बुधवार, जून 07, 2017

हिंदी थ्रिलर — थीसिस — राजिन्दर अरोड़ा



लग रहा था कि कहानी लम्बी है लेकिन... सब लेखक राजिन्दर अरोड़ा जी की मेहनत है,जो सफल रही, एक उम्दा हिंदी थ्रिलर।   —  भरत तिवारी

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राजिन्दर अरोड़ा की कहानी 

थीसिस





गाड़ियों का एक ठहरा हुआ समंदर था, जिसमें कोई हलचल नहीं थी कोई लहर नहीं कोई चाल नहीं। दूर-दूर जहाँ तक नज़र जाती थी बस रंग और साइज़ ही बदलता था बाकी सब एक सा। बीच बीच में कहीं पीछे या आगे से किसी हॉर्न की आवाज़ आती थी या किसी गाड़ी का दरवाजा खुलने और बंद होने की या फिर पास की गाड़ी में खोंस कर जोर से थूकने की । जम्हाईयां लेते लेते राजीव थक कर सर स्टीयरिंग व्हील पे टिका देता है और बांहों का गोल सिरहाना बना कर आँखें बंद कर लेता है।

रात के 11 बजने को थे, आज कॉलेज में यूनिवर्सिटी टीचर्स यूनियन के एक मेंबर के साथ कॉलेज टीचर्स यूनियन वालों के मीटिंग थी — शाम को जल्दी में तय की गयी थी सो राजीव को भी रुकना पड़ा। उसने सोचा था की 8 या 9 बजे तक सब निबट जायेगा इस लिए घर भी खबर नहीं की। दस बजे सुनीता का पहला फ़ोन आया था। कहाँ हो ? दोस्त लोग साथ हैं क्या? बता तो दिया होता? एक के बाद एक सवाल ऐसे आये की जवाब देने के लिए मुँह भी नहीं खुल पाया।

अरे नहीं सुनीता — सीधा कालेज से आ रहा हूँ — तुम भी कमाल करती हो — अगर मुझे कहीं जाना होता तो तुम्हें बताता ना। यकीन मानो डेढ़ घंटे से सराय काले खान के पास ट्रैफिक में फंसा हूँ, ये कम्बख्त ट्रैफिक है कि हिल ही नहीं रहा — जहां था वही हूँ। भूख के मारे जान निकल रही है और तुम हो के ताने कस रही हो।

तभी पीछे से जोर से हॉर्न बजा और राजीव चौकन्ना हो कर उठ बैठा। शायद सपना देख रहा था और सपने में ही सुनीता से बातें भी कर रहा था। आगे वाली गाड़ी कुल 6 फीट भी आगे नहीं बढ़ी होगी और पीछे वालों ने कोहराम मचा दिया। गाड़ी स्टार्ट कर उसने बुदबुदाते हुए एक गन्दी गाली दी और गाड़ी आगे सरका दी। फिर इग्निशन बंद। रियर व्यू मिरर में देखते हुए उसने सर झटक दिया।

सिगरेट सुलगाते हुए उसने अपनी तरफ का शीशा थोडा नीचे किया। बाहर से तो जैसे धुएँ का सैलाब आ गया — सफ़ेद और काला — बेताल की तरह धुएँ ने गाड़ी में जगह बना ली। उसकी अपनी सिगरेट का धुआं तो दिखना भी बंद हो गया था। कुछ पलों के लिए उसने दरवाजा खोला और बाहर जा कर खड़ा हो गया। अपनी जगह से वो नॉएडा मोड़ वाला पुल देख सकता था। बार-बार बदलती ट्रैफिक लाइट के रंग के कोई मानी नहीं थे। कुछ हिल भी तो नहीं रहा था। फिर इस हरी बत्ती के होने का क्या फायदा?

तंग आ कर वो फिर गाड़ी मैं बैठ गया। पलट कर पिछली सीट पर पड़ी किताब उठा ली और फिर सोचा घर सुनीता को खबर तो कर दूँ , परेशान हो रही होगी, जाने क्या क्या सोच रही होगी। कमीज की पाकेट से फोन निकाल कर सुनीता को मिलाया, बहुत देर तक घंटी बजने के बाद जब सुनीता ने फोन उठाया तो यकायक ये ख्याल आया के वो भी तो थकी होगी, शायद आँख लग गयी होगी। सॉरी तुम सो रही होगी , मेरा मतलब आराम कर रही होगी, बहुत देर से ट्रैफिक में फंसा हूँ, जाने कब खुलेगा ?

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"नहीं, में तो बाहर गेट पर थी, सोचा इतनी देर हो गयी और तुम आते ही होगे, तुम्हें गेट खोलने के लिए उतरना होगा सो बाहर ही इंतज़ार कर रही थी। कहाँ हो? सराये काले खान पर? क्या?

हाँ यार करीब दो घंटे हो गए ये साला ट्रेड फेयर न हुआ हमारी तो कवायद हो गयी। कालेज में टीचर यूनियन की मीटिंग थी, सो देर हो गयी। नन्नू सो गया क्या? या पढ़ रहा है?

