सोमवार, जुलाई 03, 2017

कृष्णा सोबती : भारतीय संस्कृति और मूल्य

आखिर कौन से आंतरिक या बाहरी दबाव है जिनकी चुनौती से हमारी पुरानी परम्परा, सनातन शिखर समतल मैदान में बदल जाएंगे। क्या सचमुच? — कृष्णा सोबती


Krishna Sobti

Bhartiya Sanskriti aur Mulya 



भारतीय संस्कृति और मूल्य
कृष्णा सोबती

राजनीतिज्ञों ने अपना विश्वास और चमक दोनों खोए हैं। एक खास तरह की पैंतरेबाजी और संयोग सुलभता के गलियारे ने हमारे जनजीवन को आतंकित किया है। यहां तक कि इस प्रक्रिया में भ्रष्टाचार को सुविधा और सुयोग का नाम दे दिया है। और सही और गलत का दायरा काफी विस्तृत कर दिया है। अब सही वह है जिससे आपका स्वार्थ जुड़ा है, गलत वह है जिससे आपका स्वार्थ नहीं जुड़ा।

दोस्तो,
भारतीय संस्कृति और बदलते मूल्य जैसे गहन, गम्भीर विषय पर कुछ कहने से पहले मुझे आपके सामने यह स्वीकार करना है कि मेरा परिचय भारतीय संस्कृति के प्रबुद्ध पक्ष से उतना ही है जिसे साधारणजन अपने होने की हैसियत से, अपने में महसूस करता है। संस्कार की उस अटूट कड़ी से जुड़ उसे वहन करता है जिसे भारतीय संस्कार और संस्कृति का नाम दिया जाता है। भारतीय संस्कृति की चारों दिशाओं को एक साथ देख सकने वाला गहन, प्रबुद्ध चिंतन मेरे यहां गैर हाजिर है। इसके पहले कि इस अछूत कड़ी के मणके छूकर महसूस किए जाएं, मैं इसके मूल स्थान पर अटक कर, अपने होने की शर्त से उस विराट के सन्मुख नमन होना चाहूंगी जिसका नाम मेरा देश है। वही इस संस्कृति का जनक है।



मेरे देश ने मेरी काया को मिट्टी दी है। आत्मा दी है। आंख दी है। उसी ने मेरी रुह को लहकाया है। वह संस्कार रचाया है जो अपनी सत्ता में मेरे मिजाज और तासीर में, मेरे ‘मेरेपन’ में मौजूद है। मेरा देश ही अपने अतीत और वर्तमान में मुझमें उजागर है। इसलिए नहीं कि मैं हूं और जिन्दा हूं, इसलिए कि जो कुछ भी मेरा है, मुझमें है, मेरे अस्तित्व में निहित है, वह इस देश की विरासत है जो यहां जन्म लेकर मैंने पाई है। मुझ तक आई है।

हर किसी का देश उसके अंदर और उसके बाहर रहता है और निरंतर उसके भाव, उसकी दृष्टि, उसके कोण को अपनी चौखट में जुड़ाए रखता है। यही बंधन अपने अपने देश प्रदेश की गंध, गरिमा और गुण को अपने निवासियों में, नागरिकों में मुखरित करता रहता है। उजागर करता चला जाता है। हम नहीं भी रहते, नहीं भी होते, तो भी।

संस्कृति की बात बहुत ही मामूली ढंग से मैं इसी बिंदु से उठाने जा रही हूं :
उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम विस्तृत दिशाएं। धुर उत्तर में देश का मस्तक हिमालय, उसकी छांह तले हरियाली धरती, उसकी गंध, उसकी महक, नदियां झीलें, उसके चरणों तले सागर, आप सबको समग्र भाव से प्यार करते चले जाते हैं।

वही देश आपके अंतर में उसकी कविता, उसका दर्शन, उसका चिंतन बनकर सरसता रहता है। इसी के द्वारा दी गई दृष्टि अंतर्दृष्टि, जीवन दृष्टि इसकी जीवन शैली को बुनती चली जाती है। यही से उपजे, उभरे और प्रतिष्ठित होते चले गए मूल्यों की परम्परा हममें उस धारा के रूप में बहती जाती है जिसे हम अपने जीने में पहचानते चले हैं।

