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#हिन्दी रेखाचित्र : रोहिणी अग्रवाल — दादी की खटोली में आसमान का चंदोवा

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हिन्दी रेखाचित्र : रोहिणी अग्रवाल — दादी की खटोली में आसमान का चंदोवा
हिन्दी रेखाचित्र : रोहिणी अग्रवाल — दादी की खटोली में आसमान का चंदोवा 


हिन्दी रेखाचित्र : रोहिणी अग्रवाल — दादी की खटोली में आसमान का चंदोवा 

लेकिन मां के लिए एक कोना भी नहीं। मां की निजी जरूरतों के लिए! एकांत पाकर अपने चित्त को सुस्थिर करने के लिए! बर्तनों, मटकों और लहकते चूल्हे की आंच या सीली लकड़ी के धुएं से भरी रसोई की मल्लिका मां का जीवन क्या आग जलाने और उसकी राख से बर्तन चमकाने, पानी भरने और रोटियां बनाने की कवायद में होम हो जाने के लिए है? मां के मन में अपनी निजता को थहाने के लिए क्या एक कोना एकांत पाने की इच्छा नहीं पनपती होगी? सचमुच 'अपनों' के बारे में कितना कम जानते हैं हम!

रोहिणी अग्रवाल हिंदी साहित्य में की किसी परिचय की मोहताज ‘सच में’ नहीं हैं इसलिए वह नहीं दूँगा...हाँ अगर आप उन्हें बाई चांस नहीं जानते हैं तो इस रेखाचित्र ‘दादी की खटोली में आसमान का चंदोवा’ — जिसमें नाना-नानी, दादा-दादी, गर्मी की छुट्टियों में उनके घर जाना, और बचपन के उस समय, उस घर, उस समाज और उसकी स्त्रियों का सारा का सारा ताना-बाना बुना हुआ है — को पढ़ने के बाद; यह समझते हुए पता कीजियेगा कि …. जो भी विकास होता है, उसमें पिछली पीढ़ी की उस स्त्री को नहीं भूलना चाहिए जिसकी विकासशील सोच ने उसकी नातिनों-पोतियों (नाती-पोतों को भी) को वह ऊँचाई दी जिससे वह  वह बन सके जिस पर हम आज हम गर्व करते हैं.

भरत एस तिवारी

स्मृतिशेष होती पीढ़ी की जिजीविषा और संघर्ष

दादी की खटोली में आसमान का चंदोवा


मां (दादी) आज फिर सपने में आई है।

रोज सिर पलूस कर (आशीर्वाद देकर) चुपचाप चली जाती थी कहीं। आशीर्वाद से नहाई मैं उमग कर तरोताजा उठती थी। सच कहूं, मुझे इस सपने की आदत हो गई थी। न, आदत नहीं, नशा। लेकिन रोज की तरह आज उसने सिर नहीं पलूसा। बस, मेरे संग पीढ़े पर बैठ गई। मेरी उल्टी हथेली को अपनी गोद में लेकर उभरी नसों के जाल से जाने क्या खेलती रही, देर तक। वायल के सफेद दुपट्टे को जरा सा पीछे हटा कर मैंने मां (दादी) के हड़ियल कंधे पर अपना सिर टिका दिया। फिर पता नहीं क्यों, भय और आवेश में भर कर मैं घिघिया उठी— “मां!” और कस कर मां की दुबली काया अपनी मजबूत हथेलियों में भर ली।

“पगली!” मां ने माथा सहला कर पुचकार दिया — “मैं कहीं नहीं जाऊँगी। यहीं रहूंगी? तेरे पास!”

अरे! मां क्या मन की भाषा पढ़ना जानती है? मैं विस्मित! आश्वस्त भी! हां, मां कहीं नहीं जाएगी। मैं अपनी पूरी देह सिकोड़ कर मां की गोद में समा गई। सुख को देर तक बूंद—बूंद पीती गई। फिर मां पिघलने लगी। पिघलती गई। जर्रा—जर्रा! धार—धार! पिघल कर भू्रण बन गई — नन्हा सा बीज! और मेरे भीतर गर्भ में समा गई।

मैं हड़बड़ा कर उठ बैठी। न, मां कहीं नहीं थी। बस, मैं थी, अपनी देह के अस्तर के साथ। मैंने अपनी देह को सूंघा। मां गंध बन कर पोर—पोर में महक रही थी। मैं विमूढ़ सी अपने आप से पूछती रही — मां क्या फिर से जीना चाहती है? क्यों? क्या मां अपने लोक में सुखी नहीं? अधूरी खंडित आकांक्षाओं का प्रेत क्या वाकई उन्हें भरमा रहा है? या यह मेरा अपना वहम है — एक अधूरा सपना — मां के सान्निध्य में मां के युग की स्त्री को जानने का सपना?


रोहिणी अग्रवाल
रोहिणी अग्रवाल
महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय,
रोहतक, हरियाणा
मेल: rohini1959@gmail.com
मो० : 9416053847
'संतोष बी.टी. कर ले, बस। नौकरी करना कोई जरूरी नहीं, पर कभी नौकरी की जरूरत पड़े तो किसी का मुंह क्यों तके? दुनिया भर की लड़कियां नौकरी करती हैं। बुराई भी क्या है?' लेकिन लाहौर—जालंधर जाकर पढ़ाई करने वाले बेटों ने 'वीटो' कर दिया, 'नहीं, हमारे घर की लड़की रोज ट्रेन में दो—दो स्टेशन पार कर बठिंडा नहीं जाएगी। लड़कियां घर बैठी ही सोहती हैं।' मैं सोचती हूं, मां की उफनती चुप्पी में विवशता और अपमान से ज्यादा क्या भितरघात की पीड़ा नहीं रही होगी? पढ़े—लिखे बेटों में उनका अपना बाप!! हिन्दी रेखाचित्र : रोहिणी अग्रवाल — दादी की खटोली में आसमान का चंदोवा 

