गुरुवार, अक्तूबर 05, 2017

उस्ताद राशिद खान की तान से शिमला गूंजा — भरत तिवारी


Ustad Rashid Khan (Photo© Bharat Tiwari)

उस्ताद राशिद खान की तान से शिमला गूंजा

भरत तिवारी



Ustad Rashid Khan (Photo© Bharat Tiwari)

उस्ताद रशीद खान की राग मारवा की तान, शिमला के ऐतिहासिक गेयटी से होती हुई शिमला की हवाओं में, बुधवार की शाम, इस तरह घुल गई, कि भरे हुए हाल के अन्दर के श्रोताओं की मंत्रमुग्धता, थियेटर के बाहर इंतज़ार करते श्रोताओं और सैलानियों को भी उस्ताद की आवाज़ की गहराई में उतार के गई।

Rupali Thakur (Photo© Bharat Tiwari)

सरकारें जब कला और संगीत के प्रति अपने दायित्व को निभाती नज़र आती हैं, तो सुखद आश्चर्य होता है। देखा जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि संगीत, गायन, नृत्य आदि कलाओं को अनादिकाल से बढ़ावा और सरंक्षण दिए जाने की ज़िम्मेदारी अलग-अलग समय की सरकारों —  कलाप्रेमी राजाओं से लेकर नवाबों तक, और कमोबेश अंग्रेजों से लेकर आज़ाद भारत के विभिन्न सरकारी महकमों तक — ने ही सम्हाली है।

Lt Gen R K Soni, Dr. Vinay Mishra, Ustad Rashid Khan

छोटे शहरों में अब, राजाओं-नवाबों के समय की तुलना में, संगीत आदि को कम बढ़ावा मिलना, राज्य की, संस्कृति के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को ठीक से पूरा नहीं किया जाना है। ऐसे में ‘भाषा एवं संस्कृति विभाग, हिमाचल प्रदेश’ का शिमला में, 5 दिन का ‘शिमला शास्त्रीय संगीत उत्सव’ मनाया जाना, राज्य का अपनी ज़िम्मेदारी को समझना दिखाता है। 4 से 8 अक्तूबर तक होने वाले इस उत्सव का यह चौथा वर्ष है। कभी हिन्दुस्तान की ‘गर्मी-की-राजधानी’ होने वाले पहाड़ी शहर, शिमला के संगीत प्रेमी उत्सव शुरू होने के इंतज़ार में थे। उत्सव पर अनुराधा ठाकुर, प्रमुख सचिव, कला भाषा और संस्कृति ने ठीक कहा, “हिमाचली संस्कृति में समाज और संगीत का गहरा रिश्ता है। भारतीय शास्त्रीय संगीत के महान कलाकारों को शिमला का जुड़ाव रहा है, राष्ट्रीय स्तर के संगीत समारोह के लिए शिमला एक माकूल शहर है।“


‘शिमला शास्त्रीय संगीत उत्सव’ में, शास्त्रीय संगीत की महत्ता को समझते हुए, एक दिन में एक कलाकार का गायन होना, कला को श्रोताओं तक पूरी तरह पहुंचाता है। क्योंकि एक समय में एक से अधिक प्रस्तुतियां होने पर, बीच का समय, संगीत-रस में डूबे श्रोता के ध्यान को पहले तोड़ता है और श्रोता को पुनः किसी अन्य के संगीत से जोड़ने की उम्मीद रखता है। इसके अलावा गायक और श्रोता के बीच जुड़ाव एक घंटे के गायन में बनना संभव नहीं है, क्योंकि आधा-घंटा तो शास्त्रीय संगीत को, गायक को, माहौल बनाने में ही लग जाता है। कार्यक्रम का शाम 6 से रात 8:30 तक होना, यानी श्रोता को, पहले ज़माने की तरह, संगीत में डूबे 150 मिनट मिले।

Ustad Rashid Khan, Ustad Murad Ali Khan (Photo© Bharat Tiwari)

उस्ताद राशिद खान की ज़बरदस्त-ज़ोरदार आवाज़ से 4 अक्तूबर को समारोह की शुरुआत हुई । उस्ताद ने शुरुआत राग मारवा से की उसके बाद याद पिया की आयी, मिश्र पहाड़ी में ठुमरी, और अंत अपने अपने बेहद लोकप्रिय गाने 'आओगे जब तुम ओ सजना' से की। संगत में, तबले पर पंडित शुभांकर बनर्जी, सारंगी पर उस्ताद मुराद खान,  और हारमोनियम पर डॉ विनय मिश्र थे।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि लेफ्टिनेंट जनरल आर के सोनी तथा कलाकारों का स्वागत भाषा एवं संस्कृति विभाग की निदेशक रूपाली ठाकुर ने किया।

वीरवार को शिमला के अपने उस्ताद शुजात खान का सितार वादन है।


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1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (06-010-2017) को
    "भक्तों के अधिकार में" (चर्चा अंक 2749)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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