई कम उम्र लड़की होगी, जिसका सौदा किया होगा शहर के किसी रईस ने और खूब दौलत लुटाएगा इसके बदले।" एक लड़की का कुंवारापन खरीदने का जश्न। पता चला कि इस गली में अक्सर होता है ऐसा जश्न। फिर वह लड़की धंधे में बाकायदा उतर जाती है। किसी के घर की शोभा नहीं बनती। सुना ये भी कि यहां लड़कियां चुरा कर भी लाई जाती हैं या इन्हीं तवायफों की नाजायज संतानें होती हैं। इनके घर में लड़की पैदा हो तो खुशियां मनाई जाती हैं।

मेरा शास्त्री जी के यहां अक्सर आना जाना होने लगा और रास्ता वहीं था। शहर के सारे कवि-कथाकार उनके घर जाने के लिए उधर से ही गुजरते थे। चुपके-चुपके कोठों की तरफ देखते हुए। सिर्फ एक को छोड़ कर। शहर के एक बड़े कवि की प्रेमिका वहां वास करती थीं। वे रोज शाम रिक्शे पर बैठकर उसके पास जाते थे। सुना ये भी था कि कवि के प्रेम में उस तवायफ ने नाच गाना बंद कर दिया था और उनकी रखैल हो गई थी। इतने किस्से थे शहर में उस गली के कि मेरी उत्सुकता कभी खत्म नहीं हुई। मगर मैंने कवि का पीछा जरूर किया और उसकी प्रेमिका का घर देख आई। मैं कभी हिम्मत नहीं जुटा पाई अंदर जाने की। अब लगता है चली जाती तो क्या होता? शायद कुछ नहीं। फिल्में देख कर ऐसे नाचने-गाने वाली औरतों की जो उनकी छवि बना रखी थी, वो टूट जाती। शायद तभी नरक को करीब से देख लिया होता।

तब हमारे शहर की तवायफें बेहद मशहूर थी। कुछ ने तो फिल्मों में भी काम किया था। उनकी सुंदरता और कीमतों की चर्चा खूब सुनाई देती थी। खासकर शादियों के दौरान, बड़े लोग ही महंगी बाईजी बुला सकते थे। उस जमाने में होड़ थी महंगी बाईजी बुलाने की। नाच देखने के लिए मार होती थी। जिनके दरवाजे पर सबसे महंगी बाईजी का नाच होता था उनकी समाज में बड़ी प्रतिष्ठा मानी जाती थी। बाबूसाहेब शहर या गांव में कई दिनों तक साफ सफ्फाक धोती पहने मूँछों पर ताव देते चौक चौराहों पर टहलते दिख जाते थे। नाच से कई दिन पहले से गांव-कस्बो  की हवा में सनसनी होती थी...कि फलां बाईजी आ रही है...। लेकिन हमें क्या...लड़कों, मर्दों की चांदी होती थी...मुझे एक दृश्य आज भी याद है । चचेरे भाई की शादी तय हुई तो लड़की वालों ने नाच की मांग की। घर में कानाफुसी शुरु कि शहर कौन जाएगा और बाई कौन ठीक करेगा। घर में मार-काट मच गई।  सारे भाई-बंधु तैयार थे और जाना एक-दो को ही था। ज्यादा ध्यान नहीं कि किसका नंबर आया, मगर जो भी गया होगा, उससे जले-भुने, वंचित लोग खासे खफा हुए होंगे।


कई स्मृतियां हैं बचपन की। गांव के एक सज्जन ज्यादातर नाच के लिए बाईजी ठीक (विशेषज्ञता) करने में माहिर माने जाते थे। उनकी वहां चलती थी। सुना था। उनका एक 15 साल का बेटा था। एक बार नाच देखकर वो एक बाईजी के पीछे पागल हो गया। बाईजी शहर लौटी तो वो पीछा करते करते कोठे पर जा धमका। बताते हैं, कि बाईजी ने उसे समझाया कि यहां बच्चे नहीं आते, लौट जाओ। यहां बहुत पैसे खर्च होते हैं, तुम नहीं कर पाओगे। जाओ, पहले जवान हो, कमाओ फिर आना...। बच्चे ने अपनी जेब से घर से चुराई हुई नोटों की एक गड्डी निकाली और बाईजी की तरफ उछाल दी। बोला, "हम बच्चे नहीं हैं...और ये लो पैसा।" बाईजी ने दो मुस्टंडो को बुलाया और पैसे और बच्चा उनके हवाले करते हुए कहां कि ले जाओ और फलाना बाबू के घर पहुंचा आओ। दुबारा ये दिखाई ना दे। बाद में उसकी क्या गति हुई नहीं पता, मगर फलाना बाबू ने शादी-व्याह के मौके पर बाईजी ठीक करने का काम हमेशा के लिए छोड़ दिया।