मां (दादी) के साथ मेरा अहसास का सम्बन्ध है — संवेदनात्मक स्पर्श के सहारे चुप्पियों की गहरी नींव पर टिका। हमने बहुत कम समय साथ बिताया है, लेकिन उन साझे लम्हों में जहां हम दोनों मिलते थे, वहां संवाद के लिए शब्दों का आसरा लेना बेहद भोंडा लगता था। सच कहूं तो एक टूरिस्ट के रोमांच, उत्तेजना और उत्साह के साथ सालाना ट्रिप पर हम दादके—नानके आया करते थे। हम माने हम चारों भाई—बहन और मम्मी। स्कूल की गर्मी की छुट्टियों के बाहर बिताए जाने वाले पैंतीस दिनों में बीस दिन मानसा (नानके) और पंद्रह दिन जैतो (दादके) के लिए सुनिश्चित थे। अमूमन हम पहले मानसा जाते क्योंकि मामा हमें लिवाने आते थे। आज सोचती हूं तो समझ नहीं पाती कि राजस्थान की सीमा से लगते दक्षिणी हरियाणा के पिछड़े और बेहद छोटे डिस्ट्रिक्ट हैड क्वार्टर नारनौल से पंजाब की उतनी ही पिछड़ी—सोई 'मंडियों' में जाने की कल्पना से ही हम क्यों रोमांचित हो जाया करते थे? इसलिए कि चेंज और मोबिलिटी के नाम पर दादके—नानके की यात्राओं के अलावा और कोई विकल्प ही नहीं था उन दिनों? लेकिन नानके में मेरा दिल नहीं लगता था। पढ़ने के लिए वहां न कहानियों की किताबें, न नंदन—पराग—चंदामामा (बाद में साप्ताहिक हिंदुस्तान—धर्मयुग) जैसी पत्रिकाएं। ट्रांजिस्टर पर विविधभारती के गाने या इतवार को आने वाले रेडियो नाटक सुनने तक की सहूलियत नहीं। लंगूर सेना में शामिल होकर यहां—वहां धमाचौकड़ी मचाना मुझे पसंद नहीं था। मम्मी या मासी के साथ रिश्तेदारों के घर जाना तो और भी नापसंद। वहां बाकायदा हम बच्चों की नुमाइश लगाई जाती। कभी नर्सरी राइम्स सुनाने की बाध्यता तो कभी अंग्रेजी ज्ञान की परीक्षा। पास हो जाओ तो हमारे बोलने के लहजे की ही खिंचाई — “हाय! एनूं तां पंजाबी ही नईं बोलणी आंदी। किंवे हिंदी विच पंजाबी बोलदी है। हरयाणे दी जट्टणी है, जट्टणी!” नानके जाना मेरे लिए हमेशा यातनाप्रद अनुभव रहा है। किताबी कीड़ा और नकचढ़ी कह कर सभी ने वहां मेरा बायकाट कर रखा था। जैतो के मुकाबले नानके का घर समृद्ध था। मॉडर्न भी। रहन—सहन अपेक्षाकृत काफी उन्नत। यह अभिमान वहां के बाशिंदों में था या नहीं, मैं नहीं जानती, लेकिन पता नहीं क्यों जब भी वे हल्केपन से 'जैतोवालों' का जिक्र करते, मैं अपमान से तिलमिला जाती। बड़ों का संग मुझे सुरक्षा देता था। इसलिए अकेली होती तो मम्मी और मामी—मासी की महफिल में उपेक्षित अतिथि सी बैठ जाती या फिर मांजी (नानी) के पास। रूई की पूनी में से सूत की तार निकलते देख उछाह से भर उठती, “मांजी, मैं भी चरखा कातूंगी।” विधवा मांजी अनसुना कर देतीं। न हां, न ना! उनके लेखे मैं वहां होती ही नहीं थी। बोलते रहो, जो भी, उनकी बला से।

जाहिर है जिस दिन जैतो जाने के लिए रेलवे स्टेशन जाते, मेरे पैरों पर पंख लग जाते। सशरीर पहुंचने से पहले ही मैं 'अपनी' हवेली का चप्पा—चप्पा छान आती — बड़ा सा भारी—भरकम किवाड़ खोलते ही बाईं तरफ बैठक, दाईं तरफ बड़ी—बड़ी दो खुरलियां (नांदें) और जुगाली करती तीन गउएं। बीच में ड्योढी जिसके एक कोने में मूंज की चारपाई पर तहा कर रखा बाबा जी (दादा) का बिस्तर, हुक्का और खूंटी पर लटकता कोट। फिर एक छोटा सा फाटक और सामने बड़ा सा चौक। बाईं ओर बालन (ईंधन) वाला कोठा, दोहरी रसोई (मां की मिल्कियत); बाईं ओर ऊपर चढ़ती सीढ़ियां, फिर हैंड पम्प, बाथरूम और स्टोर (जो बाद में ताई का बाथरूम कम स्टोर रूम बना)। फिर बरामदा। बरामदे के बीचोंबीच रखा लकड़ी का भारी—भरकम बेंच (जिस पर हम बारह बच्चे एक साथ बैठ जाया करते थे)। बरामदे के दोनों ओर कमरे जितनी लम्बाई—चौड़ाई के आठ इंच ऊँचे दो प्लेटफार्म। एक ताई के कब्जे में, उनकी रसोई के लिए और दूसरा मां का जिसे सभी अजायबघर कहते थे — चरखा, चक्की, अचार के मर्तबान, तीन—चार ट्रंक, गठरियां—पोटलियां .. और और भी न जाने क्या—क्या। हां, एक कुर्सी भी! और उसके साथ सटे छोटे से गोल मेज पर बड़ा सा ग्लोब! मां के प्लेटफार्म के पास दो तूड़े (भूसा—चारा) वाले कोठे। ताई की रसोई की तरफ एक लम्बा सा अंधेरा कोठा। इसके दोनों तरफ एक—एक पलंग, मेज—कुर्सी। और अंदर की तरफ जाओ तो एक छोटी सी खटोली भी। फिर चार बड़े—बड़े भारी तालाबंद संदूक — एक मां का, एक ताई का, एक मम्मी का और एक चाची का। फिर एक छोटा सा दरवाजा, जैसे गुफा का मुंह हो। झुक कर इसके भीतर प्रवेश करो तो बेहद अंधेरी गुफा जैसी कोई लम्बी सी सुरंग। दोनों तरफ अनाज से ठसाठस बोरियां और कहीं बोरियों के बीच दरार में से झांकती बाबा जी की पालतू बिल्लियों की चमकती आंखें। (इन बोरियों के बीच बिल्लियों के लिए दूध की कटोरी और रोटियां रखने के लिए हम बच्चों में कितनी होड़ मचती थी। तौबा!) फिर एक भारी सा दरवाजा। अक्सर उढ़काया हुआ। इसे खोलो तो उजाले का सैलाब आंखों को चौंधिया देता था। इस दरवाजे के पार मानो दूसरी ही दुनिया थी। साथ—साथ सटी दो दुकानें, गद्दी और तिजोरी — बाबा जी का साम्राज्य! और दुकानों के बाहर आढ़त मंडी। नीचे बस इतना ही। सीढ़ियां चढ़ कर ऊपर जाओ तो कई—कई चौबारे। ज्यादातर तालाबंद। लेकिन सब के सब चाचाओं को अलॉटेड। या फिर ताया जी के परिवार का वास।

