चौं रे चम्पू, "उल्लू ने सूरज पर मुकदमा किया" —अशोक चक्रधर Choun re Champoo - Ashok Chakradhar

चौं रे चम्पू 

उल्लू ने सूरज पर मुकदमा किया

—अशोक चक्रधर

—चौं रे चम्पू! उल्लू, गधा, कुत्ता, जे गारी ऐं का?

—ये प्रेमपूर्ण गालियां हैं। वैसे यह बात इन तीनों जंतुओं से पूछनी चाहिए कि जब मनुष्य से इनकी तुलना की जाती है तो इन्हें कैसा लगता है? मेरा मानना है कि तीनों जंतु मनुष्य को लाभ ही पहुंचाते हैं, ख़ास नुकसान तो नहीं करते। उल्लू मनुष्य-समाज से दूर रहना पसन्द करता है। गधा एक सधा प्राणी है। कुत्ता निकट रहकर वफ़ादारी के कीर्तिमान बनाता है। कहा भी जाता है, ‘ज़माने में वफ़ा ज़िन्दा रहेगी, मगर कुत्तों से शर्मिन्दा रहेगी।’ जहां तक उल्लू का सवाल है, उल्लू को निर्बुद्ध, अपशकुनी और निशाचर माना जाता है। मेरी एक कविता की शुरुआत कुछ इस तरह से होती है, ‘गुर्गादास, कुछ उदास! मैंने पूछा, कष्ट क्या है ज़ाहिर हो! वे बोले, आजकल उल्लू टेढ़ा चल रहा है। मैंने कहा, तुम तो उल्लू सीधा करने में माहिर हो।’ आजकल चचा, सब अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं। चुनाव आने वाले हैं इसलिए सारे गुर्गादास परेशान हैं।

—जे बता चम्पू कै उल्लू सीधौ करिबे कौ मलतब का ऐ?

—यह एक शोध का विषय है। मुहावरों का जन्म किसी न किसी कारण से होता है, यह बात तय है। मुझे लगता है लक्ष्मी का वाहन होने के कारण माना जाता है। अपनी मूर्खता के रहते वह उचित-अनुचित का ध्यान नहीं रखता कि कहां लक्ष्मी की आवश्यकता है कहां नहीं है। जहां लक्ष्मी पहले से धनवृष्टि कर चुकी होती हैं, वहां उल्लू और-और कृपाएं दिलवाता है। अपने वाहन पर लक्ष्मी का कोई अंकुश तो शायद होता नहीं। ऐसे में जो लोग उल्लू में कंकड़ मार कर या सीटी बजा कर या गुलेल से दिशा बदल कर, अपने घर की तरफ सीधा करते रहे होंगे, वे ही उल्लू सीधा करने में माहिर माने जाते होंगे।

—दम ऐ तेरी बात में लल्ला, और काठ कौ उल्लू?

—अब ये कोई गाली है क्या? हमारे प्रशासन में कितने ही ऐसे व्यक्तित्व हैं जो काठ की मेज कुर्सी पर काठवत बैठे रहते हैं। ज़्यादा काम करो, ज़्यादा तनाव। कम काम करो, कम तनाव। कोई काम न करो, कोई तनाव नहीं। ऐसे काठ के उल्लू तनाव-शून्य रहते हैं।

—और उल्लू की दुम, उल्लू कौ पट्ठा?

—उल्लू की दुम का मुहावरा, ‘तुम’ से तुक मिलाने के लिए बना होगा। उल्लू कौ पट्ठा, तुम्हारे लिए नहीं, तुम्हारे संरक्षक के लिए उलाहना है।

—हास्य-ब्यंग के कवीन कूं जे तीनोंई प्रानी भौत पसन्द ऐं।

—हां चचा! इन पर हज़ारों कविताएं लिखी गई होंगी। ‘बरबाद गुलिस्तां करने को बस एक ही उल्लू काफ़ी है, हर शाख पे उल्लू बैठा है अंजामे गुलिस्तां क्या होगा?’ लेकिन चचा, अभी साहित्य अकादमी ने एक काव्य-उत्सव कराया। सोलह विदेशी कवि थे, पच्चीस भारतीय भाषाओं के। मॉरीशस से मेरे एक पच्चीस साल पुराने मित्र धनपाल राज हीरामन भी आए हुए थे। उन्होंने उल्लू पर एक मज़ेदार कविता सुनाई, ‘उल्लू ने सूरज पर मुकदमा कर दिया, उसकी शिकायत थी कि उसे दिन में भी दिखाई नहीं देता। सबूत के तौर पर उसने न्यायाधीश को अपनी मोटी-मोटी आंखें दिखाईं। सूरज मामला हार गया। जब से उसको जेल हुई, तबसे उल्लू रात को भी देखने लगा।

—जा कबता में का ब्यंग भयौ?

—कमाल है! एक व्यंग्य तो यह है कि आजकल उल्लू जैसे निर्बुद्ध, सूरज जैसे लोगों पर मुकदमा कर सकते हैं। दूसरा यह कि सूरज कैद में होगा तो समाज में चेतना का उजाला कैसे फैल पाएगा? उल्लूओं का ही साम्राज्य होगा।

—तोय उल्लू कह्यौ जाय तौ बुरौ तौ नायं मानैगौ?

—क्यों मानूंगा? उल्लू निशाचर है। हम भी रात-रातभर कविताएं सुनाने वाले निशाचर हैं। बुरा क्या मानना! जब हमारी व्यंग्य कविताएं इसीलिए होती हैं कि दूसरे बुरा मानें तो हमें भी कोसने वालों को नहीं कोसना चाहिए। अपना धैर्य परोसना चाहिए।

—धैर्य कौ धन तौ गधा कह्यौ जाय?

—वह भी कह लो, कोई आपत्ति नहीं, क्योंकि गधा तो स्वर्ग का अधिकारी है। निर्भय जी ने लिखा था, ’कोई कहता कूड़ा-करकट कीच गधा है। कोई कहता निपट-निरक्षर नीच गधा है। पर शब्दों के शिल्पी ने जब शब्द तराशे, उसने देखा स्वर्गधाम के बीच गधा है।’ चचा! फ़ाइनली, प्रेम ऐसा मामला है जो इंसान को उल्लू, गधा, कुत्ता कुछ भी बना सकता है।

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