कहानी : न्याय की तुला - डॉ .बच्चन पाठक 'सलिल'

बक्सर, बिहार के 76 वर्षीय डॉ० बच्चन पाठक 'सलिल' का लेखन उनके उपनाम सलिल की तरह पानी के समान है, किसी भी विचारधारा से अप्रभावित. 1968 में प्रेमचंद की कृतियों पर करा गया उनका शोध कार्य (पीएच.डी.), आज विद्यार्थियों को पीएच.डी. अध्ययन में सहायता दे रहा है. उनको मिले सम्मानों में अमृत पुरुस्कार, राष्ट्रिय सदभावना पुरुस्कार, स्वामी प्रणवानंद सम्मान व भोजपुरी मूलन सम्मान आदि शामिल हैं. 

 न्याय की तुला - डॉ .बच्चन पाठक 'सलिल'

दसवीं शती में कश्मीर राज्य के अधिपति थे महाराज यशस्कर देव। ..वे अत्यंत पराक्रमी, न्याय प्रिय, धर्म में आस्था रखने वाले उदारशासक थे, उनके पराक्रम से भयभीत मध्य एशिया के किसी भी दस्यु जाति ने उनके शासनकाल में कश्मीर पर आक्रमण नहीं किया. अत्याचारी दस्युओं एवं आतंकवादियों को महाराजा क्षमा नहीं करते थे, यह सर्व विदित था। ...कश्मीर धन धान्य से पूर्ण था, पाटलिपुत्र से लेकर गांधार तक के व्यापारी आते, अपनी सामग्री बेचते और कश्मीर के वस्त्राभूषण क्रय करके ले जाते। सर्वत्र सुशान्ति थी, वस्तुतः जहाँ प्रशासन राज धर्म का निर्वहन करता है, वहीँ लक्ष्मी का निवास होता है।

     भगवती वितस्ता [झेलम] का जल अमृत के समान था, लोग वितस्ता की पूजा करते थे। उसे प्रदूषित करना दंडनीय अपराध था, वितस्ता भी कृषि कार्य से लेकर पेय जल तक की आवश्यकताएं पूरी करती थी। यदि वितस्ता की शपथ लेकर कोई अपनी बात कहता तो वह विश्वास योग्य माना जाता था। पुष्पों और फलों से उद्यान परिपूर्ण रहते थे, राज्य कर्मचारी कर्तव्यनिष्ठ और प्रजापालक थे। उन्हें राज्य की ओर से सभी सुविधाएँ प्राप्त थीं। पर निर्देश यह था कि किसी निरपराध नागरिक पर किसी प्रकार का अत्याचार न हो, इन सारे तथ्यों का सुंदर वर्णन ''राज तरंगिणी '' में कियागया है।

     एक दिन महाराज यशस्कर अपने दरबार में सिंहासन पर विराजमान थे, सभी सभासद अपने अपने स्थान पर बैठे थे। काशी से आये एक कवी भगवन शिव का गुणानुवाद कर रहे थे - सभासद साधुवाद दे रहे थे। .कुछ दरबारी कवि अपनी हीन भावना के कारण मन ही मन क्षुब्ध हो रहे थे - वस्तुतः इर्ष्य सार्वदेशिक सर्वकालिक व्याधि है।
अकस्मात मुख्य द्वारपाल ने आकर बताया ''महाराज की जय हो !'' महाराज ने उसकी ओर प्रश्न सूचक दृष्टि डाली ,द्वारपाल ने निवेदन किया - महाराज एक व्यक्ति सिर पर भगवती वितस्ता का जल एक घट में लेकर आया है, और बार बार कहता है - ''मै एक घटिका में राजद्वार पर आत्महत्या करूँगा ''

     महाराज विचलित हो गए। कविता पाठ बंद हो गया। सभासदों को बैठे रहने का संदेश देकर महाराज शीघ्र द्वार पर पहुंचे, देखा -एक प्रौढ़ व्यक्ति खड़ा है। हांव भाव से विह्वल वह विक्षिप्त नहीं जान पड़ता। हाँ ... आवेश में जरुर प्रतीत होता है। महाराज ने कोमल स्वर में पूछा - बन्धु। आपको क्या कष्ट है ? क्या किसी राज कर्मचारी ने आप पर अत्याचार किया है ? क्या आप धनाभाव से पीड़ित हैं ? क्या किसी ने आपकी आस्था पर प्रहार किया है ? आप भगवती वितस्ता के भक्त हैं। कृपया संक्षेप में बताएं, आपको क्या कष्ट है ? मै यथा सम्भव दूर करने का प्रयत्न करूँगा''।

     उस व्यक्ति ने कहा -''महाराज की जय हो, प्रबल प्रतापी महाराज यशस्कर देव के राज्य में कर्मचारी अनुशासित और प्रजा पालक हैं,  उनसे मुझे कोई कष्ट नहीं है। मै धनाभाव से भी पीड़ित नहीं हूँ। अभी मेरे पास एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ हैं। मै आत्मघात के बाद उसे राज कोष में प्रजा के लिए देना चाहता हूँ '' ।