'अरे! मां का कमरा! मां कहां सोती होगी? सर्दियों में? बरसात में?' हम गर्मियों में जाते थे और सब छत पर सोते थे। एक के साथ एक सट कर बिछी पन्द्रह चारपाइयां और कोने में मां की छोटी सी पलूंगड़ी! तब सोचा ही नहीं कभी, लेकिन आज जब वह 'अभाव' 'दीखा' तो अचरज टीस बन कर भीतर तक उतर गया। इतनी बड़ी हवेली में सबके लिए जगह है — गाय—बिल्लियों के लिए। बोरियों के लिए भी, लेकिन मां के लिए एक कोना भी नहीं। मां की निजी जरूरतों के लिए! एकांत पाकर अपने चित्त को सुस्थिर करने के लिए! बर्तनों, मटकों और लहकते चूल्हे की आंच या सीली लकड़ी के धुएं से भरी रसोई की मल्लिका मां का जीवन क्या आग जलाने और उसकी राख से बर्तन चमकाने, पानी भरने और रोटियां बनाने की कवायद में होम हो जाने के लिए है? मां के मन में अपनी निजता को थहाने के लिए क्या एक कोना एकांत पाने की इच्छा नहीं पनपती होगी? सचमुच 'अपनों' के बारे में कितना कम जानते हैं हम! वक्त रहते कितना कम सोचते हैं उनके बारे में! कुछ 'करने' का सवाल तो शायद कभी उठता ही नहीं।

   मां को देखने की 'नजर' बहुत बाद में अर्जित की मैंने। तब, जब स्मृतिशेष बन कर मां जा चुकी थीं।




लेकिन उस बार जैतो जाने के लिए मां नहीं, मां का चरखा ज्यादा आकर्षित कर रहा था। मांजी की शिकायत कर मां से चरखा हथियाना मुझे अच्छा नहीं लगा। यूं भी 'चुप्पा' मां से अंट—संट बोलने की हिम्मत कोई नहीं करता था। मैंने बस इतना किया कि चरखे के पास जाकर बैठ गई। चरखे पर धूल की परत चढ़ी थी। चरखे के पास बोहिया (चंगेर/टोकरी) खाली। न पूनी, न कते सूत का गलोटा। खाली चरखे को घुमाने से कताई का जादू नहीं फूटता। मैं उदास उठने को हुई कि मां ने बैठा दिया — 'चरखा कातना है?'

'हां ...नहीं ...पर पूनी तो है नहीं।' मैंने तकली पर प्यार से उंगली फेर दी। नई आस से तकली जगमगा गई। मां ने प्लेटफार्म पर पड़ी अनगिन पोटलियों में से पूनी निकाली, हाथ से सूत की तार निकाल कर तकली पर चढ़ाई और चरखे को घूं—घूं चला दिया। सूत की महीन डोर तनती गई और चुपके से पूनी मेरी उंगलियों के बीच सरका दी जैसे थपक—थपक कर सुलाते बच्चे को हौले से बिस्तर पर लिटा कर मां तकिए की टेक लगा दे कि उसी में मां के स्पर्श का अहसास पा बच्चा नींद की मीठी दुनिया में खेया रहे। मैंने एक बार नहीं, तीन बार तकली को मोड़ कर खराब कर दिया। मां मुस्करा कर उसे ठीक करती रही, बस। मेरा हौसला बढ़ गया। पूछ लिया — 'मां, तू चरखा क्यों नहीं कातती?'

'मुझे अच्छा नहीं लगता।'

'क्यों? मेरे मांजी तो खूब चरखा कातते हैं।'

मां की बुझी आंखें एक लम्बी सांस के साथ बंद हो गईं — 'चरखा कात कर मैं अपना दिल नहीं बहलाना चाहती, धीए। मैं कुछ और करना चाहती हूं।'

मैं सिटपिटा गई।  ये ल्लो! मैं जो कुछ भी करती हूं, दिल बहलाने के लिए और मां कहती है ...तो क्या मैं गलत हूं?
'गांधी बाबा ने औरतों को चरखा थमा कर अच्छा नहीं किया। वे तो वहीं की वहीं बैठी रह गईं और वक्त आगे निकल गया।'

पूनी से सूत निकालते मेरे हाथ वहीं थम गए। बात बिल्कुल भी समझ नहीं आई। बस, इतना भर पता चला कि मां उदास है। मां को चरखा कातना अच्छा नहीं लगता। मां कुछ और करना चाहती है। क्या? क्या?? पता नहीं।

मां को खुश करने के लिए मैं क्या करूं?