उसके तो मैंने 10 बजे ही सोने को कह दिया था। सुबह मैथ्स का इम्तेहान है उसका। सोचा जल्दी सो जायेगा तो सुबह उठ कर रिवाइज़ कर लेगा । हाँ ठीक किया, तुम भी खाना खा कर सो जाओ, चाबी लैटर बॉक्स में रख देना मैं निकाल लूँगा। अंदर जा कर आराम करो, सर्दी लग जाएगी । ठीक है, सुनीता ने कहा और फोन काट दिया।

ट्रैफिक अब कुछ हिलने लगा था, राजीव ने किताब सीट पर फेंकी और गाड़ी आगे सरका दी। बस आधे मिनट में सब कुछ फिर रुक गया। कुछ देर इंतज़ार करने के बाद राजीव ने किताब फिर से उठा ली। मुश्किल से आधा पन्ना भी न पढ़ा होगा की उसे झपकियाँ आने लगी। ये तो सही नहीं है, गाड़ी में नींद आना खतरनाक हो सकता है।

मन ही मन वो अपने आप को कोस रहा था — क्या जरुरत थी रावत के साथ इतनी जल्दी में बड़े-बड़े दो पेग लगाने की — वो कमबख़्त भी कहाँ सुनता है — मीटिंग ख़त्म होते ही अपनी गाड़ी में खींच कर ले गया और बहाना ये की जो किताब तुमने मांगी थी वो मिल गयी है। राजीव भी किताब के लालच में उसकी गाड़ी तक चला आया।

"अरे बाहर क्या खड़े हो" रावत बोला और झट से गाड़ी का दरवाज़ा खोल दिया। "इससे पहले के कोई देख ले चलो जल्दी से एक-एक पेग मार लेते हैं" राजीव के बहुत मना करने पर, देरी का बहाना लगाने पर भी रावत एक न माना। सीट के नीचे से बोतल निकाली और डेश बोर्ड से पेपर कप्स। अँधेरी पार्किंग में ये भी नहीं पता चला के डाली कीतनी। पानी के बोतल में शायाद एक गिलास भी नहीं बचा था — थोड़ा-थोड़ा मिलाया और पहला तो ऐसे गटक लिया मानो जन्मो का प्यासा हो। पहला अभी ख़त्म भी न हुआ था और उसने हाथ से गिलास छीन कर एक और भर दिया। इस बार तो पानी कम और दारु डबल थी।

क्या हुआ राजीव अरे खींचो इसे — तुम्हे भी देर हो रही है और मुझे भी — कल मिलते हैं — घर पंहुच कर एसऍमएस कर देना, ओके गुड नाईट कहते हुए रावत ने राजीव को गाड़ी से बाहर धकेल दिया। ये भी नहीं पूछा की कार लाये भी हो या नहीं।

गाड़ी की लाइट जला कर राजीव ने पिछली सीट को देखा — शायद पानी की बोतल पड़ी हो — पर नहीं — झुंझला कर जम्हाईआं लेता हुआ वो फिर से गाड़ी के बाहर आ कर खड़ा हो गया। उससे तीन-चार गाड़ियां पीछे एक ऑटो वाला पानी से कुल्ला कर रहा था। भागते हुए वंहा पहुँच कर उसने बड़े सलीके से कहा — अरे दोस्त — बहुत प्यास लगी है और मेरी गाड़ी में पानी नहीं है — थोडा सा पानी पी लूं तो बेचैनी ख़तम होगी। क्यूँ नहीं भाई साहेब पी लीजिये — मेरे पास एक और बोतल है। बिना सोचे समझे की पानी साफ़ है भी या पीने वाला भी है के नहीं उसने बोतल मुह से लगा ली — दो चार घूँट पिए और ओक भर कर दो बार आँखों में मारी। ऑटो वाले का शुक्रिया करता हुआ बिना चेहरा पोंछे वो आगे बढ़ गया।



दिन भर हुई बूँदा-बांदी से सड़क पर कीचड सा हो गया था। नवंबर के महीने में आधी रात होने को आई थी, जमुना के भी पास ही तो थे, सो हवा भी ठंडी लग रही थी। राजीव को लगा की अब तो नींद खुल जायेगी। सिगरेटे की डिब्बी में देखते हुए सोचने लगा, कुल तीन और बची हैं — जब तक घर पहुंचूंगा शायद दुकान भी बंद हो जाये — पर रहा नहीं गया — एक निकाल कर सुलगा ली।

सड़क के दूसरी तरफ का ट्रैफिक बिलकुल नॉर्मल सा चल रहा था। ऐसा लगता ही नहीं था की उधर से आने वल्ली गाड़ियों को किसी भी तरह की परेशानी हुयी हो — तो फिर ऐसा क्या है जिसने इस तरफ के ट्रैफिक को जाम कर रखा है — तभी सामने से कुछ ड्राईवर नुमा लोगो का झुण्ड आते हुए देख कर संजीव उनके तरफ बढ़ने लगा। उनसे बात कर के ये खुलासा हुआ की आई पी स्टेशन से पहले वाली रेल फाटक पर आने वाली ट्रैन ने एक ट्रक वाले को उड़ा दिया और ट्रैन फाटक के आधी आग और आधी पीछे खड़ी है। और दूसरी तरफ प्रगति मैदान के गेट नंबर १ पर आग लगी है तो उधर जाने वाला ट्रैफिक भी रोक दिया गया है। इस सब को अभी खुलने में करीब एक दो घंटा और लग सकता है।