     महाराज विचलित हो उठे, बोले – बन्धु! आत्मघात पातक है, आप अपनी व्यथा कहें। उस व्यक्ति ने निवेदन किया -'' महाराज मै मंगल नामक ब्राह्मण हूँ, पिता ने पढाया पर उनके देहावसान के बाद, मै कुसंगति में पड़ गया। मुझे सुरा, सुन्दरी का रोग लग गया, फलस्वरूप मेरे संचित द्रव्य, खेत, और उद्यान बिक गए, मैंने अपना निवास भी बेच दिया, अब मुझे प्रदेश जाने के सिवा कोई विकल्प नहीं था, मेरे निवास के पास एक कूप था उस पर सोपान थे, मैंने वहां एक कुटिया बनाई, अपनी पत्नी को उसमे रखा - मैंने उसे समझाया -'' तुम कूप के सोपान पर बैठ कर पथिकों को जल पिलाओ, जो कुछ मिल जाये उससे अपना निर्वाह करो, मै परदेश धन अर्जन के लिए जा रहा हूँ। शीघ्र ही धन लेकर आऊंगा, अब मै व्यसन मुक्त हूँ, मेरी चिंता मत करना।

     मेरा घर श्रेष्ठिन लक्ष्मीदास ने ख़रीदा था, मैंने राज लिपिक से स्पष्ट कह दिया था कि कूप सोपान रहित पूरा आवास लक्ष्मीदास को बेच रहा हूँ। कुछ दिनों तक तो पत्नी सोपान पर बैठ कर पथिकों की सेवा करती रही, फिर श्रेष्ठिन ने उसे बल पूर्वक हटा दिया, कूप को प्राचीर से घेर दिया,  मेरी राम मडैया तोड़ कर वहां पर अपना भंडार गृह बना लिया ...मै वापस आया। पत्नी ने कहा -''तुम्हारी लक्ष मुद्राएँ अब क्या करुँगी ? मै भिक्षाटन करती रही, हम दम्पति न्यायाधीश के पास गये उनसे भगवती वितस्ता और महाराज यशस्कर की शपथ खाकर सारी बात बतलाई,  उन्होंने श्रेष्ठिन से बात की और मुझे कह दिया -''श्रेष्ठिन ने कोई अनुचित कार्य नहीं किया ''...

     महाराज ने मंगल से एक दिन की अवधि ली और दरबार में लौट आये, वे सोच रहे थे - जिस राज्य में सर्वसाधारण का न्यायपालिका से विश्वास उठ जायेगा,  वह राज्य नष्ट हो जायेगा, उन्होंने न्यायाधीश से पूछा -न्यायाधीश ने निवेदन किया - ''महाराज, मैंने अभिलेख देखा, उसमे स्पष्ट लिखा है - ''कूप और सोपान सहित आवास बेच रहा हूँ। साक्षी के हताक्षर भी हैं, मै क्या कर सकता हूँ ?''

     महाराज चिंता निमग्न हो गये, उन्होंने देखा - सेठ लक्ष्मीदास एवं कुछ अन्य श्रेष्ठिन दरबार में उपस्थित हैं, सभी की उँगलियों में रत्न जटित मुद्रिकाएँ [अंगूठियाँ] हैं उन्होंने सबकी मुद्रिकाएँ ली और देखने लगे। पुनः बाहर गये और एक विश्वस्त अनुचर को लक्ष्मीदास की अंगूठी देकर बोले -''लक्ष्मी दास के घर जाओ, यह अंगूठी दिखाकर आवास -कूप का अभिलेख ले आओ। महाराज ने अभिलेख देखा, न्यायाधीश का कथन सही था, पर साथ ही उनकी दृष्टि व्यय पर पड़ी, राज लिपिक को एक सहस्र मुद्राएँ दी गईं, महाराज ने सोचा - इस छोटे से विवरण के लिए दस या पन्द्रह मुद्राएँ दी जाती हैं। इतनी बड़ी राशि क्यों दी गई ? कहीं यह उकोच [रिश्वत] तो नहीं ?

     राज लिपिक को बुलाया गया, तब तक यह चर्चा विस्तारित हो चुकी थी, लिपिक सहमा सहमा आया, उसने स्वीकार किया कि सेठ के कहने पर ही ''कूप सोपान रहित के स्थान पर ''सहित'' लिख दिया था, उसने एक सहस्र का उत्कोच भी स्वीकार किया।

     महाराज यशस्कर गम्भीर हो गये, उन्होंने निर्णय सुनाया - सेठ लक्ष्मीदास ने कपट किया है, राज्य कर्मचारी को उत्कोच देकर राज्य की प्रतिष्ठा पर आघात किया है, उनका यह आवास और कूप आज से मंगल का हो गया। लक्ष्मी दास की सेवाओं को देखते हुए उनकी सम्पत्ति का अधिग्रहण राज्य नहीं करेगा। उस पर उनके पुत्र का अधिकार रहेगा। लक्ष्मीदास दस वर्षों तक राज्य से निर्वासित रहेंगे। राज कर्मचारी उन्हें कल प्रातः रथ पर बैठा कर राज्य से बाहर छोड़ आयेगें ''

     उन्होंने फिर कहा - ''राज लिपिक को कार्य मुक्त किया जाता है ''

फिर न्यायाधीश से बोले -विद्वान् न्यायाधीश! न्याय में केवल अभिलेख और साक्ष्य का ही ध्यान नहीं रखा जाता, विवेक भी साथ रहना चाहिए –हमारी छठी इन्द्रिय ऐसे समय में उचित परामर्श देती है ...

     मंगल से बोले -'' अब तुम विवेक सम्मत ढंग से संस्कार युक्त रह कर अपना गृहस्थ जीवन बिताओ''


डॉ बच्चन पाठक 'सलिल'
पूर्व व्याख्याता [हिंदी साहित्य ] रांची विश्वविद्यालय ,
बाबा आश्रम कॉलोनी
आदित्यपुर -२
संपर्क: 0657-2370892

nmrk5136

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