'गांधी बाबा तो बड़े गियानी—ध्यानी थे। उन्हें जानना चाहिए था कि चरखा कातने से औरत की जून में फर्क नहीं पड़ता। फर्क पड़ता है पढ़ने से।' मां अपनी ही रौ में बुदबुदा रही थी।

मुझे रास्ता सूझ गया। एकदम उछल कर भाग खड़ी हुई — 'अभी आई मां, कहीं जाना नहीं।' और सीधे चौबारे जाकर किताबों के समंदर से अपनी पसंद की किताब छांट लाई। 'सिंदबाद की साहसिक समुद्री यात्राएं'। पीढ़े पर बैठी मां को ससम्मान वह किताब थमा दी — 'मां, इसे पढ़ ले। किताबें पढ़ने से सारा दुख दूर चला जाता है। हम अकेले भी नहीं रहते।' मैंने अपना अर्जित ज्ञान बघारा। शान के साथ। किताबी कीड़ा तो मैं ही थी न! मेरी उपलब्धियां किसी और का अनुभव कैसे हो सकतीं थीं! मां ने उमग कर किताब सीने से लगा ली। फिर हौले—हौले खोला। पन्नों पर दुलार से हाथ फिराया और तस्वीरें देखने लगी। मैं रनिंग कमेंट्री करने लगी — 'यह सिंदबाद है, जहाजी के कपड़ों में। यह देख जहाज। सच्ची मां, मैं एक दिन जहाज में सारी दुनिया का चक्कर जरूर लगाऊँगी। ...लेकिन मैंने अभी तक समुद्र भी नहीं देख है। तूने तो देखा होगा न! तेरे जितनी उम्र में सारी दुनिया घूम आऊँगी, देख लेना। ...तू चलेगी मेरे साथ?'

मां मीठी हंसी हंस दी और अगली तस्वीर पर उंगली धर दी — 'यह?'

“यह ...ये सारे लिलिपुटियन सिंदबाद पर तीरों की वर्षा कर रहे हैं ...यह जो दैत्य लड़की की हथेली पर खिलौना है न ...यह खिलौना नहीं, अपना सिंदबाद है ...लेकिन मां, तस्वीरें देखने में मजा नहीं आता। तू पढ़ न!' मैं अधीर हो उठी।

“मुझे पढ़ना नहीं आता।” मां का चेहरा काला हो गया था। “हमारे जमाने में लड़कियां स्कूल जाने लगीं थीं, पर मुझे नहीं भेजा किसी ने।”

....

“ तू मुझे पढ़ना सिखाएगी?”

[]


हां, यही है मां की हूक! अधूरी आकांक्षा! मां ने अपने सातों बेटों को खूब पढ़ाया। इतना कि सातों ने मिल कर बारह एम.ए.कर डालीं। टीचर—प्रोफेसर से लेकर आई.ए.एस.अफसर बनने तक की सारी सीढ़ियां चढ़ डालीं। लेकिन सातों मिल कर मां के कपाल में लिखी निरक्षरता के अभिशाप को नहीं बदल पाए। नहीं, बहुत गलत कह रही हूं मैं। मां तख्ती—स्लेट लेकर पहला हरफ सिखाए जाने के इंतजार में ललकती बैठी रही और वे सातों लाल अपनी आंखों में बड़ी दुनिया का बड़ा सपना लिए मां की अदना सी दुनिया से दूर होते चले गए। मां की टेर सुनने की फुर्सत ही कहां? ग्लोब देकर मां को बूंद सी लंका के सहारे हिंदुस्तान देखना सिखा दिया...और आड़ी—तिरछी रेखाओं के जाल में उलझी मां जान ही नहीं पाई कि लंका से हिंदुस्तान में घुसो तो किस दिशा में कितना चल कर जैतो पहुंचा जा सकता है।


बहरहाल उस घटना के बाद मां के साथ मेरा 'बहनापा' गहराने लगा था। हौले—हौले! साल दर साल!

आज हैरत में भर कर सोचती हूं, हम दोनों ने अपनी बनाई हदबंदियों को एक—दूसरे के लिए ही क्यों तोड़ा? क्या मां मुझमें अपना अक्स देखती थी? क्या मैं मां के जड़ अतीत का गत्यात्मक भविष्य थी? हममें कुछ समानताएं तो थीं ही — एक से जिद्दी उफान के साथ। अपने नजरिए से दुनिया देखने की ललक। ताकत भी। मां ने कभी करवा चौथ का व्रत नहीं रखा। न ही अपनी बहुओं पर कभी कोई व्रत—तयोहार, नीति—नियम लादा। सबको छूट थी — 'जो अच्छा लगे, करो। पर रहो शांति से। मिल—जुल कर। मनों में मैल हो तो कैसी परंपरा! कैसी जिंदगी!' बड़ी ताई ने रसोई अलग की तो मां ने गृहस्थी जुटाने में बढ़—चढ़ कर मदद की। मम्मी बताती हैं, सास बन कर मां ने कभी उनका रास्ता नहीं रोका। मम्मी की सम्पन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि और ऊँची पढ़ाई के कारण बाबा जी उनका आदर करते थे। एक बार जूठे बर्तनों का ढेर मांजते देखा तो आग बबूला हो गए। फरमान जारी कर दिया — 'मदन की बहू कपड़े—बर्तन का काम नहीं करेगी।' मां ने न नाक—भौं सिकोड़ी, न भृकुटि तानी। जूठन मलने का जिम्मा लेकर बहू का ठसका बनाए रखा। मम्मी ने ससुराल में बस दो ही काम किए— कुनबे का खाना बनाया और सिलाई—कढ़ाई—बुनाई का 'अभिजात' काम किया। सुघड़ गृहिणी की पदवी पाई, सो अलग।



