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एक वारांगना वीरांगना : बेगम जान — रवींद्र त्रिपाठी #BegumJaan

अप्रैल 19, 2017


फिल्म समीक्षा: बेगम जान 

— रवींद्र त्रिपाठी





निर्देशक-सृजित मुखर्जी
कलाकार- विद्या बालन, गौहर खान, पल्लवी शारदा, नसीरुद्दीन शाह, आशीष विद्यार्थी, रजत कपूर, इला अरुण, चंकी पांडे, विवेक मुश्रान
`बेगम जान’ अपना भूगोल बचाए रखने का संघर्ष है
Ravindra Tripathi
क्या एक वारांगना भी वीरांगना हो सकती है? क्या एक कोठा चलानेवाली भी एक ऐसी बहादुर शख्सियत में तब्दील हो सकती है जो अपने आत्मसम्मान और आजादी के लिए लड़ते हुए मर मिटे और उसकी राह पर कुछ दूसरे भी चलें? और हां, उसकी आजादी का मतलब दूसरा हो, वह नहीं जो हम समझते हैं।

`बेगम जान’ देखने के बाद यही सवाल मन में बार बार बजता है। वैसे इसके निर्देशक सृजित मुखर्जी ने `राजकाहिनी’ (2015) नाम से जो बांग्ला फिल्म बनाई थी `बेगम जान’ उसी का हिंदी रूप है। पर इससे इसकी अहमियत कम नहीं होती है। फिल्म उस दर्द का बयान है जो भारत-पाकिस्तान के विभाजन से उपजी थी जिसे दोनों देशों के लोग आज भी महसूस करते हैं। हालांकि ये बयान अब तक के विभाजन संबंधी दूसरे बयानों से अलग है। इसे देखते हुए बार बार मंटो की कहानी `टोबा टेक सिंह’ की याद आती है। विद्याबालन ने फिर से ऐसा किरदार निभाया है जो लोगों के जेहन में लंबे वक्त तक बसा रहेगा।
लोग देश पर इसलिए न्योछावार नहीं होते कि वे उसके बाशिंदे होते हैं बल्कि इसलिए कि जिस देश में वे रहते हैं वो उनके भीतर भी रहता है। 