साहित्य दर्शन, ज्ञान चिंतन जो भी यहां रहनेवालों ने अपने स्वभाव और धर्म के अनुसार जिया हैं, प्रस्तुत किया हैं, उन्हें भी। एक बहुत बड़ी और गहरी अटूट कड़ी जो भारतीय मानस के संस्कार से जुड़ी है, अपनी सुरक्षात्मक मुद्रा को अतीत के गुंजल में समेटे लपेटे हुए है और जिसे हर भारतीय ने केवल ओढ़ने भर को ही ओढ़ा हुआ नहीं है, वही हमारे सोच, संस्कार की परिचायक है।

एक छोटी सी कलम होने के नामे मेरे लेखक के सरोकार, मेरे अपने समय और समाज से जुड़े हैं और इसी रिश्ते से व्यापक मानवीय मूल्यों से भी। आज हमारे जीवन में, भारतीय सोच में जो अदल बदल और फेर बदल, परिवर्तन हो रहे हैं या हो चुके हैं उन्हें हमारा साहित्य अंकित करता है। इन्हीं परिवर्तनों का बाहरी हिस्सा हमारे रोजमर्रा के क्रिया कलाप में परिभाषित होता है। यहीं इसी प्रक्रिया में जीवन, राजनीति, सत्ता और तंत्र के रूप में इसे अपने में सोखता चला जाता है। परिवर्तन जब भी होते हैं अचानक नहीं होते। वे इतनी खामोशी से भी नहीं होते कि उनके बदलाव, टकराव आप सतह पर और सतह के नीचे महसूस न कर सकें। सच तो यह है कि परिवर्तन लगातार होते चले जाते हैं और अपने बदलावों के संदर्भों में विपरीत दिशाओं से लोकमानस की कसौटी पर खरे होकर ही टिकते चले जाते हैं। इन्हीं के द्वारा, इनके सरोकारों में क्षोभ, हलचलें, सामाजिक राजनीतिक टकराहटें जुड़ने भिड़ने की स्थितियां समय से संवाद स्थापित करती रहती हैं और साहित्य कला और विचार में रेखांकित होती रहती हैं।

इस सबके बावजूद यहां की इकाई के रूप में जो भी व्यक्ति इसका नागरिक है वह नश्वरता के नियम के तहत मृत्यु की विराट सत्ता की भी प्रजा है। इसी से बदलावों के मुखड़े बदलते हैं। पुराने होते हैं और फिर हेर फेर के दौर में से गुजर कर नए हो जाते हैं। अलग दिखने लगते हैं। निसर्ग का नियम संतुलन बिगड़ने नहीं देता। इसी से मूल्य भी जीवन से मृत्यु की ओर शेष हो फिर दुबारा जीवन की ही ओर लौटते हैं।

एक छोटी सी पंक्ति प्रस्तुत है,
“तुम मेरी ओर मुड़ो, तब मैं तुम्हारी ओर मुड़ूंगा। ’’

लगता है यह किसी साधु संत, पीर नबी की आवाज नहीं, यह वक्त के चक्के पर चढ़ी परिवर्तन की आवाज है जो एक बार फिर भारतीय जीवन के द्वार को खटखटा रही है। पूरे आसार हैं, इस आहट के साथ एक नया युग, नया दौर आने को है। आकर ही रहेगा, शायद। आखिर कौन से आंतरिक या बाहरी दबाव है जिनकी चुनौती से हमारी पुरानी परम्परा, सनातन शिखर समतल मैदान में बदल जाएंगे। क्या सचमुच?