एक किस्सा बेतरह याद आ रहा है। हर साल की तरह इस बार भी गर्मी की छुट्टियों में घर आए हुए थे। बिरादरी में किसी की शादी थी या शायद कोई जश्न। रात को खाना खाने के बाद लड़कियां और स्त्रियां आंगन में बैठी थीं। मेंहदी लगाने का आयोजन चल रहा था। बुआ और ताई ने हथेली पर चम्मच भर घुली मेंहदी रख कर मुट्ठी भींच ली। इससे जो डिजाइन बनता था, उसे 'छल्ले' कहा जाता था। चाचा जी की बेटियां — मिनी और प्रतिभा — पटियाला शहर की थीं। उन्हें यह 'देहाती' हरकत अच्छी नहीं लगी। वे मोमजामे की कुप्पी बना कर उसमें मेंहदी भर रहीं थीं। परिवार की लड़कियां कतार बना कर उनके सामने बैठीं थीं। सभी अपनी हथेलियों पर शहरी लड़कियों की तरह महीन डिजाइन वाली मेंहदी लगवाने को उत्सुक थीं। पहली बार छल्ले नहीं, बेलबूटियां! दुलारी चाची का सीना गर्व से फूला था। मम्मी का चेहरा बुझ गया। वे जिंदगी में कभी दूसरे नम्बर पर नहीं रही थीं और उनकी बेटी हर जगह फिसड्डी! 'किताबें तो कोई भी पढ़ ले। हुनर सीखे बिना लड़कियों की कदर होती है कहीं?' उन्होंने आह भरी। मां और मैं हम दोनों चुप रहीं। मैं कतार में भी नहीं बैठी। अच्छा हुआ कि हम दोनों को हथेलियां रंगना बेहद नापसंद था क्योंकि किसी ने हमसे मेंहदी लगवाने का आग्रह भी नहीं किया।

क्या एक सहमत चुप्पी के साथ यह हमें आउटकास्ट करने का बड़बोला फैसला नहीं था?

अगली सुबह रात का ही 'कन्टीन्यूम' थी। ग्यारह बजे के करीब मनिहारिन रंग—बिरंगी चूड़ियों के भारी—भारी लच्छे लिए आ पहुंची। नए डिजाइन की महंगी चूड़ियां डिब्बियों में थीं। मनिहारिन को खुले दिल से हुक्म दिया गया — सभी की दोनों कलाइयां मनपसंद चूड़ियों से भर दो। मेरी बारी आई तो मैंने सदा की तरह हाथ पीछे कर लिए। मम्मी ने सदा की तरह दांत पीसते हुए मेरी बाहें मरोड़ दीं। रात का गुस्सा ताजा होकर दूने वेग से बरसा था। “न शकल सूरत, न सफेद रंगत। जटूरियां बिखेर कर ऊँटनी सी घूमती रहेगी। ऊपर से जट्टणियों जैसा बोल! रहना—सहना नहीं सीखेगी तो कैसे बेड़ा पार लगाऊँगी इसका?”

मां अपनी किसी बहू से टकराती नहीं थी। लेकिन इस बार चुप नहीं रह पाईं। ढाल बन कर मुझे अपनी गोद में खींच लिया — “पढ़ाई को न कोस, बहू। शुकर मना कि अपने खानदान में यह पहली लड़की है जिसने पढ़ाई की कदर की है। पढ़ाई किसी को बरबाद नहीं करती। देखना, एक दिन यही लड़की तेरा नाम रोशन करेगी। अफसर बनेगी, अफसर।”

लेकिन मैं अफसर नहीं बनी। बनी लैक्चरर। हंस कर कहा — “मां, तेरी भविष्यवाणी गलत हो गई। मैं अफसर नहीं बन पाई।” मां ने लाड़ से मेरे सिर पर चपत लगा दी — “अफसर नहीं तो और क्या है तू? कुर्सी पर बैठ कर हुक्म चलाने वाला अफसर नहीं होता। अफसर होता है वह जो अपनी मर्जी से जिंदगी जीता है; अपने फैसले खुद लेता है; फैसले के अच्छे—बुरे नतीजे की जिम्मेदारी खुद कबूल करता है। भेड़ की तरह चलने वाले अफसरों को मैं अफसर नहीं मानती।”

मैं श्रद्धा से नत हो आई। सचमुच, मां कितनी गहरी बात करती है। कहने को अनपढ़ और तिरस्कृत औरत। मुझे पहली बार मां को 'तू' कहना बहुत नागवार गुजरा। नहीं, मैं इस दलील को नहीं मान सकती कि जिसे बहुत अपना मानते हैं, अभिन्न और आत्मीय — उसे ही तू कह कर बुलाते हैं। मैंने परतों में लिपटे सच को देखा है — तू और आप का सम्बोधन इंसान की हैसियत से जुड़ा है — पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक हैसियत। औरत हो तो पति की हैसियत के अलावा उसके प्रति पति और परिवार के व्यवहार को कसौटी बना कर उसकी हैसियत तय की जाती है। अलबत्ता परंपरा का विरोध करती औरत की हैसियत मापने के लिए किसी भी मानदंड का प्रयोग नहीं किया जाता। उसे सर्वसम्मति से खारिज कर दिया जाता है — तिरस्कृत नहीं, दंडित। कसे जाने की कसमसाहट को भीतर ही भीतर समेट कर मां ने अपनी सीमारेखाओं का उल्लंघन कभी नहीं किया था। वह कर्त्तव्यनिष्ठ पत्नी थी, त्यागमयी मां। अपने 'होने' को महसूस करती थी, इसलिए अदृश्य कर दिए जाने की नियति को लेकर जीने की यंत्रणा उसे तिल—तिल कर गलाती गई। बच्चों और परिवार के अलावा जिंदगी में उसके लिए कुछ और भी था — उसका अपना 'मैं'। इस 'मैं' में कुछ सपने थे, कुछ आकांक्षाएं; घेरेबंदियों को तोड़ कर आकाश तक दौड़ने की ललक ...देश और दुनिया से जुड़ने की लालसा ...चाहती थी कि पटरियों पर दौड़ती रेल के संग—संग दौड़ कर लंदन की महारानी को देखने लंदन पहुंच जाए ...आदमियों पर हुकूमत कर पूरे संसार में अपने नाम का सिक्का चलाने वाली यह रानी क्या उनसे बहुत अलग होगी?  ...लेकिन कैसा लंदन? कैसी महारानी? उसने तो गांधी बाबा को भी नहीं देखा। न ही नेहरू को। नेहरूजी तो जैतो आए भी थे, किसी जलसे में ...सब गए थे। बस, औरतों को ही जाने की मनाही थी।

मां के भीतर भांय—भांय करता सन्नाटा था!

