मंगलवार, नवंबर 21, 2017

डर को ममता की चादर क्यों पहनायी जा रही है — अभिसार शर्मा | @abhisar_sharma


अभिसार लिख रहे हैं, लगातार बोल रहे हैं, मगर क्या आप उन्हें पढ़, समझ भी रहे हैं? 
अपनी अक्ल को ख़ुद ठिकाने लगाना अक्लमंदी होती है साहब, यह रहा उनका नया ब्लॉग — कुकुर झौं-झौं से फुर्सत मिले तो पढ़ लीजियेगा
— भरत तिवारी 

बीजेपी के गब्बर सिंह  

— अभिसार शर्मा

ये डराने वाले, इतना डरते क्यों हैं? और उससे भी बड़ी बात, जिनके नाम पर ये डर फैलाया जा रहा है, वो खामोश क्यों? 


बिहार में बीजेपी अध्यक्ष नित्यानंद राय ने कहा के जो भी हाथ या ऊँगली नरेंद्र मोदी के खिलाफ उठेगी, उसे काट दिया जायेगा। सवाल ये नहीं के राय साहब ने क्या कहा। इससे बुरा, इससे बदतर गिरिराज सिंह कह चुके हैं, जब उन्होंने कहा था के मोदी का विरोध करने वाले पाकिस्तान चले जाएँ। ये प्रजातंत्र के लिए और भी खतरनाक है और महाशय अब केंद्र में मंत्री हैं। मगर नित्यानंद राय की खतरनाक बात मुझे वो लगती है जो उन्होंने उसके बाद कही। वो कहते हैं, और गौर से पढियेगा —

'जिनकी मां खाना परोसती थी, मोदी को खाना खिलाने बैठती थी, आज उस थाली के सामने मां को बेटा दिखाई नहीं देता। ऐसे हालात से उठकर एक गरीब का बेटा पीएम बना है। एक-एक व्यक्ति को उनका सम्मान करना चाहिए।'

कौन सी माँ इस बात को लेकर खुश होगी के उसके बेटे के नाम पर लोगों के हाथ काट दिए जाएँ? 
गौर किया आपने? हिंसा के साथ साथ, राय साहब ने ममता का भी ज़िक्र कर डाला। कौन सी माँ इस बात को लेकर खुश होगी के उसके बेटे के नाम पर लोगों के हाथ काट दिए जाएँ? बताइये? नित्यानंदजी को ज़रा भी शर्म नहीं आयी, ये कहने से पहले। उन्होंने प्रधानमंत्री की तौहीन तो की ही है, बल्कि पूरी ममता को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है? ममता और हिंसा एक साथ? ये कैसी वीभत्स, कैसी अश्लील सोच है? आप देख रहे हैं, ये लोग क्या कर रहे हैं? ये हमें अन्दर से ख़त्म कर रहे हैं। हमारी इंसानियत को ख़त्म कर रहे हैं। दुनिया के सबसे मासूम और पवित्र जज़्बे को इन्होने हिंसा के समकक्ष, साथ लाकर खड़ा कर दिया है।


खामोश क्यों
और बात सिर्फ नित्यानंद राय की नहीं है। क्या कहा था हरियाणा में बीजेपी नेता सूरज पाल अमु ने? दीपिका पादुकोण का सर काट दिया जायेगा। और ये बात महाशय ने एक और पवित्र नारी पद्मावती के पक्ष में कही। देख रहे हैं आप? एक महिला सम्मान में, दूसरी महिला की इज़्ज़त तार तार कर दो ... उस मारने के धमकी दे दो। ये बिलकुल वैसे है, जैसे प्रधानमंत्री की माता की बात करना और उस ममता की आड़ में लोगों के हाथ काट देने की धमकी दे डालना। ये कैसी वाहियात सोच है? अब क्या लोगों की संवेदनाओं को ख़त्म कर दीजियेगा? क्या ममता और नारी सम्मान जैसे जज़्बों को तार तार कीजियेगा?

डर को ममता की चादर क्यों पहनायी जा रही है? ताकि डर हमारी ज़िन्दगी का अभिन्न अंग हो जाये और हम अपने हुक्मरानों के डर में जीते रहें?