बाद के दिनों में वो शहर छूटा वो गली छूटी, लेकिन बचपन में महफिल से वंचित होने के बाद एक तस्वीर जैसे दिमाग में फ्रिज हो गई—"दाहिने हाथ में बेला के सफेद फूलो की माला लपेट कर सूंघते लोग" आज भी वो अंदाज मुझे मजेदार लगता है। आज भी दिल्ली की रेडलाइट पर बेला का गजरा मिल जाए तो हाथ अपने आप उस अंदाज में उठ कर नाक तक चले जाते हैं। अलबेला था वो अंदाज, अब हास्यास्पद लगे शायद। ये सारे चित्र दिमाग में धंसते रहे...उनके प्रति मन में आकर्षण पनपता रहा। उनकी आजादी भी खासी लुभाती थी। वे सरेआम नाच गा सकती थीं, कुछ भी पहन सकती थीं...मर्दों की महफिल के लायक थीं...मगर हमारे समाज की औरतें...चौखट के अंदर...। दालान में तब आती थीं जब मर्द कहीं बाहर गए हो। लक्ष्मण रेखाओं के भीतर घुटती आत्माओं के साथ बड़े होने का अवसर हमें मिला है।


बाद में जब मैं दिल्ली आई, तो यहां भी एक गली-एक सड़क मिली, जिसे रेडलाइट एरिया मानते हैं, जीबी रोड। पत्रकार होने के नाते वहां जाने मिलने और समझने की हिम्मत आ गई थी। नैतिकता को रोड़ा खत्म हो चुका था। मेरे भीतर जो दकियानूसी का शहर था, वो उजड़ चुका था।  आफिस में जीबी रोड की जो भी खबरें आती तो मैं ही देखती थी। तब से आज तक उन्हें जानने की उत्सुकता खत्म नहीं हुई। जहां जहां गई, जिस शहर में, जिस देश में, वहां के रेडलाइट एरिया के बारे में पता करना शुरु किया। वहां वक्त बिताया, बिना किसी डर या संकोच के। अब मैं मध्यवर्गीय छाया से बाहर थी और खुदमुख्तार थी। और सबसे बड़ी बात कि ये मेरे काम का हिस्सा था, सो संकोच नहीं रहा। सोनागाछी की सेक्सवर्करो ने जब आंदोलन छेड़ा तब कोलकाता जाकर उनके बारे में लंबी स्टोरी लिखी। कुछ देशों के रेडलाइट एरिया के नजारों पर भी लिखा। उनकी समाजशास्त्रीय ढंग से व्याख्या भी की। उनके दुख दर्द को करीब से समझने जानने का खूब मौका मिला। केरल की मशहूर सेक्सवर्कर नलिनी जमाली की आत्मकथा पढ़ने के बाद कोट्टायम गई और वहां की सेक्सवर्कर के साथ लंबी बातचीत की, उनके अनुभव सुने। जो इस किताब में शामिल है।

दुनिया की नजर में वे चाहे जो हों, बुरी, अछूत, गंदी, लेकिन मेरी नजर में वे दैहिक श्रमिक हैं। उनके सामने दुनिया ने जब कोई रास्ता नहीं छोड़ा और सड़क या कोठे पर ला खड़ा किया तो वे क्या करती। 'ईजी मनी' कमाने की राह पर चलने वाली लड़कियां इनमें शामिल नहीं है। वो अलग मामला है। मेरी सहानुभूति उनसे है जो किसी मजबूरी में, अपनी मर्जी के खिलाफ इस धंधे में उतर गई हैं या उतार दी गई हैं।

अपने बचपन में जगी उत्सुकता धीरे धीरे उनके प्रति सद्भाव में बदलती चली गई। फिर दुनिया देखने का मौका मिला। देश के कुछ चुनिंदा ठिकाने देखने के बाद दुनिया की खिड़की से झांकने का मन था। पिछले पांच सालों में ये मौका खूब मिला। कई विकसित और विकासशील देशों की ऐसी लड़कियों की दुनिया को करीब से महसूस करने का मौका मिला। वहां कई कई दिन प्रवास करने का मौका मिला। कई रातें गुजारी उन गलियों की तलाश में, अपने लोकल गाइड और दोस्तों की सहायता भी ली। न्यूजर्सी में रह रहे मेरे मित्र सुब्रत शॉ ने अपने शर्मीलेपन के बावजूद मेरे इस काम में भरपूर मदद की, वहां -वहां ले गए, साथ रहे जहां जाना जरूरी था। चीन में हमने खुद 'पराक्रम' किया और भीतर तक घुस कर नजारा देख आए। वहां अजनबीपन नहीं था। हिंदी गानों के इतने रसिया थे उस गली में कि हमें अखरा ही नहीं।  इनके बारे में पढा भी बहुत। जहां जो भी छपता उसे पढ डालती। समाज जितना इनका नाम लेकर गाली देता या इनसे दूरी बनाता, मैं अपने भीतर कभी इनके प्रति नफरत नहीं पाती, उल्टा आकर्षण और बढ जाता। इनके रहने की जितनी प्रमुख जगहें थीं, वो मैंने छान डाली। काफी वक्त भी वहां बिताए, घंटो उनसे सवाल किए, जवाब पाए। उनकी आत्मा का चित्कार भी सुना और ठसकवालियां भी देखीं। सोनागाछी की सपना गाएन ठसकवाली ही है, जो रोज शाम को एक 'क्लाएंट' निपटाती हैं, जिन्हें वे बाबू कहती हैं। बाबू के प्रति वे समर्पित हैं। उनका खरचा बाबू ही चलाते हैं। इसीलिए वे और ग्राहक नहीं तलाशती। शाम को डयूटी पर जाती है, और सुबह अपने ठिकाने वापस। बड़े शान से ये सब बताती भी हैं। वैसे भी देह की दुनिया में सोनागाछी का तेवर सबसे अलग है।