दोस्तो, हम कितनी ही श्रद्धा और ललक से अपने भव्य अतीत को पुकारें, उसे क्या हमारा वर्तमान और भविष्य भी सुनेगा? सुन सकेगा? क्या विज्ञान का युग पीछे लौटेगा? अध्यात्म की ऊंची सोच को क्या आज का भौतिकवाद उसकी सत्ता को बरकरार रखने की मजबूरी को सहन करेगा? जो मूल्य परम्पराएं टूट चुके हैं हम उन्हें आवाजें दे देकर क्या दुबारा सत्तारूढ़ कर सकेंगे? लौटा सकेंगे? वर्ण व्यवस्था में जकड़े हमारे समाज को विधान से मिले बराबरी के अधिकार ने उसकी जड़ों को हिलाया है। इस लज्जाजनक स्थिति को ललकार कर उबारनेवाली अछूत जनता देश और व्यवस्था का प्रमुख अंग हैं। क्यों नहीं, वे भी क्यों नहीं, देश की कुलीन धारा में जज्ब हो सकते। क्यों नहीं वे यहां के सामूहिक सत्त्व को अपना सकते?

दोस्तो, यह होने को है और होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होगा, और, कुछ और होगा तो उच्च वर्ण के ललाट की खरोंचे जख्म ही बनेगी और किसी भी मंत्र की आवृत्ति से विभूति नहीं चूक सकेगी। सिर्फ रक्त की बूंदें टपकेंगी। आज के लिए यह कोई धार्मिक राजनीतिक सवाल नहीं, यह एक बहुत बड़े पैमाने पर हमारे भव्य मूल्यों को चुनौती है। हमारे विश्वासों और आस्थाओं पर सबसे बड़ा व्यंग्य है। परेशानी होती है यह सोचकर कि जहां हमारे चिंतन ने विराट के असीम को छू लेने की जुर्रत की वहां हमारी यह सामाजिक शोषण की संस्था लगभग हजार साल तक पनपती चली गई। इसी सर जमीन पर। कमजोर, पिछड़े दलित वर्ग वे सब जिन्हें हमने अपने बडप्पन में ‘हरिजन’ की संज्ञा दी, वे सब गली सड़ी स्थितियों, परिस्थितियों से उठकर अब हमारा सामना करने को हैं जिनसे सदियों हमने नजरें चुराई हैं।

दोस्तो, किसी मोड़ पर युग विशेष में जब मूल्यों की टक्कर होती है तो दरारों में से कुछ बड़े खतरे पैदा होते हैं। मुझे कहने की इजाजत दीजिए कि ऐसा ही एक खतरा हमारे सामने हमीं को चुनौती देता नजर आता है। बराबरी के इस अहसास को हमारे अंदर या बाहर की कोई भी ताकत रोक नहीं सकती। भारतीय इतिहास का, उसके धार्मिक विश्वास का, उसके खोखलेपन का यह सबसे बड़ा मूल्य परिवर्तन होगा। कितना ही समय क्यों न लगे, यह बदल कर रहेगा।

संयुक्त परिवार हमारे ढांचे की रीढ़ रही है। परिवार की एकजुट मुद्रा बदली है और इसके साथ ही जुड़े संबंधों और अर्थ के संदर्भ बदल रहे हैं, संबंधों के संवेदन भी। बड़ा संयुक्त परिवार छोटी छोटी इकाइयों में विभाजित हो रहा है। इसके साथ ही झीना पड़ रहा है, सगेपन का घनत्व। भारतीय परिवार की भावनात्मक सघनता लगातार छीज रही है। क्या हम याद करना पसंद करेंगे कि इन बाहरी दबावों के सामने इस पुरानी प्रथा को दुबारा ताजादम करना मुश्किल ही होगा। इसने जहां भारतीय जीवन को सुरक्षा दी, वहां व्यक्ति से उसकी इच्छाशक्ति छीन कर कुछ कर सकने की सामर्थ्य को क्षीण भी किया। उसे एक परिवार का, समूह का अंग भर बनाकर छोड़ दिया। इसी के साथ जुड़ी है भारतीय मानस की जोखिम न उठाने की सहज, स्वाभाविक मनोवृत्ति। जिसे हम चाहे जिस नाम से बुलाएं पुकारें।

यह अकारण नहीं है कि स्वाधीनता प्राप्ति के बाद सहसा भारतीय मानस ने सबसे पहले समूह से अलग होने की, परिवार से बाहर जाने की तीव्रता से अभिव्यक्ति की। मैं सोचता हूं, अतः मैं हूं।