इस चौड़ी सड़क के बीचो बीच लगे लोहे के जंगले ने स्कूटर और मोटर साइकील वालों को बुरी तरह बेतहाश किया हुआ था। अकसर दुपैयाह ड्राइवर कुछ तिगड़म लड़ा कर या एक दूसरे की मदद कर सड़क के दूसरी तरफ पार कर जाते हैं और रॉंग साइड पकड़ कर जल्दी से निकल लेते हैं पर इस जंगले ने आज उन्हें भी जकड रखा था।

राजीव को अब खीज आने लगी थी और इधर पेट में भी प्रेशर बढ़ रहा था। नवंबर की गुलाबी सर्दी, हलकी ठंडी हवा, दो पेग और उसके बाद पिए हुए पानी ने अपना कमाल दिखाना शुरू कर दिया था वैसे भी वो आखरी बार तीन घंटे पहले पेशाब को गया था और अब ज्यादा देर रोकने के स्थिति में भी नहीं था। उसे याद नहीं आ रहा था की कब आखरी बार उसने सड़क पे खड़े हो के मूता था। मन ही मन अपने आप को कोस रहा था और सड़क के उस पार लगे पेड़ों का मुआयना भी कर रहा था। एक बार अपनी पुरानी खटारा सी फ़िएट गाड़ी को ठीक से देखा, चाबी घुमा के ताला लगाया और धीरे धीरे गाड़ियों की क़तार के बीच से निकलता सड़क से फुटपाथ तक आ गया। वहाँ खड़ा हो कर उसने फिर एक बार चारो तरफ का जायज़ा लिया और फिर फुर्ती से पलट कर पोपलर के पेड़ों की तीन कतारों को पार करता 25-30 फुट सड़क से दूर आ गया। एक बार फिर पलट कर देखा के कोई देख तो नहीं रहा, फिर एक बड़े से जामुन के पेड़ के पीछे खड़े हो कर उसने अपने आप को हल्का कर लिया। जैसे हे वो पैंट की ज़िप बंद करने के लिया थोड़ा सा सामने झुका तो उसे ऐसे महसूस हुआ जैसे कोई सामने से निकला हो या फिर कोई जानवर सरक कर अँधेरे में पेड़ों के पीछे चला गया हो। यहाँ अंदर पेड़ों के झुरमुट में धुँए से दूर ठण्ड थोड़ी जायदा ही थी। थरथराता हुआ वो तेज कदमो से वापिस लौट पड़ा। एक दो बार पलट कर देखने की कोशिश की पर घबराहट के मारे किसी भी चीज़ पर ध्यान न दे पाया। ये डर भी क्या चीज़ है।

दिवाली के बाद आज दस दिन हो चले थे साफ़ गाढ़े नीले आसमान में चमकते तारों के झुण्ड जैसे जाम में फंसे लोगों पर हँस रहे थे पछिम की और कार्तिक का नया चाँद ऐसे लग रहा था जैसे किसी ने रोटी से एक बड़ा कौर तोड़ लिया हो। बिना किसी स्वेटर या जैकेट के उसे बार-बार सिरहन हो रही थी। बहुत से ड्राइवर या उनके साथ बैठे हुए लोग गाड़ियों में ऊंघ रहे थे , बेफिक्र। सब शांत था, अब कोई हॉर्न नहीं बज रहा था न ही कंही से गुस्साई आवाज़ें आ रही थी। गाड़ी का दरवाज़ा खोल राजीव धीरे से सीट पर सरक सा गया और हाथ बढ़ा कर किताब को अपनी तरफ खींच लिया। गाड़ी से बाहर दस कदम पर पीले रंग की तेज रौशनी वाली स्ट्रीट लाइट के नीचे खंबे से अपना दाहिना कन्धा टिका कर उसने किताब को खोला और पढ़ने लगा। एक आखरी बार सामने की तरफ देख उसे तसल्ली हो गयी की जल्द ये ट्रैफिक खुलने वाला नहीं है। बेसाख्ता उसका बाँया हाथ कमीज की पॉकेट तक पहुंचा और सिगरेट के पैकेट से खेलने लगा। 'बस आखरी दो बची हैं' उसने मन ही मन सोचा और पैकेट को अपनी जगह छोड़ दिया। अचानक दो गाड़ियों के बीच से एक नौजवान उसकी तरफ बढ़ा और उसने मासूम सा मुह बना कर पूछा 'आप के पास लाइटर है?'

