विष्णु खरे: इरफान खान, तुम जिंदगी के समंदर पर तिरता अदना कॉर्क नहीं हो

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Vishnu Khare article for actor Irrfan Khan

जाने-माने लेखक और दिग्गज कवि विष्णु खरे का बुधवार को निधन हो गया। वह सहायक संपादक और संपादक के रूप में नवभारत टाइम्स से काफी लंबे अरसे तक जुड़े रहे। यहां पेश है उनका एक लेख:

(23, सितम्बर, सन्डे नवभारत टाइम्स, संपादक राजेश मित्तल)

इरफान खान को जब कैंसर होने का पता चला तो उन्होंने दिल को छूने वाला एक खत लिखा था जिसे खूब पढ़ा गया। विष्णु खरे ने उनके लिए दुआओं भरा यह लेख लिखा था।




यूं तो तुम्हें दिल्ली के उन दिनों से देखा है, जब तुम 1984 के आसपास नैशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में पढ़ रहे थे और मैं उस रवींद्र भवन में एक मुलाजिम था, जहां चौथी मंजिल पर तुम अभिनेता लोग आया-जाया करते थे, और एन.एस.डी. की गतिविधियों से जुड़े ‘दिनमान’ के संपादक और शेक्सपियर के अनुवादक हिंदी के हमारे बड़े कवि रघुवीर सहाय ने तुम्हारी प्रतिभा को तभी पहचान लिया था, जिस वजह से कई लेखक-पत्रकार दूर या करीब से तुम्हें अपने ही सर्किल का समझने लगे थे। फिर शायद एकाध दफा हम लोग सरसरी तौर पर मिले भी हैं। दिल्ली में लोग तुम्हारी ऐक्टिंग के कायल हो रहे थे और यह तय था कि तुम बरास्ता दिल्ली स्टेज और टेलिविजन मुंबई की फिल्मी दुनिया में दाखिल होगे ही। यही हुआ। लेकिन जिस तरह तुमने संघर्ष करते हुए थिएटर, टीवी और सिनेमा में अपने चेहरे-मोहरे और हुनर के लिए जगह बनाई, उसकी कल्पना शायद किसी को न थी। और इस वक्त महज 52 की उम्र में जो बुलंदियां तुमने छुईं हैं, उनके लिए तो अधिकांश सीनियर अदाकार भी तरसते और रश्क करते होंगे।

विष्णु खरे | 9 फरवरी 1940-19 सितंबर 2018 | फ़ोटो: भरत एस तिवारी

तो क्या यह किसी की बदनजर है, जो तुम्हें कदर लगी है। तुम्हारे लाखों-करोड़ों मुरीद यही सोचते थे कि तुम्हें शायद पीलिया या इसी तरह की कोई अर्ध-गंभीर बीमारी हुई है, जो अपना वक्त लेकर ठीक हो ही जाएगी। लेकिन यह बढ़े हुए दर्जे का न्यूरोएनडोक्राइन कैंसर। तुमने लंदन से लिखे गए अपने ख़त में ठीक ही कहा है कि यह कैंसर का ऐसा नाम है, जो पहली बार तुम्हारी जानकारी और जुबान पर आया। सच तो यह है कि यह तुम्हें हुआ है, इसलिए हम जैसे लाखों लोगों को भी पहली बार मालूम पड़ा है कि कोई ऐसा भी नासूर होता है। और तुम बताते हो कि यह बिरले लोगों को होता है और इसलिए इसके बारे में जानकारी बहुत कम है। इसका इलाज कैसे किया जाए, यह मालूम नहीं है और तुम पर जैसे कोई मेडिकल तजुर्बा किया जा रहा है।