फिल्म की कहानी शुरू होती है (अमिताभ बच्चन की आवाज में) भारत और पाकिस्तान के बंटवारे के उस दौर से जब सिरिल रेडक्लिफ को ये जिम्मा सौंपा गया कि वे दोनों देशों की सीमा तय करें। ये काम बहुत हड़बड़ी में हुआ और इसका एक नतीजा ये भी हुआ सांप्रदायिक तनाव बढ़ा। रेडक्लिफ रेखा भारत के पश्चिमी इलाके में जो सरहद बना रही थी उसकी जद में बेगम जान (विद्या बालन) का कोठा भी आ गया। कोठे में कई लड़कियां और औरते रहती हैं। दोनो देशों के अधिकारी हर्षवर्धन (आशीष विद्यार्थी) और इलियास (रजित कपूर) के ऊपर ये जिम्मेदारी है कि कोठे को हटाएं। लेकिन बेगम जान ये कोठा हटाने को तैयार नहीं। वो खुद दबंग महिला है और साथ ही उसे भरोसा है राजा साहब (नसीरुद्दीन शाह) पर कि वे उसकी मदद करेंगे। लेकिन हालात ऐसे हैं कि राजा साहब चाहते हुए भी ज्यादा मदद नहीं कर पाते। दोनों अधिकारी कबीर नाम के एक स्थानीय गुंडे की मदद लेते है जो ना हिंदू ना मुसलमान हैं और वक्त पड़ने पर दोनो है। अब बेगन जान क्या करे? लड़े या दोनों नए देशों की सरकारों के सामने समर्पण करे। अपने धंधे को चलाना ही उसका धर्म है। बेगम जान और उसकी साथिनें जो फैसला करती है वह वही है जो जनश्रुति में पद्मिनी और उसकी सहेलियों ने किया था।
आज भी नफरत की वो दीवार ऊंची हो रही है और हिदू- मुसलमान के बीच खाई को बढ़ाती जा रही है। 
फिल्म में कई तहें हैं। एक तो ये रेडक्लिफ रेखा के बेतुकेपन और त्रासद पक्ष की तरफ इशारा करती है। दूसरी तऱफ सामंतवाद के उस चेहरे की तरफ भी जो औरतों के लिए किसी तरह की हमदर्दी नहीं रखती है। राजा साहब वैसे तो बेगम जान की मदद करते हैं। लेकिन बेगम जान संकट में हैं तो उससे क्या चाहते हैं? उस कमसिन लड़की के साथ रात बिताना जो बेगम के यहां शरणागत है। उनका तर्क है कि बेगम के यहां की हर औरत या लड़की पर पहला अधिकार राजा का है! और राजा साहब उस लड़की के साथ रात ही नहीं बिताते बल्कि बेगम से कहते हैं कि वो उस वक्त तक पलंग के सामने गाती रहे जब तक वे रति-सुख ले रहे हैं। निर्देशक ने सलीके से ये कह दिया है कि ऐसे पतनशील राजा या सामंत किसी की रक्षा नहीं कर सकते। बेगम जान इस बात से अनजान है कि जिस राजा साहब पर उसे भरोसा है उनके जैसों के राज के दिन लद गए है। बेगम जान इतिहास के उस दोमुहाने पर खड़ी है जहां पुराना जर्जर होकर खत्म हो रहा है और नया नफरत के ऐसे बीज बोने जा रहा है जिसकी विभीषिका लंबे समय तक कायम रहेगी। आज भी नफरत की वो दीवार ऊंची हो रही है और हिदू- मुसलमान के बीच खाई को बढ़ाती जा रही है।
विद्या बालन ने फिर से ऐसा किरदार निभाया है जो लोगों के जेहन में लंबे वक्त तक बसा रहेगा। 
निर्देशक ने `ना हिंदू ना मुसलमान’ वाली बात को नए सांचे में ढाल दिया है। `ना हिंदु ना मुसलमान’ वाली बात उस कबीर के बारे में कही जाती है जो भक्त और कवि थे। लेकिन इस फिल्म का कबीर (चंकी पांडे) अलग तरह का `ना हिदु ना मुसलमान’ है। वो पैसे के लिए हिंदु का घर भी उजाड़ सकता है और मुसलमान की हत्या भी कर सकता है। इस फिल्म का कबीर जनेऊ भी पहनता है और सुन्नत भी कराए हुए है। वह बेगम जान को कोठे से बेदखल करने का ठेका लेता है और उसे अंजाम भी देता है।
फिल्म उस दर्द का बयान है जो भारत-पाकिस्तान के विभाजन से उपजी थी जिसे दोनों देशों के लोग आज भी महसूस करते हैं। 
`बेगम जान’ में एक ऐसा विर्मश है जो सार्वदेशिक है और वह यह है कि सिर्फ देशों या राष्ट्रीयताओं का ही एक भूगोल नहीं होता बल्कि एक परिवार या एक व्यक्ति का भी भूगोल होता है। ऐसा भूगोल जिसमें वह सिर्फ शारीरिक रूप से अस्तित्व में नहीं रहता बल्कि मानसिक तौर पर भी मन के भीतर बसा रहता है और इसको बचाने के लिए कुर्बानी भी देनी पड़े तो आदमी दे देता है। लोग देश पर इसलिए न्योछावार नहीं होते कि वे उसके बाशिंदे होते हैं बल्कि इसलिए कि जिस देश में वे रहते हैं वो उनके भीतर भी रहता है। देश एक भावात्मक इकाई भी है। और ये बात किसी के अपने घर पर भा लागू होती है। घर भी एक भौगोलिक क्षेत्र है। लोग बेघर बार होते हैं लेकिन उनके मन में वो घर बसा रहता है। ऐसे कई वाकये होते हैं जिसमें आदमी को दूसरी जगह बड़ा मकान भी मिले तो वहां नहीं चाहता। क्यों? क्योंकि वो नया मकान उसके भीतर नहीं बसा होता है। बेगम जान के लिए अपना कोठा सिर्फ एक व्यापार का केंद्र नहीं है। वो उसका एक ऐसा देश है जहां वो हुकूमत करती है। जहां उसका राज है। उसे इस कोठे के एवज में दूसरा मकान मिल सकता था। हिंदुस्तान में या पाकिस्तान में। लेकिन वह वहां नहीं जाना चाहती है। वह अपनी महिला साथियों के साथ जलकर मर जाना पसंद करती है लेकिन कोठे को छोड़कर नहीं जाती। फिल्म `बेगम जान’ व्यक्ति के भीतर निहित भौगोलिक अधिकार के मनोविज्ञान की कहानी भी है। कई लोग बेबसी में घर छोड़ने को विवश होते हैं, छोड़ भी देते है। पर कुछ ऐसे भी होते हैं जो अपने घर को अपनी सल्तनत मानते हुए उसके लिए मर मिटते हैं। विद्या बालन ने जिस बेगम जान के किरदार को निभाया है वह ऐसी ही है। `बेगम जान’ अपना भूगोल बचाए रखने का संघर्ष है।