और सबसे बड़ी बात ... ये डराने वाले, इतना डरते क्यों हैं? और उससे भी बड़ी बात, जिनके नाम पर ये डर फैलाया जा रहा है, वो खामोश क्यों?

आखिर क्यों दीपिका पर इस अश्लील हमले पर स्मृति ईरानी, देश की सूचना प्रसारण मंत्री, खामोश हैं? ये बात मैं अपने कल के ब्लॉग में बोल चुका हूँ।

मगर गौर कीजियेगा हर तरफ क्या हो रहा है । मोदीजी के नाम पर हिंसा की धमकी और उसमे भी उनकी माँ का ज़िक्र करना। पद्मावती की अस्मिता की रक्षा के नाम पर एक और महिला की इज़्ज़त को तार तार कर देना। ये इस देश का नया सामान्य है क्या? मैं बस सवाल पूछ रहा हूँ ! जहाँ हिंसा के खौफ को बर्दाश्त किया जा रहा है, उसे मुख्यधारा में जगह दे दी गयी है। ये सब इतनी जल्दी हो रहा है के अब इसमें कोई हैरत भी नहीं होती। इस देश की जनता, इस सोच की बंधक है और हमें कोई तकलीफ भी नहीं। मज़ा आ रहा है। क्यों? मज़ा आ रहा है न? और सबसे दुखद बात यह कि कुछ पत्रकार इस सोच को अपनी लेखनी और अपनी टीवी की बहसों में जगह दे रहे हैं?


बार बार ऐसी मिसालें सामने आ रही हैं के कोई सुरक्षित नहीं है। कारवां पत्रिका की कहानी पढ़ी होगी आपने? मैं "इंडिया संवाद" के अनुवाद को आपके सामने रख रहा हूँ। कैसे एक जज की संदेहास्पद हालत में मौत हो जाती है और कोई सवाल भी नहीं पूछता। कुछ नहीं कहूंगा। बस पढ़िए ...

26 मई 2014 को दिल्ली में मोदी सरकार स्थापित हो चुकी थी और चार महीने बाद महाराष्ट्र में भी बीजेपी के हाथ सत्ता आ चुकी थी। पूरे देश में भगवा परचम लहरा रहा था लेकिन मुंबई की सीबीआई अदालत में सोहराबुद्दीन हत्याकांड के मामले में अब भी बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह के सर पर इन्साफ की तलवार लटक रही थी। इसी बीच महीने भर के अंदर यानी 30 नवंबर 2014 को सोहराबुद्दीन हत्याकांड की सुनवाई कर रहे जज बृजगोपाल हरिकृष्ण लोया की संदिग्ध हालात में मौत हो गयी।

जज लोया की मौत को सरकार से लेकर मीडिया ने दबा दिया। अगले 30 दिन बाद यानी 30 दिसंबर 2014 को जज लोया की जगह दूसरे जज एमबी गोसावी ने अमित शाह को सोहराबुद्दीन हत्याकांड के इस चर्चित कांड से बरी कर दिया।

जज लोया के परिवार ने अब इस समूचे घटनाक्रम पर गंभीर सवाल उठाए हैं। परिवार का कहना है कि जज की मौत के पीछे गहरी साज़िश है। उनके कपड़ों पर खून के छींटे थे, लेकिन गुनाहों के ये दाग हमेशा के लिए मिटा दिए गए और पूरे परिवार को अंधेरे में रखा गया।

48 वर्षीय जज बृजगोपाल की संदिग्ध मौत के तीन साल बाद उनके परिवार ने डरते-डरते जुबान खोली है। जस्टिस लोया सीबीआई अदालत में सोहराबुद्दीन शेख, पत्नी कौसर के फर्जी मुठभेड़ में हत्या के ट्रायल की सुनवाई कर रहे थे। इस हत्याकांड के केंद्र में गुजरात के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी और तत्कालीन गृह राज्य मंत्री अमित शाह थे।