राजीव ने हल्की सी मुस्कराहट से उस भोले-भाले नौजवान को सर से पाँव तक सराहा और बिना कुछ कहे अपनी पैंट की जेब से माचिस निकाल कर उसे थमा दी। "थैंक यू "

'ये जबान दिल्ली वाले लड़कों की तो नहीं है' राजीव ने सोचा और फिर मुस्कुराने लगा

तुम रख लो, मेरे पास गाड़ी में और भी माचिस हैं, बार-बार कहाँ ढूंढते फिरोगे।

ये सुनकर वो लड़का हँसने लगा और बेतकल्लुफी से उसने अपने विल्स सिगरेट का पैकेट राजीव की तरफ बढ़ा दिया।

'आर यू शुऊर?' राजीव ने मजाकिया अंदाज़ में पूछा और फिर जल्दी से एक सिगरेट निकल ली। 'क्या नाम है तुम्हारा?

रंजन

राजीव उसकी गाढ़ी काली आँखों में सीधा देख रहा था। उस लड़के ने रंजन के आगे और कुछ नहीं जोड़ा। सिगरेट के गहरे काश लगा रहा था और ऐसे लग रहा था जैसे उसे इस ट्रैफिक जाम से कोई दिक्कत नहीं थी। राजीव आस-पास की गाड़ियों को देख कर ये अंदाज़ा लगाने की कोशिश कर रहा था की उनमे से कौन सी गाड़ी रंजन की है।

'आप इस तरह सड़क पर खड़े हो कर भी किताब पढ़ सकते हैं? बड़े ताजुब की बात है, मैंने आज तक ऐसा कभी नहीं देखा'

मैं बहुत जल्दी बोर हो जाता हूँ और फिर मेरी पुरानी गाड़ी में रेडियो भी नहीं है, इसलिए। ये रात भी लम्बी होने वाली है खुदा जाने कब ट्रैफिक खुलेगा — राजीव ने कहा और एक बार फिर सामने की तरफ लाल से हरी, और हरी से लाल हो रही बत्ती को देर तक देखता रहा।

'do you read only or write also?' रंजन ने बहुत झिझकते हुए पूछा।

इस बार राजीव को रंजन की अंग्रेजी के लहजे पर विश्वास नहीं हुआ।

तुम अभी-अभी हिंदुस्तान आये हो? दिल्ली वाले तो नहीं लगते? मतलब ये जुबान दिल्ली की तो नहीं है '

ठीक कहा आपने, में पिछले पांच साल से बुडापेस्ट में था। वैसे मैं पूना से हूँ। एम् फिल करने के बाद पी एच् डी कर रहा हूँ।

अरे वाह ' ग्लैड तो मीट यू रंजन' .

मेरा नाम राजीव है और में दिल्ली कॉलेज में पॉलिटिकल हिस्ट्री पढ़ता हूँ . क्या सब्जेक्ट है तुम्हारे थीसिस का?

'Displacement and the evil State'

What? You mean displacement of people? The urban phenomena in which state is the only actor in uprooting people and families?

Yes, broadly. रंजन ने फिर बिना किसी इमोशन के कहा और बुझ चुकी सिगरेट के छोटे टुकड़े को पैर से मसल दिया। फिर एक और सिगरेट निकली और सुलगा ली। इस बार उसने पूछने की जहमत नहीं की — डिब्बी हाथ में ही पकडे रखी — खुले हाथ में, जो राजीव के सामने था।

'नो थैंक्स' . कमाल है, क्या जगह हुई किसी से पहली मुलाकात की — ट्रैफिक जैम — ठंडी रात और वो सब्जेक्ट जो मुझे दिल से कितना प्यारा है. तो यहाँ दिल्ली में क्या रिसर्च कर रहे हो?

बहुत से झुग्गी झोंपड़ी लोकलिटीज़ में गया हूँ — लोगो से मिला हूँ — समझा है के उन्हें एक जगह से दूसरी जगह क्यों जाना पड़ता हैं — कौन ये सब करवाता है — इसमें किसका फायदा और किसका नुकसान है — उन घरों, उन लोगो, उन फैमिलीज़ का क्या होता है जो उजड़ जाती हैं, जिनका कारोबार चला जाता है, जिनके बच्चे आवारा हो जाते हैं बिना काम और रोटी के, कुछ चोरी करने लगते हैं और कुछ ड्रग्स में बर्बाद हो जाते हैं। सब कुछ कितना भयावह है न — और सरकार कहती है ये सब उनके अच्छे की लिए किया गया है।

राजीव ने गौर से देखा — रंजन की आँखें डबडबाई हुई थीं।

'किया जाना है दोस्त, बहुत कुछ ठीक करना है, और ये सब तुम्हारी जवान पीढ़ी ही तो करेगी'

रंजन ने सर झटक दिया और आसमान की तरफ देखने लगा।

बहुत अच्छा लगा तुमसे मिल के रंजन — अगर तुम इंटरेस्टेड हो तो मैं तुम्हे दिल्ली के सब से बड़े डिस्प्लेसमेंट और रिहैबिलिटेशन से एफ्फेक्टेड लोगों से मिलवा सकता हूँ।

आप जमुना पुश्ता के बारे में बात कर रहे हैं ?