'होली खेले बृज की हर बाला' और उसकी कोरियोग्राफी बहुत अच्छी है


एक और पक्ष की तरफ हमारा ध्यान जाना चाहिए। वो है वे कहानियां जिनको हम अपने घरों में नानी दादी से सुनते रहते हैं। `बेगम जान’ में नानी-दादी वाले उस किरदार को इला पांडे ने निभाया है। वो अम्मा बनी है जो बेगम जान के कोठे में एक छोटी बच्ची को लक्ष्मीबाई, से लेकर दूसरी नायिकाओं के किस्से सुनाती है। अम्मा कोठे में रहने वाली किसी औरत की वास्तविक मां नही है। बेगम जान से वाराणसी में उसकी मुलाकात तब हुई थी जब उसकी जिंदगी में जाती हादसा हुआ था। तब से वो बेगम जान के साथ है और कोठे में उन औरतों को उन वीरांगनाओं के किस्से सुनाती आई है जिन्होंने अपने राज्य या अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए संघर्ष किया और आत्म बलिदान दिया। फिल्म के शुरू में ये लगता नहीं कि आखिर ये किस्से क्यों सुनाए जा रहे हैं। लेकिन आखिर वक्त में जब बेगम जान के कोठे में आग लगा दी जाती है और वह अपने होठों पर अजीब सी मुस्कान लिए जलते हुए कोठे के भीतर जाने के लिए मुड़ती तो पहले ही ध्वनित होने लगता है कि किस्से की पदमावती की तरह वह भी अपने को अग्नि के हवाले करने वाली है। तब ये भी स्पष्ट होता है कि आखिर फिल्म में किस्से सुनाने के प्रकरण के बार-बार आने का अभिप्राय क्या है। हमारी विचारधारा को वो किस्से प्रभावित करते हैं जिनको हम बचपन से सुनते आएं हैं और जीवन में जब वह क्षण आता है कि जब कोई निर्णायक कदम उठाना पड़ता है तो उस किस्से के दर्शन या विचार की तरफ हम मुड़ते हैं और फैसला करते हैं कि करना क्या है।

फिल्म के गाने भावनाओं को गहरे में उभारते हैं। होलीवाला गाना `होली खेले बृज की हर बाला’ और उसकी कोरियोग्राफी भी बहुत अच्छी है। फिल्म के छोटे चरित्र भी अपनी खास अहमियत रखते हैं। पर सबसे बड़ी बात ये है कि अपने समग्र रूप में ये फिल्म भारत-पाक विभाजन की उस त्रासदी को उभारती है जिसका अंजाम हम अभी भी भोग रहे हैं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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