तुम्हें ऐसा लगा कि जैसे तुम किसी स्पेशल ट्रेन में सफर कर रहे थे और तुम्हारे दिलोदिमाग सपनों, मनसूबों, मकसदों, हसरतों से लबरेज हैं, लेकिन तभी एक टिकट-चेकर आता है और तुम्हारे कंधे पर हाथ रखकर होशियार करता है कि तुम्हारी मंजिल आ रही है, उतरने के लिए तैयार हो जाओ। तुम कहते हो- नहीं… नहीं… अभी देर है। वह बोलता है, ‘नहीं, तुम्हें यहीं उतरना होगा। कभी-कभी ऐसा हो जाता है।’ अपने खत में तुमने सीन को इस तरह लिखा है, जैसे वह तुम्हारी किसी अगली फिल्म से हो। लेकिन तुम्हारे सामने सचाई आती है और तुम्हें लगता है कि जैसे तुम किसी बोतल से निकला हुआ काग हो, जो समंदर की विराट लहरों पर तैर रहा हो और उन्हें नियंत्रित करने की बेतहाशा कोशिश कर रहा हो। फिर सदमे, भय और घबराहट में तुमने अपने बेटे से कहा, ‘मुझे इस संकट में खुद से यही उम्मीद है कि मैं इस हालत में इससे मुकाबला न करूं। अपने पैरों पर खड़ा रहूं। डर और घबराहट मुझ पर हावी न हो पाएं और मैं दयनीय न होऊं।’

उसके बाद तकलीफ और पीड़ा और दर्द ने तुम पर हमला किया। तुम्हें मालूम हुआ कि तकलीफ कैसी कितनी हो सकती है। कुछ भी काम नहीं कर रहा था। कोई सांत्वना नहीं, कोई प्रेरणा नहीं। लगता था पूरी कायनात तकलीफ बन गई थी और दर्द ईश्वर से भी बड़ा हो गया था। तुम लिखते हो कि जब तुम शक्तिहीन, श्लथ और निराश अपने अस्पताल में दाखिल हो रहे थे, तब तुम्हें अहसास हुआ कि वह इमारत क्रिकेट की उस मक्का लॉर्ड्स मैदान के सामने थी, इसमें तुम बचपन में कभी खेलने का ख्वाब देखते थे। लेकिन तुममें कोई रोमांच न हुआ। यूं लगा कि जैसे यह दुनिया तुम्हारी कभी थी ही नहीं। यह लगा मानो क्रिकेट के मैदान और अस्पताल के बीच जिंदगी के खेल और मौत के खेल के बीच सिर्फ एक सड़क थी, जिसे तुम अपनी बालकनी से खड़े देख रहे थे। कुछ भी निश्चित नहीं था।

एक तुम जैसा अदाकार, जिसने देशी-विदेशी सैकड़ों नाटकों, सीरियलों, फिल्मों में काम किया हो, जिसे दर्जनों खिताब और ईनाम मिलते रहे हों, जिसे दुनियाभर के करोड़ों दर्शक और सैकड़ों फिल्म पत्रकार और समीक्षक चेहरे व नाम से जानते हों, जो जमाने भर का साहित्य जानता-पढ़ता रहा हो, जिंदगी और मौत के सारे मरहले समझता हो और अपनी कला में उतार चुका हो।




दरअसल तुम जीवन की विडंबनाएं जानते हो और तुम्हारी कई फिल्में इसीलिए बन पाई हैं कि तुम्हें जीवन पर और खुद पर हंसना भी खूब आता है। यह कहना मुश्किल है कि तुम्हारे निभाए चरित्रों और भूमिकाओं से संसार भर के कितने स्त्री-पुरुषों-बच्चों को कितनी कलात्मक खुशी और प्रेरणा मिलती होगी। तुमने कई अंतरराष्ट्रीय फिल्मों में काम किया है और हरेक की कई भाषाओं में समीक्षाएं हुई हैं और तुम्हारे अभिनय को सबने सराहा है। तुम विश्व के उत्कृष्ट कलाकारों की पंक्ति में आते हो। अपने संकट की इस विकट घड़ी में तुम एक मार्मिक कवि भी बन उठे हो। तुम जानते ही हो कि लाखों हाथ तुम्हारे लिए दुआ में उठे हुए हैं।

तुम लिखते हो कि तुम ब्रह्मांड की अकूत शक्ति और बुद्धिमत्ता के विराट प्रभाव को पहचान गए हो। उसने तुम्हें कहां स्थित कर दिया है। तुम जिंदगी के समंदर पर तिरता अदना कॉर्क नहीं हो, लेकिन मुझे तुम्हारी अगली फिल्म का इंतजार है। मुझे मालूम है कि उसमें तुम सराहे जाओगे। मुझे एक दैवी चमत्कार की भी प्रतीक्षा है, जिसे अभी कहने में भी डर लगता है।


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