परिवार का कहना है —  संदेहास्पद परिस्थितियों में जस्टिस लोया का शव नागपुर के सरकारी गेस्टहाउस में मिला था। इस मामले को तत्कालीन भाजपा सरकार ने हार्टफेलियर का रूप दिया। लेकिन कई अनसुलझे सवाल इस मौत पर आज भी जवाब मांग रहे हैं। जस्टिस लोया सुनवाई के जिस निर्णायक मोड़ पर थे, निर्णय देने वाले थे, उसकी हम हकीकत में बाद में बताएंगे। पहले जानते हैं कि उनके परिवार ने इस संदिग्ध मौत पर कौन-कौन से सवाल उठाए हैं।


परिवार के सात सवाल
1-जस्टिस लोया की मौत कब हुई, इस पर अफसर से लेकर डॉक्टर अब तक खामोश क्यों हैं। तमाम छानबीन के बाद भी अब तक मौत की टाइमिंग का खुलासा क्यों नहीं हुआ
2-48 वर्षीय जस्टिस लोया की हार्ट अटैक से जुड़ी कोई भी मेडिकल हिस्ट्री नहीं थी, फिर मौत का हार्टअटैक से कनेक्शन कैसे
3- उन्हें वीआइपी गेस्ट हाउस से सुबह के वक्त आटोरिक्शा से अस्पताल क्यों ले जाया गया
4-हार्टअटैक होने पर परिवार को तत्काल क्यों नहीं सूचना दी गई। हार्टअटैक से नेचुरल डेथ के इस मामले में अगर पोस्टमार्टम जरूरी था तो फिर परिवार से क्यों नहीं पूछा गया
5-पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के हर पेज पर एक रहस्मय दस्तख्वत हैं, ये दस्तख्वत जस्टिस लोया के कथित ममेरे भाई का बताया गया है। परिवार का कहना है-संबंधित हस्ताक्षर वाला जस्टिस का कोई ममेरा भाई नहीं है
6-अगर इस रहस्यमय मौत के पीछे कोई साजिश नहीं थी तो फिर मोबाइल के सारे डेटा मिटाकर उनके परिवार को 'डिलीटेड डेटा' वाला फोन क्यों दिया गया
7-अगर मौत हार्टअटैक से हुई फिर कपड़ों पर खून के छींटे कैसे लगे।


संघ कार्यकर्ता की भूमिका पर सवाल
जज का परिवार इस पूरे मामले में एक संघ कार्यकर्ता की भूमिका को संदेहास्पद मानता है। इसी संघ कार्यकर्ता ने सबसे पहले परिवार को हादसे की जानकारी दी। इसी कार्यकर्ता ने बाद में डिलीट किए डेटा वाला जज का मोबाइल भी परिवार को सौंपा।
ये सवाल भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की नींद उड़ाने के लिए भले काफी हों, मगर इससे बड़ा सवाल पूरी व्यवस्था की नींद उड़ाने वाला है। सवाल यह है-मौत के 30 दिन बाद नए जज ने अमित शाह को इस सनसनीखेज मामले से बरी कैसे कर दिया। यही नहीं जांच एजेंसी सीबीआई ने अमित शाह के केस में डिस्चार्ज होने के बाद चुप्पी क्यों साध ली। केस की अपील उच्च न्यायालय में क्यों नहीं की।

जस्टिस लोया की मौत का घटनाक्रम
अंग्रेजी पत्रिका कारवां से बात करते हुए जस्टिस लोया की बहन अनुराधा, भांजी नुपूर और पिता हरकिशन का कहना है- यकीन नहीं होता कि जज बृजगोपाल की हृदयगति रुक जाने से मौत हुई। परिवार का कहना है-30 नवंबर 2014 को जस्टिस लोया साथी जज स्वप्ना जोशी की बेटी की शादी में शरीक होने नागपुर आए थे। उनके रहने का इंतजाम वीआइपी गेस्ट हाउस में हुआ था। अगले दिन परिवार को बताया गया जस्टिस लोया की हार्टअटैक से मौत हो गई।

Abhisar Sharma
Journalist , ABP News, Author, A hundred lives for you, Edge of the machete and Eye of the Predator. Winner of the Ramnath Goenka Indian Express award.

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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