अस्तित्ववाद की यह अर्थपूर्ण ध्वनि आज हमारे प्रबुद्ध लोकमानस में व्याप्त सबसे तीखी और तेज आहट है। जहां समाज के प्रभुत्व में व्यक्ति की साख समाज का अंग होने में थी, वहां आज मानव की आत्मचेतना निज की एकांतिकता को संजोने में लगी है। इसी अस्तित्ववाद ने धर्मशास्त्र, काव्य दर्शन, मनोविज्ञान की सीमाओं के व्यापक क्षेत्र का अतिक्रमण किया है।

गलत न होगा यह कहना कि यह संकट का दर्शन है। इससे उपजे अलगाव और विच्छिन्नता की भावनाएं ही इसके मूल में हैं। इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय मानस और चिंतन ने साहित्य द्वारा अपने पुराने संदर्भों में आधुनिकता के इस स्वर को, इसके विश्व व्यापी प्रभाव को पहचाना है। लगातार आंका है।

हमारे आज के जीवन में कार्यकलापों का क्रम बदला है। उसके साथ ही वैज्ञानिक और औद्योगिक अर्थव्यवस्था के दबावों ने इस क्रम का सामान्यीकरण भी किया है। हमारे समाज में सामूहिकता की जो भावना उभरी है शायद वही इस संदर्भ में व्यक्तित्व लोप का कारण भी बनी है। जनमत और जनजागरण के कारण वर्गों के विभाजन में समता, बराबरी की आधुनिक प्रवृत्ति व्यक्तित्व पर दबाव और बोझ रखती है। यह सच भी है कि जीवन के बढ़ते हुए समाजीकरण ने सत्ता और तंत्र को मजबूत किया है। बेहिसाब ताकत दी है। जाहिर है आज के संदर्भ में हमारे अतीत का बौद्धिक विलास, आसपास फैले इनसान के मानसिक तनावों और नई स्थितियों के यथार्थ का समाधान नहीं कर सकेगा। अपनी व्यक्तिगत बेहतरी की तीव्र नैतिक इच्छा, समाज और धर्म की असंगति का विस्तार करती चली जाती है। मुझे इजाजत दीजिए यह कहने की कि तथाकथित गौरवमयी भारतीय संस्कृति की परम्परा में वर्गीकरण और सह अस्तित्व के अर्थ कुछ भी रहे हो, ऊंच नीच के जन्मजात अधिकार भेदभाव, छुआछूत के नाम से ही पहचाने जाते रहे हैं।

दोस्तो इस तरह हम चेतना के सेहतमंद रास्तों को बंद करनेवाली सिकुड़न, कट्टरता और पूर्वग्रह के लबादे से देर तक जन को धमका, भरमा नहीं सकते। इतिहास के इस मोड़ पर हमारे विधान ने हमें बराबरी के अधिकार दिए हैं। इसी ने हमारे देश के जनसाधारण को प्रतिष्ठा दी है। यहीं अपने पढ़े लिखे प्रबुद्ध वर्ग से हटकर ग्रामीण जनता के जीवन संदर्भों में हो रहे बदलावों का जिक्र करूंगी जो आधुनिक विकास की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं। कृषि विज्ञान ने जिस छोटे बड़े पैमाने पर हमारे गांवों को प्रभावित किया है, उन्हें शिक्षा और बेहतर खेती और सुख सुविधाओं को उकसाया है। गांव के पुराने ढांचे में एक खास तरह की खलबली, ग्रामीण समाज में कहीं तीखेपन से लक्षित है और इस बात का प्रमाण है कि आर्थिक व्यवस्था और कृषि विकास के परिणामस्वरूप गहराई से खुदे पुराने मूल्य और परम्पराएं बिखराव की चपेट में है। भारतीय मिजाज में रची बसी अहिंसा और प्रेम की भावना के साथ साथ एक अजीब हिंसा और क्रोध का भाव उभरा है। खासतौर पर महानगरीय जीवन में। अलगाव का एक और मूड भी है जो हमारे लेखन में परायेपन और थकन का आभास देता है। इसे केवल पश्चिम की नकल ही मान लेना शायद ठीक न होगा। आधुनिक जीवन पर हावी हो रहे तनावों की ही यह देन है।