सन्नाटे में टंगे अनुत्तरित सवाल!

अपने अकेलेपन को टेरती अकेली गूंगी आवाज!

मैंने पूछ ही लिया उस दिन — “मां, तुझे सभी तू कह कर बुलाते हैं — तेरे बेटे—बेटी, पोते—पातियां। बुरा नहीं लगता?” बरसों की आदत! मैं चाह कर भी 'आप' कह कर सम्बोधित नहीं कर पाई।

मां चुप रही। इस बात का भला जवाब भी क्या था? सवाल भी सवाल कहां था? सिर धुन—धुन कर पीछे लौटता मेरा नपुंसक आक्रोश ही तो था — श्रद्धा के आवरण में लिपटा — एक क्षणिक प्रतिक्रिया भर! पर उस समय मानो यही मेरे लिए दुनिया भर का अहम सवाल! मैंने 'चुप' को फिर कोंचा — “मेरे मांजी को सभी 'जी' और 'आप' कहते हैं, और तुझे 'तू'। क्यों?

  मां हंस पड़ी, विषादयुक्त हंसी — “तेरी नानी ठेकेदारनी है। बड़े रुतबे वाली बड़ी औरत! उसके आगे मेरी क्या बिसात!” फिर राजदार होने की प्रक्रिया में अंतर्मुखी हो गई — “मां भी कहां? घर की बड़ी—बूढ़ियों की देखादेखी पहले सब पुन्नी कहते थे — तेरा प्यो (पिता), ताये—चाचे! सब नाम लेते थे। फिर जब बड़े हुए, प्रकाश लाहौर जाकर कॉलेज में पढ़ने लगा, ऊँचे घरों के शहरी लड़कों से उठना—बैठना हुआ तो मां कहना शुरु कर दिया। कहता था, वहां मां को नाम से बुलाना जहालत की निशानी मानी जाती है। तो धीए, इस तरह मैं पुन्नी से मां बन गई। लेकिन तेरे बाबा जी को आज तक उन्होंने बाई जी (पिता के लिए प्रयुक्त सम्बोधन) कह कर नहीं पुकारा। मेहर (दादा जी के बड़े भाई) के बच्चों की तरह अब तक चाचाजी कहते हैं। एक बार बाई कह कर पुकार लेते तो भगत (दादा जी को सभी भगत कहते थे) के कलेजे में कितनी ठंड पड़ जाती, मैं जानती हूं।” मां की आंखें पनीली हो आईं — “घर के मर्द बाप बन जाते थे, लेकिन बड़े—बुजुर्गों के सामने बाप कहलाने में शर्माते थे। ब्याह करके दूसरे घर की धी ले आते थे, लेकिन बिरादरी के सामने उसकी शकल देखने में कतराते थे। फिर नेह—नाता जोड़ने की ताकत कहां से आती? ऐसे ही नजर चुराते, मुंह छुपाते जिंदगी चली गई, लेकिन चल कर एक डग रास्ता भी नहीं नापा।” आत्मलीन मां अपने खोल से बाहर लौट आई — “कुछ नहीं, सब चलन की बातें हैं धीए। चलन को बदलने के लिए उम्रें बीत जाती हैं। फिर भी क्या पता बदले कि नहीं।”

'अपूठी चाल चलो तो दुनिया का चलन बदल ही जाता है, मां। बदलना पड़ता है दुनिया को। जिद में सबको अपने साथ आगे ले जाने का हौसला हो तो सब पुराने कायदे—कानून टूट जाते हैं।' नहीं, मां को बताने की जरूरत नहीं। अपनी तमाम संशयात्मकता के बावजूद वे आश्वस्त थीं कि वक्त बदलेगा। इस बदलाव के लिए तरह—तरह के प्रयोग करते हुए उन्होंने धर्म के साथ भी भरपूर छेड़छाड़ की थी। साक्षी है हम बच्चों की पूरी फौज कि मंगलवार को हनुमान भगवान के प्रसाद में 'मन्नी' (गुड़ की मीठी रोटी) बनाने की परंपरा निभाती मां परिवार के पुरखों के प्रसाद में हमारी फरमाइश पर टॉफियां बांटने में कोई संकोच नहीं करती थी।

अभी कुछ साल पहले अपने बीते वक्तों का लेखाजोखा कर रही थी तो ख्याल आया — दूसरे परिवार की मिट्टी में अपने को रोपने की बाध्यता में मैं अपनी जड़ों को अनदेखा क्यों करती जा रही हूं? मेरी जड़ों में लिपटा है मेरे कुटुम्ब का अतीत, सम्बन्धों का संजाल, सामाजिक—आर्थिक स्थिति जो आदत और संस्कार बन कर मेरे व्यक्तित्व में आ विराजी है, संवाद और संवेदना का अनवरत प्रवाह जो जैनेटिक ट्रांसमिशन से कहीं अधिक संवेदनशील और सशक्त है ...इन्हीं जड़ों की बदौलत रीढ़ की हड्डी को सीधा तान मैं दूसरे परिवार में अपनी वंशबेल बढ़ा रही हूं। फिर क्यों नहीं सींचती इन जड़ों को — एक आंतरिक नमन के साथ? गुपचुप अकेले नहीं, सबके साथ, सबकी साझी पारिवारिक निष्ठा के साथ? जैतो में हमारी पुश्तैनी बगीची है। बगीची के एक हिस्से में परदादा, उनके पिता और कई कुटुम्बजनों की मढ़ियां हैं। बचपन में वहां जाकर हम दीया जरूर जलाया करते थे। अब उस बगीची में मां और बाबा जी की मढ़ियां भी हैं और उनकी याद में हर वर्ष पूरे कुटुम्ब का वार्षिक समागम वहां होता है। मैंने ऐलान किया — “मैं उस परिवार की बेटी हूं। क्यों नहीं अपने पुरखों को श्रद्धांजलि अर्पित करने जाऊँ?” तब से मैं सपरिवार अमूमन हर साल बगीची जाती हूं। यही नहीं, मां की परंपरा का निर्वाह करते हुए हर वीरवार अपने पुरखों की याद में दीया जला कर प्रसाद भी बांटती हूं। अक्सर टॉफियां! या आइसक्रीम! कभी—कभी पेस्ट्री भी! मां कभी किसी टैबू को नहीं मानती थी न!