हाँ — मिलना चाहोगे बीस हज़ार कुनबों से — दो लाख लोगों से — जिनको अब शहर के सबसे दूर के कोने में बिना पानी बिना किसी सहूलियत की जगह पर कूड़े जैसे इकट्ठा कर दिया गया है

बहुत दिनों से सोच रहा था — पर आप कैसे जुड़ें हैं उनसे ?

वो बाद में बताऊंगा पहले एक सिगरेट और पिलाओ — सॉरी — मेरे पास बस २ सिगरेट बचे हैं सो अपने नहीं पी रहा। हमारी एक संस्था है जो उन लोगों के बीच में काम कर रही है — बच्चों की पढाई — सफाई — मेडिकल केयर और कोशिश कर लोगों को रोज़गार दिलवाने की।



अचानक सड़क पर हलचल होने लगी — गाड़ियों के इंजन एक-एक करके जिन्दा हो गए — आस पास धुआँ फिर से इकट्ठा होने लगा — हॉर्न फिर से बजने लगे — कुछ गाड़ियां सरकने भी लगी थीं।

अरे रंजन अपना फ़ोन नंबर तो दो। अगले हफ्ते फिर मिलते हैं और में तुम्हे ले चलूँगा अपने साथ।

98 62 ......... रंजन ने नंबर बोलते हुए अपना दायाँ हाथ आगे बढ़ाया और फिर बिना कुछ कहे गाड़ियों के बीच से निकलता पीछे को चला गया। बहुत तेज़ी से बजे हॉर्न ने राजीव को झंझोड़ा और उसने भी गाड़ी स्टार्ट कर दी। धीरे-धीरे सरकते राजीव की गाड़ी भी उस रेल फाटक के पार हो गयी जंहा पर भीड़ का एक हुजूम लगा था। दो क्रेन ने तहस-नहस हुए ट्रक को उठा कर रास्ता बना दिया था। अगले बीस मिनट में राजीव घर पहुँच गया और सुनीता को रंजन के बारे में बता कर अँधेरे कमरे में उसके बारे में सोचने लगा। जाने कब उसे नींद लग गई और गर्म रज़ाई के आगोश में थका राजीव हिलोरे लेने लगा।

शनिवार के सुबह हुई ही नहीं। जब नींद खुली तो दोपहर के तीन बज रहे थे। नन्नू इम्तेहान दे कर वापिस घर लौट चुका था। बाहर डाइनिंग टेबल पर बैठी सुनीता किसी मैगज़ीन के पन्ने पलट रही थी और राजीव को देखते ही मुस्कुरा कर खड़ी हो गयी।

चाय?

हाँ बहुत च्यास लगी है — नन्नू कहाँ है — उसका टेस्ट कैसा रहा।

बाहर खेलने गया है अभी आ जायेगा — ठीक ही कर आया है तुम्हे मालूम तो है उसका मैथ्स कैसा है। पास तो हो ही जायेगा।

अख़बार के एडिट पेज पर छपे एक लेख में वो इतना मशगूल था के उसे नन्नू के घर आने का इल्म भी नहीं हुआ। उसके ठीक सामने बैठा नन्नू नीम्बू पानी की चुस्कियाँ ले रहा था। 'बहुत लोग मर गए कल रात की आग में और उस ट्रक का बेचारा ड्राइवर भी मर गया, बताइये सब गलती तो उस रेल फाटक वाले की थी न जिसे उसने बंद नहीं किया।' नन्नू गुस्से में बोल रहा था और राजीव उसे निहार रहा था।

शाम करीब पांच बजे राजीव ने रंजन का नंबर डायल किया, काफी देर फ़ोन बजता रहा पर किसी ने उठाया नहीं। राजीव ने सोचा जब वो फ़ोन देख लेगा तो शायद वापिस करे वैसे रंजन ने राजीव का नंबर न तो माँगा था न ही उसने दिया था।

अगले दिन इतवार को राजीव तैयार हो कर घर से निकल ही रहा था की सुनीता ने बताया तुम जब नहा रहे थे तो तुम्हारा फ़ोन बज रहा था। पर ये रंजन का फ़ोन नहीं था कोई और ही नंबर था। घर से निकलते उसने सीढ़ियों में फिर से रंजन को फोन लगाया सोचा आज अगर मिल ले तो वो उसे भी अपने साथ ले जाएगा फिर शायद पूरा हफ्ता टाइम मिले या नहीं। कुछ देर घंटी बजने के बाद किसी ने फ़ोन उठाया पर वो रंजन नहीं था।

दूसरी तरफ से आने वाली आवाज ने कुछ सकपकाते हुए बताया के रंजन नहीं है। राजीव ये पूछ भी न पाया की वो कहाँ है और वो कब दुबारा फोन करे। इससे पहले ही उधर से फोन काट दिया गया। रिंग रोड तक पहुँचने से पहले ही रंजन का नंबर फोन पर फ़्लैश हुआ, राजीव ने गाड़ी धीमे करते हुए फोन लिया और एक दम बोल पड़ा, कहाँ हैं आप रंजन साहेब, कल से फोन लगा रहा हूँ !