सामाजिक रूप में यह महानगरीय बोध अनिवार्यतरू ऐसे रचनाकारों की रचनाओं में प्रेषित होता है जो गांव कस्बों और छोटे शहरों से उखड़कर एक बड़ी दुनिया में पहुंच गए हैं। भारतीय मन की कल्पना और रोमांस को इसी यथार्थ ने अपने भयावह रूपों में झंझोड़ा है।

धंधों की विविधता ने जहां जीवन की एकरसता तोड़ी है, वहां उसे एक चौखट विशेष में बांधकर एक नई और परायी लगने वाली एकरसता का भी सामना करना पड़ा है। संवेदना और सैंसेबिलटी के स्तर पर इसी पृष्ठभूमि से पुराने मूल्यों को चुनौती भी मिली है। ऐसी संरचना की उड़ान पहले से कहीं व्यापक है और अपनी सीमाओं को फलांग कर आगे बढ़ी है। जो नए पुराने मूल्यों की टक्कर और विरोधाभास पुरानी पीढ़ी में लक्षित होता है वह नई पीढ़ी में सीधे साक्षात्कार की मुद्रा में है। यहां मैं अपनी बात साफ करने के लिए इन्हें दो धाराओं में बांटना चाहूंगी। एक प्रबुद्ध इलीट वर्ग जो बदलते मूल्यों और उनसे जुड़े अहसासों से अतीत की समग्रता से बहुत कुछ संजोना, समेटता चाहता है और दूसरी ओर साधारण जनता जो मीडिया, रेडियो, टीवी, सिनेमा द्वारा मिली जानकारी के बल पर ही ‘इलीट’ के सांस्कृतिक दम्भ का सामना करने की हिम्मत जुटाने में लगी है।

यहां मैं हिंदी फिल्मों का खासतौर पर जिक्र करना चाहूंगी। भारत की बहुत बड़ी जनता को जिनका सीमित, साक्षर ज्ञान उन्हें साहित्य से दूर रखता है, फिल्मों से ही जीवन के लकदक मूल्यों और उनकी संवेदना की प्राप्ति होती है। उस तस्वीर से, कथानक से उनकी मानसिकता, उनके मूल्य प्रभावित होते हैं। एक खास अंदाज में फिल्में उस उघाड़ को भी प्रेषित करती चली जाती है जिसका प्रभाव साहित्य मनन से कहीं ज्यादा कारगर होता है।

क्या हम याद करना पसंद करेंगे कि भारतीय ग्रामीण और देश का सर्वहारा वर्ग तंत्र और सत्ता के सम्पर्क में एक बहुत बड़े परिवर्तन का सामना करनेवाली प्रक्रिया में से गुजर रहा है। हमारा लोकमानस सदियों से उदासीनता में जीता रहा है। बाहर के आक्रमणों और खतरों से बचने के लिए वह बार बार हर बार इसी दुर्ग में लौटता रहा है। अकाल, बीमारी, भुखमरी, सभी को भाग्यवाद के सहारे स्वीकार करता रहा है।

इसी ने, अभावों, गरीबी के लंबे अनुभव ने जहां हमारे किसान को बेहिसाब सहन शक्ति दी, वहां नियति के आगे सिर झुका देनेवाली मूल विवशता भी। आज हमारे गांवों में जिंदगी की बेहतरी के लिए संकोच नहीं, उम्मीदें हैं। आशाएं हैं। यहां यह कहना गलत न होगा कि भारतीय ग्रामीण जनता की धर्म भावना, आस्था एक खास तरह के राजनीतिक दबावों के पीछे पीछे सरकती, दीखती है जिसके नए मापदंडों को आत्मसात् करने और समझने का प्रयास ग्रामीण समाज लगातार कर रहा है। हमारे पास कारण और उदाहरण मौजूद है कि हमारा लोकमानस सामाजिक तौर पर नीची सीढ़ी पर होते हुए भी, रोजमर्रा के धंधों और मजबूरियों के बावजूद अपने तईं, मानवीय भावनाओं को अंकित करता चला गया है। अभिव्यक्त करता रहा है। अपने को व्यक्त करने की आदिम इच्छा ने हमें लोककलाओं में विलक्षण चित्र दिए हैं।