मां मेरी स्मृतियों में जीता मीठा अहसास भरा स्वाद बनी रहतीं, अगर अंशु — मेरे बेटे — ने मुझे अपने पार जाकर 'दूसरे' को देखने की नजर न दी होती। उस बार हम तीनों जैतो गए थे। सबसे पहले हवेली! मेरे बचपन की पोटली वहीं पड़ी थी न! मचलते आवेग के साथ मैं हवेली का हर कोना—अंतरा दोनों बाप—बेटे को दिखा देना चाहती थी। किस्सों में बंट—बंट कर अनंत हो गए मेरे उछाह को वे अनुराग भरी हंसी के साथ भीतर जज्ब करते गए। बगीची पहुंचे तो उतने ही आदर—मान के साथ पुरखों की मढ़ियों (समाधि) पर दीया जला कर मत्था टेका। सबसे आखिर में हम बाबा जी की मढ़ी पर आए। अगल—बगल दो मढ़ियां! बाबा जी के नाम की प्लेट — भगत रुलदू राम! अंशु ने पूछा — “और नानू मां की मढ़ी?” तीन बरस की उम्र में नानू—मां (मेरी दादी) के साथ बिताए कुछ माह उसकी स्मृतियों में सदा जीवित रहे हैं। उसके चेहरे पर 'जानी पहचानी' 'अपनी' नानू मां की गोद में बैठने का भाव पुलक भरी चमक के साथ कौंध गया — “नानू मां की मढ़ी कहां है?” स्वर में आतुरता!

“इधर।“ मैंने इशारा किया, बाबा जी के बगल वाली छोटी सी समाधि की ओर। उसने झुक कर एक और दीया जला दिया। मुट्ठी भर फूल बिखेर कर दोनों हाथ जोड़ दिए — एक बार फिर। अब परिचय से भर कर।

बगीची से लौटते हुए पूछा — “नानू मां की मढ़ी पर औरों की तरह नेमप्लेट क्यों नहीं है?”

“वंशवृक्ष में स्त्रियों के नाम नहीं लिखे जाते। शायद इसलिए।” मैंने बात को ज्यादा तवज्जो नहीं दी।

“आपको यह डिस्क्रिमिनेशन अटपटा नहीं लगता?”

“परम्परा है भई, इसमें कोई क्या कर सकता है?”

“यह बात आप कह रही हैं?” एक गहरी तरेर के साथ उसने मेरी ओर ताका। मैं पानी—पानी हो गई। आधुनिका बनने का स्वांग और एक मुकम्मल मानवीय दृष्टि नहीं!

रास्ते भर सोचती रही, मां का विस्तार बनते—बनते मैं रपट कर कहां गिर पड़ी? लीक पीटती दिनचर्या में फिरकनी सा घूमने के बावजूद मां निःसंग होकर अपने को देख पाईं थीं, इसलिए परिवेश और 'दूसरों' की संगति में निरंतर एक—दूसरे की जांच करने की मानवीय संवेदना पा सकीं। और मैं ....अपने ही क्षुद्र बड़प्पन और जरूरतों में लिथड़ी ...नहीं, केन्द्र में स्वयं अपने को रख कर 'मनुष्य' को नहीं जाना जा सकता। मां के केन्द्र में थी सीमाओं का अतिमक्रण करने की तड़प — वह तड़प जो चेतना और प्रेरणा की मशाल जला कर दूसरों की राह रोशन करे।

साल दर साल गाढ़े होते रिश्ते के बीच मैंने देखा था, काम निबटते ही मां रसोई से भाग कर ऊपर चौबारे में आ जातीं। किताबों के ढेर में से यह—वह किताब उठा कर सूंघतीं—खोलतीं। कभी मुझे दिखा कर नाम पूछ लेतीं। “माय एक्सपेरिमेंट्स विद ट्रूथ। सत्य के प्रयोग। गांधी जी की आत्मकथा।” मैंने किताब का टाइटल बताया।

“मैं भी आत्मकथा लिखना चाहती हूं।” मां ने रुक—रुक कर, लेकिन सधे स्वर में कहा।

मैंने चौंक कर सिर उठाया। मां इतनी दृढ़ता से तो कभी नहीं बोलती। “तेरे पास आत्मकथा लिखने के लिए क्या है मां? आत्मकथा लिखने के लिए जिंदगी जीनी पड़ती है, लम्बी—चौड़ी—फैली जिंदगी।” मैं कुछ ज्यादा ही नाटकीय होकर बोली — “घर में बैठे रहने से जिंदगी नहीं जी जाती।”

“लेकिन धीए, मेरी बंधी जिंदगी में भी बहुत गहराई है। बहुत फैलाव। पेड़ की तरह जो जड़ें फैला कर नीचे पाताल तक भी पहुंच जाता है, और शाखाएं ऊपर उठा कर आसमान को भी छूने लगता है।”

मैं निर्वाक्!

“तू मुझे लिखना सिखाएगी?” मां के फौलादी स्वर में फरियादी की कातरता घुल आई, फिर से। फरियाद, जो कभी किसी ने नहीं सुनी। नहीं, मैं फरियाद 'न सुनने' के अपराध की अपराधी भर नहीं, मैंने आत्मकथा लिखने की संभावनाओं की हत्या की है — आत्मकथा के जरिए पन्नों पर उभरने वाली जिंदगी के आंसू और मुस्कान, सपनों और संघर्षों की हत्या; एक पूरे युग के क्रंदन और सृजन की हत्या!