'आप कौन हैं? और कहाँ से बोल रहे हैं' दूसरी तरफ से आने वाली आवाज ने पूछा?

जी मेरा नाम राजीव है, मैं अपने को रंजन का दोस्त तो नहीं कह सकता पर कल रात हम मिले थे और उसने मुझे कहा था की हम एक जगह इकट्ठे जायेंगे। पर आप कौन?

'वो छोड़िये' आप रंजन को कल रात मिले थे? कहाँ?

इन सवालों पर राजीव थोड़ा सकपकाया और सोचने लगा कोई बहुत ही शक्की मिजाज़ का आदमी है।

जी हम कल रात मिले थे रंजन बहुत ही उम्दा इंसान हैं और उनकी थीसिस में मुझे बहुत इंटरेस्ट है, बस इसलिए मैं उनसे मिलाना चाहता था।

'बेटा, कैसे बहकी-बहकी बातें कर रहो हो — तुम रंजन को कल रात कैसे मिले हो सकते हो — रंजन को तो मरे हुए दो महीने हो गए' तुम कोई चोरी या चालाकी तो नहीं कर रहे हमारे साथ — ये मत भूलो तुम्हारा नंबर है मेरे पास है अभी पुलिस को फ़ोन करूंगा तो होश ठिकाने आ जायेंगे तुम्हारे।

राजीव के हाथ से फोन गिरते गिरते बचा, उसके हाथ बेतहाशा काँप रहे थे, किसी तरह उसने गाड़ी सड़क के किनारे लगाई और हैरान हो कर बोला 'ये आप क्या कह रहें हैं सर — में कॉलेज में पढ़ाने वाला लेक्चरर हूँ — कल रात रंजन और में रिंग रोड पर डेढ़ घंटा बात कर रहे थे और आप कह रहें हैं की उसे मरे हुए दो महीने हो गए — में नहीं मानता — शायद आपने पी रखी है और ऊलजलूल बक रहें है।

देखिये लेक्चरर साहेब आपको कुछ गलत फ़हमी हुई है।

राजीव ने उनकी बात बीच में ही काटते हुए बोला — 'मुझे — मुझे? गलत फ़हमी ? मुझे? जिसने खुली सड़क पर बीसियों आदमियों के इर्द-गिर्द होते रंजन से बातें की, उसकी तीन सिगरेट पी, उसने ही मुझे अपना नंबर दिया और आप कह रहें हैं मुझे गलत फ़हमी हुई है। अजीब इंसान हैं आप। आप हैं कौन रंजन के और कहाँ रहते हैं ?

में रंजन का मामा हूँ, डॉ पांचाल और तीमारपुर की साइंस सोसाइटी में रहता हूँ। तीमारपुर थाने में जाइये और पूछ लीजिये पुलिस वालों से।

'प्लीज मत कहिये, ये मत कहिये प्लीज, में आपके हाथ जोड़ता हूँ, मेरे में तो अब इतनी हिम्मत भी नहीं के मैं गाड़ी चला सकूंगा — आई ऍम सॉरी — पर मेरा यकीन कीजिये में कल रात रंजन से मिला हूँ — उसने मुझे बताया के वो पूना का रहने वाला है — बताइये ठीक है के नहीं ?

हाँ ये सच है। रंजन का घर पूना में है।

उसने मुझे बताया के वो पांच बरस बुडापेस्ट में रह कर पीएचडी कर रहा है।

ये भी ठीक है — तो फिर? पर ये तो रंजन के बहुत से दोस्तों को पता था। मैंने तो किसी राजीव का नाम रंजन से नहीं सुना। अभी तुम कहाँ हो ?

जी कश्मीरी गेट के पास।

मेरा पता है २३३२। .... तुम सीधे यहाँ आ जाओ।

जी।

राजीव स्टीयरिंग व्हील को जोर से पकडे था जैसे गाड़ी कही अपने आप सरकने न लगे। वो कांप रहा था। मुश्किल से गाड़ी का दरवाजा खोल वो बाहर निकला और बदहवासी में सिगरेट के लंबे-लम्बे कश खींचने लगा। उसका सर घूम रहा था — परसों रात का एक-एक वाकया उसके जेहन में किसी नयी देखी फिल्म की तरह घूम रहा था।

'व्हाट द फ़क इस दैट?' उसने अपने दायां पैर टायर पर जोर से मारा और बोनट पर हाथ रख सर झुका के सिसकियाँ भरने लगा। नो आई डोंट बिलीव दिस — इम्पॉसिबल — ये हो ही नहीं सकता — मैंने उस शख्स की उँगलियों को छुआ है मैंने उसकी काली आँखों में देखा है — उससे बातें की हैं — और फिर उसने मेरी माचिस ली और अपनी जेब में रखी — कौन था वो — कौन? कांपते हुए उसे गाड़ी का दरवाजा खोला और तेजी से गाड़ी चलाने लगा। राजीव ये तय नहीं कर पा रहा था की उसे पहले थाने जाना चाहिए या की रंजन के घर। इसी कश्मकश में वो तिमारपुर पहुँच चुका था।

सरकारी फ्लैट्स की तिमंज़ला सोसाइटी के करीब पहुँच कर उसने गेट के पास खड़े गार्ड से घर का नंबर पूछा। किनके यहाँ जाना है ?