नैतिकता के पुराने चुक गए मूल्यों का जो रूप हमारी जीवन शैली ढोये चली आ रही हैं, उनका विघटन हुआ है और अवमूल्यन भी। आज के आधुनिक संदर्भ में उभरते और छिन्न भिन्न होते स्त्री पुरुषों के संबंधों में एक नया आयाम खुला है। स्त्री की आर्थिक स्वतंत्रता और बराबरी के तेवर से तलाक के कानून से पुरानी भारतीय विवाह संस्था को गहरा झटका लगा है। नई अर्थव्यवस्था और चौखट में भारतीय नारी अपने पुराने और नए स्वरूप में ताल मेल बिठाने में प्रयत्नशील है। इसी के साथ साथ भारतीय जीवन से जुड़े जन्म जन्मांतर वाले प्रेम और आसक्ति के अर्थ भी बदले हैं।

असंगत न होगा यह जान लेना कि जहां विज्ञान ने ईश्वर की एकमात्र सत्ता के साम्राज्य को कम किया है। वहां भारतीय मानस ने बिना किसी वैचारिक कशमकश के विज्ञान की उपयोगिता और सामर्थ्य को स्वीकार किया है।

इसके साथ साथ दिलचस्प तथ्य यह भी कि जहां अंधविश्वासों में हमारे यहां कमी आई है वहां सामाजिक रूप में धर्म के छोटे बड़े मठ, आश्रम और मठाधीशों की बाढ़ सी आई है। लगता है छूटते पुराने विश्वासों और आस्थाओं को कोई न कोई सुलभ व्यवहारिक रूप देने की कोशिश जारी है। ऐसा कहना मुनासिब ही होगा कि सामाजिक और नैतिक मूल्यों के बदलाव ने एक खास तरह से हमारी सांस्कृतिक रुचियों को भी अदला बदला है। लौट लौटकर गौरवमयी परम्परा के स्तुतिगान आज भी धनी वर्ग से जुड़े हैं। विविध कलाओं और विधाओं द्वारा अतीत की भव्यता को समो कर रखने का आग्रह व्यापक रूप से अभिजात के परिष्कार के समीप है। लोककलाएं प्रबुद्ध वर्ग के लिए मंचित होती रहती हैं। विदेश की ओर उन्मुख मुद्रा ने इन्हें निश्चय ही एक नई क्षमता दी है जो अर्थ से जुड़ी है।

एक बड़ा महत्त्वपूर्ण परिवर्तन जो एक साथ पूरे देश में उभरा है, वह है ‘मीडिया’ की मदद से प्रस्तुत होनेवाला ‘दृष्टिकोण’। इस दृष्टिकोण में मिलाजुला झूठ और सच है। इसके सच में वे मूलभूत आदर्श निहित हैं जो आज भी भारतीय मानस के समीप है और इसके झूठ में वे जो विशेष स्वार्थों की सुरक्षा के लिए सच में मिलाकर प्रस्तुत कर लिए जाते हैं।

इस विशाल प्रस्तुतिकरण ने सच और झूठ के अलग अलग मुखड़ों को काफी हद तक एक-सा कर दिया है। मंच पर एक ही अभिनेता को दाएं बाएं अलग अलग पहना दी गई पोशाक की तरह। जहां जाति समूह के नाम पर झगड़े फसाद जारी हैं, वहीं धर्म प्रदेश जाति के भेदभाव को लांघकर, पूर्वाग्रहों को फलांगकर हमारे यहां एक छोटी मगर नई बिरादरी भी विकसित हो रही है जो न सिर्फ मुसलमान है, न सिर्फ पारसी, न सिर्फ सिक्ख, क्रिस्तान। चाहें कितने ही कम परिवार क्यों न हो, ये विवाह हमारी सामाजिक, सांस्कृतिक सेहत के लिए वरदान सिद्ध होंगे।