दरअसल, पहले मुझे लगता था कि दैहिक श्रम सिर्फ विकासशील, गरीब देशों की त्रासदी होती है। विकसित देशों में शौकिया कोई करे तो करे, ये पेशा मजबूरी नहीं होगी। समाजों का फर्क तो होना चाहिए था।  बंद और कुंठित समाज की मान्यताएं और विवशताएं यहां तक कि जरूरतें भी अलग किस्म की होती हैं। मगर मेरा भ्रम टूट गया। औरतों और सेक्स के मामले में सोच एक बिंदु पर मिली दिखाई दी। पेट की भूख और देह की भूख एक सी जलाती है। कोई फर्क नहीं। दलालों की वही मंडी वहां भी है। मारकाट वहां भी मची है। बोलियां वहां भी लगाई जा रही है। फर्क बस इतना कि जहां लाइसेंस मिला है वहां शोषण कम है। लड़कियां अपनी मर्जी से धंधे में आ रही हैं। बेरोजगार लड़कियों की फौज यहां आसान पैसा बनाने के चक्कर में इस अंधी गली में घुस आती हैं। बाहर जाने का रास्ता भी उनकी अपनी मर्जी से खुलता है। मगर बंद समाजों में ये आजादी कहां। जिस देश की सारी बौद्धिकता वजिर्निटी के इर्द गिर्द घूमती हो वहां धंधेवालियों का अपने परंपरागत पेशे से रिहाई एक सपना भर है। हो सकता है सुधीजनों को मुझसे असहमति हो, उनकी असहमति का स्वागत है, मगर मैं तवायफों को तब भी कलाकार मानती थी, जिन्होंने अपने कोठो पर नाच, गीत संगीत, शास्त्रीय संगीत को जिंदा रखा था। आज भी वहीं मानती हूं...और उनके धंधे को दैहिक श्रम का दर्जा देती हूं। जिसको जो मानना है माने। कोठो के इतिहास पर नजर डालें, कितने मशहूर नाम मिल जाएंगे जिनके दम पर शास्त्रीय गायन जिंदा हैं। अलग से नाम गिनाने की जरूरत नहीं शायद। इतिहास ने तो उनको इज्जत भी दी है। एक स्त्री होने के नाते एक सेक्सवर्कर के बारे में जानने की स्वाभाविक इच्छा जब मेरे प्रोफेशन का हिस्सा हो गई तो बचपन की उत्सुकता और दिलचस्पी को साथ लेकर मैं इस दुनिया को और भी करीब से जानने-और पहचानने लगी। मैं तो इनके जीवन पर गहरा शोध करना चाहती थी। ये किताब शोध तो नहीं मगर शोध जैसा ही कुछ है।

अब बात कुछ इस किताब के बारे में...कुछ विद्वान वेश्या शब्द को वैश्य शब्द के कारण ही उत्पन्न हुआ मानते हैं। देह का यह व्यवसाय जिसे हम वैश्यावृति कहते हैं, संभवतः व्यापारिक विकास से आया। ऐसा नहीं है कि यह पेशा सिर्फ व्यापार के कारण ही अस्तित्व में आया। हां, यह जरूर कहा जा सकता है कि इसके कारण यह फला फूला होगा।

यह बहुत साधारण सा तथ्य है कि सामान्यतः इस मनोरंजन के लिए सरप्लस मनी का ही उपयोग होता था। परंतु जब धीरे धीरे यह सामाजिक प्रथा के रुप में पहचान पाने लगी तब प्रतिष्ठा और प्रतिष्ठित होने का मापक भी बन गई। यह प्रथा दूसरे कुछ रुपों में धार्मिक प्रथा के रुप में भी परिवर्तित हो गईं। दक्षिण भारत की देवदासी प्रथा इसी तरह की दुखद कड़ी है। अक्षत कन्याओं का देवताओं के साथ विवाह का स्वांग और फिर वेश्यावृति।


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (21-05-2017) को
    "मुद्दा तीन तलाक का, बना नाक का बाल" (चर्चा अंक-2634)
    पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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