राजीव कुछ सेकंड के लिए सकपकाया और फिर बोला रंजन रहते हैं वहाँ।

गार्ड ने उसे गौर से देखा और बोला "भगवान भी बहुत बेइंसाफी करते हैं साहेब — रंजन बाबू कितने अच्छे इंसान थे — उनकी आत्मा को शांति मिले' — आगे से बायें हाथ पर तीसरी लाइन में दूसरी मंजिल पर।

राजीव ने एक बार फिर सर झटका और गाड़ी आगे बढ़ा दी। गार्ड तक ने तो बता दिया, अब क्यों जाना था रंजन के घर ? तीसरी लाइन में उसने जैसे ही गाड़ी घुमाई तो देखा की सामने पुलिस की जिप्सी खड़ी थी।

डॉ पांचाल का फ्लैट दूसरी मंजिल पे था। फ्लैट का दरवाजा खुला था। दो पुलिस वाले सामने सोफे पर बैठे राजीव का ही इंतज़ार कर रहे थे। डॉ पांचाल सामने डाइनिंग टेबल के पास पड़े फ्रिज से पानी की बोतल निकाल रहे थे। पलट कर उन्होंने राजीव को ऊपर से नीचे तक मुआइना किया और सामने पड़ी कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। सिवाय उस डाइनिंग टेबल, सोफे और फ्रिज के उस कमरे में और कुछ नहीं था। साफ़ सफ़ेद दीवारों पर कोई तस्वीर या कैलेंडर भी नहीं था। एक छोटी मेज़ पर कुछ किताबें थी और सामने वाले दरवाज़े की चौखट के पास कुछ पुरानी अखबारें ज़मीन पर पड़ी थीं। डाइनिंग टेबल पर चाय के कप, सॉस और जैम की बोतल, ऐशट्रे और माचिस बड़ी बेतरतीबी से रखे थे। कमरे की हालत से पता चल रहा था की डॉ पांचाल अकेले ही रहते थे।

करीब एक घंटा तक राजीव ने डॉ पांचाल और पुलिस वालों को उस रात का पूरा किस्सा सुनाया। अपना आई डी कार्ड निकाला और अपना फ़ोन नंबर पुलिस वालों को लिखवा दिया। राजीव कह रहा था और वो सुन रहे थे, बस कोई जिरह नहीं हुई। डॉ पांचाल ने आखिर चुप्पी तोड़ी और बोले रंजन ने कौन से कपडे पहन रखे थे ?

जी, खाखी — मिलिट्री रंग की जीन्स थी और ऊपर धारीदार गाढ़े हरे रंग की पूरी बाजू की कमीज जिसके कफ ऊपर मुड़े थे । उसके बांये हाथ में घडी थी। जैसे ही राजीव ने सर ऊपर उठा कर डॉ पांचाल को देखा उसे अंदाज़ा हो गया की वो रो रहे थे।

रंजन की तस्वीर पहचान पाओगे ?

जी हाँ क्यों नहीं — उसे देखने ही तो आया हूँ।



मेज़ पर रखा एक लिफ़ाफ़ा डॉ पांचाल ने सामने बैठे कांस्टेबल को पकड़ा दिया। उस कांस्टेबल की शर्ट पर लगी नाम प्लेट पर लिखा था 'नितिन यादव' . अपनी जगह से खड़ा हो कर कांस्टेबल यादव राजीव के पास आ कर बैठ गया।

लिफाफे में से तीन तस्वीरें निकल कर उसने अपने हाथ में ताश के पत्तों की तरह पकड़ लीं। राजीव ने झटके से बीच वाली तस्वीर उसकी उँगलियों के बीच से निकाल ली और उसे सामने रख अपना सर झटकने लगा।

'बहुत अजीब वाकया है प्रोफेसर साहेब — उस रात थाने में मैंने ही एक्सीडेंट की पहली डायरी रिपोर्ट लिखी थी। आप हमारे साथ थाने चल सकते हैं ? जी हाँ, राजीव ने तपाक से जवाब दिया।

एक्सीडेंट के वक़्त रंजन ने क्या कपडे पहन रखे थे?