बदलते मूल्यों में जहां मेरा अधिकार आपके अधिकार से अलग नहीं, कम नहीं, वहां मेरी आस्था, मेरे विश्वास भी किन्हीं दूसरी आस्थाओं के तहत अलग नहीं। हमें यह जान लेना चाहिए कि विधान ने हमें बराबरी के अधिकार दिए हैं। हम में से कोई भी समूह विशेष होने का दुशाला नहीं ओढ़ सकता। भारतीय संस्कृति और इससे जुड़े मूल्य बहुत से रसायनों का मिश्रण हैं। इसके तत्त्वों को विभाजित कर इसकी मुक्कमल तस्वीर बनाई नहीं जा सकती। इतिहास के क्रम को दोहराने की चाह होती है पर वह मनचाहे ढंग से दोहराए भी नहीं जा सकते।

राजनीतिज्ञों ने अपना विश्वास और चमक दोनों खोए हैं। एक खास तरह की पैंतरेबाजी और संयोग सुलभता के गलियारे ने हमारे जनजीवन को आतंकित किया है। यहां तक कि इस प्रक्रिया में भ्रष्टाचार को सुविधा और सुयोग का नाम दे दिया है। और सही और गलत का दायरा काफी विस्तृत कर दिया है। अब सही वह है जिससे आपका स्वार्थ जुड़ा है, गलत वह है जिससे आपका स्वार्थ नहीं जुड़ा।

भारतीय बुद्धिजीवी शायद उसी बाहर और अंतर की स्थितियों परिस्थितियों में तालमेल बिठाने के प्रयत्न में हैं। सिद्धांत के मुखौटे बुद्धिजीवी के लिए बेहद जरूरी है। इसलिए उन्हीं ही पुनीत धारा से जुडे रहना जरूरी भी है। उसके चिंतन और चिंता में जो दोहराव है, उसे शायद विपरीत धाराओं के अनुशासन एक संयम और सुरक्षात्मक गतिमयता देंगे। हमारे जीवन के बदलते मूल्यों का लेखा जोखा काफी बड़ा है। व्यापक है। दूर-दूर तक इसके बदलते स्वरूपों को देखा जा सकता है। एक ओर परम्पराओं को ढोने की थकन है तो दूसरी ओर नए के प्रति जिज्ञासा भी। इस मामले में हमारी छोटी, नई पीढ़ी हमसे आगे हैं और भिन्न भी।

दुनिया छोटी हो जाने के फलस्वरूप बाहर का ज्ञान, विज्ञान, साहित्य और संगीत नई पीढ़ी के निकट उतना ही अपना है जितना भारतीय। यकीनी तौर पर यह उनके लिए एक बड़ी जमा है। दोस्तो, दर्शन और चिंतन की गहराइयों और भारतीय मानस की कलात्मक ऊंचाइयों के बावजूद जीने के स्तर पर हम यथार्थ को नजरअंदाज कर अपनी खामियों को भी विशिष्ट बना लेने में माहिर हैं। विचारधाराओं का नाम नहीं लूंगी लेकिन दोस्तो जब हम किसी निगाह विशेष से इतिहास के प्रमाणों में जनजीवन और उसके तत्त्वों की पहचान और शनाख्त करने का फैसला कर लेते हैं और एक सोच पर टिक जाते हैं तो इसके साथ साथ एक हादसा और भी पेश आता है। आप जहां देख रहे होते हैं उसके पीछे से कुछ खामोशी से, अनजाने में ही गुजर जाता है जो कम महत्त्वपूर्ण नहीं होता।

आज भारतीय जीवन की ऊपरी तहों और गहरी जड़ों में जो भी बदलाव हुए हैं, हो रहे हैं वे विज्ञान की प्रयोगधर्मी दृष्टि से एकलय हो सकेंगे, सोचकर हम शायद आश्वस्त ही होते हैं लेकिन इस बीच कितना बचेगा, कितना बदलेगा, कितने को भारतीय जीवन समेट सकेगा, यह सवाल है जिनकी आहट हमें मिल रही है पर उसका सबूत और नया स्वरूप समय के अगले मोड़ पर है, पुरानी भारतीय संस्कृति को भी शायद भविष्य में ही नया समन्वय ढूंढ़ना होगा।

(तद्भव - 35 से साभार)

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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