अब मैं सिर्फ अनुमान लगा सकती हूं, मां आत्मकथा लिखतीं तो क्या दर्ज करतीं? बेटों को पढ़ा—लिखा कर 'आदमी' बनाने का संतोष? वह संतोष जो फ्रेम जड़ी फोटो में मां के चेहरे को अलौकिक दीप्ति से नहला गया है। मां अभिमान से भर कर बताती थीं — प्रकाश ताया जी ने हैडमास्टर बन कर उन्हें स्कूल के वार्षिक समारोह में बतौर मुख्य अतिथि आमंत्रित किया था। यही नहीं, पूरे स्कूल के सामने उनके पैर भी छुए और कहा कि आज वे जो कुछ हैं, मां की बदौलत, वरना गांव में कौन नहीं जानता कि भगत जी ने अपनी अलमस्ती में गृहस्थी पर रत्ती भर ध्यान नहीं दिया। पढ़ाई को जनून बना कर मां ने उनकी आंखों में न रोपा होता तो शायद वे गांव के और हमउम्रों की तरह बाप की गद्दी पर बैठ कर आढ़तिए का काम सम्हाल रहे होते। मां की आंखें छलछला आईं थीं। जाने क्यों मुझे लगा, सार्थकता के आह्लाद में उमड़े उन आंसुओं में एक आंसू अपनी पराजय का भी था — पढ़—लिख न सकने की हताशा का। इस हताशा में बेटी को आत्मनिर्भर न बना सकने का मलाल भी छिपा हो तो कोई आश्चर्य नहीं।

बुआ का ध्यान आने पर क्या मां को बेटों पर क्रोध नहीं आता होगा? प्राइवेट बी.ए.कर बुआ दो साल ब्याह के इंतजार में घर बैठी रहीं। गांव से दो स्टेशन की दूरी पर था बठिंडा। मालवा क्षेत्र का बड़ा शहर। बुआ से ज्यादा मां की तमन्ना थी — 'संतोष बी.टी. कर ले, बस। नौकरी करना कोई जरूरी नहीं, पर कभी नौकरी की जरूरत पड़े तो किसी का मुंह क्यों तके? दुनिया भर की लड़कियां नौकरी करती हैं। बुराई भी क्या है?' लेकिन लाहौर—जालंधर जाकर पढ़ाई करने वाले बेटों ने 'वीटो' कर दिया, 'नहीं, हमारे घर की लड़की रोज ट्रेन में दो—दो स्टेशन पार कर बठिंडा नहीं जाएगी। लड़कियां घर बैठी ही सोहती हैं।' मैं सोचती हूं, मां की उफनती चुप्पी में विवशता और अपमान से ज्यादा क्या भितरघात की पीड़ा नहीं रही होगी? पढ़े—लिखे बेटों में उनका अपना बाप!!

...और क्या लिखतीं मां आत्मकथा में? बाबा जी के संग दाम्पत्य के खट्टे—मीठे अनुभव? शिकवे—शिकायतें? मोहभंग? सामंजस्यपूर्ण साझा जीवन जीने का उल्लास जो आठ जिंदा संतानों के रूप में उन्हें निरंतर जोड़े रहा? या पोते के संग—संग बेटे को जन्म देने की शर्म ने उनके छुपे घावों को एक बार और कुरेद दिया होगा? मैंने मां और बाबा जी को कभी बात करते नहीं देखा। बाबा जी की दिनचर्या गृहस्थी के नियम—कायदों में कभी नहीं बंधी। देर सुबह लगभग ग्यारह बजे तक सोए रहते। उठते तो खंखार कर ड्योढी से अंदर आते। बहुओं के साथ—साथ मां भी सावधान हो जाती। अक्सर चिमटे में जलता अंगारा फंसा कर हमें आवाज देतीं — “जा, भगत जी की चिलम में रख आ।” बाबा जी हुक्का लेकर भूखे—उपासे दुकान की ओर चले जाते। भरी दोपहर जब लौटते तो सूना घर भांय—भांय कर रहा होता। मां समेत हम सब ऊपर चौबारों में। स्नानादि से निवृत्त होकर बाबा जी अपनी पालतू बिल्लियों को बुला लाते और रसोई में ढक कर रखा खाना मिल—बांट कर खाते। रात को भी यही क्रम दोहराया जाता। यह रिश्तों में पसरी कड़वाहट थी? या बिना रिश्ता पनपे साथ रहने की मजबूरी? परंपरा के निर्वाह का अभ्यास था? या अपने—अपने स्तर पर अजनबीपन की यंत्रणा भोगने का अभिशाप? क्या मां ने इस बर्फ को पिघलाने के लिए अपनी ओर से कोई पहल नहीं की होगी?

जाने क्यों मुझे लगा, मां आत्मकथा लिखतीं तो शिवरानी देवी की आग में सुभद्राकुमारी चौहान का संवेदनात्मक राग भर कर अपने मन की उथल—पुथल और किरचों को ठीक से देख पातीं। अटूट चुप्पियों में सैलाब की तरह फैलता आक्रोश जरूरी तोड़फोड़ के बाद जमीन को बेहद उर्वर बना देता है। कौन जाने, मां की बंद मुट्ठी में बीजों का अक्षय भंडार कैद हो? अधूरे सपनों और टीसती हूकों को बीज बना कर सम्हालाने की क्षमता मां में भरपूर थी। वे चाहती थीं नम ऊष्म जमीन जो बीजों को एक संवेदनशील संभाल के साथ सींच कर अंकुवा दे। लेकिन तमाम हसरतों और संघर्षों के बावजूद ऐसी चप्पा भर जमीन भी वे नहीं पा सकीं। ग्लानि से भर कर सोचती हूं, मां नहीं, एक पूरी पीढ़ी को गूंगा बना कर शब्द और सुर छीन लेने का अपराध ही क्या गतिरोधक की तरह बार—बार हमें जहां—तहां ठहरा नहीं देता? क्या अपनी अहंकारजन्य नकारात्मक भूमिका का आकलन किया है हमने कभी? दूसरों के रास्ते बंद कर आखिर किस मंजिल की ओर बढ़ना चाहते हैं हम?

मैं मन ही मन मां के कदमों में गुलाब का सफेद फूल रख देती हूं। यह मेरा इकबाल—ए—गुनाह है।


रोहिणी अग्रवाल


(ये लेखक के अपने विचार हैं।)
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