वही जो आप बता रहे हैं' दूसरे कांस्टेबल ने कहा। चलिए हमें आपका बयान भी लिखना है। राजीव ने हाथ जोड़ कर डॉ पांचाल से विदाई ली और धीरे धीर कॉन्स्टेबल्स के साथ नीचे उतर आया। तीमारपुर थाने में उसने रंजन के फटे हुए कपडे पहचाने और सड़क पर पड़े मृत शरीर की तस्वीरों की भी पहचान की। पीछे से अधकुचली बुलेट मोटरसाइकिल के बायीं और रंजन और सामने करीब १० फुट दूर कोई दूसरा जवान लड़का पड़ा था। कुछ किताबें, एक मोटी सी डायरी, पानी की बोतल और सड़क पे फ़ैले ख़ून में एक मोबाइल फ़ोन, विल्स सिगरेट का पैकेट और इन सब के इर्द-गिर्द लगी सफ़ेद चाक की लाइन।

डॉ पांचाल को मिलने और ये सब देखने के बाद भी राजीव को किसी पर भी यकीन नहीं हो रहा था। काँपती उँगलियों के बीच सिगरेट रुक नहीं पाई और कांस्टेबल की मेज़ पर ही गिर गई। उनसे बिना कुछ कहे राजीव बाहर निकाला और गाड़ी में बैठ कर फिर से फूट पड़ा।

सच क्या है और उस रात क्या था, वो कौन था तर्क से बाहर था। साथ की सीट पर बज रहा फोन सुनीता का था पर राजीव ने लिया नहीं। गाड़ी आगे बढ़ा दी। शाम के सात बज चुके थे अँधेरा हो गया था। बाहरी रिंग रोड लेते हुए वो कुछ देर में ही जमुना के पुल के पास था पर उसने गाड़ी घर की तरफ नहीं मोड़ी और सीधा निकल गया। प्रगति मैदान के पीछे का रेल फाटक पार करने के बाद उसने गाड़ी धीमी कर दी और सड़क के दोनों तरफ एक-एक चप्पे को बहुत गहरे से मन में उतार लिया।

अगली लाल बत्ती के बाद उसने गाड़ी कच्चे में उतार दी और बाहर निकल कर सिगरेट सुलगा ली। बहुत देर तक वो सामने लगे पोपलर के पेड़ और उनके पार दूर पीछे ऊंचाई पर जा रही रेल को देखता रहा। सड़क के दोनो तरफ गुजरने वाली गाड़ियों का शोर उसे परेशां करने लगा था। एक बार फिर उसने गाड़ी आगे बढ़ा दी। सड़क के बाएं किनारे पर धीरे-धीरे गाड़ी चलता वो सराय काले खां तक पहुंचा और वहाँ से यू टर्न ले कर फिर वापिस जाने लगा।

प्रगति मैदान के गेट नंबर 1 के सामने रुक कर वो चाय वाले की दुकान पर बैठा देर रात तक चाय पीता और सिगरेट फूकता रहा। करीब ग्यारह बजे वो उठा और गाड़ी फिर रिंग रोड की ओर मोड़ दी। ट्रैफिक अब कम हो चला था। पुराने किले के पीछे से आश्रम तक और फिर वापिस पुराने किले तक उसने कितने चक्कर काटे उसे याद नहीं था। रात का करीब एक बजने को था, इस बीच कई बार सुनीता का फोन बजा पर उसने लिया नहीं। थक कर उसने गाड़ी उसी जगह के करीब लगा दी जहाँ वो दो रात पहले ट्रैफिक में रुका था। बहुत देर वो अँधेरे में देखने की कोशिश करता रहा फिर पास की लाल बत्ती के सामने से उसने किसी को सड़क पार करते देखा। वो आदमी थोड़ी देर के लिया गाड़ियों को देखता रहा और फिर ट्रैफिक लाइट के खम्भे के पास आकर रुक गया जैसे दोबारा सड़क पार करने को तैयार हो। राजीव धीरे-धीर उसके पास बढ़ने लगा। ट्रैफिक लाइट की लाल से हरी होती रौशनी में अब उसे रंजन का चेहरा पहचान आ रहा था। वो रंजन से करीब 10 फीट दूर था पर रंजन ने उसकी तरफ देखा भी नहीं। राजीव दो कदम और आगे बढ़ा और उसने आवाज़ दी — रंजन। राजीव को ऐसे लगा जैसे वो आदमी एक तरफ घूमा, और अब राजीव को उस शरीर के पार उसके पीछे वाला ट्रैफिक लाइट का खम्भा साथ-साथ दिखाई दे रहा था। राजीव के बदन में सिहरन दौड़ गयी, अपनी मुट्ठियों को दबोचता वो एक कदम और आगे बढ़ा — अब बस वो दोनों तीन फुट के फासले पर थे — अगर राजीव चाहता तो झपट कर उसे छू या दबोच सकता था पर हिम्मत कहाँ थी। उसने फिर से आवाज़ दी रंजन !!!

इस बार वो हवा के झोंके सा घूमा और राजीव के सामने आ गया। कुछ पलों तक दोनों एक दूसरे को निस्तब्ध देखते रहे। आवाज़ राजीव के हलक में दब के रह गयी थी। चाहते हुए भी वो बोल नहीं पा रहा था पर उसने बहुत गौर से बेख़ौफ़ रंजन की आँखों में देखा।

रंजन कुछ कहने वाला था, उसके होंठ हिले पर आवाज़ राजीव तक कुछ देर में पहुँची — 'राजीव, प्लीज मेरा थीसिस पूरा कर उसे स्टॉकहोल्म यूनिवर्सिटी के डॉ ग्रैहम वोज़्निक को पहुँचा देना'।


राजिन्दर अरोड़ा | Rajinder Arora | 98100-18857 | ISHTIHAAR

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